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दशम स्कन्ध · अध्याय 63

भगवान कृष्ण का बाणासुर के साथ युद्ध

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

श्लोक 1 (bhagavata.10.63.1)

श्रीशुक उवाच अपश्यतां चानिरुद्धं तद्बन्धूनां च भारत । चत्वारो वार्षिका मासा व्यतीयुरनुशोचताम् ॥ १ ॥

śṛī-śuka uvāca apaśyatāṁ cāniruddhaṁ tad-bandhūnāṁ ca bhārata catvāro vārṣikā māsā vyatīyur anuśocatām

शुकदेव गोस्वामी ने कहा — हे भरतवंशी, अनिरुद्ध को न देखते हुए उनके संबंधीजन शोक करते रहे, और इसी बीच वर्षा ऋतु के चार महीने बीत गए।

श्लोक 2 (bhagavata.10.63.2)

नारदात्तदुपाकर्ण्य वार्तां बद्धस्य कर्म च । प्रययुः शोणितपुरं वृष्णयः कृष्णदैवताः ॥ २ ॥

nāradāt tad upākarṇya vārtāṁ baddhasya karma ca prayayuḥ śoṇita-puraṁ vṛṣṇayaḥ kṛṣṇa-daivatāḥ

नारद से यह समाचार तथा अनिरुद्ध की बंदी होने की घटना सुनकर, कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले वृष्णिवंशी शोणितपुर की ओर चल पड़े।

श्लोक 3 (bhagavata.10.63.3)

प्रद्युम्नो युयुधानश्च गदः साम्बोऽथ सारणः । नन्दोपनन्दभद्राद्या रामकृष्णानुवर्तिनः ॥ ३ ॥

pradyumno yuyudhānaś ca gadaḥ sāmbo ’tha sāraṇaḥ nandopananda-bhadrādyā rāma-kṛṣṇānuvartinaḥ

बलराम और कृष्ण के पीछे प्रद्युम्न, युयुधान, गद, साम्ब और सारण, तथा नन्द, उपनन्द, भद्र आदि चले।

श्लोक 4 (bhagavata.10.63.4)

अक्षौहिणीभिर्द्वादशभिः समेताः सर्वतोदिशम् । रुरुधुर्बाणनगरं समन्तात् सात्वतर्षभाः ॥ ४ ॥

akṣauhiṇībhir dvādaśabhiḥ sametāḥ sarvato diśam rurudhur bāṇa-nagaraṁ samantāt sātvatarṣabhāḥ

बारह अक्षौहिणी सेना के साथ एकत्रित होकर, सात्वतवंश के उन श्रेष्ठ वीरों ने बाणासुर के नगर को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 5 (bhagavata.10.63.5)

भज्यमानपुरोद्यानप्राकाराट्टालगोपुरम् । प्रेक्षमाणो रुषाविष्टस्तुल्यसैन्योऽभिनिर्ययौ ॥ ५ ॥

bhajyamāna-purodyāna- prākārāṭṭāla-gopuram prekṣamāṇo ruṣāviṣṭas tulya-sainyo ’bhiniryayau

अपने नगर के उद्यानों, प्राचीरों, अट्टालिकाओं और द्वारों को टूटता देखकर, क्रोध से भरा हुआ बाण समान संख्या की सेना लेकर युद्ध हेतु बाहर निकला।

श्लोक 6 (bhagavata.10.63.6)

बाणार्थे भगवान् रुद्रः ससुतः प्रमथैर्वृतः । आरुह्य नन्दिवृषभं युयुधे रामकृष्णयोः ॥ ६ ॥

bāṇārthe bhagavān rudraḥ sa-sutaḥ pramathair vṛtaḥ āruhya nandi-vṛṣabhaṁ yuyudhe rāma-kṛṣṇayoḥ

बाण के हित में, अपने पुत्र सहित तथा प्रमथगणों से घिरे भगवान रुद्र, अपने वृषभ नन्दी पर आरूढ़ होकर, बलराम और कृष्ण से युद्ध करने लगे।

श्लोक 7 (bhagavata.10.63.7)

आसीत्सुतुमुलं युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् । कृष्णशङ्करयो राजन् प्रद्युम्नगुहयोरपि ॥ ७ ॥

āsīt su-tumulaṁ yuddham adbhutaṁ roma-harṣaṇam kṛṣṇa-śaṅkarayo rājan pradyumna-guhayor api

हे राजन्, तब कृष्ण और शंकर के बीच, तथा प्रद्युम्न और गुह (कार्तिकेय) के बीच भी एक अत्यंत घोर, अद्भुत और रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 8 (bhagavata.10.63.8)

