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दशम स्कन्ध · अध्याय 50

द्वारका नगरी की स्थापना

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

श्लोक 1 (bhagavata.10.50.1)

श्रीशुक उवाच अस्तिः प्राप्तिश्च कंसस्य महिष्यौ भरतर्षभ । मृते भर्तरि दुःखार्ते ईयतुः स्म पितुर्गृहान् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca astiḥ prāptiś ca kaṁsasya mahiṣyau bharatarṣabha mṛte bhartari duḥkhārte īyatuḥ sma pitur gṛhān

श्रीशुकदेव ने कहा — हे भरतश्रेष्ठ! कंस की दोनों पत्नियाँ अस्ति और प्राप्ति, अपने पति के मारे जाने पर अत्यंत दुःखी होकर अपने पिता के घर चली गईं।

श्लोक 2 (bhagavata.10.50.2)

पित्रे मगधराजाय जरासन्धाय दुःखिते । वेदयां चक्रतुः सर्वमात्मवैधव्यकारणम् ॥ २ ॥

pitre magadha-rājāya jarāsandhāya duḥkhite vedayāṁ cakratuḥ sarvam ātma-vaidhavya-kāraṇam

उन दुःखी रानियों ने अपने पिता, मगध-नरेश जरासंध को, अपने वैधव्य का सारा कारण बता दिया।

श्लोक 3 (bhagavata.10.50.3)

स तदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्षयुतो नृप । अयादवीं महीं कर्तुं चक्रे परममुद्यमम् ॥ ३ ॥

sa tad apriyam ākarṇya śokāmarṣa-yuto nṛpa ayādavīṁ mahīṁ kartuṁ cakre paramam udyamam

हे राजन्! यह अप्रिय समाचार सुनकर शोक और क्रोध से भरे हुए जरासंध ने पृथ्वी को यादव-रहित करने का सबसे बड़ा प्रयत्न आरंभ कर दिया।

श्लोक 4 (bhagavata.10.50.4)

अक्षौहिणीभिर्विंशत्या तिसृभिश्चापि संवृतः । यदुराजधानीं मथुरां न्यरुधत् सर्वतोदिशम् ॥ ४ ॥

akṣauhiṇībhir viṁśatyā tisṛbhiś cāpi saṁvṛtaḥ yadu-rājadhānīṁ mathurāṁ nyarudhat sarvato diśam

तेईस अक्षौहिणी सेनाओं से घिरकर उसने यादवों की राजधानी मथुरा को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 5 (bhagavata.10.50.5)

निरीक्ष्य तद्बलं कृष्ण उद्वेलमिव सागरम् । स्वपुरं तेन संरुद्धं स्वजनं च भयाकुलम् ॥ ५ ॥

nirīkṣya tad-balaṁ kṛṣṇa udvelam iva sāgaram sva-puraṁ tena saṁruddhaṁ sva-janaṁ ca bhayākulam

उस सेना को समुद्र के समान उमड़ता हुआ देखकर, जिसने अपने नगर को घेर लिया था और जिससे अपने ही स्वजन भयभीत हो उठे थे,

श्लोक 6 (bhagavata.10.50.6)

चिन्तयामास भगवान् हरिः कारणमानुषः । तद्देशकालानुगुणं स्वावतारप्रयोजनम् ॥ ६ ॥

cintayām āsa bhagavān hariḥ kāraṇa-mānuṣaḥ tad-deśa-kālānuguṇaṁ svāvatāra-prayojanam

भगवान हरि, जो मूल कारण होते हुए भी मनुष्य के रूप में विचरण कर रहे थे, उस देश-काल के अनुरूप अपने अवतार के प्रयोजन का चिंतन करने लगे।

श्लोक 7 (bhagavata.10.50.7)

हनिष्यामि बलं ह्येतद्भुवि भारं समाहितम् । मागधेन समानीतं वश्यानां सर्वभूभुजाम् ॥ ७ ॥

haniṣyāmi balaṁ hy etad bhuvi bhāraṁ samāhitam māgadhena samānītaṁ vaśyānāṁ sarva-bhūbhujām

[भगवान ने सोचा—] मगधराज द्वारा अपने अधीन समस्त राजाओं से एकत्र की गई, और इस पृथ्वी पर भार-स्वरूप बनी हुई इस सेना का मैं वध करूँगा —

श्लोक 8 (bhagavata.10.50.8)

अक्षौहिणीभिः सङ्ख्यातं भटाश्वरथकुञ्जरैः । मागधस्तु न हन्तव्यो भूयः कर्ता बलोद्यमम् ॥ ८ ॥

akṣauhiṇībhiḥ saṅkhyātaṁ bhaṭāśva-ratha-kuñjaraiḥ māgadhas tu na hantavyo bhūyaḥ kartā balodyamam

— जो पैदल सैनिकों, अश्वों, रथों और हाथियों की अनेक अक्षौहिणियों से गिनी जाती है। परंतु मगधराज को मारना नहीं है, क्योंकि वह पुनः सेना जुटाने का कारण बनेगा।

श्लोक 9 (bhagavata.10.50.9)

