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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1

ईश्वर-साक्षात्कार का प्रथम सोपान

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (bhagavata.2.1.1)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

oṁ namo bhagavate vāsudevāya

ॐ। भगवान वासुदेव को नमस्कार।

श्लोक 2 (bhagavata.2.1.2)

श्रीशुक उवाच वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप । आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca varīyān eṣa te praśnaḥ kṛto loka-hitaṁ nṛpa ātmavit-sammataḥ puṁsāṁ śrotavyādiṣu yaḥ paraḥ

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्, आपका यह प्रश्न अत्यंत श्रेष्ठ है, क्योंकि यह समस्त लोगों के कल्याण के लिए किया गया है। श्रवण करने योग्य समस्त विषयों में यह सर्वोच्च है और आत्मज्ञानी पुरुषों द्वारा स्वीकृत है।

श्लोक 3 (bhagavata.2.1.3)

श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः । अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥

śrotavyādīni rājendra nṛṇāṁ santi sahasraśaḥ apaśyatām ātma-tattvaṁ gṛheṣu gṛha-medhinām

हे राजेन्द्र, जो लोग आत्मतत्त्व को नहीं देख पाते और गृहस्थी में लीन रहते हैं, उनके लिए घर की बातों में सुनने योग्य विषय सहस्रों की संख्या में हैं।

श्लोक 4 (bhagavata.2.1.4)

निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः । दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥

nidrayā hriyate naktaṁ vyavāyena ca vā vayaḥ divā cārthehayā rājan kuṭumba-bharaṇena vā

हे राजन्, ऐसे मनुष्य की रात्रि निद्रा में अथवा भोग में व्यतीत होती है, और दिन धन कमाने या परिवार के भरण-पोषण में बीत जाता है।

श्लोक 5 (bhagavata.2.1.5)

देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसैन्येष्वसत्स्वपि । तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥

dehāpatya-kalatrādiṣv ātma-sainyeṣv asatsv api teṣāṁ pramatto nidhanaṁ paśyann api na paśyati

यद्यपि शरीर, संतान, पत्नी आदि — जिन्हें वह अपनी सेना के समान आश्रय मानता है — नाशवान हैं, फिर भी मोहग्रस्त मनुष्य उनके विनाश को देखते हुए भी वास्तव में नहीं देख पाता।

श्लोक 6 (bhagavata.2.1.6)

तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरिः । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम् ॥ ५ ॥

tasmād bhārata sarvātmā bhagavān īśvaro hariḥ śrotavyaḥ kīrtitavyaś ca smartavyaś cecchatābhayam

अतः हे भारतवंशी, जो भयमुक्ति चाहता है, उसे सर्वात्मा भगवान हरि के विषय में श्रवण करना, कीर्तन करना और स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 7 (bhagavata.2.1.7)

एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया । जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः ॥ ६ ॥

etāvān sāṅkhya-yogābhyāṁ sva-dharma-pariniṣṭhayā janma-lābhaḥ paraḥ puṁsām ante nārāyaṇa-smṛtiḥ

सांख्य और योग के द्वारा अथवा अपने धर्म के दृढ़ पालन द्वारा प्राप्त होने वाला मनुष्य-जन्म का परम लाभ यही है कि अंत समय में नारायण का स्मरण हो।

श्लोक 8 (bhagavata.2.1.8)

प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिषेधतः । नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥

prāyeṇa munayo rājan nivṛttā vidhi-ṣedhataḥ nairguṇya-sthā ramante sma guṇānukathane hareḥ

हे राजन्, जो मुनि प्रायः विधि-निषेध से ऊपर उठकर निर्गुण अवस्था में स्थित हो चुके हैं, वे भी हरि के गुणों की कथा में आनंदपूर्वक रमण करते हैं।

श्लोक 9 (bhagavata.2.1.9)

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥

idaṁ bhāgavataṁ nāma purāṇaṁ brahma-sammitam adhītavān dvāparādau pitur dvaipāyanād aham

इस भागवत नामक पुराण को, जो वेद के समान माना गया है, मैंने द्वापर युग के अंत में अपने पिता द्वैपायन से पढ़ा था।

श्लोक 10 (bhagavata.2.1.10)

परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया । गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥

pariniṣṭhito ’pi nairguṇya uttama-śloka-līlayā gṛhīta-cetā rājarṣe ākhyānaṁ yad adhītavān

हे राजर्षे, यद्यपि मैं निर्गुण अवस्था में पूर्णतः स्थित था, तथापि उत्तमश्लोक भगवान की लीलाओं ने मेरे चित्त को आकर्षित कर लिया, और इसी कारण मैंने यह आख्यान पढ़ा।

श्लोक 11 (bhagavata.2.1.11)

तदहं तेऽभिधास्यामि महापौरुषिको भवान् । यस्य श्रद्दधतामाशु स्यान्मुकुन्दे मतिः सती ॥ १० ॥

tad ahaṁ te ’bhidhāsyāmi mahā-pauruṣiko bhavān yasya śraddadhatām āśu syān mukunde matiḥ satī

वही भागवत मैं अब आपको सुनाऊँगा, क्योंकि आप महापुरुष के परम भक्त हैं; जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, उसकी बुद्धि शीघ्र ही मुकुंद में दृढ़ हो जाती है।

श्लोक 12 (bhagavata.2.1.12)

एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम् । योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्तनम् ॥ ११ ॥

etan nirvidyamānānām icchatām akuto-bhayam yogināṁ nṛpa nirṇītaṁ harer nāmānukīrtanam

हे राजन्, जो निष्काम हैं, जो सकाम हैं, तथा जो योगी आत्मतुष्ट हैं — इन सभी के लिए हरि के नाम का निरंतर कीर्तन ही निर्भय और निश्चित मार्ग निर्धारित किया गया है।

श्लोक 13 (bhagavata.2.1.13)

किं प्रमत्तस्य बहुभिः परोक्षैर्हायनैरिह । वरं मुहूर्तं विदितं घटते श्रेयसे यतः ॥ १२ ॥

kiṁ pramattasya bahubhiḥ parokṣair hāyanair iha varaṁ muhūrtaṁ viditaṁ ghaṭate śreyase yataḥ

प्रमादी मनुष्य के इस संसार में अनजाने बीते हुए अनेक वर्षों से क्या लाभ? इससे तो एक सचेत क्षण ही श्रेष्ठ है, क्योंकि उसी से परम कल्याण की प्राप्ति संभव होती है।

श्लोक 14 (bhagavata.2.1.14)

खट्वाङ्गो नाम राजर्षिर्ज्ञात्वेयत्तामिहायुषः । मुहूर्तात्सर्वमुत्सृज्य गतवानभयं हरिम् ॥ १३ ॥

khaṭvāṅgo nāma rājarṣir jñātveyattām ihāyuṣaḥ muhūrtāt sarvam utsṛjya gatavān abhayaṁ harim

खट्वांग नामक राजर्षि, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके जीवन का केवल एक ही मुहूर्त शेष है, तब उसी क्षण सब कुछ त्यागकर भयरहित हरि की शरण में चले गए।

श्लोक 15 (bhagavata.2.1.15)

तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधिः । उपकल्पय तत्सर्वं तावद्यत्साम्परायिकम् ॥ १४ ॥

tavāpy etarhi kauravya saptāhaṁ jīvitāvadhiḥ upakalpaya tat sarvaṁ tāvad yat sāmparāyikam

हे कौरव्य, आपकी भी अब जीवन-सीमा सात दिन शेष है; इतने समय में वह सब कुछ तैयार कर लीजिए, जो परलोक के लिए आवश्यक है।

श्लोक 16 (bhagavata.2.1.16)

अन्तकाले तु पुरुष आगते गतसाध्वसः । छिन्द्यादसङ्गशस्त्रेण स्पृहां देहेऽनु ये च तम् ॥ १५ ॥

anta-kāle tu puruṣa āgate gata-sādhvasaḥ chindyād asaṅga-śastreṇa spṛhāṁ dehe ’nu ye ca tam

जब अंतकाल आ पहुँचे, तब मनुष्य को निर्भय होकर वैराग्य रूपी शस्त्र से शरीर तथा उससे संबंधित समस्त वस्तुओं के प्रति आसक्ति को काट डालना चाहिए।

श्लोक 17 (bhagavata.2.1.17)

