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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22

कर्दम मुनि और देवहूति का विवाह

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (bhagavata.3.22.1)

मैत्रेय उवाच एवमाविष्कृताशेषगुणकर्मोदयो मुनिम् । सव्रीड इव तं सम्राडुपारतमुवाच ह ॥ १ ॥

maitreya uvāca evam āviṣkṛtāśeṣa- guṇa-karmodayo munim savrīḍa iva taṁ samrāḍ upāratam uvāca ha

मैत्रेय ने कहा — इस प्रकार अपने समस्त गुणों और कर्मों की महिमा प्रकट करने के पश्चात् जब मुनि मौन हो गए, तब सम्राट मनु ने मानो संकोच करते हुए उनसे कहा।

श्लोक 2 (bhagavata.3.22.2)

मनुरुवाच ब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया । छन्दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥ २ ॥

manur uvāca brahmāsṛjat sva-mukhato yuṣmān ātma-parīpsayā chandomayas tapo-vidyā- yoga-yuktān alampaṭān

मनु ने कहा — छन्दोमय ब्रह्मा ने अपने संरक्षण की इच्छा से आप ब्राह्मणों को अपने मुख से उत्पन्न किया, जो तप, विद्या और योग से युक्त तथा विषय-भोगों में अनासक्त हैं।

श्लोक 3 (bhagavata.3.22.3)

तत्त्राणायासृजच्चास्मान् दोःसहस्रात्सहस्रपात् । हृदयं तस्य हि ब्रह्म क्षत्रमङ्गं प्रचक्षते ॥ ३ ॥

tat-trāṇāyāsṛjac cāsmān doḥ-sahasrāt sahasra-pāt hṛdayaṁ tasya hi brahma kṣatram aṅgaṁ pracakṣate

और उनकी रक्षा के लिए ही सहस्रचरण भगवान ने हमें अपनी सहस्र भुजाओं से उत्पन्न किया; इसीलिए ब्राह्मणों को उनका हृदय और क्षत्रियों को उनका अंग कहा जाता है।

श्लोक 4 (bhagavata.3.22.4)

अतो ह्यन्योन्यमात्मानं ब्रह्म क्षत्रं च रक्षतः । रक्षति स्माव्ययो देवः स यः सदसदात्मकः ॥ ४ ॥

ato hy anyonyam ātmānaṁ brahma kṣatraṁ ca rakṣataḥ rakṣati smāvyayo devaḥ sa yaḥ sad-asad-ātmakaḥ

इसीलिए ब्राह्मण और क्षत्रिय परस्पर एक-दूसरे की तथा स्वयं की भी रक्षा करते हैं; और इस प्रकार कारण-कार्य-स्वरूप वे अविनाशी भगवान ही उनकी रक्षा करते हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.3.22.5)

तव सन्दर्शनादेवच्छिन्ना मे सर्वसंशयाः । यत्स्वयं भगवान् प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषोः ॥ ५ ॥

tava sandarśanād eva cchinnā me sarva-saṁśayāḥ yat svayaṁ bhagavān prītyā dharmam āha rirakṣiṣoḥ

आपके दर्शन मात्र से ही मेरे समस्त संशय दूर हो गए, क्योंकि आपने स्वयं ही प्रेमपूर्वक प्रजा-रक्षा की इच्छा रखने वाले के धर्म का वर्णन किया।

श्लोक 6 (bhagavata.3.22.6)

दिष्टया मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम् । दिष्टया पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम् ॥ ६ ॥

diṣṭyā me bhagavān dṛṣṭo durdarśo yo ’kṛtātmanām diṣṭyā pāda-rajaḥ spṛṣṭaṁ śīrṣṇā me bhavataḥ śivam

सौभाग्य से मैंने उन पूजनीय आपका दर्शन किया, जो असंयमित मन वाले पुरुषों के लिए दुर्लभ हैं; सौभाग्य से आपकी कल्याणकारी चरण-धूलि मेरे मस्तक को स्पर्श कर गई।

श्लोक 7 (bhagavata.3.22.7)

