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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17

हिरण्याक्ष द्वारा विश्व की समस्त दिशाओं पर विजय

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (bhagavata.3.17.1)

मैत्रेय उवाच निशम्यात्मभुवा गीतं कारणं शङ्कयोज्झिताः । ततः सर्वे न्यवर्तन्त त्रिदिवाय दिवौकसः ॥ १ ॥

maitreya uvāca niśamyātma-bhuvā gītaṁ kāraṇaṁ śaṅkayojjhitāḥ tataḥ sarve nyavartanta tridivāya divaukasaḥ

मैत्रेय ने कहा — स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा बताए गए उस कारण को सुनकर देवगण भय से मुक्त हो गए और तत्पश्चात् सभी अपने स्वर्ग-लोक को लौट गए।

श्लोक 2 (bhagavata.3.17.2)

दितिस्तु भर्तुरादेशादपत्यपरिशङ्किनी । पूर्णे वर्षशते साध्वी पुत्रौ प्रसुषुवे यमौ ॥ २ ॥

ditis tu bhartur ādeśād apatya-pariśaṅkinī pūrṇe varṣa-śate sādhvī putrau prasuṣuve yamau

पति के कथन से अपनी संतान को लेकर आशंकित रहने वाली सती दिति ने पूर्ण सौ वर्षों के पश्चात् जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया।

श्लोक 3 (bhagavata.3.17.3)

उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ ३ ॥

utpātā bahavas tatra nipetur jāyamānayoḥ divi bhuvy antarikṣe ca lokasyoru-bhayāvahāḥ

उन दोनों के जन्म के समय स्वर्ग में, पृथ्वी पर और अन्तरिक्ष में अनेक अपशकुन हुए, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत् को अत्यन्त भयभीत कर दिया।

श्लोक 4 (bhagavata.3.17.4)

सहाचला भुवश्चेलुर्दिशः सर्वाः प्रजज्वलुः । सोल्काश्चाशनयः पेतुः केतवश्चार्तिहेतवः ॥ ४ ॥

sahācalā bhuvaś celur diśaḥ sarvāḥ prajajvaluḥ solkāś cāśanayaḥ petuḥ ketavaś cārti-hetavaḥ

पर्वतों सहित पृथ्वी काँप उठी, सभी दिशाएँ जलती हुई सी प्रतीत हुईं, उल्काओं सहित वज्र गिरे और अनिष्टकारी धूमकेतु प्रकट हुए।

श्लोक 5 (bhagavata.3.17.5)

ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन्मुहुः । उन्मूलयन्नगपतीन्वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ५ ॥

vavau vāyuḥ suduḥsparśaḥ phūt-kārān īrayan muhuḥ unmūlayan naga-patīn vātyānīko rajo-dhvajaḥ

अत्यन्त पीड़ादायक वायु चलने लगी, जो बार-बार फुत्कार करती हुई विशाल वृक्षों को उखाड़ फेंकती थी; बवण्डर उसकी सेना और धूल उसकी ध्वजा थी।

श्लोक 6 (bhagavata.3.17.6)

उद्धसत्तडिदम्भोदघटया नष्टभागणे । व्योम्नि प्रविष्टतमसा न स्म व्यादृश्यते पदम् ॥ ६ ॥

uddhasat-taḍid-ambhoda- ghaṭayā naṣṭa-bhāgaṇe vyomni praviṣṭa-tamasā na sma vyādṛśyate padam

बिजली की चमक मानो हँसती हुई घने बादलों के समूह से आकाश के तारागण लुप्त हो गए और सम्पूर्ण आकाश अन्धकार से इस प्रकार भर गया कि कहीं कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 7 (bhagavata.3.17.7)

चुक्रोश विमना वार्धिरुदूर्मिः क्षुभितोदरः । सोदपानाश्च सरितश्चुक्षुभुः शुष्कपङ्कजाः ॥ ७ ॥

cukrośa vimanā vārdhir udūrmiḥ kṣubhitodaraḥ sodapānāś ca saritaś cukṣubhuḥ śuṣka-paṅkajāḥ

ऊँची लहरों वाला समुद्र मानो शोकाकुल होकर विलाप करने लगा, उसका अन्तर्भाग क्षुब्ध हो उठा; कुओं सहित नदियाँ भी क्षुब्ध हो गईं और कमल मुरझा गए।

श्लोक 8 (bhagavata.3.17.8)