गृहात् प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थजलाप्लुतः । शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने ॥ १६ ॥

gṛhāt pravrajito dhīraḥ puṇya-tīrtha-jalāplutaḥ śucau vivikta āsīno vidhivat kalpitāsane

धैर्यवान पुरुष घर से निकलकर, किसी पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके, विधिपूर्वक बनाए गए आसन पर किसी स्वच्छ और एकांत स्थान में बैठे।

श्लोक 18 (bhagavata.2.1.18)

अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम् । मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन् ॥ १७ ॥

abhyasen manasā śuddhaṁ trivṛd-brahmākṣaraṁ param mano yacchej jita-śvāso brahma-bījam avismaran

मन के द्वारा उस पवित्र त्रिवर्णात्मक परम अक्षर (ॐ) का अभ्यास करे; श्वास को वश में करके, उस ब्रह्म-बीज को कभी न भूलते हुए, मन को संयमित करे।

श्लोक 19 (bhagavata.2.1.19)

नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः । मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥

niyacched viṣayebhyo ’kṣān manasā buddhi-sārathiḥ manaḥ karmabhir ākṣiptaṁ śubhārthe dhārayed dhiyā

बुद्धिरूपी सारथी के द्वारा इंद्रियों को विषयों से हटा ले; तथा कर्मों द्वारा विक्षिप्त हुए मन को बुद्धि के सहारे शुभ लक्ष्य में स्थिर करे।

श्लोक 20 (bhagavata.2.1.20)

तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा । मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् । पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥

tatraikāvayavaṁ dhyāyed avyucchinnena cetasā mano nirviṣayaṁ yuktvā tataḥ kiñcana na smaret padaṁ tat paramaṁ viṣṇor mano yatra prasīdati

वहाँ अविच्छिन्न चित्त से भगवान के एक-एक अंग का ध्यान करे; मन को विषयरहित करके तत्पश्चात् अन्य कुछ भी न सोचे — वही विष्णु का परम पद है, जहाँ मन को शांति प्राप्त होती है।

श्लोक 21 (bhagavata.2.1.21)

रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढं मन आत्मनः । यच्छेद्धारणया धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम् ॥ २० ॥

rajas-tamobhyām ākṣiptaṁ vimūḍhaṁ mana ātmanaḥ yacched dhāraṇayā dhīro hanti yā tat-kṛtaṁ malam

रजस और तमस से आक्षिप्त होकर मोहग्रस्त हुए अपने मन को धैर्यवान पुरुष इस धारणा द्वारा वश में करे, जो उन दोनों गुणों से उत्पन्न मल का नाश कर देती है।

श्लोक 22 (bhagavata.2.1.22)

यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः । आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥

yasyāṁ sandhāryamāṇāyāṁ yogino bhakti-lakṣaṇaḥ āśu sampadyate yoga āśrayaṁ bhadram īkṣataḥ

इस धारणा का निरंतर अभ्यास करने से योगी शीघ्र ही भक्ति-लक्षण योग को प्राप्त कर लेता है, तथा उस कल्याणकारी आश्रय का साक्षात्कार करता है।

श्लोक 23 (bhagavata.2.1.23)

राजोवाच यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता । यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२ ॥

rājovāca yathā sandhāryate brahman dhāraṇā yatra sammatā yādṛśī vā hared āśu puruṣasya mano-malam

राजा ने कहा — हे ब्राह्मण, यह धारणा किस प्रकार धारण की जाए, किस पर स्थिर की जाए, और वह कैसी हो जिससे मनुष्य के मन का मल शीघ्र दूर हो जाए, यह मुझे बताइए।

श्लोक 24 (bhagavata.2.1.24)

श्रीशुक उवाच जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः । स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥

śrī-śuka uvāca jitāsano jita-śvāso jita-saṅgo jitendriyaḥ sthūle bhagavato rūpe manaḥ sandhārayed dhiyā

श्री शुकदेव जी ने कहा — आसन को जीतकर, श्वास को जीतकर, आसक्ति को जीतकर तथा इंद्रियों को जीतकर, बुद्धि के सहारे मन को भगवान के स्थूल रूप में स्थिर करे।

श्लोक 25 (bhagavata.2.1.25)

विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् । यत्रेदं व्यज्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च सत् ॥ २४ ॥

viśeṣas tasya deho ’yaṁ sthaviṣṭhaś ca sthavīyasām yatredaṁ vyajyate viśvaṁ bhūtaṁ bhavyaṁ bhavac ca sat