दिष्टया त्वयानुशिष्टोऽहं कृतश्चानुग्रहो महान् । अपावृतैः कर्णरन्ध्रैर्जुष्टा दिष्ट्योशतीर्गिरः ॥ ७ ॥

diṣṭyā tvayānuśiṣṭo ’haṁ kṛtaś cānugraho mahān apāvṛtaiḥ karṇa-randhrair juṣṭā diṣṭyośatīr giraḥ

सौभाग्य से मैं आपसे उपदेश पा चुका हूँ और मुझ पर महान अनुग्रह हुआ है; सौभाग्य से मैंने खुले कानों से आपके पवित्र वचन ग्रहण किए।

श्लोक 8 (bhagavata.3.22.8)

स भवान्दुहितृस्नेहपरिक्लिष्टात्मनो मम । श्रोतुमर्हसि दीनस्य श्रावितं कृपया मुने ॥ ८ ॥

sa bhavān duhitṛ-sneha- parikliṣṭātmano mama śrotum arhasi dīnasya śrāvitaṁ kṛpayā mune

हे मुने! अपनी पुत्री के स्नेह से व्याकुल मन वाले, इस दीन मुझसे, कृपया कृपापूर्वक मेरी विनती सुनने की कृपा कीजिए।

श्लोक 9 (bhagavata.3.22.9)

प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम । अन्विच्छति पतिं युक्तं वयः शीलगुणादिभिः ॥ ९ ॥

priyavratottānapadoḥ svaseyaṁ duhitā mama anvicchati patiṁ yuktaṁ vayaḥ-śīla-guṇādibhiḥ

प्रियव्रत और उत्तानपाद की यह बहन, मेरी पुत्री, आयु, शील और गुणों में योग्य पति की खोज में है।

श्लोक 10 (bhagavata.3.22.10)

यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान् । अशृणोन्नारदादेषा त्वय्यासीत्कृतनिश्चया ॥ १० ॥

yadā tu bhavataḥ śīla- śruta-rūpa-vayo-guṇān aśṛṇon nāradād eṣā tvayy āsīt kṛta-niścayā

जब उसने नारद से आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणों के विषय में सुना, तभी से वह आपके प्रति दृढ़-निश्चय हो गई।

श्लोक 11 (bhagavata.3.22.11)

तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया । सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु ॥ ११ ॥

tat pratīccha dvijāgryemāṁ śraddhayopahṛtāṁ mayā sarvātmanānurūpāṁ te gṛhamedhiṣu karmasu

अतः, हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित इस पुत्री को स्वीकार कीजिए, जो गृहस्थ-कर्मों में आपके पूर्णतः अनुरूप है।

श्लोक 12 (bhagavata.3.22.12)

उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते । अपि निर्मुक्तसङ्गस्य कामरक्तस्य किं पुनः ॥ १२ ॥

udyatasya hi kāmasya prativādo na śasyate api nirmukta-saṅgasya kāma-raktasya kiṁ punaḥ

स्वयं आई हुई कामना का निषेध करना, आसक्तिरहित पुरुष के लिए भी प्रशंसनीय नहीं है — फिर कामासक्त पुरुष के लिए तो कहना ही क्या?

श्लोक 13 (bhagavata.3.22.13)

य उद्यतमनादृत्य कीनाशमभियाचते । क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्चावज्ञया हतः ॥ १३ ॥

ya udyatam anādṛtya kīnāśam abhiyācate kṣīyate tad-yaśaḥ sphītaṁ mānaś cāvajñayā hataḥ

जो व्यक्ति स्वयं आई हुई वस्तु का अनादर करके किसी कंजूस से याचना करता है, उसकी विस्तृत कीर्ति क्षीण हो जाती है और उसका सम्मान अवज्ञा से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 14 (bhagavata.3.22.14)

अहं त्वाशृणवं विद्वन् विवाहार्थं समुद्यतम् । अतस्त्वमुपकुर्वाणः प्रत्तां प्रतिगृहाण मे ॥ १४ ॥

ahaṁ tvāśṛṇavaṁ vidvan vivāhārthaṁ samudyatam atas tvam upakurvāṇaḥ prattāṁ pratigṛhāṇa me