एतदर्थोऽवतारोऽयं भूभारहरणाय मे । संरक्षणाय साधूनां कृतोऽन्येषां वधाय च ॥ ९ ॥

etad-artho ’vatāro ’yaṁ bhū-bhāra-haraṇāya me saṁrakṣaṇāya sādhūnāṁ kṛto ’nyeṣāṁ vadhāya ca

मेरे इस अवतार का यही प्रयोजन है — पृथ्वी का भार उतारना, साधुजनों की रक्षा करना और दुष्टों का वध करना।

श्लोक 10 (bhagavata.10.50.10)

अन्योऽपि धर्मरक्षायै देहः संभ्रियते मया । विरामायाप्यधर्मस्य काले प्रभवतः क्वचित् ॥ १० ॥

anyo ’pi dharma-rakṣāyai dehaḥ saṁbhriyate mayā virāmāyāpy adharmasya kāle prabhavataḥ kvacit

धर्म की रक्षा के लिए और जब-जब समय के प्रभाव से अधर्म बढ़ता है, तब-तब उसे रोकने के लिए भी मैं अन्य देह धारण करता हूँ।

श्लोक 11 (bhagavata.10.50.11)

एवं ध्यायति गोविन्द आकाशात् सूर्यवर्चसौ । रथावुपस्थितौ सद्यः ससूतौ सपरिच्छदौ ॥ ११ ॥

evaṁ dhyāyati govinda ākāśāt sūrya-varcasau rathāv upasthitau sadyaḥ sa-sūtau sa-paricchadau

गोविन्द के इस प्रकार चिंतन करते ही आकाश से सूर्य के समान तेजस्वी दो रथ, सारथियों और साज-सामान सहित, तत्काल वहाँ प्रकट हो गए।

श्लोक 12 (bhagavata.10.50.12)

आयुधानि च दिव्यानि पुराणानि यदृच्छया । दृष्ट्वा तानि हृषीकेशः सङ्कर्षणमथाब्रवीत् ॥ १२ ॥

āyudhāni ca divyāni purāṇāni yadṛcchayā dṛṣṭvā tāni hṛṣīkeśaḥ saṅkarṣaṇam athābravīt

उनके साथ ही उनके सनातन दिव्य अस्त्र भी अपने-आप वहाँ आ उपस्थित हुए। उन्हें देखकर हृषीकेश (कृष्ण) संकर्षण (बलराम) से इस प्रकार बोले।

श्लोक 13 (bhagavata.10.50.13)

पश्यार्य व्यसनं प्राप्तं यदूनां त्वावतां प्रभो । एष ते रथ आयातो दयितान्यायुधानि च ॥ १३ ॥

paśyārya vyasanaṁ prāptaṁ yadūnāṁ tvāvatāṁ prabho eṣa te ratha āyāto dayitāny āyudhāni ca

[कृष्ण ने कहा —] हे आर्य! आपके संरक्षण में रहने वाले यादवों पर आया यह संकट देखिए। हे प्रभो! देखिए, आपका रथ और आपके प्रिय अस्त्र भी आ पहुँचे हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.10.50.14)

एतदर्थं हि नौ जन्म साधूनामीश शर्मकृत् । त्रयोविंशत्यनीकाख्यं भूमेर्भारमपाकुरु ॥ १४ ॥

etad-arthaṁ hi nau janma sādhūnām īśa śarma-kṛt trayo-viṁśaty-anīkākhyaṁ bhūmer bhāram apākuru

साधुजनों के लिए कल्याण करने वाले हे ईश! हमारा यह जन्म इसी प्रयोजन के लिए हुआ है — अतः इन तेईस अक्षौहिणी सेनाओं के नाम से ज्ञात इस पृथ्वी के भार को दूर कीजिए।

श्लोक 15 (bhagavata.10.50.15)

एवं सम्मन्त्र्य दाशार्हौ दंशितौ रथिनौ पुरात् । निर्जग्मतुः स्वायुधाढ्यौ बलेनाल्पीयसा वृतौ ॥ १५ ॥

evaṁ sammantrya dāśārhau daṁśitau rathinau purāt nirjagmatuḥ svāyudhāḍhyau balenālpīyasā vṛtau

इस प्रकार परामर्श कर, कवच धारण किए हुए और अपने-अपने अस्त्रों से सुसज्जित वे दोनों दाशार्हवंशी रथों पर सवार होकर, अत्यंत छोटी-सी सेना के साथ नगर से बाहर निकल पड़े।

श्लोक 16 (bhagavata.10.50.16)

शङ्खं दध्मौ विनिर्गत्य हरिर्दारुकसारथिः । ततोऽभूत् परसैन्यानां हृदि वित्रासवेपथुः ॥ १६ ॥

śaṅkhaṁ dadhmau vinirgatya harir dāruka-sārathiḥ tato ’bhūt para-sainyānāṁ hṛdi vitrāsa-vepathuḥ

नगर से निकलते ही, दारुक के सारथ्य में हरि ने शंख बजाया, जिससे शत्रु-सेना के हृदय भय से काँप उठे।