उनका यह विशेष शरीर समस्त स्थूल पदार्थों में सर्वाधिक स्थूल है, और इसी में यह सम्पूर्ण विश्व — भूत, भविष्य तथा वर्तमान — प्रकट होता है।

श्लोक 26 (bhagavata.2.1.26)

अण्डकोशे शरीरेऽस्मिन् सप्तावरणसंयुते । वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान् धारणाश्रयः ॥ २५ ॥

aṇḍa-kośe śarīre ’smin saptāvaraṇa-saṁyute vairājaḥ puruṣo yo ’sau bhagavān dhāraṇāśrayaḥ

इस अण्डकोश रूपी शरीर में, जो सात आवरणों से युक्त है, वही वैराज पुरुष भगवान विराजमान हैं, जो इस धारणा के आश्रय हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.2.1.27)

पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् । महातलं विश्वसृजोऽथ गुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥ २६ ॥

pātālam etasya hi pāda-mūlaṁ paṭhanti pārṣṇi-prapade rasātalam mahātalaṁ viśva-sṛjo ’tha gulphau talātalaṁ vai puruṣasya jaṅghe

इस विषय के ज्ञाता कहते हैं कि पाताल इनके पैर का तलवा है, रसातल एड़ी और पंजा है, महातल विश्व-स्रष्टा के टखने हैं, तथा तलातल इस पुरुष की पिंडलियाँ हैं।

श्लोक 28 (bhagavata.2.1.28)

द्वे जानुनी सुतलं विश्वमूर्ते- रूरुद्वयं वितलं चातलं च । महीतलं तज्जघनं महीपते नभस्तलं नाभिसरो गृणन्ति ॥ २७ ॥

dve jānunī sutalaṁ viśva-mūrter ūru-dvayaṁ vitalaṁ cātalaṁ ca mahītalaṁ taj-jaghanaṁ mahīpate nabhastalaṁ nābhi-saro gṛṇanti

हे राजन्, सुतल इस विश्वरूप के दोनों घुटने हैं, वितल और अतल दोनों जंघाएँ हैं, महीतल इनका कटिभाग है, तथा आकाशमण्डल को इनकी नाभि का सरोवर कहा जाता है।

श्लोक 29 (bhagavata.2.1.29)

उरःस्थलं ज्योतिरनीकमस्य ग्रीवा महर्वदनं वै जनोऽस्य । तपो वराटीं विदुरादिपुंसः सत्यं तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ष्णः ॥ २८ ॥

uraḥ-sthalaṁ jyotir-anīkam asya grīvā mahar vadanaṁ vai jano ’sya tapo varāṭīṁ vidur ādi-puṁsaḥ satyaṁ tu śīrṣāṇi sahasra-śīrṣṇaḥ

ज्योतिर्लोक इनकी छाती है, महर्लोक ग्रीवा है, जनलोक इस आदिपुरुष का मुख है, तथा तपोलोक को इनका ललाट कहा गया है; सत्यलोक सहस्रशीर्ष भगवान का मस्तक है।

श्लोक 30 (bhagavata.2.1.30)

इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्राः कर्णौ दिशःश्रोत्रममुष्य शब्दः । नासत्यदस्रौ परमस्य नासे घ्राणोऽस्य गन्धो मुखमग्निरिद्धः ॥ २९ ॥

indrādayo bāhava āhur usrāḥ karṇau diśaḥ śrotram amuṣya śabdaḥ nāsatya-dasrau paramasya nāse ghrāṇo ’sya gandho mukham agnir iddhaḥ

इन्द्र आदि देवगण इनकी भुजाएँ कही जाती हैं, दिशाएँ इनके कान हैं और शब्द इनका श्रवण है। नासत्य और दस्र (अश्विनीकुमार) परमपुरुष की नासिकाएँ हैं, गंध इनकी घ्राण-शक्ति है, तथा प्रज्वलित अग्नि इनका मुख है।

श्लोक 31 (bhagavata.2.1.31)