हे विद्वान्! मैंने सुना है कि आप विवाह हेतु तत्पर हैं; अतः आप, जो आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रती नहीं हैं, मेरी अर्पित इस भेंट को स्वीकार कीजिए।

श्लोक 15 (bhagavata.3.22.15)

ऋषिरुवाच बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा । आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधिः ॥ १५ ॥

ṛṣir uvāca bāḍham udvoḍhu-kāmo ’ham aprattā ca tavātmajā āvayor anurūpo ’sāv ādyo vaivāhiko vidhiḥ

ऋषि ने कहा — निश्चय ही मैं विवाह करने का इच्छुक हूँ, और आपकी पुत्री भी अभी किसी और को वचनबद्ध नहीं है; अतः यह प्रथम प्रकार का वैवाहिक विधान हम दोनों के लिए उपयुक्त है।

श्लोक 16 (bhagavata.3.22.16)

कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः । क एव ते तनयां नाद्रियेत स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम् ॥ १६ ॥

kāmaḥ sa bhūyān naradeva te ’syāḥ putryāḥ samāmnāya-vidhau pratītaḥ ka eva te tanayāṁ nādriyeta svayaiva kāntyā kṣipatīm iva śriyam

हे नरदेव! आपकी इस पुत्री की, वेद-परम्परा में मान्य, यह कामना पूर्ण हो; भला ऐसी आपकी कन्या का सम्मान कौन नहीं करेगा, जो अपने ही तेज से मानो आभूषणों की शोभा को भी फीका कर देती है?

श्लोक 17 (bhagavata.3.22.17)

यां हर्म्यपृष्ठे क्वणदङ्घ्रिशोभां विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम् । विश्वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना- द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेताः ॥ १७ ॥

yāṁ harmya-pṛṣṭhe kvaṇad-aṅghri-śobhāṁ vikrīḍatīṁ kanduka-vihvalākṣīm viśvāvasur nyapatat svād vimānād vilokya sammoha-vimūḍha-cetāḥ

मैंने सुना है कि विश्वावसु, महल की छत पर, झंकृत नूपुरों से शोभित चरणों वाली तथा गेंद के खेल में विह्वल नेत्रों वाली इस कन्या को क्रीड़ा करते देखकर, मोहविमूढ़ होकर अपने ही विमान से गिर पड़ा था।

श्लोक 18 (bhagavata.3.22.18)

तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम- मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् । वत्सां मनोरुच्चपदः स्वसारं को नानुमन्येत बुधोऽभियाताम् ॥ १८ ॥

tāṁ prārthayantīṁ lalanā-lalāmam asevita-śrī-caraṇair adṛṣṭām vatsāṁ manor uccapadaḥ svasāraṁ ko nānumanyeta budho ’bhiyātām

इस स्त्रियों के आभूषण-स्वरूप, लक्ष्मी के चरणों की सेवा न करने वालों के लिए अदृश्य, मनु की प्रिय पुत्री और उत्तानपाद की बहन को, जो स्वयं मेरे पास याचना करती आई है, भला कौन बुद्धिमान अस्वीकार करेगा?

श्लोक 19 (bhagavata.3.22.19)

अतो भजिष्ये समयेन साध्वीं यावत्तेजो बिभृयादात्मनो मे । अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान् शुक्लप्रोक्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान् ॥ १९ ॥

ato bhajiṣye samayena sādhvīṁ yāvat tejo bibhṛyād ātmano me ato dharmān pāramahaṁsya-mukhyān śukla-proktān bahu manye ’vihiṁsrān

अतः मैं इस साध्वी को इस शर्त पर स्वीकार करूँगा कि जब वह मेरे बीज को धारण कर लेगी, तब मैं उन परमहंसों के श्रेष्ठ, शुद्ध भगवान द्वारा कथित, अहिंसामय धर्मों को अत्यन्त आदरपूर्वक अपना लूँगा।

श्लोक 20 (bhagavata.3.22.20)