श्लोक 17 (bhagavata.10.50.17)

तावाह मागधो वीक्ष्य हे कृष्ण पुरुषाधम । न त्वया योद्धुमिच्छामि बालेनैकेन लज्जया । गुप्तेन हि त्वया मन्द न योत्स्ये याहि बन्धुहन् ॥ १७ ॥

tāv āha māgadho vīkṣya he kṛṣṇa puruṣādhama na tvayā yoddhum icchāmi bālenaikena lajjayā guptena hi tvayā manda na yotsye yāhi bandhu-han

उन दोनों को देखकर मगधराज बोला — अरे कृष्ण, नराधम! मैं तुझ जैसे अकेले बालक से लड़ना नहीं चाहता, क्योंकि इसमें मुझे लज्जा आती है। अरे मूर्ख! तू तो सदा छिपकर वार करने वाला है — मैं तुझसे नहीं लडूँगा। हे बंधु-हन्ता! तू यहाँ से चला जा।

श्लोक 18 (bhagavata.10.50.18)

तव राम यदि श्रद्धा युध्यस्व धैर्यमुद्वह । हित्वा वा मच्छरैश्छिन्नं देहं स्वर्याहि मां जहि ॥ १८ ॥

tava rāma yadi śraddhā yudhyasva dhairyam udvaha hitvā vā mac-charaiś chinnaṁ dehaṁ svar yāhi māṁ jahi

हे राम! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो धैर्य धारण कर मुझसे युद्ध करो — या तो मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न होकर अपनी देह त्यागकर स्वर्ग जाओ, या फिर मुझे मार डालो।

श्लोक 19 (bhagavata.10.50.19)

श्रीभगवानुवाच न वै शूरा विकत्थन्ते दर्शयन्त्येव पौरुषम् । न गृह्णीमो वचो राजन्नातुरस्य मुमूर्षतः ॥ १९ ॥

śrī-bhagavān uvāca na vai śūrā vikatthante darśayanty eva pauruṣam na gṛhṇīmo vaco rājann āturasya mumūrṣataḥ

भगवान ने कहा — सच्चे शूरवीर डींग नहीं मारते, वे तो अपने पराक्रम को कर्म द्वारा ही सिद्ध करते हैं। हे राजन्! हम व्याकुल और मरने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के वचनों को गंभीरता से नहीं लेते।

श्लोक 20 (bhagavata.10.50.20)

श्रीशुक उवाच जरासुतस्तावभिसृत्य माधवौ महाबलौघेन बलीयसावृणोत् । ससैन्ययानध्वजवाजिसारथी सूर्यानलौ वायुरिवाभ्ररेणुभिः ॥ २० ॥

śrī-śuka uvāca jarā-sutas tāv abhisṛtya mādhavau mahā-balaughena balīyasāvṛnot sa-sainya-yāna-dhvaja-vāji-sārathī sūryānalau vāyur ivābhra-reṇubhiḥ

श्रीशुकदेव ने कहा — जरा के पुत्र जरासंध ने उन दोनों माधवों पर आक्रमण कर, अपनी विशाल सेना के प्रबल समूह से उन्हें उनकी सेना, रथ, ध्वजा, अश्व और सारथियों सहित उसी प्रकार घेर लिया, जैसे वायु बादलों और धूल से सूर्य और अग्नि को ढक देती है।

श्लोक 21 (bhagavata.10.50.21)

सुपर्णतालध्वजचिह्नितौ रथा- वलक्षयन्त्यो हरिरामयोर्मृधे । स्त्रियः पुराट्टालकहर्म्यगोपुरं समाश्रिताः सम्मुमुहुः शुचार्दिताः ॥ २१ ॥

suparṇa-tāla-dhvaja-cihitnau rathāv alakṣayantyo hari-rāmayor mṛdhe striyaḥ purāṭṭālaka-harmya-gopuraṁ samāśritāḥ sammumuhuḥ śucārditaḥ

गरुड़ और ताड़-वृक्ष के चिह्नों से पहचाने जाने वाले हरि और बलराम के रथों को युद्ध में न देख पाने पर, नगर के अट्टालिकाओं, भवनों और द्वारों पर खड़ी स्त्रियाँ शोक-संतप्त होकर मूर्च्छित हो गईं।

श्लोक 22 (bhagavata.10.50.22)

हरिः परानीकपयोमुचां मुहुः शिलीमुखात्युल्बणवर्षपीडितम् । स्वसैन्यमालोक्य सुरासुरार्चितं व्यस्फूर्जयच्छार्ङ्गशरासनोत्तमम् ॥ २२ ॥

hariḥ parānīka-payomucāṁ muhuḥ śilīmukhāty-ulbaṇa-varṣa-pīḍitam sva-sainyam ālokya surāsurārcitaṁ vyasphūrjayac chārṅga-śarāsanottamam

शत्रु-सेना रूपी मेघों से बार-बार बाणों की अत्यंत भीषण वर्षा से पीड़ित अपनी सेना को देखकर, हरि ने देवताओं और असुरों दोनों द्वारा पूजित अपने श्रेष्ठ शार्ङ्ग धनुष की टंकार की।

