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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21

मनु और कर्दम के मध्य संवाद

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (bhagavata.3.21.1)

विदुर उवाच स्वायम्भुवस्य च मनोर्वंशः परमसम्मतः । कथ्यतां भगवन् यत्र मैथुनेनैधिरे प्रजाः ॥ १ ॥

vidura uvāca svāyambhuvasya ca manor vaṁśaḥ parama-sammataḥ kathyatāṁ bhagavan yatra maithunenaidhire prajāḥ

विदुर ने कहा — हे भगवन्! स्वायम्भुव मनु का वंश अत्यन्त सम्मानित है, जिसमें मैथुन द्वारा प्रजा की वृद्धि हुई। कृपया मुझे उसका वर्णन कीजिए।

श्लोक 2 (bhagavata.3.21.2)

प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ स्वायम्भुवस्य वै । यथाधर्मं जुगुपतुः सप्तद्वीपवतीं महीम् ॥ २ ॥

priyavratottānapādau sutau svāyambhuvasya vai yathā-dharmaṁ jugupatuḥ sapta-dvīpavatīṁ mahīm

स्वायम्भुव मनु के दोनों पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद, धर्मानुसार सप्तद्वीपवती पृथ्वी का शासन करते थे।

श्लोक 3 (bhagavata.3.21.3)

तस्य वै दुहिता ब्रह्मन्देवहूतीति विश्रुता । पत्नी प्रजापतेरुक्ता कर्दमस्य त्वयानघ ॥ ३ ॥

tasya vai duhitā brahman devahūtīti viśrutā patnī prajāpater uktā kardamasya tvayānagha

हे ब्रह्मन्! हे निष्पाप! उनकी पुत्री, जो देवहूति के नाम से प्रसिद्ध है, आपने प्रजापति कर्दम की पत्नी के रूप में बताई थी।

श्लोक 4 (bhagavata.3.21.4)

तस्यां स वै महायोगी युक्तायां योगलक्षणैः । ससर्ज कतिधा वीर्यं तन्मे शुश्रूषवे वद ॥ ४ ॥

tasyāṁ sa vai mahā-yogī yuktāyāṁ yoga-lakṣaṇaiḥ sasarja katidhā vīryaṁ tan me śuśrūṣave vada

योग की सिद्धियों से युक्त उस देवहूति में उस महायोगी ने कितनी बार सन्तान उत्पन्न की? यह मुझे बताइए, क्योंकि मैं इसे सुनने का इच्छुक हूँ।

श्लोक 5 (bhagavata.3.21.5)

रुचिर्यो भगवान् ब्रह्मन्दक्षो वा ब्रह्मणः सुतः । यथा ससर्ज भूतानि लब्ध्वा भार्यां च मानवीम् ॥ ५ ॥

rucir yo bhagavān brahman dakṣo vā brahmaṇaḥ sutaḥ yathā sasarja bhūtāni labdhvā bhāryāṁ ca mānavīm

हे ब्रह्मन्! यह भी बताइए कि पूजनीय रुचि तथा ब्रह्मा-पुत्र दक्ष ने मनु की पुत्रियों को पत्नी रूप में पाकर किस प्रकार सन्तान उत्पन्न की।

श्लोक 6 (bhagavata.3.21.6)

मैत्रेय उवाच प्रजाः सृजेति भगवान् कर्दमो ब्रह्मणोदितः । सरस्वत्यां तपस्तेपे सहस्राणां समा दश ॥ ६ ॥

maitreya uvāca prajāḥ sṛjeti bhagavān kardamo brahmaṇoditaḥ sarasvatyāṁ tapas tepe sahasrāṇāṁ samā daśa

मैत्रेय ने कहा — 'प्रजा उत्पन्न करो' — ब्रह्मा के इस आदेश पर, पूजनीय कर्दम ने सरस्वती नदी के तट पर दस सहस्र वर्षों तक तपस्या की।

श्लोक 7 (bhagavata.3.21.7)

ततः समाधियुक्तेन क्रियायोगेन कर्दमः । सम्प्रपेदे हरिं भक्त्या प्रपन्नवरदाशुषम् ॥ ७ ॥

tataḥ samādhi-yuktena kriyā-yogena kardamaḥ samprapede hariṁ bhaktyā prapanna-varadāśuṣam

तत्पश्चात् समाधियुक्त क्रियायोग द्वारा कर्दम ने भक्तिपूर्वक उन हरि की शरण ली, जो शरणागतों को शीघ्र ही वरदान देने वाले हैं।

श्लोक 8 (bhagavata.3.21.8)