कुम्भाण्डकूपकर्णाभ्यां बलेन सह संयुगः । साम्बस्य बाणपुत्रेण बाणेन सह सात्यकेः ॥ ८ ॥

kumbhāṇḍa-kūpakarṇābhyāṁ balena saha saṁyugaḥ sāmbasya bāṇa-putreṇa bāṇena saha sātyakeḥ

बलराम का युद्ध कुम्भाण्ड और कूपकर्ण से हुआ, साम्ब का युद्ध बाण के पुत्र से, और सात्यकि का युद्ध स्वयं बाण से हुआ।

श्लोक 9 (bhagavata.10.63.9)

ब्रह्मादयः सुराधीशा मुनयः सिद्धचारणाः । गन्धर्वाप्सरसो यक्षा विमानैर्द्रष्टुमागमन् ॥ ९ ॥

brahmādayaḥ surādhīśā munayaḥ siddha-cāraṇāḥ gandharvāpsaraso yakṣā vimānair draṣṭum āgaman

ब्रह्मा आदि देवाधीश, मुनिगण, सिद्ध, चारण, तथा गन्धर्व, अप्सराएँ और यक्ष — सभी अपने विमानों में बैठकर यह युद्ध देखने आए।

श्लोक 10 (bhagavata.10.63.10)

शङ्करानुचरान् शौरिर्भूतप्रमथगुह्यकान् । डाकिनीर्यातुधानांश्च वेतालान् सविनायकान् ॥ १० ॥

śaṅkarānucarān śaurir bhūta-pramatha-guhyakān ḍākinīr yātudhānāṁś ca vetālān sa-vināyakān

कृष्ण ने शंकर के अनुचरों — भूत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, वेताल तथा विनायक-गणों को पीछे खदेड़ दिया।

श्लोक 11 (bhagavata.10.63.11)

प्रेतमातृपिशाचांश्च कुष्माण्डान् ब्रह्मराक्षसान् । द्रावयामास तीक्ष्णाग्रैः शरैः शार्ङ्गधनुश्च्युतैः ॥ ११ ॥

preta-mātṛ-piśācāṁś ca kuṣmāṇḍān brahma-rākṣasān drāvayām āsa tīkṣṇāgraiḥ śaraiḥ śārṅga-dhanuś-cyutaiḥ

तथा अपने शार्ङ्ग धनुष से छूटे तीक्ष्ण बाणों द्वारा उन्होंने प्रेत, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड और ब्रह्मराक्षसों को भी भगा दिया।

श्लोक 12 (bhagavata.10.63.12)

पृथग्विधानि प्रायुङ्क्त पिणाक्यस्त्राणि शार्ङ्गिणे । प्रत्यस्त्रैः शमयामास शार्ङ्गपाणिरविस्मितः ॥ १२ ॥

pṛthag-vidhāni prāyuṅkta piṇāky astrāṇi śārṅgiṇe praty-astraiḥ śamayām āsa śārṅga-pāṇir avismitaḥ

त्रिशूलधारी शिव ने शार्ङ्गधारी कृष्ण पर नाना प्रकार के अस्त्र चलाए — किंतु निर्विकार कृष्ण ने प्रत्येक अस्त्र को उपयुक्त प्रत्यस्त्रों से शांत कर दिया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.63.13)

ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतम् । आग्नेयस्य च पार्जन्यं नैजं पाशुपतस्य च ॥ १३ ॥

brahmāstrasya ca brahmāstraṁ vāyavyasya ca pārvatam āgneyasya ca pārjanyaṁ naijaṁ pāśupatasya ca

ब्रह्मास्त्र का उत्तर उन्होंने ब्रह्मास्त्र से, वायव्यास्त्र का पर्वतास्त्र से, आग्नेयास्त्र का पर्जन्यास्त्र से, और शिव के पाशुपतास्त्र का अपने निजी अस्त्र से दिया।

श्लोक 14 (bhagavata.10.63.14)

मोहयित्वा तु गिरिशं जृम्भणास्त्रेण जृम्भितम् । बाणस्य पृतनां शौरिर्जघानासिगदेषुभिः ॥ १४ ॥

mohayitvā tu giriśaṁ jṛmbhaṇāstreṇa jṛmbhitam bāṇasya pṛtanāṁ śaurir jaghānāsi-gadeṣubhiḥ

जृम्भणास्त्र से गिरीश (शिव) को जंभाई लेने पर विवश कर मोहित करने के बाद, कृष्ण ने खड्ग, गदा और बाणों से बाण की सेना का संहार किया।

श्लोक 15 (bhagavata.10.63.15)

स्कन्दः प्रद्युम्नबाणौघैरर्द्यमानः समन्ततः । असृग् विमुञ्चन् गात्रेभ्यः शिखिनापक्रमद् रणात् ॥ १५ ॥

skandaḥ pradyumna-bāṇaughair ardyamānaḥ samantataḥ asṛg vimuñcan gātrebhyaḥ śikhināpakramad raṇāt