श्लोक 23 (bhagavata.10.50.23)

गृह्णन् निशङ्गादथ सन्दधच्छरान् विकृष्य मुञ्चन् शितबाणपूगान् । निघ्नन् रथान् कुञ्जरवाजिपत्तीन् निरन्तरं यद्वदलातचक्रम् ॥ २३ ॥

gṛhṇan niśaṅgād atha sandadhac charān vikṛṣya muñcan śita-bāṇa-pūgān nighnan rathān kuñjara-vāji-pattīn nirantaraṁ yadvad alāta-cakram

वे अपने तरकश से बाण निकालते, उन्हें धनुष पर चढ़ाते, प्रत्यंचा खींचकर तीखे बाणों के समूहों को छोड़ते हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों का संहार करने लगे — इस प्रकार निरंतर करते हुए वे अलात-चक्र (घूमती हुई मशाल) के समान प्रतीत होने लगे।

श्लोक 24 (bhagavata.10.50.24)

निर्भिन्नकुम्भाः करिणो निपेतु- रनेकशोऽश्वाः शरवृक्णकन्धराः । रथा हताश्वध्वजसूतनायकाः पदायतश्छिन्नभुजोरुकन्धराः ॥ २४ ॥

nirbhinna-kumbhāḥ kariṇo nipetur anekaśo ’śvāḥ śara-vṛkṇa-kandharāḥ rathā hatāśva-dhvaja-sūta-nāyakāḥ padāyataś chinna-bhujoru-kandharāḥ

मस्तक विदीर्ण हुए हाथी गिर पड़े, अनेक घोड़े बाणों से गर्दन कटकर धराशायी हो गए, रथ अपने अश्वों, ध्वजाओं, सारथियों और स्वामियों सहित नष्ट हो गए, तथा पैदल सैनिक कटी हुई भुजाओं, जंघाओं और गर्दनों के साथ भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 25 (bhagavata.10.50.25)

सञ्छिद्यमानद्विपदेभवाजिना- मङ्गप्रसूताः शतशोऽसृगापगाः । भुजाहयः पूरुषशीर्षकच्छपा हतद्विपद्वीपहयग्रहाकुलाः ॥ २५ ॥

sañchidyamāna-dvipadebha-vājinām aṅga-prasūtāḥ śataśo ’sṛg-āpagāḥ bhujāhayaḥ pūruṣa-śīrṣa-kacchapā hata-dvipa-dvīpa-haya grahākulāḥ

कटे हुए मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों के अंगों से सैकड़ों रक्त-नदियाँ बह चलीं, जिनमें कटी हुई भुजाएँ सर्पों-सी, मनुष्यों के सिर कछुओं-से, मरे हुए हाथी द्वीपों-से और मरे हुए घोड़े मगरमच्छों-से प्रतीत होते थे।

श्लोक 26 (bhagavata.10.50.26)

करोरुमीना नरकेशशैवला धनुस्तरङ्गायुधगुल्मसङ्कुलाः । अच्छूरिकावर्तभयानका महा- मणिप्रवेकाभरणाश्मशर्कराः ॥ २६ ॥

karoru-mīnā nara-keśa-śaivalā dhanus-taraṅgāyudha-gulma-saṅkulāḥ acchūrikāvarta-bhayānakā mahā- maṇi-pravekābharaṇāśma-śarkarāḥ

उनमें हाथ और जंघाएँ मछलियों-सी, मनुष्यों के केश जलीय शैवाल-से, धनुष तरंगों-से और अन्य अस्त्र झाड़ियों-से भरे प्रतीत होते थे; तलवारों से बने भँवर उन्हें भयावह बनाते थे, और बिखरे हुए बहुमूल्य रत्न-आभूषण उनमें कंकड़-पत्थरों के समान थे।

श्लोक 27 (bhagavata.10.50.27)

प्रवर्तिता भीरुभयावहा मृधे मनस्विनां हर्षकरीः परस्परम् । विनिघ्नतारीन् मुषलेन दुर्मदान् सङ्कर्षणेनापरिमेयतेजसा ॥ २७ ॥

pravartitā bhīru-bhayāvahā mṛdhe manasvināṁ harṣa-karīḥ parasparam vinighnatārīn muṣalena durmadān saṅkarṣaṇenāparīmeya-tejasā

अपार तेजस्वी संकर्षण द्वारा अपने मूसल से मदोन्मत्त शत्रुओं का संहार करते हुए युद्ध में प्रवाहित की गई वे रक्त-नदियाँ भीरुओं के लिए भयावह और वीर पुरुषों के लिए परस्पर हर्ष उत्पन्न करने वाली थीं।

श्लोक 28 (bhagavata.10.50.28)

बलं तदङ्गार्णवदुर्गभैरवं दुरन्तपारं मगधेन्द्रपालितम् । क्षयं प्रणीतं वसुदेवपुत्रयो- र्विक्रीडितं तज्जगदीशयोः परम् ॥ २८ ॥

balaṁ tad aṅgārṇava-durga-bhairavaṁ duranta-pāraṁ magadhendra-pālitam kṣayaṁ praṇītaṁ vasudeva-putrayor vikrīḍitaṁ taj jagad-īśayoḥ param

