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दशम स्कन्ध · अध्याय 60

कृष्ण द्वारा रुक्मिणी से परिहास

अध्याय 59अध्याय-सूचीअध्याय 61

श्लोक 1 (bhagavata.10.60.1)

श्रीबादरायणिरुवाच कर्हिचित् सुखमासीनं स्वतल्पस्थं जगद्गुरुम् । पतिं पर्यचरद् भैष्मी व्यजनेन सखीजनैः ॥ 60.1 ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca karhicit sukham āsīnaṁ sva-talpa-sthaṁ jagad-gurum patiṁ paryacarad bhaiṣmī vyajanena sakhī-janaiḥ

श्री बादरायणि ने कहा — एक बार अपनी शय्या पर सुखपूर्वक बैठे हुए, जगद्गुरु अपने पति की सखियों सहित भैष्मी (रुक्मिणी) पंखा झलकर सेवा करने लगीं।

श्लोक 2 (bhagavata.10.60.2)

यस्त्वेतल्लीलया विश्वं सृजत्यत्त्यवतीश्वरः । स हि जातः स्वसेतूनां गोपीथाय यदुष्वजः ॥ 60.2 ॥

yas tv etal līlayā viśvaṁ sṛjaty atty avatīśvaraḥ sa hi jātaḥ sva-setūnāṁ gopīthāya yaduṣv ajaḥ

जो अपनी लीला मात्र से इस विश्व की सृष्टि, संहार और पालन करते हैं, वे परमेश्वर, अजन्मा भगवान, अपने ही धर्म-सेतुओं की रक्षा हेतु यदुवंश में अवतरित हुए।

श्लोक 3 (bhagavata.10.60.3)

तस्मिनन्तर्गृहे भ्राजन्मुक्तादामविलम्बिना । विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि ॥ 60.3 ॥

tasmin antar-gṛhe bhrājan- muktā-dāma-vilambinā virājite vitānena dīpair maṇi-mayair api

उस अंतःपुर में, चमकते मोतियों की मालाओं से लटकते वितान और मणि-निर्मित दीपों से सुशोभित,

श्लोक 4 (bhagavata.10.60.4)

मल्लिकादामभिः पुष्पैर्द्विरेफकुलनादिते । जालरन्ध्रप्रविष्टैश्च गोभिश्चन्द्रमसोऽमलैः ॥ 60.4 ॥

mallikā-dāmabhiḥ puṣpair dvirepha-kula-nādite jāla-randhra-praviṣṭaiś ca gobhiś candramaso ’malaiḥ

मल्लिका-पुष्पों की मालाओं पर भ्रमरों के गुंजार से गूँजते हुए, तथा जालीदार झरोखों से प्रविष्ट निर्मल चंद्र-किरणों से आलोकित,

श्लोक 5 (bhagavata.10.60.5)

पारिजातवनामोदवायुनोद्यानशालिना । धूपैरगुरुजै राजन् जालरन्ध्रविनिर्गतैः ॥ 60.5 ॥

pārijāta-vanāmoda- vāyunodyāna-śālinā dhūpair aguru-jai rājan jāla-randhra-vinirgataiḥ

पारिजात-वन की सुगंध लिए वायु से, मानो कक्ष में उद्यान का-सा वातावरण बना रही हो, तथा जालीदार झरोखों से बाहर निकलती अगुरु-धूप की सुवास सहित, हे राजन्,

श्लोक 6 (bhagavata.10.60.6)

पयःफेननिभे शुभ्रे पर्यङ्के कशिपूत्तमे । उपतस्थे सुखासीनं जगतामीश्वरं पतिम् ॥ 60.6 ॥

payaḥ-phena-nibhe śubhre paryaṅke kaśipūttame upatasthe sukhāsīnaṁ jagatām īśvaraṁ patim

दूध के फेन के समान श्वेत शय्या पर, उत्तम तकिये पर सुखपूर्वक विराजमान अपने पति, जगदीश्वर की, वे सेवा करने लगीं।

श्लोक 7 (bhagavata.10.60.7)

वालव्यजनमादाय रत्नदण्डं सखीकरात् । तेन वीजयती देवी उपासां चक्र ईश्वरम् ॥ 60.7 ॥

vāla-vyajanam ādāya ratna-daṇḍaṁ sakhī-karāt tena vījayatī devī upāsāṁ cakra īśvaram

अपनी सखी के हाथ से रत्नजड़ित दंड वाला चँवर लेकर देवी उस पंखे से अपने स्वामी की सेवा करने लगीं।

श्लोक 8 (bhagavata.10.60.8)

सोपाच्युतं क्वणयती मणिनूपुराभ्यां रेजेऽङ्गुलीयवलयव्यजनाग्रहस्ता । वस्त्रान्तगूढकुचकुङ्कुमशोणहार- भासा नितम्बधृतया च परार्ध्यकाञ्च्या ॥ 60.8 ॥

sopācyutaṁ kvaṇayatī maṇi-nūpurābhyāṁ reje ’ṅgulīya-valaya-vyajanāgra-hastā vastrānta-gūḍha-kuca-kuṅkuma-śoṇa-hāra- bhāsā nitamba-dhṛtayā ca parārdhya-kāñcyā

अच्युत के निकट खड़ी, अपने मणि-नूपुरों को झंकृत करती, अंगूठियों-कंगन तथा पंखे से सुशोभित हाथ वाली वे देवी अत्यंत मनोहर लग रही थीं — वस्त्र के आँचल से आधे ढके स्तनों के कुंकुम से रँगी उनकी माला की आभा, तथा कटि पर धारण की गई अमूल्य करधनी से वे और भी दीप्त हो रही थीं।

श्लोक 9 (bhagavata.10.60.9)