प्रद्युम्न के बाणों की वर्षा से चारों ओर से पीड़ित होकर स्कन्द (कार्तिकेय) अपने अंगों से रक्त बहाते हुए अपने मयूर पर बैठकर युद्धभूमि से भाग गए।

श्लोक 16 (bhagavata.10.63.16)

कुम्भाण्डकूपकर्णश्च पेततुर्मुषलार्दितौ । दुद्रुवुस्तदनीकानि हतनाथानि सर्वतः ॥ १६ ॥

kumbhāṇḍa-kūpakarṇaś ca petatur muṣalārditau dudruvus tad-anīkani hata-nāthāni sarvataḥ

बलराम की गदा से आहत होकर कुम्भाण्ड और कूपकर्ण मृत होकर गिर पड़े। उनके सैनिक, नायकविहीन होकर, चारों दिशाओं में भाग खड़े हुए।

श्लोक 17 (bhagavata.10.63.17)

विशीर्यमाणं स्वबलं दृष्ट्वा बाणोऽत्यमर्षितः । कृष्णमभ्यद्रवत् सङ्ख्ये रथी हित्वैव सात्यकिम् ॥ १७ ॥

viśīryamāṇam sva-balaṁ dṛṣṭvā bāṇo ’ty-amarṣitaḥ kṛṣṇam abhyadravat saṅkhye rathī hitvaiva sātyakim

अपनी सेना को तितर-बितर होते देखकर, अत्यंत क्रुद्ध बाण ने सात्यकि के साथ युद्ध छोड़कर, उस संग्राम में अपने रथ पर कृष्ण की ओर धावा बोला।

श्लोक 18 (bhagavata.10.63.18)

धनूंष्याकृष्य युगपद् बाणः पञ्चशतानि वै । एकैकस्मिन् शरौ द्वौ द्वौ सन्दधे रणदुर्मदः ॥ १८ ॥

dhanūṁṣy ākṛṣya yugapad bāṇaḥ pañca-śatāni vai ekaikasmin śarau dvau dvau sandadhe raṇa-durmadaḥ

युद्ध के उन्माद में बाण ने अपने पाँच सौ धनुषों को एक साथ खींचा और प्रत्येक धनुष पर दो-दो बाण चढ़ा लिए।

श्लोक 19 (bhagavata.10.63.19)

तानि चिच्छेद भगवान् धनूंषि युगपद्धरिः । सारथिं रथमश्वांश्च हत्वा शङ्खमपूरयत् ॥ १९ ॥

tāni ciccheda bhagavān dhanūṁsi yugapad dhariḥ sārathiṁ ratham aśvāṁś ca hatvā śaṅkham apūrayat

भगवान हरि ने उन सभी धनुषों को एक साथ काट डाला, और बाण के सारथी, रथ तथा घोड़ों को भी मार गिराकर अपना शंख बजाया।

श्लोक 20 (bhagavata.10.63.20)

तन्माता कोटरा नाम नग्ना मक्तशिरोरुहा । पुरोऽवतस्थे कृष्णस्य पुत्रप्राणरिरक्षया ॥ २० ॥

tan-mātā koṭarā nāma nagnā makta-śiroruhā puro ’vatasthe kṛṣṇasya putra-prāṇa-rirakṣayā

उसी समय बाण की माता कोटरा, अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा की इच्छा से, नग्न होकर और अपने केश खोलकर कृष्ण के सम्मुख आ खड़ी हुई।

श्लोक 21 (bhagavata.10.63.21)

ततस्तिर्यङ्मुखो नग्नामनिरीक्षन् गदाग्रजः । बाणश्च तावद् विरथश्छिन्नधन्वाविशत् पुरम् ॥ २१ ॥

tatas tiryaṅ-mukho nagnām anirīkṣan gadāgrajaḥ bāṇaś ca tāvad virathaś chinna-dhanvāviśat puram

गद के अग्रज कृष्ण ने उस नग्न स्त्री की ओर न देखने हेतु अपना मुख फेर लिया, और इसी अवसर पर, रथहीन तथा टूटे हुए धनुष वाले बाण ने भागकर अपने नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 22 (bhagavata.10.63.22)

विद्राविते भूतगणे ज्वरस्तु त्रिशिरास्त्रीपात् । अभ्यधावत दाशार्हं दहन्निव दिशो दश ॥ २२ ॥

vidrāvite bhūta-gaṇe jvaras tu trī-śirās trī-pāt abhyadhāvata dāśārhaṁ dahann iva diśo daśa

शिव के भूतगणों के भाग जाने पर, तीन सिरों और तीन पैरों वाला शिव-ज्वर दशार्ह-कुल के कृष्ण की ओर दौड़ा, मानो अपनी उपस्थिति से दसों दिशाओं को जला रहा हो।