तावत्प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे । दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद्वपुः ॥ ८ ॥

tāvat prasanno bhagavān puṣkarākṣaḥ kṛte yuge darśayām āsa taṁ kṣattaḥ śābdaṁ brahma dadhad vapuḥ

हे विदुर! तब सत्ययुग में प्रसन्न हुए कमलनयन भगवान ने, वेदवाणी द्वारा ही ज्ञात होने वाला अपना दिव्य स्वरूप धारण करते हुए, उन्हें दर्शन दिया।

श्लोक 9 (bhagavata.3.21.9)

स तं विरजमर्काभं सितपद्मोत्पलस्रजम् । स्निग्धनीलालकव्रातवक्त्राब्जं विरजोऽम्बरम् ॥ ९ ॥

sa taṁ virajam arkābhaṁ sita-padmotpala-srajam snigdha-nīlālaka-vrāta- vaktrābjaṁ virajo ’mbaram

उसने उन्हें देखा — निर्मल, सूर्य के समान तेजस्वी, श्वेत कमल और कुमुदों की माला पहने, स्निग्ध श्याम घुँघराले केशों से सुशोभित कमल-मुख वाले, तथा निर्मल वस्त्र धारण किए हुए।

श्लोक 10 (bhagavata.3.21.10)

किरीटिनं कुण्डलिनं शङ्खचक्रगदाधरम् । श्वेतोत्पलक्रीडनकं मनःस्पर्शस्मितेक्षणम् ॥ १० ॥

kirīṭinaṁ kuṇḍalinaṁ śaṅkha-cakra-gadā-dharam śvetotpala-krīḍanakaṁ manaḥ-sparśa-smitekṣaṇam

मुकुट और कुण्डल धारण किए, शंख, चक्र और गदा लिए, हाथ में श्वेत कमल का खिलौना लिए हुए, और हृदय को स्पर्श करने वाली मुस्कान भरी दृष्टि वाले भगवान को उसने देखा।

श्लोक 11 (bhagavata.3.21.11)

विन्यस्तचरणाम्भोजमंसदेशे गरुत्मतः । दृष्ट्वा खेऽवस्थितं वक्षःश्रियं कौस्तुभकन्धरम् ॥ ११ ॥

vinyasta-caraṇāmbhojam aṁsa-deśe garutmataḥ dṛṣṭvā khe ’vasthitaṁ vakṣaḥ- śriyaṁ kaustubha-kandharam

उसने देखा कि भगवान अपने चरण-कमल गरुड़ के कंधों पर रखे हुए आकाश में स्थित हैं, उनका वक्षस्थल तेजस्वी है और उनके गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है।

श्लोक 12 (bhagavata.3.21.12)

जातहर्षोऽपतन्मूर्ध्ना क्षितौ लब्धमनोरथः । गीर्भिस्त्वभ्यगृणात्प्रीतिस्वभावात्मा कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥

jāta-harṣo ’patan mūrdhnā kṣitau labdha-manorathaḥ gīrbhis tv abhyagṛṇāt prīti- svabhāvātmā kṛtāñjaliḥ

आनन्दित होकर, अपनी कामना पूर्ण होने पर, उसने अपना मस्तक भूमि पर झुका दिया; और स्वभाव से ही प्रेम से परिपूर्ण होकर हाथ जोड़कर वचनों द्वारा उनकी स्तुति करने लगा।

श्लोक 13 (bhagavata.3.21.13)

ऋषिरुवाच जुष्टं बताद्याखिलसत्त्वराशेः सांसिद्ध्यमक्ष्णोस्तव दर्शनान्नः । यद्दर्शनं जन्मभिरीड्य सद्भि- राशासते योगिनो रूढयोगाः ॥ १३ ॥

ṛṣir uvāca juṣṭaṁ batādyākhila-sattva-rāśeḥ sāṁsiddhyam akṣṇos tava darśanān naḥ yad-darśanaṁ janmabhir īḍya sadbhir āśāsate yogino rūḍha-yogāḥ

ऋषि ने कहा — हे पूज्य! आज आपके दर्शन से मेरे नेत्रों की पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो गई है, जो आप समस्त सत्ता के भण्डार हैं — जिस दर्शन की कामना सिद्धयोगी भी अनेक पुण्य-जन्मों के पश्चात् करते हैं।

श्लोक 14 (bhagavata.3.21.14)

ये मायया ते हतमेधसस्त्वत्- पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम् । उपासते कामलवाय तेषां रासीश कामान्निरयेऽपि ये स्युः ॥ १४ ॥

ye māyayā te hata-medhasas tvat- pādāravindaṁ bhava-sindhu-potam upāsate kāma-lavāya teṣāṁ rāsīśa kāmān niraye ’pi ye syuḥ