तां रूपिणीं श्रियमनन्यगतिं निरीक्ष्य या लीलया धृततनोरनुरूपरूपा । प्रीतः स्मयन्नलककुण्डलनिष्ककण्ठ- वक्त्रोल्लसत्स्मितसुधां हरिराबभाषे ॥ 60.9 ॥

tāṁ rūpiṇīṁ śrīyam ananya-gatiṁ nirīkṣya yā līlayā dhṛta-tanor anurūpa-rūpā prītaḥ smayann alaka-kuṇḍala-niṣka-kaṇṭha- vaktrollasat-smita-sudhāṁ harir ābabhāṣe

उन्हें, जो साक्षात् श्री (लक्ष्मी) थीं, जिनका आश्रय उनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं, तथा जिनका रूप उन्हीं लीला-देह के अनुरूप था, देखकर प्रसन्न-मुस्कुराते हरि, जिनका मुख घुँघराले केश, कुण्डल तथा कंठहार से सुशोभित था और मुस्कान का अमृत जिनके मुख पर छलक रहा था, बोले।

श्लोक 10 (bhagavata.10.60.10)

श्रीभगवानुवाच राजपुत्रीप्सिता भूपैर्लोकपालविभूतिभिः । महानुभावैः श्रीमद्भी रूपौदार्यबलोर्जितैः ॥ 60.10 ॥

śrī-bhagavān uvāca rāja-putrīpsitā bhūpair loka-pāla-vibhūtibhiḥ mahānubhāvaiḥ śrīmadbhī rūpaudārya-balorjitaiḥ

भगवान ने कहा — हे राजकुमारी! तुम्हें लोकपालों के समान समर्थ राजाओं ने चाहा था — जो प्रभावशाली, ऐश्वर्यवान, सौंदर्य, उदारता और बल से भरपूर थे।

श्लोक 11 (bhagavata.10.60.11)

तान्प्राप्तानर्थिनो हित्वा चैद्यादीन् स्मरदुर्मदान् । दत्ता भ्रात्रा स्वपित्रा च कस्मान्नो ववृषेऽसमान् ॥ 60.11 ॥

tān prāptān arthino hitvā caidyādīn smara-durmadān dattā bhrātrā sva-pitrā ca kasmān no vavṛṣe ’samān

अपने भाई और पिता द्वारा दिए गए, तुम्हारे समक्ष उपस्थित चेदिराज तथा अन्य उत्सुक वरों को त्यागकर, तुमने हमें, जो उनके समकक्ष नहीं हैं, क्यों चुना?

श्लोक 12 (bhagavata.10.60.12)

राजभ्यो बिभ्यतः सुभ्रु समुद्रं शरणं गतान् । बलवद्भिः कृतद्वेषान् प्रायस्त्यक्तनृपासनान् ॥ 60.12 ॥

rājabhyo bibhyataḥ su-bhru samudraṁ śaraṇaṁ gatān balavadbhiḥ kṛta-dveṣān prāyas tyakta-nṛpāsanān

हे सुभ्रु! उन राजाओं से भयभीत होकर हमने समुद्र की शरण ली; हमने बलवानों की शत्रुता मोल ली है, और प्रायः राजसिंहासन का भी त्याग कर दिया है।

श्लोक 13 (bhagavata.10.60.13)

अस्पष्टवर्त्मनां पुंसामलोकपथमीयुषाम् । आस्थिताः पदवीं सुभ्रु प्रायः सीदन्ति योषितः ॥ 60.13 ॥

aspaṣṭa-vartmanām puṁsām aloka-patham īyuṣām āsthitāḥ padavīṁ su-bhru prāyaḥ sīdanti yoṣitaḥ

हे सुभ्रु! जिन पुरुषों का आचरण अनिश्चित हो तथा जो समाज-अस्वीकृत मार्ग पर चलते हों, उनका अनुसरण करने वाली स्त्रियाँ प्रायः दुःख भोगती हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.10.60.14)

निष्किञ्चना वयं शश्वन्निष्किञ्चनजनप्रियाः । तस्मात् प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे ॥ 60.14 ॥

niṣkiñcanā vayaṁ śaśvan niṣkiñcana-jana-priyāḥ tasmā tprāyeṇa na hy āḍhyā māṁ bhajanti su-madhyame

हम सदा निष्किंचन हैं, और निष्किंचनजनों को ही प्रिय हैं; अतः हे सुमध्यमे! धनवान प्रायः मेरी उपासना नहीं करते।

श्लोक 15 (bhagavata.10.60.15)

ययोरात्मसमं वित्तं जन्मैश्वर्याकृतिर्भवः । तयोर्विवाहो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्वचित् ॥ 60.15 ॥

yayor ātma-samaṁ vittaṁ janmaiśvaryākṛtir bhavaḥ tayor vivāho maitrī ca nottamādhamayoḥ kvacit

जिन दोनों का धन, जन्म, ऐश्वर्य, रूप और कुल समान हो, उन्हीं में विवाह और मित्रता उचित होती है — श्रेष्ठ और निकृष्ट में कभी नहीं।

श्लोक 16 (bhagavata.10.60.16)

वैदर्भ्येतदविज्ञाय त्वयादीर्घसमीक्षया । वृता वयं गुणैर्हीना भिक्षुभिः श्लाघिता मुधा ॥ 60.16 ॥

vaidarbhy etad avijñāya tvayādīrgha-samīkṣayā vṛtā vayaṁ guṇair hīnā bhikṣubhiḥ ślāghitā mudhā

हे वैदर्भी! यह न जानते हुए, दूरदर्शिता के अभाव में, तुमने गुणहीन तथा केवल भिखारियों द्वारा व्यर्थ ही प्रशंसित हमें चुन लिया।

श्लोक 17 (bhagavata.10.60.17)