श्लोक 23 (bhagavata.10.63.23)

अथ नारायणः देवः तं दृष्ट्वा व्यसृजज्ज्वरम् । माहेश्वरो वैष्णवश्च युयुधाते ज्वरावुभौ ॥ २३ ॥

atha nārāyaṇaḥ devaḥ taṁ dṛṣṭvā vyasṛjaj jvaram māheśvaro vaiṣṇavaś ca yuyudhāte jvarāv ubhau

उसे आते देखकर, भगवान नारायण ने अपना निजी ज्वर-अस्त्र छोड़ दिया। इस प्रकार शिव-ज्वर और विष्णु-ज्वर, दोनों ज्वर परस्पर युद्ध करने लगे।

श्लोक 24 (bhagavata.10.63.24)

माहेश्वरः समाक्रन्दन् वैष्णवेन बलार्दितः । अलब्ध्वाभयमन्यत्र भीतो माहेश्वरो ज्वरः । शरणार्थी हृषीकेशं तुष्टाव प्रयताञ्जलिः ॥ २४ ॥

māheśvaraḥ samākrandan vaiṣṇavena balārditaḥ alabdhvābhayam anyatra bhīto māheśvaro jvaraḥ śaraṇārthī hṛṣīkeśaṁ tuṣṭāva prayatāñjaliḥ

विष्णु-ज्वर के बल से पीड़ित होकर शिव-ज्वर चीत्कार करने लगा। अन्यत्र कहीं भी शरण न पाकर, भयभीत शिव-ज्वर हृषीकेश की शरण चाहते हुए हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगा।

श्लोक 25 (bhagavata.10.63.25)

ज्वर उवाच नमामि त्वानन्तशक्तिं परेशं सर्वात्मानं केवलं ज्ञप्तिमात्रम् । विश्वोत्पत्तिस्थानसंरोधहेतुं यत्तद् ब्रह्म ब्रह्मलिङ्गं प्रशान्तम् ॥ २५ ॥

jvara uvāca namāmi tvānanta-śaktiṁ pareśam sarvātmānaṁ kevalaṁ jñapti-mātram viśvotpatti-sthāna-saṁrodha-hetuṁ yat tad brahma brahma-liṅgam praśāntam

ज्वर ने कहा — अनंत शक्तिशाली, परमेश्वर, सर्वात्मा, केवल शुद्ध चैतन्यस्वरूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण हैं, आप ही वह शांत ब्रह्म हैं जिसका संकेत वेद करते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.10.63.26)

कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो द्रव्यं क्षेत्रं प्राण आत्मा विकारः । तत्सङ्घातो बीजरोहप्रवाह- स्त्वन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये ॥ २६ ॥

kālo daivaṁ karma jīvaḥ svabhāvo dravyaṁ kṣetraṁ prāṇa ātmā vikāraḥ tat-saṅghāto bīja-roha-pravāhas tvan-māyaiṣā tan-niṣedhaṁ prapadye

काल, भाग्य, कर्म, जीव और उसका स्वभाव, प्रकृति, क्षेत्र (देह), प्राण, अहंकार और उसके विकार, तथा इन सबका समुदाय — जो बीज और अंकुर के समान अनवरत प्रवाहित होता है — यह सब आपकी माया है। मैं उस माया के निषेधस्वरूप आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।

श्लोक 27 (bhagavata.10.63.27)

नानाभावैर्लीलयैवोपपन्नै- र्देवान् साधून् लोकसेतून् बिभर्षि । हंस्युन्मार्गान् हिंसया वर्तमानान् जन्मैतत्ते भारहाराय भूमेः ॥ २७ ॥

nānā-bhāvair līlayaivopapannair devān sādhūn loka-setūn bibharṣi haṁsy unmārgān hiṁsayā vartamānān janmaitat te bhāra-hārāya bhūmeḥ

अपनी लीलाओं द्वारा नाना भावों को धारण करते हुए आप देवताओं, साधुजनों और लोक-मर्यादा का पालन करते हैं, तथा उन्मार्गगामी, हिंसा में लगे लोगों का संहार करते हैं। आपका यह जन्म पृथ्वी के भार को हरने के लिए ही है।

श्लोक 28 (bhagavata.10.63.28)

तप्तोऽहं ते तेजसा दुःसहेन शान्तोग्रेणात्युल्बणेन ज्वरेण । तावत्तापो देहिनां तेऽङ्घ्रिमूलं नो सेवेरन् यावदाशानुबद्धाः ॥ २८ ॥

tapto ’ham te tejasā duḥsahena śāntogreṇāty-ulbaṇena jvareṇa tāvat tāpo dehināṁ te ’nghri-mūlaṁ no severan yāvad āśānubaddhāḥ

