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दशम स्कन्ध · अध्याय 64

राजा नृग का उद्धार

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

श्लोक 1 (bhagavata.10.64.1)

श्रीबादरायणिरुवाच एकदोपवनं राजन् जग्मुर्यदुकुमारकाः । विहर्तुं साम्बप्रद्युम्नचारुभानुगदादयः ॥ १ ॥

śrī-bādarāyaṇir uvāca ekadopavanaṁ rājan jagmur yadu-kumārakāḥ vihartuṁ sāmba-pradyumna cāru-bhānu-gadādayaḥ

श्री बादरायणि (शुकदेव) ने कहा — हे राजन्, एक दिन साम्ब, प्रद्युम्न, चारुभानु, गद आदि यदुवंशी बालक क्रीड़ा करने के लिए एक उपवन में गए।

श्लोक 2 (bhagavata.10.64.2)

क्रीडित्वा सुचिरं तत्र विचिन्वन्तः पिपासिताः । जलं निरुदके कूपे ददृशुः सत्त्वमद्भुतम् ॥ २ ॥

krīḍitvā su-ciraṁ tatra vicinvantaḥ pipāsitāḥ jalaṁ nirudake kūpe dadṛśuḥ sattvam adbhutam

वहाँ बहुत देर तक खेलने के बाद वे प्यासे हो गए। जल ढूंढ़ते हुए उन्होंने एक सूखे कुएँ में झांककर एक अद्भुत प्राणी देखा।

श्लोक 3 (bhagavata.10.64.3)

कृकलासं गिरिनिभं वीक्ष्य विस्मितमानसाः । तस्य चोद्धरणे यत्नं चक्रुस्ते कृपयान्विताः ॥ ३ ॥

kṛkalāsaṁ giri-nibhaṁ vīkṣya vismita-mānasāḥ tasya coddharaṇe yatnaṁ cakrus te kṛpayānvitāḥ

पर्वत के समान विशाल उस गिरगिट को देखकर वे बालक चकित रह गए, और दया से भरकर उसे बाहर निकालने का प्रयत्न करने लगे।

श्लोक 4 (bhagavata.10.64.4)

चर्मजैस्तान्तवैः पाशैर्बद्ध्वा पतितमर्भकाः । नाशक्नुरन् समुद्धर्तुं कृष्णायाचख्युरुत्सुकाः ॥ ४ ॥

carma-jais tāntavaiḥ pāśair baddhvā patitam arbhakāḥ nāśaknuran samuddhartuṁ kṛṣṇāyācakhyur utsukāḥ

उस गिरे हुए प्राणी को चमड़े की रस्सियों और सूत की डोरियों से बाँधकर भी वे बालक उसे बाहर न निकाल सके, तो उत्सुकतावश वे कृष्ण के पास जाकर यह बात बताने लगे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.64.5)

तत्रागत्यारविन्दाक्षो भगवान् विश्वभावनः । वीक्ष्योज्जहार वामेन तं करेण स लीलया ॥ ५ ॥

tatrāgatyāravindākṣo bhagavān viśva-bhāvanaḥ vīkṣyojjahāra vāmena taṁ kareṇa sa līlayā

वहाँ पहुंचकर विश्व के पालनकर्ता कमल-नेत्र भगवान ने उसे देखा और लीलापूर्वक अपने बाएँ हाथ से उसे बाहर निकाल लिया।

श्लोक 6 (bhagavata.10.64.6)

स उत्तमःश्लोककराभिमृष्टो विहाय सद्यः कृकलासरूपम् । सन्तप्तचामीकरचारुवर्णः स्वर्ग्यद्भुतालङ्करणाम्बरस्रक् ॥ ६ ॥

sa uttamaḥ-śloka-karābhimṛṣṭo vihāya sadyaḥ kṛkalāsa-rūpam santapta-cāmīkara-cāru-varṇaḥ svargy adbhutālaṅkaraṇāmbara-srak

उत्तमश्लोक भगवान के हाथ के स्पर्श मात्र से वह प्राणी तत्काल अपना गिरगिट का रूप त्यागकर तपाए हुए स्वर्ण के समान सुंदर वर्ण धारण कर, दिव्य आभूषणों, वस्त्रों और मालाओं से सुशोभित हो उठा।

श्लोक 7 (bhagavata.10.64.7)