जिनकी बुद्धि आपकी माया से हरी जा चुकी है, वे आपके चरण-कमल — जो संसार-सागर से पार जाने की नौका हैं — को केवल क्षुद्र सुख के लिए पूजते हैं; हे ईश! उन्हें भी वे कामनाएँ, जो नरक में भी सुलभ हैं, आप ही प्रदान करते हैं।

श्लोक 15 (bhagavata.3.21.15)

तथा स चाहं परिवोढुकामः समानशीलां गृहमेधधेनुम् । उपेयिवान्मूलमशेषमूलं दुराशयः कामदुघाङ्घ्रिपस्य ॥ १५ ॥

tathā sa cāhaṁ parivoḍhu-kāmaḥ samāna-śīlāṁ gṛhamedha-dhenum upeyivān mūlam aśeṣa-mūlaṁ durāśayaḥ kāma-dughāṅghripasya

उसी प्रकार मैं भी, समान स्वभाव वाली, गृहस्थ जीवन की कामधेनु के समान पत्नी पाने की इच्छा से, अपनी तुच्छ कामना के वशीभूत होकर, समस्त मूलों के मूल, कामनाओं को पूर्ण करने वाले वृक्ष-स्वरूप आपके चरणों की शरण में आया हूँ।

श्लोक 16 (bhagavata.3.21.16)

प्रजापतेस्ते वचसाधीश तन्त्या लोकः किलायं कामहतोऽनुबद्धः । अहं च लोकानुगतो वहामि बलिं च शुक्लानिमिषाय तुभ्यम् ॥ १६ ॥

prajāpates te vacasādhīśa tantyā lokaḥ kilāyaṁ kāma-hato ’nubaddhaḥ ahaṁ ca lokānugato vahāmi baliṁ ca śuklānimiṣāya tubhyam

हे अधीश! आपकी ही आज्ञारूपी रस्सी से यह सम्पूर्ण लोक, कामनाओं से बँधा हुआ, प्रजापति के वचन का अनुसरण कर रहा है; और मैं भी लोक का अनुगमन करते हुए, हे शुक्ल! हे अनिमेष काल! आपको बलि अर्पित करता हूँ।

श्लोक 17 (bhagavata.3.21.17)

लोकांश्च लोकानुगतान् पशूंश्च हित्वा श्रितास्ते चरणातपत्रम् । परस्परं त्वद्गुणवादसीधु- पीयूषनिर्यापितदेहधर्माः ॥ १७ ॥

lokāṁś ca lokānugatān paśūṁś ca hitvā śritās te caraṇātapatram parasparaṁ tvad-guṇa-vāda-sīdhu- pīyūṣa-niryāpita-deha-dharmāḥ

किन्तु जिन्होंने संसार तथा उसके पशुतुल्य अनुयायियों को त्यागकर आपके चरणों की छत्रछाया की शरण ली है, उनके शारीरिक धर्म परस्पर आपके गुणों की चर्चारूपी मादक अमृत से विलीन हो जाते हैं।

श्लोक 18 (bhagavata.3.21.18)

न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां त्रयोदशारं त्रिशतं षष्टिपर्व । षण्नेम्यनन्तच्छदि यत्त्रिणाभि करालस्रोतो जगदाच्छिद्य धावत् ॥ १८ ॥

na te ’jarākṣa-bhramir āyur eṣāṁ trayodaśāraṁ tri-śataṁ ṣaṣṭi-parva ṣaṇ-nemy ananta-cchadi yat tri-ṇābhi karāla-sroto jagad ācchidya dhāvat

अजर अक्ष पर घूमने वाला, तेरह अरों वाला, तीन सौ साठ पर्वों वाला, छह नेमियों वाला, अनन्त पत्तियों वाला और तीन नाभियों वाला वह चक्र, जो भयंकर वेग से जगत् को काटता हुआ दौड़ता है, आपके भक्तों की आयु का हरण नहीं करता।

श्लोक 19 (bhagavata.3.21.19)

एकः स्वयं सञ्जगतः सिसृक्षया- द्वितीययात्मन्नधियोगमायया । सृजस्यदः पासि पुनर्ग्रसिष्यसे यथोर्णनाभिर्भगवन् स्वशक्तिभिः ॥ १९ ॥

ekaḥ svayaṁ sañ jagataḥ sisṛkṣayā- dvitīyayātmann adhi-yogamāyayā sṛjasy adaḥ pāsi punar grasiṣyase yathorṇa-nābhir bhagavan sva-śaktibhiḥ