मुहुः परिधयोऽभूवन् सराह्वोः शशिसूर्ययोः । निर्घाता रथनिर्ह्रादा विवरेभ्यः प्रजज्ञिरे ॥ ८ ॥

muhuḥ paridhayo ’bhūvan sarāhvoḥ śaśi-sūryayoḥ nirghātā ratha-nirhrādā vivarebhyaḥ prajajñire

बार-बार सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर ग्रहणकाल जैसे मण्डल बनते रहे, और पर्वतों की गुफाओं से रथों की घर्घराहट जैसी भयंकर गर्जनाएँ उठती रहीं।

श्लोक 9 (bhagavata.3.17.9)

अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् । सृगालोलूकटङ्कारैः प्रणेदुरशिवं शिवाः ॥ ९ ॥

antar-grāmeṣu mukhato vamantyo vahnim ulbaṇam sṛgālolūka-ṭaṅkāraiḥ praṇedur aśivaṁ śivāḥ

गाँवों के भीतर मुख से भयंकर अग्नि उगलती हुई सियारिनें अशुभ स्वर में चिल्लाने लगीं, और सियारों तथा उल्लुओं की चीत्कार भी उनके साथ गूँजने लगी।

श्लोक 10 (bhagavata.3.17.10)

सङ्गीतवद्रोदनवदुन्नमय्य शिरोधराम् । व्यमुञ्चन् विविधा वाचो ग्रामसिंहास्ततस्ततः ॥ १० ॥

saṅgītavad rodanavad unnamayya śirodharām vyamuñcan vividhā vāco grāma-siṁhās tatas tataḥ

इधर-उधर कुत्ते अपनी गर्दन ऊपर उठाकर कभी गीत के समान और कभी विलाप के समान नाना प्रकार की आवाज़ें निकालने लगे।

श्लोक 11 (bhagavata.3.17.11)

खराश्च कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् । खार्काररभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥ ११ ॥

kharāś ca karkaśaiḥ kṣattaḥ khurair ghnanto dharā-talam khārkāra-rabhasā mattāḥ paryadhāvan varūthaśaḥ

हे विदुर! गधे अपने कठोर खुरों से पृथ्वी को पीटते हुए और अपनी ही रेंकने की उत्तेजना से उन्मत्त होकर झुण्ड के झुण्ड इधर-उधर दौड़ने लगे।

श्लोक 12 (bhagavata.3.17.12)

रुदन्तो रासभत्रस्ता नीडादुदपतन् खगाः । घोषेऽरण्ये च पशवः शकृन्मूत्रमकुर्वत ॥ १२ ॥

rudanto rāsabha-trastā nīḍād udapatan khagāḥ ghoṣe ’raṇye ca paśavaḥ śakṛn-mūtram akurvata

गधों की रेंक से भयभीत होकर पक्षी चीत्कार करते हुए अपने घोंसलों से उड़ गए, और गोशालाओं तथा वनों में पशु भय के मारे मल-मूत्र त्यागने लगे।

श्लोक 13 (bhagavata.3.17.13)

गावोऽत्रसन्नसृग्दोहास्तोयदाः पूयवर्षिणः । व्यरुदन्देवलिङ्गानि द्रुमाः पेतुर्विनानिलम् ॥ १३ ॥

gāvo ’trasann asṛg-dohās toyadāḥ pūya-varṣiṇaḥ vyarudan deva-liṅgāni drumāḥ petur vinānilam

भयभीत गौएँ दूध के स्थान पर रक्त देने लगीं, बादलों से मवाद बरसने लगा, देवताओं की प्रतिमाएँ अश्रु बहाने लगीं, और बिना वायु के ही वृक्ष धराशायी होने लगे।

श्लोक 14 (bhagavata.3.17.14)

ग्रहान् पुण्यतमानन्ये भगणांश्चापि दीपिताः । अतिचेरुर्वक्रगत्या युयुधुश्च परस्परम् ॥ १४ ॥

grahān puṇyatamān anye bhagaṇāṁś cāpi dīpitāḥ aticerur vakra-gatyā yuyudhuś ca parasparam

अन्य तेजस्वी अशुभ ग्रह अत्यन्त शुभ ग्रहों और नक्षत्र-समूहों को भी लांघकर टेढ़ी गति से चलने लगे और परस्पर संघर्ष करते प्रतीत हुए।

श्लोक 15 (bhagavata.3.17.15)