द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत्पतङ्गः पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च । तद्भ्रूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्य- मापोऽस्य तालु रस एव जिह्वा ॥ ३० ॥

dyaur akṣiṇī cakṣur abhūt pataṅgaḥ pakṣmāṇi viṣṇor ahanī ubhe ca tad-bhrū-vijṛmbhaḥ parameṣṭhi-dhiṣṇyam āpo ’sya tālū rasa eva jihvā

आकाश इनकी आँखों की कोटरें हैं, सूर्य इनकी दृष्टि-शक्ति है; दिन और रात्रि दोनों विष्णु की पलकें हैं, और इनकी भृकुटि की गति ब्रह्मा का स्थान है। जल इनका तालु है, तथा रस ही इनकी जिह्वा है।

श्लोक 32 (bhagavata.2.1.32)

छन्दांस्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दंष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि । हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥ ३१ ॥

chandāṁsy anantasya śiro gṛṇanti daṁṣṭrā yamaḥ sneha-kalā dvijāni hāso janonmāda-karī ca māyā duranta-sargo yad-apāṅga-mokṣaḥ

अनंत भगवान का मस्तिष्क वेदमंत्र कहे जाते हैं, दंडदाता यमराज इनकी दाढ़ें हैं, तथा स्नेह इनके दाँत हैं। इनकी मुस्कान वह माया है जो समस्त प्राणियों को उन्मत्त कर देती है, और यह विशाल अनंत सृष्टि इनकी कोर-दृष्टि के विमोचन मात्र से उत्पन्न होती है।

श्लोक 33 (bhagavata.2.1.33)

व्रीडोत्तरौष्ठोऽधर एव लोभो धर्मः स्तनोऽधर्मपथोऽस्य पृष्ठम् । कस्तस्य मेढ्रं वृषणौ च मित्रौ कुक्षिः समुद्रा गिरयोऽस्थिसङ्घाः ॥ ३२ ॥

vrīḍottarauṣṭho ’dhara eva lobho dharmaḥ stano ’dharma-patho ’sya pṛṣṭham kas tasya meḍhraṁ vṛṣaṇau ca mitrau kukṣiḥ samudrā girayo ’sthi-saṅghāḥ

लज्जा इनका ऊपरी ओष्ठ है, लोभ निचला ओष्ठ है; धर्म इनकी छाती है, तथा अधर्म का मार्ग इनकी पीठ है। ब्रह्मा इनका जननेन्द्रिय हैं, मित्र-वरुण दोनों वृषण हैं, समुद्र इनका उदर है, तथा पर्वत इनकी अस्थियों का समूह हैं।

श्लोक 34 (bhagavata.2.1.34)

नद्योऽस्य नाड्योऽथ तनूरुहाणि महीरुहा विश्वतनोर्नृपेन्द्र । अनन्तवीर्यः श्वसितं मातरिश्वा गतिर्वयः कर्म गुणप्रवाहः ॥ ३३ ॥

nadyo ’sya nāḍyo ’tha tanū-ruhāṇi mahī-ruhā viśva-tanor nṛpendra ananta-vīryaḥ śvasitaṁ mātariśvā gatir vayaḥ karma guṇa-pravāhaḥ

हे राजेन्द्र, इस विश्वरूप की नाड़ियाँ नदियाँ हैं, तथा वृक्ष इनके शरीर के रोम हैं; अनंत बलशाली वायु इनका श्वास है। युगों का प्रवाह इनकी गति है, तथा त्रिगुणों का प्रवाह इनका कर्म है।

श्लोक 35 (bhagavata.2.1.35)

ईशस्य केशान् विदुरम्बुवाहान् वासस्तु सन्ध्यां कुरुवर्य भूम्नः । अव्यक्तमाहुर्हृदयं मनश्च स चन्द्रमाः सर्वविकारकोशः ॥ ३४ ॥

īśasya keśān vidur ambuvāhān vāsas tu sandhyāṁ kuru-varya bhūmnaḥ avyaktam āhur hṛdayaṁ manaś ca sa candramāḥ sarva-vikāra-kośaḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, जलवाही मेघों को इस ईश्वर के केश कहा गया है, तथा संध्या इस विभुशाली प्रभु का वस्त्र है; अव्यक्त तत्त्व को इनका हृदय और मन कहा जाता है, तथा चन्द्रमा समस्त विकारों का कोश है।

श्लोक 36 (bhagavata.2.1.36)