पप्रच्छ विद्वानपि तन्निदानं जनेषु विख्यापयितुं मुकुन्दः । कस्त्वं महाभाग वरेण्यरूपो देवोत्तमं त्वां गणयामि नूनम् ॥ ७ ॥

papraccha vidvān api tan-nidānaṁ janeṣu vikhyāpayituṁ mukundaḥ kas tvaṁ mahā-bhāga vareṇya-rūpo devottamaṁ tvāṁ gaṇayāmi nūnam

भगवान मुकुंद, स्वयं यह जानते हुए भी, लोगों में यह बात प्रसिद्ध करने के लिए पूछने लगे — 'हे महाभाग, आपका ऐसा उत्तम रूप देखकर मैं निश्चय ही आपको एक श्रेष्ठ देवता मानता हूँ। आप कौन हैं?

श्लोक 8 (bhagavata.10.64.8)

दशाम् इमां वा कतमेन कर्मणा सम्प्रापितोऽस्यतदर्हः सुभद्र । आत्मानमाख्याहि विवित्सतां नो यन्मन्यसे नः क्षममत्र वक्तुम् ॥ ८ ॥

daśām imāṁ vā katamena karmaṇā samprāpito ’sy atad-arhaḥ su-bhadra ātmānam ākhyāhi vivitsatāṁ no yan manyase naḥ kṣamam atra vaktum

किस कर्म के कारण तुम इस अनुचित अवस्था को प्राप्त हुए, हे सज्जन? अपने विषय में हमें बताओ, हम जानने के इच्छुक हैं — यदि तुम्हें यह उचित लगे तो अभी बताना।'

श्लोक 9 (bhagavata.10.64.9)

श्रीशुक उवाच इति स्म राजा सम्पृष्टः कृष्णेनानन्तमूर्तिना । माधवं प्रणिपत्याह किरीटेनार्कवर्चसा ॥ ९ ॥

śrī-śuka uvāca iti sma rājā sampṛṣṭaḥ kṛṣṇenānanta-mūrtinā mādhavaṁ praṇipatyāha kirīṭenārka-varcasā

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — असीम रूपों वाले कृष्ण द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, सूर्य के समान चमकते मुकुट वाले उस राजा ने माधव को प्रणाम कर इस प्रकार कहा।

श्लोक 10 (bhagavata.10.64.10)

नृग उवाच नृगो नाम नरेन्द्रोऽहमिक्ष्वाकुतनयः प्रभो । दानिष्वाख्यायमानेषु यदि ते कर्णमस्पृशम् ॥ १० ॥

nṛga uvāca nṛgo nāma narendro ’ham ikṣvāku-tanayaḥ prabho dāniṣv ākhyāyamāneṣu yadi te karṇam aspṛśam

नृग ने कहा — हे प्रभो, मैं इक्ष्वाकु का पुत्र नृग नामक राजा हूँ। शायद दानशील पुरुषों की गणना करते समय मेरा नाम भी आपके कानों तक पहुंचा हो।

श्लोक 11 (bhagavata.10.64.11)

किं नु तेऽविदितं नाथ सर्वभूतात्मसाक्षिणः । कालेनाव्याहतदृशो वक्ष्येऽथापि तवाज्ञया ॥ ११ ॥

kiṁ nu te ’viditaṁ nātha sarva-bhūtātma-sākṣiṇaḥ kālenāvyāhata-dṛśo vakṣye ’thāpi tavājñayā

हे नाथ, समस्त प्राणियों के अंतःकरण के साक्षी, काल से अबाधित दृष्टि वाले आपको भला क्या अज्ञात होगा? फिर भी आपकी आज्ञा से मैं कहता हूँ।

श्लोक 12 (bhagavata.10.64.12)

यावत्यः सिकता भूमेर्यावत्यो दिवि तारकाः । यावत्यो वर्षधाराश्च तावतीरददं स्म गाः ॥ १२ ॥

yāvatyaḥ sikatā bhūmer yāvatyo divi tārakāḥ yāvatyo varṣa-dhārāś ca tāvatīr adadaṁ sma gāḥ

पृथ्वी पर जितने रेत-कण हैं, आकाश में जितने तारे हैं, और वर्षा की जितनी बूंदें हैं — उतनी ही गौएँ मैंने दान में दीं।

श्लोक 13 (bhagavata.10.64.13)