वह विशाल सेना, जो रक्त-सागर के समान दुर्गम और भयावह प्रतीत होती थी, जिसका पार पाना कठिन था और जो मगधराज द्वारा संचालित थी — वह इन जगदीश्वर वसुदेव-पुत्रों की परम लीला मात्र से ही नष्ट हो गई।

श्लोक 29 (bhagavata.10.50.29)

स्थित्युद्भवान्तं भुवनत्रयस्य यः समीहितेऽनन्तगुणः स्वलीलया । न तस्य चित्रं परपक्षनिग्रह- स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते ॥ २९ ॥

sthity-udbhavāntaṁ bhuvana-trayasya yaḥ samīhite ’nanta-guṇaḥ sva-līlayā na tasya citraṁ para-pakṣa-nigrahas tathāpi martyānuvidhasya varṇyate

जो अनंत गुणों वाले भगवान अपनी लीला-मात्र से ही तीनों लोकों की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं, उनके लिए विपक्षी सेना का दमन कोई आश्चर्य की बात नहीं है; फिर भी, मनुष्य के आचरण का अनुसरण करते हुए किए गए इस कार्य का वर्णन किया जाता है।

श्लोक 30 (bhagavata.10.50.30)

जग्राह विरथं रामो जरासन्धं महाबलम् । हतानीकावशिष्टासुं सिंहः सिंहमिवौजसा ॥ ३० ॥

jagrāha virathaṁ rāmo jarāsandhaṁ mahā-balam hatānīkāvaśiṣṭāsuṁ siṁhaḥ siṁham ivaujasā

जिसका रथ नष्ट हो चुका था और जिसकी सेना समाप्त होने पर केवल प्राण ही शेष रह गए थे, उस महाबली जरासंध को बलराम ने उसी बल से पकड़ लिया, जैसे एक सिंह दूसरे सिंह को पकड़ लेता है।

श्लोक 31 (bhagavata.10.50.31)

बध्यमानं हतारातिं पाशैर्वारुणमानुषैः । वारयामास गोविन्दस्तेन कार्यचिकीर्षया ॥ ३१ ॥

badhyamānaṁ hatārātiṁ pāśair vāruṇa-mānuṣaiḥ vārayām āsa govindas tena kārya-cikīrṣayā

अनेक शत्रुओं के संहारक उस जरासंध को जब बलराम वरुण-पाश और साधारण रस्सियों से बाँधने लगे, तब गोविन्द ने, उससे कोई और कार्य सिद्ध कराने की इच्छा से, उन्हें रोक दिया।

श्लोक 32 (bhagavata.10.50.32)

स मुक्तो लोकनाथाभ्यां व्रीडितो वीरसम्मतः । तपसे कृतसङ्कल्पो वारितः पथि राजभिः ॥ ३२ ॥

sā mukto loka-nāthābhyāṁ vrīḍito vīra-sammataḥ tapase kṛta-saṅkalpo vāritaḥ pathi rājabhiḥ

वीरों द्वारा सम्मानित जरासंध, दोनों लोकनाथों द्वारा छोड़े जाने पर लज्जित हो गया, और तपस्या करने का संकल्प लेकर चल पड़ा; परंतु मार्ग में अनेक राजाओं ने उसे रोक लिया।

श्लोक 33 (bhagavata.10.50.33)

वाक्यैः पवित्रार्थपदैर्नयनैः प्राकृतैरपि । स्वकर्मबन्धप्राप्तोऽयं यदुभिस्ते पराभवः ॥ ३३ ॥

vākyaiḥ pavitrārtha-padair nayanaiḥ prākṛtair api sva-karma-bandha-prāpto ’yaṁ yadubhis te parābhavaḥ

उन्होंने पवित्र और अर्थपूर्ण वचनों से, तथा सांसारिक तर्कों से भी उसे यह समझाया — "यादवों के हाथों तुम्हारी यह पराजय केवल तुम्हारे अपने कर्मों के बंधन का परिणाम है।"

श्लोक 34 (bhagavata.10.50.34)

हतेषु सर्वानीकेषु नृपो बार्हद्रथस्तदा । उपेक्षितो भगवता मगधान् दुर्मना ययौ ॥ ३४ ॥

hateṣu sarvānīkeṣu nṛpo bārhadrathas tadā upekṣito bhagavatā magadhān durmanā yayau

अपनी समस्त सेनाओं के नष्ट हो जाने पर, भगवान द्वारा उपेक्षित हुआ राजा बार्हद्रथ (जरासंध) उदास मन से मगध देश को लौट गया।

श्लोक 35 (bhagavata.10.50.35)

मुकुन्दोऽप्यक्षतबलो निस्तीर्णारिबलार्णवः । विकीर्यमाणः कुसुमैस्त्रीदशैरनुमोदितः ॥ ३५ ॥

mukundo ’py akṣata-balo nistīrṇāri-balārṇavaḥ vikīryamāṇaḥ kusumais trīdaśair anumoditaḥ