विज्ञानशक्तिं महिमामनन्ति सर्वात्मनोऽन्तःकरणं गिरित्रम् । अश्वाश्वतर्युष्ट्रगजा नखानि सर्वे मृगाः पशवः श्रोणिदेशे ॥ ३५ ॥

vijñāna-śaktiṁ mahim āmananti sarvātmano ’ntaḥ-karaṇaṁ giritram aśvāśvatary-uṣṭra-gajā nakhāni sarve mṛgāḥ paśavaḥ śroṇi-deśe

विज्ञान-शक्ति को सर्वात्मा भगवान का महत्तत्त्व कहा जाता है, तथा गिरित्र (शिव) इनकी अंतःकरण-शक्ति हैं। अश्व, खच्चर, ऊँट और हाथी इनके नख हैं, तथा समस्त मृग एवं पशु इनके कटि-प्रदेश में स्थित हैं।

श्लोक 37 (bhagavata.2.1.37)

वयांसि तद्व्याकरणं विचित्रं मनुर्मनीषा मनुजो निवासः । गन्धर्वविद्याधरचारणाप्सरः स्वरस्मृतीरसुरानीकवीर्यः ॥ ३६ ॥

vayāṁsi tad-vyākaraṇaṁ vicitraṁ manur manīṣā manujo nivāsaḥ gandharva-vidyādhara-cāraṇāpsaraḥ svara-smṛtīr asurānīka-vīryaḥ

पक्षीगण इनकी अद्भुत वाक्-शक्ति के प्रतीक हैं, मनु इनकी बुद्धि हैं, तथा मनुष्य इनका निवास स्थान है। गंधर्व, विद्याधर, चारण और अप्सराएँ इनकी स्वर-स्मृति हैं, तथा असुर-सेनाएँ इनका पराक्रम हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.2.1.38)

ब्रह्माननं क्षत्रभुजो महात्मा विडूरुरङ्घ्रिश्रितकृष्णवर्णः । नानाभिधाभीज्यगणोपपन्नो द्रव्यात्मकः कर्म वितानयोगः ॥ ३७ ॥

brahmānanaṁ kṣatra-bhujo mahātmā viḍ ūrur aṅghri-śrita-kṛṣṇa-varṇaḥ nānābhidhābhījya-gaṇopapanno dravyātmakaḥ karma vitāna-yogaḥ

ब्राह्मण इस महात्मा का मुख हैं, क्षत्रिय इनकी भुजाएँ हैं, वैश्य इनकी जंघाएँ हैं, तथा श्याम वर्ण के शूद्र इनके चरणों की शरण में हैं। नाना नामों से पूजनीय देवगण इनके साथ रहते हैं, और द्रव्यमय यज्ञकर्म ही इनसे जुड़ने का साधन है।

श्लोक 39 (bhagavata.2.1.39)

इयानसावीश्वरविग्रहस्य यः सन्निवेषः कथितो मया ते । सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे मनः स्वबुद्ध्या न यतोऽस्ति किञ्चित् ॥ ३८ ॥

iyān asāv īśvara-vigrahasya yaḥ sanniveśaḥ kathito mayā te sandhāryate ’smin vapuṣi sthaviṣṭhe manaḥ sva-buddhyā na yato ’sti kiñcit

इस प्रकार ईश्वर के इस स्वरूप की जो संरचना मैंने आपसे कही, वह इतनी ही है; अपनी बुद्धि द्वारा मन को इस स्थूलतम शरीर में स्थिर करना चाहिए, क्योंकि इससे परे और कुछ भी नहीं है जिस पर मन को टिकाया जा सके।

श्लोक 40 (bhagavata.2.1.40)

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः । तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः ॥ ३९ ॥

sa sarva-dhī-vṛtty-anubhūta-sarva ātmā yathā svapna-janekṣitaikaḥ taṁ satyam ānanda-nidhiṁ bhajeta nānyatra sajjed yata ātma-pātaḥ

वह एक आत्मा समस्त प्रकार की बुद्धिवृत्तियों द्वारा अनुभव किया जाता है, जैसे स्वप्न देखने वाला एक ही पुरुष स्वप्न के अनेक दृश्यों को देखता है; उसी सत्यस्वरूप आनंदनिधि की उपासना करनी चाहिए, अन्यत्र आसक्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे आत्मा का पतन होता है।

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