पयस्विनीस्तरुणीः शीलरूप- गुणोपपन्नाः कपिला हेमशृङ्गीः । न्यायार्जिता रूप्यखुराः सवत्सा दुकूलमालाभरणा ददावहम् ॥ १३ ॥

payasvinīs taruṇīḥ śīla-rūpa- guṇopapannāḥ kapilā hema-sṛṅgīḥ nyāyārjitā rūpya-khurāḥ sa-vatsā dukūla-mālābharaṇā dadāv aham

दूध देने वाली, युवा, शील-रूप-गुण से युक्त, भूरे रंग की, स्वर्ण-सींगों वाली, न्यायपूर्वक अर्जित, रजत-खुरों वाली, बछड़ों सहित, तथा रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सजी गौएँ मैंने दान कीं।

श्लोक 14 (bhagavata.10.64.14)

स्वलङ्कृतेभ्यो गुणशीलवद्भ्यः सीदत्कुटुम्बेभ्य ऋतव्रतेभ्यः । तपःश्रुतब्रह्मवदान्यसद्भ्यः प्रादां युवभ्यो द्विजपुङ्गवेभ्यः ॥ १४ ॥

sv-alaṅkṛtebhyo guṇa-śīlavadbhyaḥ sīdat-kuṭumbebhya ṛta-vratebhyaḥ tapaḥ-śruta-brahma-vadānya-sadbhyaḥ prādāṁ yuvabhyo dvija-puṅgavebhyaḥ

सुसज्जित, गुण-शील से युक्त, दरिद्र कुटुम्ब वाले, सत्य-व्रत का पालन करने वाले, तप और वेद-ज्ञान में निपुण, उदार तथा सज्जन, युवा और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मैंने ये दान दिए।

श्लोक 15 (bhagavata.10.64.15)

गोभूहिरण्यायतनाश्वहस्तिनः कन्याः सदासीस्तिलरूप्यशय्याः । वासांसि रत्नानि परिच्छदान् रथा- निष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तम् ॥ १५ ॥

go-bhū-hiraṇyāyatanāśva-hastinaḥ kanyāḥ sa-dāsīs tila-rūpya-śayyāḥ vāsāṁsi ratnāni paricchadān rathān iṣṭaṁ ca yajñaiś caritaṁ ca pūrtam

गौएँ, भूमि, स्वर्ण, घर, अश्व, हाथी, कन्याएँ दासियों सहित, तिल, चाँदी, शय्याएँ, वस्त्र, रत्न, गृह-सामग्री, रथ — तथा यज्ञों द्वारा इष्ट और पूर्त कर्म — यह सब मैंने संपन्न किया।

श्लोक 16 (bhagavata.10.64.16)

कस्यचिद् द्विजमुख्यस्य भ्रष्टा गौर्मम गोधने । सम्पृक्ताविदुषा सा च मया दत्ता द्विजातये ॥ १६ ॥

kasyacid dvija-mukhyasya bhraṣṭā gaur mama go-dhane sampṛktāviduṣā sā ca mayā dattā dvijātaye

किसी प्रमुख ब्राह्मण की एक गाय भटककर मेरे गोधन में मिल गई। इसे न जानते हुए मैंने वह गाय किसी अन्य ब्राह्मण को दान में दे दी।

श्लोक 17 (bhagavata.10.64.17)

तां नीयमानां तत्स्वामी दृष्ट्वोवाच ममेति तम् । ममेति परिग्राह्याह नृगो मे दत्तवानिति ॥ १७ ॥

tāṁ nīyamānāṁ tat-svāmī dṛṣṭrovāca mameti tam mameti parigrāhy āha nṛgo me dattavān iti

उस गाय को ले जाते देखकर उसके असली स्वामी ने कहा — 'यह मेरी है!' और जिसने उसे दान में पाया था, उसने कहा — 'नहीं, यह मेरी है, नृग ने मुझे यह दी है।'

श्लोक 18 (bhagavata.10.64.18)

विप्रौ विवदमानौ मामूचतुः स्वार्थसाधकौ । भवान् दातापहर्तेति तच्छ्रुत्वा मेऽभवद् भ्रमः ॥ १८ ॥

viprau vivadamānau mām ūcatuḥ svārtha-sādhakau bhavān dātāpaharteti tac chrutvā me ’bhavad bhramaḥ