इधर मुकुन्द, अपनी सेना को अक्षत रखते हुए शत्रु-सेना के सागर को पार कर, देवताओं द्वारा पुष्प-वर्षा और अभिनंदन प्राप्त कर रहे थे।

श्लोक 36 (bhagavata.10.50.36)

माथुरैरुपसङ्गम्य विज्वरैर्मुदितात्मभिः । उपगीयमानविजयः सूतमागधवन्दिभिः ॥ ३६ ॥

māthurair upasaṅgamya vijvarair muditātmabhiḥ upagīyamāna-vijayaḥ sūta-māgadha-vandibhiḥ

मथुरावासी, जिनकी चिंता अब समाप्त हो चुकी थी, हर्षित मन से उनके पास आए, और सूत, मागध तथा वंदीजन उनकी विजय का गुणगान करने लगे।

श्लोक 37 (bhagavata.10.50.37)

शङ्खदुन्दुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः । वीणावेणुमृदङ्गानि पुरं प्रविशति प्रभौ ॥ ३७ ॥

śaṅkha-dundubhayo nedur bherī-tūryāṇy anekaśaḥ vīṇā-veṇu-mṛdaṅgāni puraṁ praviśati prabhau

जब प्रभु नगर में प्रवेश कर रहे थे, तब शंख और दुन्दुभियाँ बज उठीं, अनेक भेरी-तूर्य बजने लगे, तथा वीणा, वंशी और मृदंग का संगीत गूँज उठा।

श्लोक 38 (bhagavata.10.50.38)

सिक्तमार्गां हृष्टजनां पताकाभिरभ्यलङ्कृताम् । निर्घुष्टां ब्रह्मघोषेण कौतुकाबद्धतोरणाम् ॥ ३८ ॥

sikta-mārgāṁ hṛṣṭa-janāṁ patākābhir abhyalaṅkṛtām nirghuṣṭāṁ brahma-ghoṣeṇa kautukābaddha-toraṇām

नगर के मार्गों पर जल छिड़का गया था, प्रजा हर्षित थी, स्थान-स्थान पर ध्वजाओं से नगर सुसज्जित था, वैदिक मंत्रोच्चार से वह गुंजायमान था, और उत्सव के लिए द्वारों पर तोरण बाँधे गए थे।

श्लोक 39 (bhagavata.10.50.39)

निचीयमानो नारीभिर्माल्यदध्यक्षताङ्कुरैः । निरीक्ष्यमाणः सस्नेहं प्रीत्युत्कलितलोचनैः ॥ ३९ ॥

nicīyamāno nārībhir mālya-dadhy-akṣatāṅkuraiḥ nirīkṣyamāṇaḥ sa-snehaṁ prīty-utkalita-locanaiḥ

प्रेम से खिले हुए नेत्रों से स्नेहपूर्वक निहारती हुई नगर की स्त्रियाँ उन पर माला, दही, अक्षत और अंकुर बरसाने लगीं।

श्लोक 40 (bhagavata.10.50.40)

आयोधनगतं वित्तमनन्तं वीरभूषणम् । यदुराजाय तत् सर्वमाहृतं प्रादिशत्प्रभुः ॥ ४० ॥

āyodhana-gataṁ vittam anantaṁ vīra-bhūṣaṇam yadu-rājāya tat sarvam āhṛtaṁ prādiśat prabhuḥ

युद्धभूमि में पड़ा हुआ मारे गए वीरों का अपार आभूषण-धन एकत्र करवाकर प्रभु ने वह सब यदुराज (उग्रसेन) को अर्पित कर दिया।

श्लोक 41 (bhagavata.10.50.41)

एवं सप्तदशकृत्वस्तावत्यक्षौहिणीबलः । युयुधे मागधो राजा यदुभिः कृष्णपालितैः ॥ ४१ ॥

evaṁ saptadaśa-kṛtvas tāvaty akṣauhiṇī-balaḥ yuyudhe māgadho rājā yadubhiḥ kṛṣṇa-pālitaiḥ

इस प्रकार मगधराज सत्रह बार उतनी ही अक्षौहिणी सेना के साथ कृष्ण-रक्षित यादवों से युद्ध करता रहा।

श्लोक 42 (bhagavata.10.50.42)

अक्षिण्वंस्तद्बलं सर्वं वृष्णयः कृष्णतेजसा । हतेषु स्वेष्वनीकेषु त्यक्तोऽगादरिभिर्नृपः ॥ ४२ ॥

akṣiṇvaṁs tad-balaṁ sarvaṁ vṛṣṇayaḥ kṛṣṇa-tejasā hateṣu sveṣv anīkeṣu tyakto ’gād aribhir nṛpaḥ

वृष्णिवंशी कृष्ण के तेज से उसकी समस्त सेना का विनाश कर देते थे, और अपनी सेनाओं के नष्ट हो जाने पर वह राजा शत्रुओं द्वारा छोड़ दिया जाता और लौट जाता था।