मैं आपके इस असह्य तेज से संतप्त हूँ, जो शीतल भी है और उग्र भी, इस अत्यंत प्रचण्ड ज्वर के रूप में। देहधारी जीव तब तक ऐसा संताप भोगते हैं जब तक वे सांसारिक आशाओं में बंधे रहकर आपके चरणों की सेवा नहीं करते।

श्लोक 29 (bhagavata.10.63.29)

श्रीभगवानुवाच त्रिशिरस्ते प्रसन्नोऽस्मि व्येतु ते मज्ज्वराद् भयम् । यो नौ स्मरति संवादं तस्य त्वन्न भवेद् भयम् ॥ २९ ॥

śrī-bhagavān uvāca tri-śiras te prasanno ’smi vyetu te maj-jvarād bhayam yo nau smarati saṁvādaṁ tasya tvan na bhaved bhayam

श्रीभगवान ने कहा — हे त्रिशिर, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। मेरे ज्वर से तुम्हारा भय दूर हो, और जो कोई भी हमारे इस संवाद का स्मरण करे, उसे तुमसे कभी कोई भय न हो।

श्लोक 30 (bhagavata.10.63.30)

इत्युक्तोऽच्युतमानम्य गतो माहेश्वरो ज्वरः । बाणस्तु रथमारूढः प्रागाद्योत्स्यन् जनार्दनम् ॥ ३० ॥

ity ukto ’cyutam ānamya gato māheśvaro jvaraḥ bāṇas tu ratham ārūḍhaḥ prāgād yotsyan janārdanam

यह सुनकर शिव-ज्वर अच्युत को प्रणाम कर चला गया। इधर बाण पुनः रथ पर आरूढ़ होकर जनार्दन से युद्ध करने आगे बढ़ा।

श्लोक 31 (bhagavata.10.63.31)

ततो बाहुसहस्रेण नानायुधधरोऽसुरः । मुमोच परमक्रुद्धो बाणांश्चक्रायुधे नृप ॥ ३१ ॥

tato bāhu-sahasreṇa nānāyudha-dharo ’suraḥ mumoca parama-kruddho bāṇāṁś cakrāyudhe nṛpa

हे राजन्, तब उस असुर ने अपनी सहस्र भुजाओं में नाना प्रकार के शस्त्र धारण कर, अत्यंत क्रोधित होकर चक्रधारी कृष्ण पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 32 (bhagavata.10.63.32)

तस्यास्यतोऽस्त्राण्यसकृच्चक्रेण क्षुरनेमिना । चिच्छेद भगवान् बाहून् शाखा इव वनस्पतेः ॥ ३२ ॥

tasyāsyato ’strāṇy asakṛc cakreṇa kṣura-neminā ciccheda bhagavān bāhūn śākhā iva vanaspateḥ

जब बाण निरंतर अस्त्र फेंकता रहा, तब भगवान ने अपने क्षुर-धार चक्र से बार-बार उसकी भुजाओं को इस प्रकार काट डाला जैसे वृक्ष की शाखाओं को काटा जाता है।

श्लोक 33 (bhagavata.10.63.33)

बाहुषु छिद्यमानेषु बाणस्य भगवान् भवः । भक्तानुकम्प्युपव्रज्य चक्रायुधमभाषत ॥ ३३ ॥

bāhuṣu chidyamāneṣu bāṇasya bhagavān bhavaḥ bhaktānakampy upavrajya cakrāyudham abhāṣata

बाण की भुजाओं के कटते जाने पर, भगवान शिव अपने भक्त पर करुणा करते हुए चक्रधारी कृष्ण के पास गए और उनसे यह कहा।

श्लोक 34 (bhagavata.10.63.34)

श्रीरुद्र उवाच त्वं हि ब्रह्म परं ज्योतिर्गूढं ब्रह्मणि वाङ्मये । यं पश्यन्त्यमलात्मान आकाशमिव केवलम् ॥ ३४ ॥

śrī-rudra uvāca tvaṁ hi brahma paraṁ jyotir gūḍhaṁ brahmaṇi vāṅ-maye yaṁ paśyanty amalātmāna ākāśam iva kevalam

श्रीरुद्र ने कहा — आप ही वह परब्रह्म, वह परम ज्योति हैं, जो वाणीरूप वेद में गुप्त हैं — जिन्हें निर्मल हृदय वाले लोग आकाश के समान शुद्ध और अद्वितीय रूप में देखते हैं।

श्लोक 35 (bhagavata.10.63.35)