दोनों ब्राह्मण, अपने-अपने अधिकार का दावा करते हुए, विवाद करते हुए मेरे पास आए और बोले — 'तुमने ही दी है और तुमने ही छीनी है।' यह सुनकर मैं भ्रमित हो गया।

श्लोक 19 (bhagavata.10.64.19)

अनुनीतावुभौ विप्रौ धर्मकृच्छ्रगतेन वै । गवां लक्षं प्रकृष्टानां दास्याम्येषा प्रदीयताम् ॥ १९ ॥

anunītāv ubhau viprau dharma-kṛcchra-gatena vai gavāṁ lakṣaṁ prakṛṣṭānāṁ dāsyāmy eṣā pradīyatām

धर्म-संकट में पड़कर मैंने दोनों ब्राह्मणों से विनयपूर्वक निवेदन किया — 'मैं इसके बदले एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा, कृपया यह गाय मुझे लौटा दो।'

श्लोक 20 (bhagavata.10.64.20)

भवन्तावनुगृह्णीतां किङ्करस्याविजानतः । समुद्धरतं मां कृच्छ्रात् पतन्तं निरयेऽशुचौ ॥ २० ॥

bhavantāv anugṛhṇītāṁ kiṅkarasyāvijānataḥ samuddharataṁ māṁ kṛcchrāt patantaṁ niraye ’śucau

'आप दोनों इस अनजान सेवक पर कृपा करें, और मुझे इस अशुद्ध नरक में गिरते हुए इस संकट से उबार लें।'

श्लोक 21 (bhagavata.10.64.21)

नाहं प्रतीच्छे वै राजन्नित्युक्त्वा स्वाम्यपाक्रमत् । नान्यद् गवामप्ययुतमिच्छामीत्यपरो ययौ ॥ २१ ॥

nāhaṁ pratīcche vai rājann ity uktvā svāmy apākramat nānyad gavām apy ayutam icchāmīty aparo yayau

गाय के वर्तमान स्वामी ने कहा — 'हे राजन्, मुझे कुछ नहीं चाहिए' — यह कहकर वह चला गया। दूसरे ब्राह्मण ने कहा — 'मुझे दस हजार अन्य गौएँ भी नहीं चाहिए' — यह कहकर वह भी चला गया।

श्लोक 22 (bhagavata.10.64.22)

एतस्मिन्नन्तरे यामैर्दूतैर्नीतो यमक्षयम् । यमेन पृष्टस्तत्राहं देवदेव जगत्पते ॥ २२ ॥

etasminn antare yāmair dūtair nīto yama-kṣayam yamena pṛṣṭas tatrāhaṁ deva-deva jagat-pate

हे देवाधिदेव, हे जगत्पते, इसी बीच यम के दूत मुझे यमलोक ले गए, और वहाँ यमराज ने मुझसे पूछा।

श्लोक 23 (bhagavata.10.64.23)

पूर्वं त्वमशुभं भुङ्क्ष उताहो नृपते शुभम् । नान्तं दानस्य धर्मस्य पश्ये लोकस्य भास्वतः ॥ २३ ॥

pūrvaṁ tvam aśubhaṁ bhuṅkṣa utāho nṛpate śubham nāntaṁ dānasya dharmasya paśye lokasya bhāsvataḥ

यमराज ने कहा — हे नृपते, क्या तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो, या अपने पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप उज्ज्वल लोकों के भोग का तो मुझे कोई अंत ही दिखाई नहीं देता।

श्लोक 24 (bhagavata.10.64.24)

पूर्वं देवाशुभं भुञ्ज इति प्राह पतेति सः । तावदद्राक्षमात्मानं कृकलासं पतन् प्रभो ॥ २४ ॥

pūrvaṁ devāśubhaṁ bhuñja iti prāha pateti saḥ tāvad adrākṣam ātmānaṁ kṛkalāsaṁ patan prabho

मैंने कहा — 'हे देव, पहले मुझे अपने पाप का फल भोगने दें।' यमराज ने कहा — 'तो गिरो!' हे प्रभो, तत्काल गिरते हुए मैंने स्वयं को गिरगिट बनते देखा।

श्लोक 25 (bhagavata.10.64.25)