श्लोक 43 (bhagavata.10.50.43)

अष्टादशमसङ्ग्राम आगामिनि तदन्तरा । नारदप्रेषितो वीरो यवनः प्रत्यदृश्यत ॥ ४३ ॥

aṣṭādaśama saṅgrāma āgāmini tad-antarā nārada-preṣito vīro yavanaḥ pratyadṛśyata

जब अठारहवाँ युद्ध होने ही वाला था, उससे पहले नारद द्वारा प्रेरित एक वीर यवन (काल-यवन) वहाँ प्रकट हो गया।

श्लोक 44 (bhagavata.10.50.44)

रुरोध मथुरामेत्य तिसृभिर्म्लेच्छकोटिभिः । नृलोके चाप्रतिद्वन्द्वो वृष्णीन्श्रुत्वात्मसम्मितान् ॥ ४४ ॥

rurodha mathurām etya tisṛbhir mleccha-koṭibhiḥ nṛ-loke cāpratidvandvo vṛṣṇīn śrutvātma-sammitān

मानव-लोक में जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था, ऐसे उस यवन ने मथुरा आकर तीन करोड़ म्लेच्छ सैनिकों के साथ उसे घेर लिया, क्योंकि उसने सुन रखा था कि वृष्णिवंशी उसके समकक्ष हैं।

श्लोक 45 (bhagavata.10.50.45)

तं दृष्ट्वाचिन्तयत् कृष्णः सङ्कर्षणसहायवान् । अहो यदूनां वृजिनं प्राप्तं ह्युभयतो महत् ॥ ४५ ॥

taṁ dṛṣṭvācintayat kṛṣṇaḥ saṅkarṣaṇa sahāyavān aho yadūnāṁ vṛjinaṁ prāptaṁ hy ubhayato mahat

उसे देखकर संकर्षण के साथ कृष्ण सोचने लगे — "अहो! यादवों पर तो दोनों ओर से महान संकट आ पड़ा है।

श्लोक 46 (bhagavata.10.50.46)

यवनोऽयं निरुन्धेऽस्मानद्य तावन्महाबलः । मागधोऽप्यद्य वा श्वो वा परश्वो वागमिष्यति ॥ ४६ ॥

yavano ’yaṁ nirundhe ’smān adya tāvan mahā-balaḥ māgadho ’py adya vā śvo vā paraśvo vāgamiṣyati

यह अत्यंत बलशाली यवन आज हमें घेरे हुए है, और मगधराज भी आज, कल या परसों तक यहाँ आ पहुँचेगा।

श्लोक 47 (bhagavata.10.50.47)

आवयोः युध्यतोरस्य यद्यागन्ता जरासुतः । बन्धून् हनिष्यत्यथवा नेष्यते स्वपुरं बली ॥ ४७ ॥

āvayoḥ yudhyator asya yady āgantā jarā-sutaḥ bandhūn haniṣyaty atha vā neṣyate sva-puraṁ balī

यदि हम दोनों इस यवन से युद्ध में उलझे हों और उसी समय जरासंध आ पहुँचे, तो वह बलशाली या तो हमारे बंधुओं को मार डालेगा या उन्हें बंदी बनाकर अपने नगर ले जाएगा।

श्लोक 48 (bhagavata.10.50.48)

तस्मादद्य विधास्यामो दुर्गं द्विपददुर्गमम् । तत्र ज्ञातीन् समाधाय यवनं घातयामहे ॥ ४८ ॥

tasmād adya vidhāsyāmo durgaṁ dvipada-durgamam tatra jñātīn samādhāya yavanaṁ ghātayāmahe

अतः हम अभी ऐसा दुर्ग बनाएँगे, जिसमें मनुष्यों का प्रवेश असंभव हो। वहाँ अपने स्वजनों को सुरक्षित रखकर हम इस यवन का वध करेंगे।"

श्लोक 49 (bhagavata.10.50.49)

इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम् । अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत् ॥ ४९ ॥

iti sammantrya bhagavān durgaṁ dvādaśa-yojanam antaḥ-samudre nagaraṁ kṛtsnādbhutam acīkarat

इस प्रकार परामर्श कर भगवान ने समुद्र के भीतर बारह योजन विस्तार वाला एक दुर्ग बनवाया, और उस दुर्ग में सर्वथा अद्भुत नगर का निर्माण करवाया।

श्लोक 50 (bhagavata.10.50.50)

दृश्यते यत्र हि त्वाष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनैपुणम् । रथ्याचत्वरवीथीभिर्यथावास्तु विनिर्मितम् ॥ ५० ॥

dṛśyate yatra hi tvāṣṭraṁ vijñānaṁ śilpa-naipuṇam rathyā-catvara-vīthībhir yathā-vāstu vinirmitam

उस नगर में त्वष्टा (विश्वकर्मा) का विज्ञान और शिल्प-कौशल स्पष्ट दिखाई देता था; वहाँ भवन-शास्त्र के अनुसार सड़कें, चौराहे और गलियाँ सुनियोजित ढंग से बनाई गई थीं।

श्लोक 51 (bhagavata.10.50.51)