अथात्मनोऽनुरूपं वै भजस्व क्षत्रियर्षभम् । येन त्वमाशिषः सत्या इहामुत्र च लप्स्यसे ॥ 60.17 ॥

athātmano ’nurūpaṁ vai bhajasva kṣatriyarṣabham yena tvam āśiṣaḥ satyā ihāmutra ca lapsyase

अब तुम अपने अनुरूप वर स्वीकार करो — किसी श्रेष्ठ क्षत्रिय को, जिसके द्वारा इस लोक और परलोक दोनों में तुम्हारी आशाएँ सत्य हो सकें।

श्लोक 18 (bhagavata.10.60.18)

चैद्यशाल्वजरासन्धदन्तवक्रादयो नृपाः । मम द्विषन्ति वामोरु रुक्मी चापि तवाग्रजः ॥ 60.18 ॥

caidya-śālva-jarāsandha dantavakrādayo nṛpāḥ mama dviṣanti vāmoru rukmī cāpi tavāgrajaḥ

हे वामोरु! चेदिराज, शाल्व, जरासंध और दन्तवक्र जैसे राजा मुझसे द्वेष रखते हैं — और तुम्हारा अग्रज रुक्मी भी।

श्लोक 19 (bhagavata.10.60.19)

तेषां वीर्यमदान्धानां दृप्तानां स्मयनुत्तये । आनितासि मया भद्रे तेजोपहरतासताम् ॥ 60.19 ॥

teṣāṁ vīrya-madāndhānāṁ dṛptānāṁ smaya-nuttaye ānitāsi mayā bhadre tejopaharatāsatām

हे भद्रे! उन शक्ति-मद से अंधे, अहंकारी पुरुषों का गर्व चूर्ण करने तथा दुष्टों का बल हरने के लिए ही मैं तुम्हें ले आया।

श्लोक 20 (bhagavata.10.60.20)

उदासीना वयं नूनं न स्त्र्यपत्यार्थकामुकाः । आत्मलब्ध्यास्महे पूर्णा गेहयोर्ज्योतिरक्रियाः ॥ 60.20 ॥

udāsīnā vayaṁ nūnaṁ na stry-apatyārtha-kāmukāḥ ātma-labdhyāsmahe pūrṇā gehayor jyotir-akriyāḥ

निश्चय ही हम उदासीन हैं, स्त्री, संतान और धन की कामना नहीं रखते; आत्मतृप्त और पूर्ण, शरीर और गृह के प्रति हम मात्र साक्षी ज्योति के समान निष्क्रिय रहते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.10.60.21)

श्रीशुक उवाच एतावदुक्त्वा भगवानात्मानं वल्लभामिव । मन्यमानामविश्लेषात् तद्दर्पघ्न उपारमत् ॥ 60.21 ॥

śrī-śuka uvāca etāvad uktvā bhagavān ātmānaṁ vallabhām iva manyamānām aviśleṣāt tad-darpa-ghna upāramat

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इतना कहकर, अपने कभी साथ न छोड़ने के कारण स्वयं को विशेष प्रिय मानने के अभिमान को नष्ट करने वाले भगवान चुप हो गए।

श्लोक 22 (bhagavata.10.60.22)

इति त्रिलोकेशपतेस्तदात्मनः प्रियस्य देव्यश्रुतपूर्वमप्रियम् । आश्रुत्य भीता हृदि जातवेपथु- श्चिन्तां दुरन्तां रुदती जगाम ह ॥ 60.22 ॥

iti trilokeśa-pates tadātmanaḥ priyasya devy aśruta-pūrvam apriyam āśrutya bhītā hṛdi jāta-vepathuś cintāṁ durantāṁ rudatī jagāma ha

त्रिलोकाधीशों के भी स्वामी, अपने प्रियतम से इससे पहले कभी न सुने गए ऐसे अप्रिय वचन सुनकर वह देवी भयभीत हो उठीं; उनके हृदय में कम्पन उठा, और रोती हुई वे भीषण चिंता में डूब गईं।

श्लोक 23 (bhagavata.10.60.23)

पदा सुजातेन नखारुणश्रिया भुवं लिखन्त्यश्रुभिरञ्जनासितैः । आसिञ्चती कुङ्कुमरूषितौ स्तनौ तस्थावधोमुख्यतिदुःखरुद्धवाक् ॥ 60.23 ॥

padā su-jātena nakhāruṇa-śrīyā bhuvaṁ likhanty aśrubhir añjanāsitaiḥ āsiñcatī kuṅkuma-rūṣitau stanau tasthāv adho-mukhy ati-duḥkha-ruddha-vāk

अपने कोमल, नखों की लालिमा से देदीप्यमान पैर से भूमि को कुरेदती हुई, काजल से काले आँसू अपने कुंकुम-रंजित स्तनों पर टपकाती हुई, वे मुख नीचा किए, अत्यंत दुःख से अवरुद्ध वाणी लिए खड़ी रहीं।

श्लोक 24 (bhagavata.10.60.24)

तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव मुह्यन् रम्भेव वायुविहतो प्रविकीर्य केशान् ॥ 60.24 ॥

tasyāḥ su-duḥkha-bhaya-śoka-vinaṣṭa-buddher hastāc chlathad-valayato vyajanaṁ papāta dehaś ca viklava-dhiyaḥ sahasaiva muhyan rambheva vāyu-vihato pravikīrya keśān

अत्यंत दुःख, भय और शोक से बुद्धि खोई हुई, उनके हाथ से कंगन ढीले होकर पंखा गिर पड़ा; और मन विचलित होकर सहसा वे मूर्च्छित हो गईं, बाल बिखर गए, मानो वायु से गिरा हुआ कदली-वृक्ष।

श्लोक 25 (bhagavata.10.60.25)

तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णः प्रियायाः प्रेमबन्धनम् । हास्यप्रौढिमजानन्त्याः करुणः सोऽन्वकम्पत ॥ 60.25 ॥

tad dṛṣṭvā bhagavān kṛṣṇaḥ priyāyāḥ prema-bandhanam hāsya-prauḍhim ajānantyāḥ karuṇaḥ so ’nvakampata

यह देखकर — कि उनकी प्रिया, प्रेम-बंधन में बँधी होने के कारण उनकी परिहास की गंभीरता को न समझ सकीं — करुणामय भगवान कृष्ण को उन पर दया आ गई।

श्लोक 26 (bhagavata.10.60.26)

पर्यङ्कादवरुह्याशु तामुत्थाप्य चतुर्भुजः । केशान् समुह्य तद्वक्त्रं प्रामृजत् पद्मपाणिना ॥ 60.26 ॥

paryaṅkād avaruhyāśu tām utthāpya catur-bhujaḥ keśān samuhya tad-vaktraṁ prāmṛjat padma-pāṇinā

शीघ्र ही शय्या से उतरकर, चार भुजाएँ प्रकट कर, उन्होंने उसे उठाया, उसके बिखरे केश समेटे, और अपने करकमल से उसका मुख पोंछा।

श्लोक 27 (bhagavata.10.60.27)

प्रमृज्याश्रुकले नेत्रे स्तनौ चोपहतौ शुचा । आश्लिष्य बाहुना राजननन्यविषयां सतीम् ॥ 60.27 ॥

pramṛjyāśru-kale netre stanau copahatau śucā āśliṣya bāhunā rājan ananya-viṣayāṁ satīm

उसके अश्रुपूर्ण नेत्रों तथा शोक से अस्तव्यस्त स्तनों को पोंछते हुए, तथा हे राजन्, उस अनन्य-निष्ठ सती को अपनी भुजा से आलिंगन करते हुए —

श्लोक 28 (bhagavata.10.60.28)

सान्त्वयामास सान्त्वज्ञः कृपया कृपणां प्रभुः । हास्यप्रौढिभ्रमच्चित्तामतदर्हां सतां गतिः ॥ 60.28 ॥

sāntvayām āsa sāntva-jñaḥ kṛpayā kṛpaṇāṁ prabhuḥ hāsya-prauḍhi-bhramac-cittām atad-arhāṁ satāṁ gatiḥ

सांत्वना की कला में निपुण, सज्जनों की परम गति वे प्रभु उस दयनीय, अपने परिहास की प्रगल्भता से चित्त-विभ्रांत, इसके अयोग्य उस रुक्मिणी को करुणापूर्वक सांत्वना देने लगे।

श्लोक 29 (bhagavata.10.60.29)

श्रीभगवानुवाच मा मा वैदर्भ्यसूयेथा जाने त्वां मत्परायणाम् । त्वद्वचः श्रोतुकामेन क्ष्वेल्याचरितमङ्गने ॥ 60.29 ॥

śrī-bhagavān uvāca mā mā vaidarbhy asūyethā jāne tvāṁ mat-parāyaṇām tvad-vacaḥ śrotu-kāmena kṣvelyācaritam aṅgane

भगवान ने कहा — हे वैदर्भी! मुझसे रुष्ट मत हो, मत हो — मैं जानता हूँ तुम केवल मेरी ही परायण हो। हे प्रिये! मैंने केवल तुम्हारे वचन सुनने की इच्छा से यह परिहास किया था।

श्लोक 30 (bhagavata.10.60.30)

मुखं च प्रेमसंरम्भस्फुरिताधरमीक्षितुम् । कटाक्षेपारुणापाङ्गं सुन्दरभ्रुकुटीतटम् ॥ 60.30 ॥

mukhaṁ ca prema-saṁrambha- sphuritādharam īkṣitum kaṭā-kṣepāruṇāpāṅgaṁ sundara-bhru-kuṭī-taṭam

मैं तुम्हारा वह मुख भी देखना चाहता था, जिसके अधर प्रेम-आवेश से काँप रहे हों, नेत्रों के कोर कटाक्ष से लाल हों, और सुंदर भौंहें तनी हुई हों।

श्लोक 31 (bhagavata.10.60.31)

अयं हि परमो लाभो गृहेषु गृहमेधिनाम् । यन्नर्मैरीयते यामः प्रियया भीरु भामिनि ॥ 60.31 ॥

ayaṁ hi paramo lābho gṛheṣu gṛha-medhinām yan narmair īyate yāmaḥ priyayā bhīru bhāmini

हे भीरु, हे भामिनि! गृहस्थों के लिए घर में यही सबसे बड़ा लाभ है — अपनी प्रिया के साथ परिहास में बिताया गया समय।

श्लोक 32 (bhagavata.10.60.32)

श्रीशुक उवाच सैवं भगवता राजन् वैदर्भी परिसान्त्विता । ज्ञात्वा तत्परिहासोक्तिं प्रियत्यागभयं जहौ ॥ 60.32 ॥

śrī-śuka uvāca saivaṁ bhagavatā rājan vaidarbhī parisāntvitā jñātvā tat-parihāsoktiṁ priya-tyāga-bhayaṁ jahau

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे राजन्! भगवान द्वारा इस प्रकार पूर्णतः सांत्वना पाकर तथा उनके वचनों को परिहास समझकर वैदर्भी ने अपने प्रियतम द्वारा त्याग दिए जाने के भय को त्याग दिया।

श्लोक 33 (bhagavata.10.60.33)

बभाष ऋषभं पुंसां वीक्षन्ती भगवन्मुखम् । सव्रीडहासरुचिरस्निग्धापाङ्गेन भारत ॥ 60.33 ॥

babhāṣa ṛṣabhaṁ puṁsāṁ vīkṣantī bhagavan-mukham sa-vrīḍa-hāsa-rucira- snigdhāpāṅgena bhārata