यतोऽभवद्विश्वमिदं विचित्रं संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते । प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं परं प्रमाणं भगवाननन्तः ॥ २० ॥

yato ’bhavad viśvam idaṁ vicitraṁ saṁsthāsyate yatra ca vāvatiṣṭhate prajāpatīnāṁ patir eṣa mahyaṁ paraṁ pramāṇaṁ bhagavān anantaḥ

जिनसे यह विचित्र विश्व उत्पन्न हुआ है, जिनमें यह लीन होगा, और जिनमें यह वर्तमान में स्थित है — वे प्रजापतियों के स्वामी, अनन्त भगवान, ही मेरे लिए परम प्रमाण हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.3.22.21)

मैत्रेय उवाच स उग्रधन्वन्नियदेवाबभाषे आसीच्च तूष्णीमरविन्दनाभम् । धियोपगृह्णन् स्मितशोभितेन मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्याः ॥ २१ ॥

maitreya uvāca sa ugra-dhanvann iyad evābabhāṣe āsīc ca tūṣṇīm aravinda-nābham dhiyopagṛhṇan smita-śobhitena mukhena ceto lulubhe devahūtyāḥ

मैत्रेय ने कहा — हे महाधनुर्धर विदुर! कर्दम मुनि ने इतना ही कहकर मौन धारण कर लिया, और अपने मन में कमलनाभ भगवान का चिन्तन करने लगे; उनके मुस्कुराते हुए मुख से देवहूति का चित्त मोहित हो गया।

श्लोक 22 (bhagavata.3.22.22)

सोऽनुज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम् । तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षितः ॥ २२ ॥

so ’nu jñātvā vyavasitaṁ mahiṣyā duhituḥ sphuṭam tasmai guṇa-gaṇāḍhyāya dadau tulyāṁ praharṣitaḥ

उसने महारानी तथा पुत्री के स्पष्ट निश्चय को जानकर, प्रसन्नतापूर्वक उस गुण-सम्पन्न मुनि को उसके समान गुणवती पुत्री प्रदान की।

श्लोक 23 (bhagavata.3.22.23)

शतरूपा महाराज्ञी पारिबर्हान्महाधनान् । दम्पत्योः पर्यदात्प्रीत्या भूषावासः परिच्छदान् ॥ २३ ॥

śatarūpā mahā-rājñī pāribarhān mahā-dhanān dampatyoḥ paryadāt prītyā bhūṣā-vāsaḥ paricchadān

महारानी शतरूपा ने वर-वधू को प्रेमपूर्वक बहुमूल्य दहेज — आभूषण, वस्त्र तथा गृहस्थी की सामग्री — प्रदान की।

श्लोक 24 (bhagavata.3.22.24)

प्रत्तां दुहितरं सम्राट् सदृक्षाय गतव्यथः । उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशयः ॥ २४ ॥

prattāṁ duhitaraṁ samrāṭ sadṛkṣāya gata-vyathaḥ upaguhya ca bāhubhyām autkaṇṭhyonmathitāśayaḥ

योग्य वर को पुत्री सौंपकर चिन्तामुक्त हुए सम्राट ने, उत्कण्ठा से व्याकुल हृदय के साथ, अपनी पुत्री को दोनों बाँहों से आलिंगन किया।

श्लोक 25 (bhagavata.3.22.25)

अशक्नुवंस्तद्विरहं मुञ्चन् बाष्पकलां मुहुः । आसिञ्चदम्ब वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः ॥ २५ ॥

aśaknuvaṁs tad-virahaṁ muñcan bāṣpa-kalāṁ muhuḥ āsiñcad amba vatseti netrodair duhituḥ śikhāḥ

उसका वियोग सहन न कर पाकर, बार-बार अश्रु बहाते हुए, 'हे माता! हे पुत्री!' कहते हुए उसने अपनी पुत्री के केशों को अपने नेत्रों के जल से सिंचित कर दिया।

श्लोक 26 (bhagavata.3.22.26)

आमन्त्र्य तं मुनिवरमनुज्ञातः सहानुगः । प्रतस्थे रथमारुह्य सभार्यः स्वपुरं नृपः ॥ २६ ॥

āmantrya taṁ muni-varam anujñātaḥ sahānugaḥ pratasthe ratham āruhya sabhāryaḥ sva-puraṁ nṛpaḥ