दृष्ट्वान्यांश्च महोत्पातानतत्तत्त्वविदः प्रजाः । ब्रह्मपुत्रानृते भीता मेनिरे विश्वसम्प्लवम् ॥ १५ ॥

dṛṣṭvānyāṁś ca mahotpātān atat-tattva-vidaḥ prajāḥ brahma-putrān ṛte bhītā menire viśva-samplavam

इन तथा अन्य महान् अपशकुनों को देखकर, ब्रह्मा के पुत्रों को छोड़कर, इनके वास्तविक रहस्य को न जानने वाली प्रजा भयभीत हो उठी और उसने सोचा कि सम्पूर्ण विश्व का प्रलय निकट आ गया है।

श्लोक 16 (bhagavata.3.17.16)

तावादिदैत्यौ सहसा व्यज्यमानात्मपौरुषौ । ववृधातेऽश्मसारेण कायेनाद्रिपती इव ॥ १६ ॥

tāv ādi-daityau sahasā vyajyamānātma-pauruṣau vavṛdhāte ’śma-sāreṇa kāyenādri-patī iva

वे दोनों आदि दैत्य अपने पराक्रम को शीघ्र ही प्रकट करते हुए इस्पात के समान शरीर के साथ दो पर्वतराजों के समान बढ़ने लगे।

श्लोक 17 (bhagavata.3.17.17)

दिविस्पृशौ हेमकिरीटकोटिभि- र्निरुद्धकाष्ठौ स्फुरदङ्गदाभुजौ । गां कम्पयन्तौ चरणैः पदे पदे कट्या सुकाञ्च्यार्कमतीत्य तस्थतुः ॥ १७ ॥

divi-spṛśau hema-kirīṭa-koṭibhir niruddha-kāṣṭhau sphurad-aṅgadā-bhujau gāṁ kampayantau caraṇaiḥ pade pade kaṭyā sukāñcyārkam atītya tasthatuḥ

उनके स्वर्ण-मुकुटों की नोकें आकाश को छूती थीं, वे सभी दिशाओं को अवरुद्ध कर देते थे, उनकी भुजाएँ चमकते हुए भुजबन्दों से सुशोभित थीं, और उनके पैरों की प्रत्येक चाल से पृथ्वी काँप उठती थी। सुन्दर करधनी से बँधी कमर के साथ वे सूर्य को भी लांघते हुए खड़े थे।

श्लोक 18 (bhagavata.3.17.18)

प्रजापतिर्नाम तयोरकार्षीद् यः प्राक् स्वदेहाद्यमयोरजायत । तं वै हिरण्यकशिपुं विदुः प्रजा यं तं हिरण्याक्षमसूत साग्रतः ॥ १८ ॥

prajāpatir nāma tayor akārṣīd yaḥ prāk sva-dehād yamayor ajāyata taṁ vai hiraṇyakaśipuṁ viduḥ prajā yaṁ taṁ hiraṇyākṣam asūta sāgrataḥ

प्रजापति कश्यप ने उन दोनों जुड़वाँ पुत्रों के नाम रखे — जो अपने शरीर से पहले उत्पन्न हुआ, प्रजा उसे हिरण्यकशिपु के नाम से जानती है, और जिसे दिति ने सर्वप्रथम गर्भ में धारण किया था, उसे हिरण्याक्ष कहा गया।

श्लोक 19 (bhagavata.3.17.19)

चक्रे हिरण्यकशिपुर्दोर्भ्यां ब्रह्मवरेण च । वशे सपालाँल्लोकांस्त्रीनकुतोमृत्युरुद्धतः ॥ १९ ॥

cakre hiraṇyakaśipur dorbhyāṁ brahma-vareṇa ca vaśe sa-pālāḻ lokāṁs trīn akuto-mṛtyur uddhataḥ

अपनी दोनों भुजाओं के बल से तथा ब्रह्मा के वरदान से, मृत्यु से निर्भय और अहंकार से उन्मत्त हिरण्यकशिपु ने अपने रक्षकों सहित तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया।

श्लोक 20 (bhagavata.3.17.20)

हिरण्याक्षोऽनुजस्तस्य प्रियः प्रीतिकृदन्वहम् । गदापाणिर्दिवं यातो युयुत्सुर्मृगयन् रणम् ॥ २० ॥

hiraṇyākṣo ’nujas tasya priyaḥ prīti-kṛd anvaham gadā-pāṇir divaṁ yāto yuyutsur mṛgayan raṇam

उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष, जो उसे प्रिय था और प्रतिदिन उसे प्रसन्न करने के लिए तत्पर रहता था, हाथ में गदा लिए युद्ध की खोज में स्वर्ग की ओर चल पड़ा।

श्लोक 21 (bhagavata.3.17.21)

तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् । वैजयन्त्या स्रजा जुष्टमंसन्यस्तमहागदम् ॥ २१ ॥

taṁ vīkṣya duḥsaha-javaṁ raṇat-kāñcana-nūpuram vaijayantyā srajā juṣṭam aṁsa-nyasta-mahā-gadam

उसकी चाल असहनीय थी, उसके स्वर्ण-नूपुर बजते हुए झंकृत होते थे, उसके गले में वैजयन्ती माला शोभित थी, और उसके कंधे पर विशाल गदा रखी हुई थी।

श्लोक 22 (bhagavata.3.17.22)

मनोवीर्यवरोत्सिक्तमसृण्यमकुतोभयम् । भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः ॥ २२ ॥

mano-vīrya-varotsiktam asṛṇyam akuto-bhayam bhītā nililyire devās tārkṣya-trastā ivāhayaḥ

वह अपने बल-पराक्रम और वरदान के मद से उन्मत्त था, असंयत तथा निर्भय था। उसे देखकर भयभीत देवगण ऐसे छिप गए जैसे गरुड़ से भयभीत सर्प छिप जाते हैं।

श्लोक 23 (bhagavata.3.17.23)

स वै तिरोहितान् दृष्ट्वा महसा स्वेन दैत्यराट् । सेन्द्रान्देवगणान् क्षीबानपश्यन् व्यनदद् भृशम् ॥ २३ ॥

sa vai tirohitān dṛṣṭvā mahasā svena daitya-rāṭ sendrān deva-gaṇān kṣībān apaśyan vyanadad bhṛśam

दैत्यराज हिरण्याक्ष ने जब देखा कि इन्द्र सहित समस्त देवगण, जो अपनी शक्ति के मद में चूर रहते थे, उसके तेज से लुप्त हो गए हैं और कहीं दिखाई नहीं देते, तो वह ज़ोर से गरज उठा।

श्लोक 24 (bhagavata.3.17.24)

ततो निवृत्तः क्रीडिष्यन् गम्भीरं भीमनिस्वनम् । विजगाहे महासत्त्वो वार्धिं मत्त इव द्विपः ॥ २४ ॥

tato nivṛttaḥ krīḍiṣyan gambhīraṁ bhīma-nisvanam vijagāhe mahā-sattvo vārdhiṁ matta iva dvipaḥ

तत्पश्चात् लौटकर, केवल क्रीड़ा की इच्छा से, वह महाबली गम्भीर और भयंकर गर्जना करने वाले समुद्र में मदमस्त हाथी के समान कूद पड़ा।

श्लोक 25 (bhagavata.3.17.25)

तस्मिन् प्रविष्टे वरुणस्य सैनिका यादोगणाः सन्नधियः ससाध्वसाः । अहन्यमाना अपि तस्य वर्चसा प्रधर्षिता दूरतरं प्रदुद्रुवुः ॥ २५ ॥

tasmin praviṣṭe varuṇasya sainikā yādo-gaṇāḥ sanna-dhiyaḥ sasādhvasāḥ ahanyamānā api tasya varcasā pradharṣitā dūrataraṁ pradudruvuḥ

उसके प्रवेश करते ही वरुण की सेना के जलचर प्राणी भयभीत और खिन्न हो उठे; बिना किसी प्रहार के भी उसके तेज से अभिभूत होकर वे दूर तक भाग खड़े हुए।

श्लोक 26 (bhagavata.3.17.26)

स वर्षपूगानुदधौ महाबल- श्चरन्महोर्मीञ्छ्वसनेरितान्मुहुः । मौर्व्याभिजघ्ने गदया विभावरी- मासेदिवांस्तात पुरीं प्रचेतसः ॥ २६ ॥

sa varṣa-pūgān udadhau mahā-balaś caran mahormīñ chvasaneritān muhuḥ maurvyābhijaghne gadayā vibhāvarīm āsedivāṁs tāta purīṁ pracetasaḥ

वह महाबली अनेक वर्षों तक समुद्र में विचरण करता हुआ, वायु से उठती हुई विशाल लहरों को अपनी लौह-गदा से बार-बार पीटता रहा, और हे प्रिय विदुर! अन्ततः वरुण की नगरी विभावरी में जा पहुँचा।