हे भरतवंशी! पुरुषों में श्रेष्ठ भगवान के मुख को लज्जायुक्त, मनोहर, स्नेहसिक्त मुस्कान भरी दृष्टि से निहारती हुई वे बोलीं।

श्लोक 34 (bhagavata.10.60.34)

श्रीरुक्मिण्युवाच नन्वेवमेतदरविन्दविलोचनाह यद्वै भवान् भगवतोऽसदृशी विभूम्नः । क्व स्वे महिम्न्यभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरज्ञगृहीतपादा ॥ 60.34 ॥

śrī-rukmiṇy uvāca nanv evam etad aravinda-vilocanāha yad vai bhavān bhagavato ’sadṛśī vibhūmnaḥ kva sve mahimny abhirato bhagavāṁs try-adhīśaḥ kvāhaṁ guṇa-prakṛtir ajña-gṛhīta-pādā

श्री रुक्मिणी ने कहा — हे कमलनयन! ठीक है, जो आपने कहा वही सत्य है — कि आप, अद्वितीय और सर्वशक्तिमान, मेरे अयोग्य हैं। कहाँ वे भगवान, जो अपनी ही महिमा में रमण करते हैं, त्रिदेवों के स्वामी हैं, और कहाँ मैं, सांसारिक गुणों वाली, जिसके चरण मात्र अज्ञानी ही ग्रहण करते हैं?

श्लोक 35 (bhagavata.10.60.35)

सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । नित्यं कदिन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवकैर्नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ 60.35 ॥

satyaṁ bhayād iva guṇebhya urukramāntaḥ śete samudra upalambhana-mātra ātmā nityaṁ kad-indriya-gaṇaiḥ kṛta-vigrahas tvaṁ tvat-sevakair nṛpa-padaṁ vidhutaṁ tamo ’ndham

सत्य है, हे उरुक्रम! मानो गुणों से भयभीत होकर आप समुद्र में शयन करते हैं, केवल साक्षी-चेतनास्वरूप परमात्मा; निरंतर दुष्ट इन्द्रियों से युद्धरत आप, और आपके सेवक तो राजपद को भी अंधकार समझकर त्याग देते हैं।

श्लोक 36 (bhagavata.10.60.36)

त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्मास्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु ये भवन्तम् ॥ 60.36 ॥

tvat-pāda-padma-makaranda-juṣāṁ munīnāṁ vartmāsphuṭaṁ nr-paśubhir nanu durvibhāvyam yasmād alaukikam ivehitam īśvarasya bhūmaṁs tavehitam atho anu ye bhavantam

आपके चरण-कमलों का मकरंद पीने वाले मुनियों के लिए भी अस्पष्ट आपका मार्ग, पशुतुल्य मनुष्यों के लिए तो सर्वथा दुर्बोध ही है। क्योंकि, हे विभो! जब आपकी ही चेष्टाएँ अलौकिक हैं, तो आपका अनुसरण करने वालों की चेष्टाएँ भी वैसी ही होंगी।

श्लोक 37 (bhagavata.10.60.37)

निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठो भवान् बलिभुजामपि तेऽपि तुभ्यम् ॥ 60.37 ॥

niṣkiñcano nanu bhavān na yato ’sti kiñcid yasmai baliṁ bali-bhujo ’pi haranty ajādyāḥ na tvā vidanty asu-tṛpo ’ntakam āḍhyatāndhāḥ preṣṭho bhavān bali-bhujām api te ’pi tubhyam

आप वस्तुतः निष्किंचन हैं, क्योंकि आपसे परे कुछ भी नहीं है, और जिन्हें ब्रह्मा आदि बलि-भोक्ता भी बलि अर्पित करते हैं। शरीर-तृप्त, धन से अंधे लोग आपको मृत्यु रूप में नहीं पहचानते — फिर भी उन बलि-भोक्ताओं को भी आप परम प्रिय हैं, और वे आपको।

श्लोक 38 (bhagavata.10.60.38)

त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुचितो भवतः समाजः पुंसः स्त्रियाश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ 60.38 ॥

tvaṁ vai samasta-puruṣārtha-mayaḥ phalātmā yad-vāñchayā su-matayo visṛjanti kṛtsnam teṣāṁ vibho samucito bhavataḥ samājaḥ puṁsaḥ striyāś ca ratayoḥ sukha-duḥkhinor na

आप ही समस्त पुरुषार्थों के साररूप, उनके परम फल स्वरूप आत्मा हैं; जिनकी इच्छा से बुद्धिमान जन सब कुछ त्याग देते हैं। हे विभो! वे ही आपके सामीप्य के योग्य हैं — न कि परस्पर काम में बँधे, सुख-दुःख भोगते स्त्री-पुरुष।

श्लोक 39 (bhagavata.10.60.39)

त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्मात्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । हित्वा भवद्भ्रुव उदीरितकालवेग ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्ये ॥ 60.39 ॥

tvaṁ nyasta-daṇḍa-munibhir gaditānubhāva ātmātma-daś ca jagatām iti me vṛto ’si hitvā bhavad-bhruva udīrita-kāla-vega- dhvastāśiṣo ’bja-bhava-nāka-patīn kuto ’nye

दण्ड त्याग चुके मुनियों द्वारा जिनकी महिमा गाई जाती है, जो समस्त लोकों की आत्मा हैं तथा स्वयं को भी अर्पित कर देते हैं, ऐसा जानकर ही मैंने आपको वरण किया, ब्रह्मा, शिव तथा स्वर्गपतियों को त्यागकर, जिनकी आशाएँ भी आपकी भृकुटि से उत्पन्न काल के वेग से नष्ट हो जाती हैं। फिर अन्य साधारण वरों की तो बात ही क्या?