नाभिर्नभोऽग्निर्मुखमम्बु रेतो द्यौः शीर्षमाशाः श्रुतिरङ्घ्रिरुर्वी । चन्द्रो मनो यस्य दृगर्क आत्मा अहं समुद्रो जठरं भुजेन्द्रः ॥ ३५ ॥

nābhir nabho ’gnir mukham ambu reto dyauḥ śīrṣam āśāḥ śrutir aṅghrir urvī candro mano yasya dṛg arka ātmā ahaṁ samudro jaṭharaṁ bhujendraḥ

आकाश आपकी नाभि है, अग्नि आपका मुख, जल आपका वीर्य, और स्वर्ग आपका मस्तक है। दिशाएँ आपका श्रवण हैं, पृथ्वी आपका चरण, चन्द्रमा आपका मन, और सूर्य आपका नेत्र है। मैं आपका अहंकार हूँ; समुद्र आपका उदर है, और इन्द्र आपकी भुजा।

श्लोक 36 (bhagavata.10.63.36)

रोमाणि यस्यौषधयोऽम्बुवाहाः केशा विरिञ्चो धिषणा विसर्गः । प्रजापतिर्हृदयं यस्य धर्मः स वै भवान् पुरुषो लोककल्पः ॥ ३६ ॥

romāṇi yasyauṣadhayo ’mbu-vāhāḥ keśā viriñco dhiṣaṇā visargaḥ prajā-patir hṛdayaṁ yasya dharmaḥ sa vai bhavān puruṣo loka-kalpaḥ

ओषधियाँ आपके रोम हैं, और जलवाही बादल आपके सिर के केश; ब्रह्मा आपकी बुद्धि हैं, और सृष्टि आपकी जननशक्ति। प्रजापति आपका हृदय हैं, और धर्म आपका स्वभाव — ऐसे ही आप हैं, समस्त लोकों के रचयिता, वह परम पुरुष।

श्लोक 37 (bhagavata.10.63.37)

तवावतारोऽयमकुण्ठधामन् धर्मस्य गुप्त्यै जगतो हिताय । वयं च सर्वे भवतानुभाविता विभावयामो भुवनानि सप्त ॥ ३७ ॥

tavāvatāro ’yam akuṇṭha-dhāman dharmasya guptyai jagato hitāya vayaṁ ca sarve bhavatānubhāvitā vibhāvayāmo bhuvanāni sapta

हे अकुण्ठ-तेज प्रभु, आपका यह अवतार धर्म की रक्षा और जगत के कल्याण के लिए है। हम सभी देवगण भी आपके ही द्वारा शक्ति पाकर इन सातों लोकों का पालन-पोषण करते हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.10.63.38)

त्वमेक आद्यः पुरुषोऽद्वितीय- स्तुर्यः स्वदृग् धेतुरहेतुरीशः । प्रतीयसेऽथापि यथाविकारं स्वमायया सर्वगुणप्रसिद्ध्यै ॥ ३८ ॥

tvam eka ādyaḥ puruṣo ’dvitīyas turyaḥ sva-dṛg dhetur ahetur īśaḥ pratīyase ’thāpi yathā-vikāraṁ sva-māyayā sarva-guṇa-prasiddhyai

आप ही आद्य पुरुष हैं, अद्वितीय, तीनों अवस्थाओं से परे तुरीय, स्वयंप्रकाश, अहेतुक कारण, ईश्वर। तथापि आप अपनी माया द्वारा समस्त गुणों की पूर्ण अभिव्यक्ति हेतु विकारयुक्त प्रतीत होते हैं।

श्लोक 39 (bhagavata.10.63.39)

यथैव सूर्यः पिहितश्छायया स्वया छायां च रूपाणि च सञ्चकास्ति । एवं गुणेनापिहितो गुणांस्त्व- मात्मप्रदीपो गुणिनश्च भूमन् ॥ ३९ ॥

yathaiva sūryaḥ pihitaś chāyayā svayā chāyāṁ ca rūpāṇi ca sañcakāsti evaṁ guṇenāpihito guṇāṁs tvam ātma-pradīpo guṇinaś ca bhūman

हे भूमन्, जिस प्रकार सूर्य अपनी ही छाया से आवृत होकर भी उस छाया को और अन्य समस्त रूपों को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आप गुणों से आवृत होकर भी स्वयंप्रकाश रहते हुए उन गुणों को और उनके धारक जीवों को प्रकाशित करते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.10.63.40)

यन्मायामोहितधियः पुत्रदारगृहादिषु । उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे ॥ ४० ॥

yan-māyā-mohita-dhiyaḥ putra-dāra-gṛhādiṣu unmajjanti nimajjanti prasaktā vṛjinārṇave

आपकी माया से मोहित बुद्धि वाले तथा पुत्र, पत्नी, घर आदि में आसक्त जीव, दुःख के सागर में डूबते-उतराते रहते हैं।

श्लोक 41 (bhagavata.10.63.41)