सुरद्रुमलतोद्यानविचित्रोपवनान्वितम् । हेमशृङ्गैर्दिविस्पृग्भिः स्फटिकाट्टालगोपुरैः ॥ ५१ ॥

sura-druma-latodyāna- vicitropavanānvitam hema-śṛṅgair divi-spṛgbhiḥ sphaṭikāṭṭāla-gopuraiḥ

वह नगर देवोद्यानों की विचित्र लताओं और वृक्षों वाले उपवनों से सुशोभित था, तथा आकाश को स्पर्श करने वाले स्वर्णशिखर वाले, स्फटिक-निर्मित अट्टालिकाओं और गोपुरों से युक्त था।

श्लोक 52 (bhagavata.10.50.52)

राजतारकुटैः कोष्ठैर्हेमकुम्भैरलङ्कृतैः । रत्नकूतैर्गृहैर्हेमैर्महामारकत स्थलैः ॥ ५२ ॥

rājatārakuṭaiḥ koṣṭhair hema-kumbhair alaṅkṛtaiḥ ratna-kūtair gṛhair hemair mahā-mārakata-sthalaiḥ

वहाँ चाँदी और सोने के भांडागार सुवर्ण-कलशों से सुसज्जित थे; रत्न-जड़ित शिखरों वाले स्वर्णमय भवन थे, जिनके आँगन विशाल पन्नों से जड़े हुए थे।

श्लोक 53 (bhagavata.10.50.53)

वास्तोष्पतीनां च गृहैर्वल्लभीभिश्च निर्मितम् । चातुर्वर्ण्यजनाकीर्णं यदुदेवगृहोल्लसत् ॥ ५३ ॥

vāstoṣpatīnāṁ ca gṛhair vallabhībhiś ca nirmitam cātur-varṇya-janākīrṇaṁ yadu-deva-gṛhollasat

वहाँ गृह-देवताओं के मंदिर और छज्जों सहित निर्मित भवन थे; वह नगर चारों वर्णों की प्रजा से भरा हुआ था, और यदुदेव (कृष्ण) के भवन से विशेष रूप से सुशोभित हो रहा था।

श्लोक 54 (bhagavata.10.50.54)

सुधर्मां पारिजातं च महेन्द्रः प्राहिणोद्धरेः । यत्र चावस्थितो मर्त्यो मर्त्यधर्मैर्न युज्यते ॥ ५४ ॥

sudharmāṁ pārijātaṁ ca mahendraḥ prāhiṇod dhareḥ yatra cāvasthito martyo martya-dharmair na yujyate

महेन्द्र ने हरि के लिए सुधर्मा नामक सभा-भवन और पारिजात वृक्ष भेंट किए, जिसमें स्थित रहने वाला मनुष्य मृत्यु-धर्म से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 55 (bhagavata.10.50.55)

श्यामैकवर्णान् वरुणो हयान् शुक्लान्मनोजवान् । अष्टौ निधिपतिः कोशान् लोकपालो निजोदयान् ॥ ५५ ॥

śyāmaika-varṇān varuṇo hayān śuklān mano-javān aṣṭau nidhi-patiḥ kośān loka-pālo nijodayān

वरुण ने मन के समान वेगवान, गहरे श्याम और श्वेत वर्ण के अश्व अर्पित किए; निधिपति कुबेर ने अपने आठों निधि-कोश दिए; और प्रत्येक लोकपाल ने अपने-अपने ऐश्वर्य अर्पित किए।

श्लोक 56 (bhagavata.10.50.56)

यद् यद् भगवता दत्तमाधिपत्यं स्वसिद्धये । सर्वं प्रत्यर्पयामासुर्हरौ भूमिगते नृप ॥ ५६ ॥

yad yad bhagavatā dattam ādhipatyaṁ sva-siddhaye sarvaṁ pratyarpayām āsur harau bhūmi-gate nṛpa

हे राजन्! भगवान द्वारा पहले जो-जो अधिकार उन्हें अपने-अपने कार्यों की सिद्धि के लिए दिए गए थे, पृथ्वी पर भगवान के अवतरित होने पर देवताओं ने वे सभी अधिकार पुनः उन्हीं भगवान को अर्पित कर दिए।

श्लोक 57 (bhagavata.10.50.57)

तत्र योगप्रभावेन नीत्वा सर्वजनं हरिः । प्रजापालेन रामेण कृष्णः समनुमन्त्रितः । निर्जगाम पुरद्वारात् पद्ममाली निरायुधः ॥ ५७ ॥

tatra yoga-prabhāvena nītvā sarva-janaṁ hariḥ prajā-pālena rāmeṇa kṛṣṇaḥ samanumantritaḥ nirjagāma pura-dvārāt padma-mālī nirāyudhaḥ

अपनी योगशक्ति के प्रभाव से समस्त प्रजा को वहाँ पहुँचाकर, प्रजा-पालन के लिए मथुरा में रुके हुए बलराम से परामर्श कर, कृष्ण कमल-माला धारण किए हुए, निःशस्त्र होकर नगर के द्वार से बाहर निकले।

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