श्लोक 40 (bhagavata.10.60.40)

जाड्यं वचस्तव गदाग्रज यस्तु भूपान् विद्राव्य शार्ङ्गनिनदेन जहर्थ मां त्वम् । सिंहो यथा स्वबलिमीश पशून् स्वभागं तेभ्यो भयाद् यदुदधिं शरणं प्रपन्नः ॥ 60.40 ॥

jāḍyaṁ vacas tava gadāgraja yas tu bhūpān vidrāvya śārṅga-ninadena jahartha māṁ tvam siṁho yathā sva-balim īśa paśūn sva-bhāgaṁ tebhyo bhayād yad udadhiṁ śaraṇaṁ prapannaḥ

हे गदाग्रज! यह तो मूर्खतापूर्ण वचन ही है, जब आपने अपने शार्ङ्ग धनुष की मात्र टंकार से समस्त राजाओं को भगाकर मुझे अपना भाग बना लिया — जैसे सिंह तुच्छ पशुओं को खदेड़कर अपना अधिकार लेता है — और अब कहते हैं कि आप उनसे भयभीत होकर समुद्र की शरण में गए।

श्लोक 41 (bhagavata.10.60.41)

यद्वाञ्छया नृपशिखामणयोऽङ्गवैन्य- जायन्तनाहुषगयादय ऐक्यपत्यम् । राज्यं विसृज्य विविशुर्वनमम्बुजाक्ष सीदन्ति तेऽनुपदवीं त इहास्थिताः किम् ॥ 60.41 ॥

yad-vāñchayā nṛpa-śikhāmaṇayo ’nga-vainya- jāyanta-nāhuṣa-gayādaya aikya-patyam rājyaṁ visṛjya viviśur vanam ambujākṣa sīdanti te ’nupadavīṁ ta ihāsthitāḥ kim

हे कमलनयन! आपकी ही चाह में राजाओं के शिरोमणि अंग, वैन्य (पृथु), जयन्त (भरत), नहुष, गय आदि ने अपना अद्वितीय राज्य त्यागकर वन में प्रवेश किया था। भला आपके मार्ग पर स्थित ऐसे जन इस लोक में कभी दुःखी हो सकते हैं?

श्लोक 42 (bhagavata.10.60.42)

कान्यं श्रयेत तव पादसरोजगन्ध- माघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् । लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयस्य मर्त्या सदोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥ 60.42 ॥

kānyaṁ śrayeta tava pāda-saroja-gandham āghrāya san-mukharitaṁ janatāpavargam lakṣmy-ālayaṁ tv avigaṇayya guṇālayasya martyā sadoru-bhayam artha-viviita-dṛṣṭiḥ

आपके चरण-कमलों की, जिसे सज्जन गाते हैं और जो जनों को मुक्ति प्रदान करती है, सुगंध का अनुभव कर कौन स्त्री अन्य पुरुष की शरण लेगी? लक्ष्मी और समस्त गुणों के आगार आपकी उपेक्षा कर, अपने वास्तविक हित को पहचानने वाली कौन मरणधर्मा स्त्री सदा महाभयग्रस्त किसी और पर निर्भर रहेगी?

श्लोक 43 (bhagavata.10.60.43)

तं त्वानुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामपूरम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिररणं सृतिभिर्भ्रमन्त्या यो वै भजन्तमुपयात्यनृतापवर्गः ॥ 60.43 ॥

taṁ tvānurūpam abhajaṁ jagatām adhīśam ātmānam atra ca paratra ca kāma-pūram syān me tavāṅghrir araṇaṁ sṛtibhir bhramantyā yo vai bhajantam upayāty anṛtāpavargaḥ

आप ही, मेरे सर्वथा अनुरूप, समस्त लोकों के अधीश्वर, परमात्मा, इस लोक और परलोक की कामनाओं के पूरक — यही मैंने वरण किया है। जन्म-मृत्यु के चक्रों में भटकती मुझे आपके वे चरण शरण दें, जो अपने भक्त के पास जाकर उसे मिथ्यात्व से मुक्त कर देते हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.10.60.44)

तस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वविडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्षण नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ 60.44 ॥

tasyāḥ syur acyuta nṛpā bhavatopadiṣṭāḥ strīṇāṁ gṛheṣu khara-go-śva-viḍāla-bhṛtyāḥ yat-karṇa-mūlam ari-karṣaṇa nopayāyād yuṣmat-kathā mṛḍa-viriñca-sabhāsu gītā

हे अच्युत, हे शत्रुदमन! आपके द्वारा नामित वे राजा उन स्त्रियों के पति बनें, जिनके घरों में वे गधे, बैल, कुत्ते, बिल्ली अथवा सेवकों के समान जीवन बिताएँ — उन स्त्रियों के, जिनके कानों में शिव-ब्रह्मा की सभाओं में गाई जाने वाली आपकी कथा कभी प्रवेश ही न कर पाई हो।

श्लोक 45 (bhagavata.10.60.45)

त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविट्कफपित्तवातम् । जीवच्छवं भजति कान्तमतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ 60.45 ॥

tvak-śmaśru-roma-nakha-keśa-pinaddham antar māṁsāsthi-rakta-kṛmi-viṭ-kapha-pitta-vātam jīvac-chavaṁ bhajati kānta-matir vimūḍhā yā te padābja-makarandam ajighratī strī

आपके चरण-कमलों का मकरंद न सूँघने वाली पूर्णतः मोहग्रस्त स्त्री एक जीवित शव को ही अपना प्रियतम मान बैठती है — त्वचा, दाढ़ी-मूँछ, रोम, नख और केश से आवृत, तथा भीतर मांस, अस्थि, रक्त, कृमि, विष्ठा, कफ, पित्त और वायु से भरा हुआ।