उस श्रेष्ठ मुनि से विदा लेकर तथा उनकी अनुमति पाकर, राजा अपने अनुचरों सहित रथ पर सवार होकर अपनी पत्नी के साथ अपनी राजधानी की ओर चल पड़े।

श्लोक 27 (bhagavata.3.22.27)

उभयोऋर्षिकुल्यायाः सरस्वत्याः सुरोधसोः । ऋषीणामुपशान्तानां पश्यन्नाश्रमसम्पदः ॥ २७ ॥

ubhayor ṛṣi-kulyāyāḥ sarasvatyāḥ surodhasoḥ ṛṣīṇām upaśāntānāṁ paśyann āśrama-sampadaḥ

मार्ग में उन्होंने ऋषियों के प्रिय सरस्वती नदी के दोनों सुन्दर तटों पर शान्त ऋषियों के समृद्ध आश्रमों को देखा।

श्लोक 28 (bhagavata.3.22.28)

तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजाः पतिम् । गीतसंस्तुतिवादित्रैः प्रत्युदीयुः प्रहर्षिताः ॥ २८ ॥

tam āyāntam abhipretya brahmāvartāt prajāḥ patim gīta-saṁstuti-vāditraiḥ pratyudīyuḥ praharṣitāḥ

अपने स्वामी के आगमन की सूचना पाकर ब्रह्मावर्त की प्रजा, अत्यन्त हर्षित होकर, गीत, स्तुति और वाद्यों के साथ उनके स्वागत के लिए आगे आई।

श्लोक 29 (bhagavata.3.22.29)

बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता । न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ २९ ॥

barhiṣmatī nāma purī sarva-sampat-samanvitā nyapatan yatra romāṇi yajñasyāṅgaṁ vidhunvataḥ

वहाँ बर्हिष्मती नामक नगरी थी, जो समस्त सम्पदाओं से सम्पन्न थी, जहाँ यज्ञ-स्वरूप भगवान (वराह) ने अपना शरीर हिलाते हुए अपने केश गिराए थे।

श्लोक 30 (bhagavata.3.22.30)

कुशाः काशास्त एवासन् शश्वद्धरितवर्चसः । ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे ॥ ३० ॥

kuśāḥ kāśās ta evāsan śaśvad-dharita-varcasaḥ ṛṣayo yaiḥ parābhāvya yajña-ghnān yajñam ījire

वे ही केश सदा हरितवर्ण कुश और काश घास बन गए, जिनसे ऋषियों ने यज्ञ-विघ्नकारियों को परास्त करके यज्ञ-स्वरूप भगवान का पूजन किया।

श्लोक 31 (bhagavata.3.22.31)

कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान्मनुः । अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम् ॥ ३१ ॥

kuśa-kāśamayaṁ barhir āstīrya bhagavān manuḥ ayajad yajña-puruṣaṁ labdhā sthānaṁ yato bhuvam

पूजनीय मनु ने कुश और काश घास से बना आसन बिछाकर, उन यज्ञ-पुरुष भगवान की पूजा की, जिनसे उन्हें पृथ्वी का साम्राज्य प्राप्त हुआ था।

श्लोक 32 (bhagavata.3.22.32)

बर्हिष्मतीं नाम विभुर्यां निर्विश्य समावसत् । तस्यां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम् ॥ ३२ ॥

barhiṣmatīṁ nāma vibhur yāṁ nirviśya samāvasat tasyāṁ praviṣṭo bhavanaṁ tāpa-traya-vināśanam

बर्हिष्मती नामक उस नगरी में, जहाँ वे पहले भी निवास कर चुके थे, प्रवेश करके शक्तिशाली मनु उस राजभवन में गए, जो त्रिविध तापों का नाश करने वाला था।

श्लोक 33 (bhagavata.3.22.33)