देवदत्तमिमं लब्ध्वा नृलोकमजितेन्द्रियः । यो नाद्रियेत त्वत्पादौ स शोच्यो ह्यात्मवञ्चकः ॥ ४१ ॥

deva-dattam imaṁ labdhvā nṛ-lokam ajitendriyaḥ yo nādriyeta tvat-pādau sa śocyo hy ātma-vañcakaḥ

जो देवताओं की इस दुर्लभ देन, मनुष्य-जन्म को पाकर भी अपनी इन्द्रियों को न जीत सके और आपके चरणों का आदर न करे — वह शोचनीय है, क्योंकि वह स्वयं को ही ठग रहा है।

श्लोक 42 (bhagavata.10.63.42)

यस्त्वां विसृजते मर्त्य आत्मानं प्रियमीश्वरम् । विपर्ययेन्द्रियार्थार्थं विषमत्त्यमृतं त्यजन् ॥ ४२ ॥

yas tvāṁ visṛjate martya ātmānaṁ priyam īśvaram viparyayendriyārthārthaṁ viṣam atty amṛtaṁ tyajan

जो मरणशील मनुष्य आपको — जो उसका अपना आत्मा, प्रियतम और ईश्वर हैं — इन्द्रिय-विषयों के लिए, जिनका स्वभाव इससे सर्वथा विपरीत है, त्याग देता है, वह अमृत को छोड़कर विष का पान करता है।

श्लोक 43 (bhagavata.10.63.43)

अहं ब्रह्माथ विबुधा मुनयश्चामलाशयाः । सर्वात्मना प्रपन्नास्त्वामात्मानं प्रेष्ठमीश्वरम् ॥ ४३ ॥

ahaṁ brahmātha vibudhā munayaś cāmalāśayāḥ sarvātmanā prapannās tvām ātmānaṁ preṣṭham īśvaram

मैं ब्रह्मा, अन्य देवगण, तथा निर्मल हृदय वाले मुनिजन — हम सब पूर्ण रूप से आपकी, अपने आत्मा, अपने प्रियतम और ईश्वर की शरण में आए हैं।

श्लोक 44 (bhagavata.10.63.44)

तं त्वा जगत्स्थित्युदयान्तहेतुं समं प्रशान्तं सुहृदात्मदैवम् । अनन्यमेकं जगदात्मकेतं भवापवर्गाय भजाम देवम् ॥ ४४ ॥

taṁ tvā jagat-sthity-udayānta-hetuṁ samaṁ prasāntaṁ suhṛd-ātma-daivam ananyam ekaṁ jagad-ātma-ketaṁ bhavāpavargāya bhajāma devam

हम आप देव की उपासना करते हैं, जो जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं, समत्व और परम शांति से युक्त हैं, जो सुहृद्, आत्मा और आराध्य देव हैं — अद्वितीय, जगत और समस्त आत्माओं के आश्रय — ताकि हम संसार-बंधन से मुक्त हो सकें।

श्लोक 45 (bhagavata.10.63.45)

अयं ममेष्टो दयितोऽनुवर्ती मयाभयं दत्तममुष्य देव । सम्पाद्यतां तद् भवतः प्रसादो यथा हि ते दैत्यपतौ प्रसादः ॥ ४५ ॥

ayaṁ mameṣṭo dayito ’nuvartī mayābhayaṁ dattam amuṣya deva sampādyatāṁ tad bhavataḥ prasādo yathā hi te daitya-patau prasādaḥ

यह बाण मुझे प्रिय है, मेरा दयनीय और अनुगामी भक्त है, और मैंने इसे अभय प्रदान किया है। हे देव, जिस प्रकार आपने दैत्यराज प्रह्लाद पर कृपा की थी, उसी प्रकार अब इस पर भी अपनी कृपा कीजिए।

श्लोक 46 (bhagavata.10.63.46)

श्रीभगवानुवाच यदात्थ भगवंस्त्वं नः करवाम प्रियं तव । भवतो यद् व्यवसितं तन्मे साध्वनुमोदितम् ॥ ४६ ॥

śrī-bhagavān uvāca yad āttha bhagavaṁs tvaṁ naḥ karavāma priyaṁ tava bhavato yad vyavasitaṁ tan me sādhv anumoditam

श्रीभगवान ने कहा — हे प्रभो, आपने जो कुछ कहा है, हम आपकी प्रसन्नता हेतु वही करेंगे। आपने जो निश्चय किया है, उसका मैं भलीभाँति अनुमोदन करता हूँ।

श्लोक 47 (bhagavata.10.63.47)

अवध्योऽयं ममाप्येष वैरोचनिसुतोऽसुरः । प्रह्रादाय वरो दत्तो न वध्यो मे तवान्वयः ॥ ४७ ॥

avadhyo ’yaṁ mamāpy eṣa vairocani-suto ’suraḥ prahrādāya varo datto na vadhyo me tavānvayaḥ