श्लोक 46 (bhagavata.10.60.46)

अस्त्वम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ 60.46 ॥

astv ambujākṣa mama te caraṇānurāga ātman ratasya mayi cānatirikta-dṛṣṭeḥ yarhy asya vṛddhaya upātta-rajo-’ti-mātro mām īkṣase tad u ha naḥ paramānukampā

हे कमलनयन! यद्यपि आप आत्मरत हैं और मुझ पर बहुत कम दृष्टि डालते हैं, फिर भी मुझे आपके चरणों में स्थिर अनुराग प्राप्त हो। जब आप इस जगत् की अभिवृद्धि हेतु प्रचुर रजोगुण धारण कर मुझ पर दृष्टि डालते हैं — वही तो हमारे लिए आपकी परम कृपा है।

श्लोक 47 (bhagavata.10.60.47)

नैवालीकमहं मन्ये वचस्ते मधुसूदन । अम्बाया एव हि प्रायः कन्यायाः स्याद् रतिः क्वचित् ॥ 60.47 ॥

naivālīkam ahaṁ manye vacas te madhusūdana ambāyā eva hi prāyaḥ kanyāyāḥ syād ratiḥ kvacit

हे मधुसूदन! मैं आपके वचनों को मिथ्या नहीं मानती — निश्चय ही प्रायः किसी अविवाहित कन्या को भी आसक्ति हो जाती है, जैसा अम्बा के विषय में हुआ था।

श्लोक 48 (bhagavata.10.60.48)

व्यूढायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम् । बुधोऽसतीं न बिभृयात् तां बिभ्रदुभयच्युतः ॥ 60.48 ॥

vyūḍhāyāś cāpi puṁścalyā mano ’bhyeti navaṁ navam budho ’satīṁ na bibhṛyāt tāṁ bibhrad ubhaya-cyutaḥ

विवाहित होते हुए भी यदि स्त्री कुलटा हो तो उसका मन सदा नए-नए पुरुषों की ओर आकृष्ट होता है; बुद्धिमान पुरुष को ऐसी असती स्त्री का पालन नहीं करना चाहिए — जो करता है, वह दोनों लोकों से भ्रष्ट हो जाता है।

श्लोक 49 (bhagavata.10.60.49)

श्रीभगवानुवाच साध्व्येतच्छ्रोतुकामैस्त्वं राजपुत्री प्रलम्भिता । मयोदितं यदन्वात्थ सर्वं तत् सत्यमेव हि ॥ 60.49 ॥

śrī-bhagavān uvāca sādhvy etac-chrotu-kāmais tvaṁ rāja-putrī pralambhitā mayoditaṁ yad anvāttha sarvaṁ tat satyam eva hi

भगवान ने कहा — हे साध्वी राजकुमारी! हमने केवल तुमसे यह सब सुनने की इच्छा से तुम्हें छला था; मेरे वचनों के उत्तर में तुमने जो कुछ कहा, वह सब सत्य ही है।

श्लोक 50 (bhagavata.10.60.50)

यान् यान् कामयसे कामान् मय्यकामाय भामिनि । सन्ति ह्येकान्तभक्तायास्तव कल्याणि नित्यद ॥ 60.50 ॥

yān yān kāmayase kāmān mayy akāmāya bhāmini santi hy ekānta-bhaktāyās tava kalyāṇi nityada

हे भामिनि! तुम जो भी वर चाहो, वे सब मुझसे, जो निष्काम हूँ, सदा तुम्हें प्राप्त हैं — क्योंकि हे कल्याणि! तुम मेरी अनन्य भक्त हो।

श्लोक 51 (bhagavata.10.60.51)

उपलब्धं पतिप्रेम पातिव्रत्यं च तेऽनघे । यद्वाक्यैश्चाल्यमानाया न धीर्मय्यपकर्षिता ॥ 60.51 ॥

upalabdhaṁ pati-prema pāti-vratyaṁ ca te ’naghe yad vākyaiś cālyamānāyā na dhīr mayy apakarṣitā

हे अनघे! मैंने अब तुम्हारा अपने पति के प्रति प्रेम और पातिव्रत्य प्रत्यक्ष देख लिया — क्योंकि मेरे वचनों से विचलित होते हुए भी तुम्हारी बुद्धि मुझसे कभी दूर नहीं हुई।

श्लोक 52 (bhagavata.10.60.52)

ये मां भजन्ति दाम्पत्ये तपसा व्रतचर्यया । कामात्मानोऽपवर्गेशं मोहिता मम मायया ॥ 60.52 ॥

ye māṁ bhajanti dāmpatye tapasā vrata-caryayā kāmātmāno ’pavargeśaṁ mohitā mama māyayā

जो लोग गृहस्थ-सुख की कामना से तप और व्रत द्वारा मेरी उपासना करते हैं, यद्यपि मैं मुक्ति का स्वामी हूँ, वे कामवश तथा मेरी माया से मोहित हैं।

श्लोक 53 (bhagavata.10.60.53)

मां प्राप्य मानिन्यपवर्गसम्पदं वाञ्छन्ति ये सम्पद एव तत्पतिम् । ते मन्दभागा निरयेऽपि ये नृणां मात्रात्मकत्वात्निरयः सुसङ्गमः ॥ 60.53 ॥

māṁ prāpya māniny apavarga-sampadaṁ vāñchanti ye sampada eva tat-patim te manda-bhāgā niraye ’pi ye nṛṇāṁ mātrātmakatvāt nirayaḥ su-saṅgamaḥ