ब्रह्मण्यस्य वदान्यस्य तव दासस्य केशव । स्मृतिर्नाद्यापि विध्वस्ता भवत्सन्दर्शनार्थिनः ॥ २५ ॥

brahmaṇyasya vadānyasya tava dāsasya keśava smṛtir nādyāpi vidhvastā bhavat-sandarśanārthinaḥ

हे केशव, ब्राह्मणों के प्रति भक्त और उदार आपके इस दास की, जो सदैव आपके दर्शन का अभिलाषी था, स्मृति आज तक नष्ट नहीं हुई।

श्लोक 26 (bhagavata.10.64.26)

स त्वं कथं मम विभोऽक्षिपथः परात्मा योगेश्वरैः श्रुतिदृशामलहृद्विभाव्यः । साक्षादधोक्षज उरुव्यसनान्धबुद्धेः स्यान्मेऽनुदृश्य इह यस्य भवापवर्गः ॥ २६ ॥

sa tvaṁ kathaṁ mama vibho ’kṣi-pathaḥ parātmā yogeśvaraḥ śruti-dṛśāmala-hṛd-vibhāvyaḥ sākṣād adhokṣaja uru-vyasanāndha-buddheḥ syān me ’nudṛśya iha yasya bhavāpavargaḥ

हे विभो, फिर आप, वह परमात्मा जिन्हें योगेश्वर लोग वेद-दृष्टि से पवित्र हृदय में ही ध्यान कर पाते हैं, साक्षात् अधोक्षज, मेरे जैसे घोर संसार-दुःखों से अंधी बुद्धि वाले को कैसे प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहे हैं — जबकि आपका साक्षात्कार तो केवल उन्हीं को होता है जिनका संसार-बंधन समाप्त हो चुका है?

श्लोक 27 (bhagavata.10.64.27)

देवदेव जगन्नाथ गोविन्द पुरुषोत्तम । नारायण हृषीकेश पुण्यश्लोकाच्युताव्यय ॥ २७ ॥

deva-deva jagan-nātha govinda puruṣottama nārāyaṇa hṛṣīkeśa puṇya-ślokācyutāvyaya

हे देवदेव, हे जगन्नाथ, हे गोविन्द, हे पुरुषोत्तम, हे नारायण, हे हृषीकेश, हे पुण्यश्लोक, हे अच्युत, हे अव्यय —

श्लोक 28 (bhagavata.10.64.28)

अनुजानीहि मां कृष्ण यान्तं देवगतिं प्रभो । यत्र क्वापि सतश्चेतो भूयान्मे त्वत्पदास्पदम् ॥ २८ ॥

anujānīhi māṁ kṛṣṇa yāntaṁ deva-gatiṁ prabho yatra kvāpi sataś ceto bhūyān me tvat-padāspadam

हे कृष्ण, हे प्रभो, मुझे देवलोक जाने की अनुमति दीजिए। मैं जहाँ कहीं भी रहूँ, मेरा चित्त सदैव आपके चरणों का आश्रय ले।

श्लोक 29 (bhagavata.10.64.29)

नमस्ते सर्वभावाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । कृष्णाय वासुदेवाय योगानां पतये नमः ॥ २९ ॥

namas te sarva-bhāvāya brahmaṇe ’nanta-śaktaye kṛṣṇāya vāsudevāya yogānāṁ pataye namaḥ

आपको नमस्कार है, जो सर्वस्वरूप, ब्रह्म, अनंत शक्तिशाली हैं। कृष्ण, वासुदेव, समस्त योगों के स्वामी, आपको नमस्कार है।

श्लोक 30 (bhagavata.10.64.30)

इत्युक्त्वा तं परिक्रम्य पादौ स्पृष्ट्वा स्वमौलिना । अनुज्ञातो विमानाग्र्यमारुहत् पश्यतां नृणाम् ॥ ३० ॥

ity uktvā taṁ parikramya pādau spṛṣṭvā sva-maulinā anujñāto vimānāgryam āruhat paśyatāṁ nṛṇām

यह कहकर राजा नृग ने भगवान की परिक्रमा की, अपने मुकुट से उनके चरण स्पर्श किए, और अनुमति पाकर सबके देखते-देखते एक श्रेष्ठ दिव्य विमान पर आरूढ़ हो गए।

श्लोक 31 (bhagavata.10.64.31)