सभार्यः सप्रजः कामान् बुभुजेऽन्याविरोधतः । सङ्गीयमानसत्कीर्तिः सस्त्रीभिः सुरगायकैः । प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा शृण्वन् हरेः कथाः ॥ ३३ ॥

sabhāryaḥ saprajaḥ kāmān bubhuje ’nyāvirodhataḥ saṅgīyamāna-sat-kīrtiḥ sastrībhiḥ sura-gāyakaiḥ praty-ūṣeṣv anubaddhena hṛdā śṛṇvan hareḥ kathāḥ

अपनी पत्नी और प्रजा सहित उन्होंने धर्म के विरुद्ध न जाते हुए भोगों का उपभोग किया; देवगायक और उनकी पत्नियाँ उनके पवित्र यश का गान करती थीं, और वे प्रत्येक प्रातःकाल अनुरक्त हृदय से हरि की कथाएँ सुनते थे।

श्लोक 34 (bhagavata.3.22.34)

निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम् । यदाभ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम् ॥ ३४ ॥

niṣṇātaṁ yoga-māyāsu muniṁ svāyambhuvaṁ manum yad ābhraṁśayituṁ bhogā na śekur bhagavat-param

योगमाया के भोगों में निपुण होते हुए भी, भगवान के परम भक्त स्वायम्भुव मनु को वे भोग तनिक भी पथभ्रष्ट न कर सके।

श्लोक 35 (bhagavata.3.22.35)

अयातयामास्तस्यासन् यामाःस्वान्तरयापनाः । शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥ ३५ ॥

ayāta-yāmās tasyāsan yāmāḥ svāntara-yāpanāḥ śṛṇvato dhyāyato viṣṇoḥ kurvato bruvataḥ kathāḥ

उनके जीवन के क्षण, जो उनकी आयु को व्यतीत कर रहे थे, कभी व्यर्थ नहीं गए, क्योंकि वे विष्णु की कथाओं को सुनते, उनका ध्यान करते, उन्हें आचरण में लाते और उनका वर्णन करते रहते थे।

श्लोक 36 (bhagavata.3.22.36)

स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम् । वासुदेवप्रसङ्गेन परिभूतगतित्रयः ॥ ३६ ॥

sa evaṁ svāntaraṁ ninye yugānām eka-saptatim vāsudeva-prasaṅgena paribhūta-gati-trayaḥ

इस प्रकार उन्होंने वासुदेव-सम्बन्धी वार्ताओं में लीन रहते हुए इकहत्तर चतुर्युगों की अपनी मन्वन्तर-अवधि व्यतीत की, और तीनों गतियों को लाँघ गए।

श्लोक 37 (bhagavata.3.22.37)

शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषाः । भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥ ३७ ॥

śārīrā mānasā divyā vaiyāse ye ca mānuṣāḥ bhautikāś ca kathaṁ kleśā bādhante hari-saṁśrayam

हे व्यास-पुत्र! शारीरिक, मानसिक, दैविक, मानुषिक अथवा भौतिक — कोई भी क्लेश उस व्यक्ति को कैसे बाधित कर सकता है, जिसने हरि की शरण ले ली हो?

श्लोक 38 (bhagavata.3.22.38)

यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्नानाविदाञ्छुभान् । नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा ॥ ३८ ॥

yaḥ pṛṣṭo munibhiḥ prāha dharmān nānā-vidhāñ chubhān nṛṇāṁ varṇāśramāṇāṁ ca sarva-bhūta-hitaḥ sadā

जब मुनियों ने प्रश्न किए, तब सदैव समस्त प्राणियों के हित में तत्पर उन मनु ने मनुष्यों के लिए तथा वर्णाश्रमों के लिए विविध कल्याणकारी धर्मों का वर्णन किया।

श्लोक 39 (bhagavata.3.22.39)

एतत्त आदिराजस्य मनोश्चरितमद्भुतम् । वर्णितं वर्णनीयस्य तदपत्योदयं शृणु ॥ ३९ ॥

etat ta ādi-rājasya manoś caritam adbhutam varṇitaṁ varṇanīyasya tad-apatyodayaṁ śṛṇu

यह प्रथम सम्राट मनु का अद्भुत चरित्र, जो वर्णन के योग्य है, तुम्हें सुनाया गया; अब उनकी पुत्री के उत्कर्ष को सुनो।

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