श्लोक 27 (bhagavata.3.17.27)

तत्रोपलभ्यासुरलोकपालकं यादोगणानामृषभं प्रचेतसम् । स्मयन् प्रलब्धुं प्रणिपत्य नीचव- ज्जगाद मे देह्यधिराज संयुगम ॥ २७ ॥

tatropalabhyāsura-loka-pālakaṁ yādo-gaṇānām ṛṣabhaṁ pracetasam smayan pralabdhuṁ praṇipatya nīcavaj jagāda me dehy adhirāja saṁyugam

वहाँ पाताल-लोक के रक्षक और जलचरों के स्वामी वरुण को पाकर, वह उनके सम्मुख नीच व्यक्ति के समान झुककर और उपहास में मुस्कुराते हुए बोला — 'हे अधिराज! मुझे युद्ध दीजिए।'

श्लोक 28 (bhagavata.3.17.28)

त्वं लोकपालोऽधिपतिर्बृहच्छ्रवा वीर्यापहो दुर्मदवीरमानिनाम् । विजित्य लोकेऽखिलदैत्यदानवान् यद्राजसूयेन पुरायजत्प्रभो ॥ २८ ॥

tvaṁ loka-pālo ’dhipatir bṛhac-chravā vīryāpaho durmada-vīra-māninām vijitya loke ’khila-daitya-dānavān yad rājasūyena purāyajat prabho

आप लोकपाल और विस्तृत कीर्ति वाले शासक हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम पर गर्वित उद्दंड वीरों का बल कुचल दिया है; समस्त दैत्यों और दानवों को जीतकर, हे प्रभो! आपने पूर्वकाल में राजसूय यज्ञ द्वारा उसका उपलक्ष्य मनाया था।

श्लोक 29 (bhagavata.3.17.29)

स एवमुत्सिक्तमदेन विद्विषा दृढं प्रलब्धो भगवानपां पतिः । रोषं समुत्थं शमयन् स्वया धिया व्यवोचदङ्गोपशमं गता वयम् ॥ २९ ॥

sa evam utsikta-madena vidviṣā dṛḍhaṁ pralabdho bhagavān apāṁ patiḥ roṣaṁ samutthaṁ śamayan svayā dhiyā vyavocad aṅgopaśamaṁ gatā vayam

अहंकार से उन्मत्त शत्रु द्वारा इस प्रकार गहरे उपहास किए जाने पर भी जलों के पूज्य स्वामी वरुण ने अपनी बुद्धि से उठते हुए क्रोध को शान्त करते हुए कहा — 'हे प्रिय! अब हम युद्ध से विरत हो चुके हैं।'

श्लोक 30 (bhagavata.3.17.30)

पश्यामि नान्यं पुरुषात्पुरातनाद् यः संयुगे त्वां रणमार्गकोविदम् । आराधयिष्यत्यसुरर्षभेहि तं मनस्विनो यं गृणते भवादृशाः ॥ ३० ॥

paśyāmi nānyaṁ puruṣāt purātanād yaḥ saṁyuge tvāṁ raṇa-mārga-kovidam ārādhayiṣyaty asurarṣabhehi taṁ manasvino yaṁ gṛṇate bhavādṛśāḥ

युद्ध-कला में इतने निपुण आपको मैं युद्ध में संतुष्ट करने वाले उस पुरातन पुरुष के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं देखता। हे असुरश्रेष्ठ! उन्हीं के पास जाइए, जिनकी प्रशंसा आप जैसे बुद्धिमान भी करते हैं।

श्लोक 31 (bhagavata.3.17.31)

तं वीरमारादभिपद्य विस्मयः शयिष्यसे वीरशये श्वभिर्वृतः । यस्त्वद्विधानामसतां प्रशान्तये रूपाणि धत्ते सदनुग्रहेच्छया ॥ ३१ ॥

taṁ vīram ārād abhipadya vismayaḥ śayiṣyase vīra-śaye śvabhir vṛtaḥ yas tvad-vidhānām asatāṁ praśāntaye rūpāṇi dhatte sad-anugrahecchayā

उस वीर के निकट पहुँचते ही आपका अहंकार समाप्त हो जाएगा, और आप कुत्तों से घिरे हुए वीर-शय्या पर सो जाएँगे — क्योंकि वे ही, सज्जनों पर अनुग्रह करने की इच्छा से, आप जैसे दुष्टों की शान्ति के लिए विविध रूप धारण करते हैं।

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