कृष्णः परिजनं प्राह भगवान् देवकीसुतः । ब्रह्मण्यदेवो धर्मात्मा राजन्याननुशिक्षयन् ॥ ३१ ॥

kṛṣṇaḥ parijanaṁ prāha bhagavān devakī-sutaḥ brahmaṇya-devo dharmātmā rājanyān anuśikṣayan

भगवान देवकी-पुत्र कृष्ण, जो ब्राह्मणों के परम भक्त और धर्म के मूर्तिमान स्वरूप हैं, तब राजाओं को शिक्षा देते हुए अपने परिजनों से इस प्रकार बोले।

श्लोक 32 (bhagavata.10.64.32)

दुर्जरं बत ब्रह्मस्वं भुक्तमग्नेर्मनागपि । तेजीयसोऽपि किमुत राज्ञां ईश्वरमानिनाम् ॥ ३२ ॥

durjaraṁ bata brahma-svaṁ bhuktam agner manāg api tejīyaso ’pi kim uta rājñāṁ īśvara-māninām

भगवान ने कहा — अग्नि से भी अधिक तेजस्वी पुरुष के लिए भी ब्राह्मण का धन, तनिक भी भोगे जाने पर, अत्यंत दुर्जर है — फिर उन राजाओं की तो बात ही क्या, जो स्वयं को ईश्वर मान बैठते हैं!

श्लोक 33 (bhagavata.10.64.33)

नाहं हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया । ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि ॥ ३३ ॥

nāhaṁ hālāhalaṁ manye viṣaṁ yasya pratikriyā brahma-svaṁ hi viṣaṁ proktaṁ nāsya pratividhir bhuvi

मैं हलाहल को भी वास्तविक विष नहीं मानता, क्योंकि उसका प्रतिकार है। ब्राह्मण के धन को ही सच्चा विष कहा गया है, क्योंकि इस पृथ्वी पर उसका कोई प्रतिकार नहीं है।

श्लोक 34 (bhagavata.10.64.34)

हिनस्ति विषमत्तारं वह्निरद्भिः प्रशाम्यति । कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः ॥ ३४ ॥

hinasti viṣam attāraṁ vahnir adbhiḥ praśāmyati kulaṁ sa-mūlaṁ dahati brahma-svāraṇi-pāvakaḥ

विष तो केवल उसे खाने वाले को ही मारता है, और साधारण अग्नि जल से शांत हो जाती है — किंतु ब्राह्मण के धन की अग्नि तो समूल कुल को ही भस्म कर देती है।

श्लोक 35 (bhagavata.10.64.35)

ब्रह्मस्वं दुरनुज्ञातं भुक्तं हन्ति त्रिपूरुषम् । प्रसह्य तु बलाद् भुक्तं दश पूर्वान् दशापरान् ॥ ३५ ॥

brahma-svaṁ duranujñātaṁ bhuktaṁ hanti tri-pūruṣam prasahya tu balād bhuktaṁ daśa pūrvān daśāparān

बिना उचित अनुमति के भोगा गया ब्राह्मण का धन तीन पीढ़ियों को नष्ट करता है, और बलपूर्वक छीनकर भोगा गया धन दस पूर्व और दस उत्तर पीढ़ियों को नष्ट कर देता है।

श्लोक 36 (bhagavata.10.64.36)

राजानो राजलक्ष्म्यान्धा नात्मपातं विचक्षते । निरयं येऽभिमन्यन्ते ब्रह्मस्वं साधु बालिशाः ॥ ३६ ॥

rājāno rāja-lakṣmyāndhā nātma-pātaṁ vicakṣate nirayaṁ ye ’bhimanyante brahma-svaṁ sādhu bāliśāḥ

राजसी वैभव से अंधे हुए राजा अपने पतन को नहीं देख पाते। जो मूर्खतावश ब्राह्मण के धन को सहज ही अपना मान लेते हैं, वे वस्तुतः नरक को ही अपना रहे होते हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.10.64.37)

गृह्णन्ति यावतः पांशून् क्रन्दतामश्रुबिन्दवः । विप्राणां हृतवृत्तीनां वदान्यानां कुटुम्बिनाम् ॥ ३७ ॥

gṛhṇanti yāvataḥ pāṁśūn krandatām aśru-bindavaḥ viprāṇāṁ hṛta-vṛttīnām vadānyānāṁ kuṭumbinām