हे मानिनि! जो लोग मुझे, मुक्ति के स्वामी को, पाकर भी केवल सांसारिक संपत्ति की ही कामना करते हैं, वे अभागे हैं — क्योंकि इन्द्रिय-भोग में लिप्त होने के कारण नरक ही उनके लिए उपयुक्त है, जहाँ ऐसी संपत्तियाँ भी सुलभ हैं।

श्लोक 54 (bhagavata.10.60.54)

दिष्ट्या गृहेश्वर्यसकृन्मयि त्वया कृतानुवृत्तिर्भवमोचनी खलैः । सुदुष्करासौ सुतरां दुराशिषो ह्यसुंभराया निकृतिं जुषः स्त्रियाः ॥ 60.54 ॥

diṣṭyā gṛheśvary asakṛn mayi tvayā kṛtānuvṛttir bhava-mocanī khalaiḥ su-duṣkarāsau sutarāṁ durāśiṣo hy asuṁ-bharāyā nikṛtiṁ juṣaḥ striyāḥ

हे गृहेश्वरि! सौभाग्य से तुमने मेरे प्रति जो निरंतर अनुवृत्ति निभाई है, वह संसार-बंधन से मुक्ति देने वाली है, जिसे दुष्ट स्वभाव, कुत्सित आशय वाली, केवल देह-पोषण में रत, छल-कपटी स्त्री के लिए करना अत्यंत कठिन होता है।

श्लोक 55 (bhagavata.10.60.55)

न त्वादृशीं प्रणयिनीं गृहिणीं गृहेषु पश्यामि मानिनि यया स्वविवाहकाले । प्राप्तान् नृपान्न विगणय्य रहोहरो मे प्रस्थापितो द्विज उपश्रुतसत्कथस्य ॥ 60.55 ॥

na tvādṛśīm praṇayinīṁ gṛhiṇīṁ gṛheṣu paśyāmi mānini yayā sva-vivāha-kāle prāptān nṛpān na vigaṇayya raho-haro me prasthāpito dvija upaśruta-sat-kathasya

हे मानिनि! मुझे अपने किसी भी घर में तुम्हारे समान प्रेममयी पत्नी दिखाई नहीं देती — तुमने अपने विवाह के समय उपस्थित समस्त राजाओं की उपेक्षा कर, मेरे विषय में सत्य वृत्तांत सुनकर एक ब्राह्मण को अपने गुप्त संदेश का वाहक बनाकर भेजा था।

श्लोक 56 (bhagavata.10.60.56)

भ्रातुर्विरूपकरणं युधि निर्जितस्य प्रोद्वाहपर्वणि च तद्वधमक्षगोष्ठ्याम् । दुःखं समुत्थमसहोऽस्मदयोगभीत्या नैवाब्रवीः किमपि तेन वयं जितास्ते ॥ 60.56 ॥

bhrātur virūpa-karaṇaṁ yudhi nirjitasya prodvāha-parvaṇi ca tad-vadham akṣa-goṣṭhyām duḥkhaṁ samuttham asaho ’smad-ayoga-bhītyā naivābravīḥ kim api tena vayaṁ jitās te

जब पहले युद्ध में पराजित और विरूपित तुम्हारे भाई की, तुम्हारे पौत्र के विवाह-प्रसंग में द्यूत-क्रीड़ा में हत्या हुई — यद्यपि तुमने असह्य दुःख सहा, फिर भी हमसे वियोग के भय से तुमने कुछ नहीं कहा। इसी से तुमने हमें जीत लिया।

श्लोक 57 (bhagavata.10.60.57)

दूतस्त्वयात्मलभने सुविविक्तमन्त्रः प्रस्थापितो मयि चिरायति शून्यमेतत् । मत्वा जिहास इदमङ्गमनन्ययोग्यं तिष्ठेत तत्त्वयि वयं प्रतिनन्दयामः ॥ 60.57 ॥

dūtas tvayātma-labhane su-vivikta-mantraḥ prasthāpito mayi cirāyati śūnyam etat matvā jihāsa idaṁ aṅgam ananya-yogyaṁ tiṣṭheta tat tvayi vayaṁ pratinandayāmaḥ

जब तुमने मुझे पाने के लिए अत्यंत गोपनीय संदेश के साथ दूत भेजा, और मुझे विलम्ब हो गया, तब इस संसार को शून्य मानकर तुमने अपने इस शरीर को, जो केवल मेरे ही योग्य था, त्यागने का निश्चय कर लिया था। तुम्हारा वह माहात्म्य सदा बना रहे; हम तो बस उसके लिए आनंदपूर्वक तुम्हारा अभिनंदन ही कर सकते हैं।

श्लोक 58 (bhagavata.10.60.58)

श्रीशुक उवाच एवं सौरतसंलापैर्भगवान् जगदीश्वरः । स्वरतो रमया रेमे नरलोकं विडम्बयन् ॥ 60.58 ॥

śrī-śuka uvāca evaṁ saurata-saṁlāpair bhagavān jagad-īśvaraḥ sva-rato ramayā reme nara-lokaṁ viḍambayan

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — इस प्रकार प्रेम-वार्ता द्वारा आत्मरत जगदीश्वर भगवान मानव-लोक का अनुकरण करते हुए रमा (रुक्मिणी) के साथ रमण करने लगे।

श्लोक 59 (bhagavata.10.60.59)

तथान्यासामपि विभुर्गृहेषु गृहवानिव । आस्थितो गृहमेधीयान् धर्मान् लोकगुरुर्हरिः ॥ 60.59 ॥

tathānyāsām api vibhur gṛhesu gṛhavān iva āsthito gṛha-medhīyān dharmān loka-gurur hariḥ

इसी प्रकार वे सर्वशक्तिमान, लोकगुरु हरि अपनी अन्य रानियों के घरों में भी एक साधारण गृहस्थ के समान निवास करते हुए गार्हस्थ्य धर्मों का पालन करते रहे।

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