यह असुर भी, जो वैरोचनि का पुत्र है, मेरे द्वारा वध्य नहीं है — क्योंकि मैंने प्रह्लाद को यह वरदान दिया था कि उसके वंश का कोई भी मेरे हाथों नहीं मारा जाएगा।

श्लोक 48 (bhagavata.10.63.48)

दर्पोपशमनायास्य प्रवृक्णा बाहवो मया । सूदितं च बलं भूरि यच्च भारायितं भुवः ॥ ४८ ॥

darpopaśamanāyāsya pravṛkṇā bāhavo mayā sūditaṁ ca balaṁ bhūri yac ca bhārāyitaṁ bhuvaḥ

इसके अभिमान को शांत करने के लिए ही मैंने इसकी भुजाएँ काटी हैं, तथा इसकी विशाल सेना का संहार भी इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी के लिए भार बन गई थी।

श्लोक 49 (bhagavata.10.63.49)

चत्वारोऽस्य भुजाः शिष्टा भविष्यत्यजरामरः । पार्षदमुख्यो भवतो न कुतश्चिद्भयोऽसुरः ॥ ४९ ॥

catvāro ’sya bhujāḥ śiṣṭā bhaviṣyaty ajarāmaraḥ pārṣada-mukhyo bhavato na kutaścid-bhayo ’suraḥ

इसकी चार भुजाएँ शेष रहेंगी, और यह जरा-मृत्यु से रहित हो जाएगा। यह आपका प्रमुख पार्षद बनेगा, और इस असुर को अब किसी भी ओर से कोई भय नहीं रहेगा।

श्लोक 50 (bhagavata.10.63.50)

इति लब्ध्वाभयं कृष्णं प्रणम्य शिरसासुरः । प्राद्युम्निं रथमारोप्य सवध्वो समुपानयत् ॥ ५० ॥

iti labdhvābhayaṁ kṛṣṇaṁ praṇamya śirasāsuraḥ prādyumniṁ ratham āropya sa-vadhvo samupānayat

इस प्रकार अभय पाकर असुर ने कृष्ण को सिर झुकाकर प्रणाम किया, और फिर प्रद्युम्न-पुत्र अनिरुद्ध को उनकी वधू सहित रथ पर बिठाकर भगवान के समक्ष लाया।

श्लोक 51 (bhagavata.10.63.51)

अक्षौहिण्या परिवृतं सुवासःसमलङ्कृतम् । सपत्नीकं पुरस्कृत्य ययौ रुद्रानुमोदितः ॥ ५१ ॥

akṣauhiṇyā parivṛtaṁ su-vāsaḥ-samalaṅkṛtam sa-patnīkaṁ puras-kṛtya yayau rudrānumoditaḥ

सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित अनिरुद्ध और उनकी वधू को आगे रखकर, तथा एक पूर्ण अक्षौहिणी सेना से घिरे हुए, कृष्ण रुद्र की अनुमति लेकर वहाँ से चल पड़े।

श्लोक 52 (bhagavata.10.63.52)

स्वराजधानीं समलङ्कृतां ध्वजैः सतोरणैरुक्षितमार्गचत्वराम् । विवेश शङ्खानकदुन्दुभिस्वनै- रभ्युद्यतः पौरसुहृद्द्विजातिभिः ॥ ५२ ॥

sva-rājadhānīṁ samalaṅkṛtāṁ dhvajaiḥ sa-toraṇair ukṣita-mārga-catvarām viveśa śaṅkhānaka-dundubhi-svanair abhyudyataḥ paura-suhṛd-dvijātibhiḥ

तत्पश्चात् भगवान ध्वजों और तोरणों से सुसज्जित, जिसके मार्ग और चौराहे जल से सिंचित थे, अपनी राजधानी में प्रविष्ट हुए — शंख, आनक और दुन्दुभि के निनाद के साथ, तथा अपने बन्धुजनों, नगरवासियों और ब्राह्मणों द्वारा हर्षपूर्वक स्वागत किए जाते हुए।

श्लोक 53 (bhagavata.10.63.53)

य एवं कृष्णविजयं शङ्करेण च संयुगम् । संस्मरेत् प्रातरुत्थाय न तस्य स्यात् पराजयः ॥ ५३ ॥

ya evaṁ kṛṣṇa-vijayaṁ śaṅkareṇa ca saṁyugam saṁsmaret prātar utthāya na tasya syāt parājayaḥ

जो कोई प्रातःकाल उठकर कृष्ण की इस विजय का, शंकर के साथ हुए इस युद्ध का स्मरण करता है, उसकी कभी पराजय नहीं होती।

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