जिन उदार, कुटुम्बी ब्राह्मणों की जीविका छीन ली गई है, वे रोते हुए जितनी धूल-कणों को स्पर्श करने वाले अश्रु-बिंदु गिराते हैं,

श्लोक 38 (bhagavata.10.64.38)

राजानो राजकुल्याश्च तावतोऽब्दान्निरङ्कुशाः । कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते ब्रह्मदायापहारिणः ॥ ३८ ॥

rājāno rāja-kulyāś ca tāvato ’bdān niraṅkuśāḥ kumbhī-pākeṣu pacyante brahma-dāyāpahāriṇaḥ

उतने ही वर्षों तक निरंकुश राजा और उनके राजकुल, ब्राह्मण-धन का अपहरण करने के कारण, कुम्भीपाक नरक में पकाए जाते हैं।

श्लोक 39 (bhagavata.10.64.39)

स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेच्च यः । षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ॥ ३९ ॥

sva-dattāṁ para-dattāṁ vā brahma-vṛttiṁ harec ca yaḥ ṣaṣṭi-varṣa-sahasrāṇi viṣṭhāyāṁ jāyate kṛmiḥ

जो कोई भी ब्राह्मण को दिया हुआ धन — चाहे स्वयं का दिया हो या किसी अन्य का — हर लेता है, वह साठ हजार वर्षों तक विष्ठा में कीड़ा बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 40 (bhagavata.10.64.40)

न मे ब्रह्मधनं भूयाद् यद् गृध्वाल्पायुषो नराः । पराजिताश्च्युता राज्याद् भवन्त्युद्वेजिनोऽहयः ॥ ४० ॥

na me brahma-dhanaṁ bhūyād yad gṛdhvālpāyuṣo narāḥ parājitāś cyutā rājyād bhavanty udvejino ’hayaḥ

मुझे ब्राह्मण का धन कभी न मिले, जिसकी लालसा में मनुष्य अल्पायु हो जाते हैं, पराजित होते हैं, राज्य से भ्रष्ट हो जाते हैं, और दूसरों को त्रास देने वाले सर्प बनकर जन्म लेते हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.10.64.41)

विप्रं कृतागसमपि नैव द्रुह्यत मामकाः । घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः ॥ ४१ ॥

vipraṁ kṛtāgasam api naiva druhyata māmakāḥ ghnantaṁ bahu śapantaṁ vā namas-kuruta nityaśaḥ

हे मेरे भक्तो, अपराध करने वाले ब्राह्मण से भी कभी द्रोह मत करना। वह चाहे मारे या बारंबार शाप दे, फिर भी उसे सदैव नमस्कार ही करना।

श्लोक 42 (bhagavata.10.64.42)

यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहितः । तथा नमत यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डभाक् ॥ ४२ ॥

yathāhaṁ praṇame viprān anukālaṁ samāhitaḥ tathā namata yūyaṁ ca yo ’nyathā me sa daṇḍa-bhāk

जिस प्रकार मैं सदैव सावधान होकर ब्राह्मणों को प्रणाम करता हूँ, उसी प्रकार तुम भी उन्हें प्रणाम करो। जो इसके विपरीत करेगा, वह मेरे दण्ड का भागी होगा।

श्लोक 43 (bhagavata.10.64.43)

ब्राह्मणार्थो ह्यपहृतो हर्तारं पातयत्यधः । अजानन्तमपि ह्येनं नृगं ब्राह्मणगौरिव ॥ ४३ ॥

brāhmaṇārtho hy apahṛto hartāraṁ pātayaty adhaḥ ajānantam api hy enaṁ nṛgaṁ brāhmaṇa-gaur iva

ब्राह्मण का धन, चाहे अनजाने में ही क्यों न हरा गया हो, हरने वाले को अवश्य पतन की ओर ले जाता है — जैसे नृग को उस ब्राह्मण की गाय ने पतित किया।

श्लोक 44 (bhagavata.10.64.44)

एवं विश्राव्य भगवान् मुकुन्दो द्वारकौकसः । पावनः सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम् ॥ ४४ ॥

evaṁ viśrāvya bhagavān mukundo dvārakaukasaḥ pāvanaḥ sarva-lokānāṁ viveśa nija-mandiram

इस प्रकार द्वारका के निवासियों को उपदेश देकर, समस्त लोकों को पवित्र करने वाले भगवान मुकुंद अपने राजभवन में प्रविष्ट हुए।

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