अकेले होते हुए भी, सृष्टि की इच्छा से, अपने भीतर स्थित दूसरी शक्ति योगमाया के द्वारा, आप इन लोकों की सृष्टि करते हैं, उनका पालन करते हैं और पुनः उन्हें अपने ही में समेट लेते हैं, हे भगवन्! जैसे मकड़ी अपनी शक्ति से अपना जाला बुनती और समेटती है।

श्लोक 20 (bhagavata.3.21.20)

नैतद्बताधीश पदं तवेप्सितं यन्मायया नस्तनुषे भूतसूक्ष्मम् । अनुग्रहायास्त्वपि यर्ही मायया लसत्तुलस्या भगवान् विलक्षितः ॥ २० ॥

naitad batādhīśa padaṁ tavepsitaṁ yan māyayā nas tanuṣe bhūta-sūkṣmam anugrahāyāstv api yarhi māyayā lasat-tulasyā bhagavān vilakṣitaḥ

हे अधीश! यह जो आप माया द्वारा हमारे लिए स्थूल-सूक्ष्म तत्त्वों का यह जगत् प्रकट करते हैं, वह आपकी अपनी वास्तविक इच्छा नहीं है; फिर भी यह हम पर अनुग्रह का ही साधन बने, क्योंकि उसी माया के द्वारा आप, हे भगवन्! शोभायमान तुलसी से सुसज्जित होकर दृष्टिगोचर होते हैं।

श्लोक 21 (bhagavata.3.21.21)

तं त्वानुभूत्योपरतक्रियार्थं स्वमायया वर्तितलोकतन्त्रम् । नमाम्यभीक्ष्णं नमनीयपाद- सरोजमल्पीयसि कामवर्षम् ॥ २१ ॥

taṁ tvānubhūtyoparata-kriyārthaṁ sva-māyayā vartita-loka-tantram namāmy abhīkṣṇaṁ namanīya-pāda- sarojam alpīyasi kāma-varṣam

मैं बार-बार आपको नमन करता हूँ, जिनके नमनीय चरण-कमल हैं, जिन्होंने अपनी माया से लोकतन्त्र की रचना इसलिए की है कि आपके साक्षात्कार से सकाम कर्म समाप्त हो जाएँ, और जो अत्यन्त तुच्छ जीवों पर भी कामनाओं की वर्षा कर देते हैं।

श्लोक 22 (bhagavata.3.21.22)

ऋषिरुवाच इत्यव्यलीकं प्रणुतोऽब्जनाभ- स्तमाबभाषे वचसामृतेन । सुपर्णपक्षोपरि रोचमानः प्रेमस्मितोद्वीक्षणविभ्रमद्भ्रूः ॥ २२ ॥

ṛṣir uvāca ity avyalīkaṁ praṇuto ’bja-nābhas tam ābabhāṣe vacasāmṛtena suparṇa-pakṣopari rocamānaḥ prema-smitodvīkṣaṇa-vibhramad-bhrūḥ

ऋषि ने कहा — इस प्रकार निष्कपट भाव से स्तुति किए जाने पर, गरुड़ के पंखों पर सुशोभित, प्रेमपूर्ण मुस्कान भरी दृष्टि से देखते हुए और भौंहों को सुन्दरता से चलाते हुए कमलनाभ भगवान ने उससे अमृत के समान मधुर वचनों में कहा।

श्लोक 23 (bhagavata.3.21.23)

श्रीभगवानुवाच विदित्वा तव चैत्यं मे पुरैव समयोजि तत् । यदर्थमात्मनियमैस्त्वयैवाहं समर्चितः ॥ २३ ॥

śrī-bhagavān uvāca viditvā tava caityaṁ me puraiva samayoji tat yad-artham ātma-niyamais tvayaivāhaṁ samarcitaḥ

श्रीभगवान ने कहा — तुम्हारे हृदय को जानकर मैंने पहले ही उस बात की व्यवस्था कर दी है, जिसके लिए तुमने अपने मन और इन्द्रियों के संयम द्वारा मेरी आराधना की है।

श्लोक 24 (bhagavata.3.21.24)

न वै जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम् । भवद्विधेष्वतितरां मयि संगृभितात्मनाम् ॥ २४ ॥

na vai jātu mṛṣaiva syāt prajādhyakṣa mad-arhaṇam bhavad-vidheṣv atitarāṁ mayi saṅgṛbhitātmanām

हे प्रजापते! मेरी आराधना कभी व्यर्थ नहीं होती, विशेषतः तुम्हारे जैसे व्यक्तियों के लिए, जिनका मन पूर्णतः मुझमें ही समर्पित है।

श्लोक 25 (bhagavata.3.21.25)

प्रजापतिसुतः सम्राण्मनुर्विख्यातमङ्गलः । ब्रह्मावर्तं योऽधिवसन् शास्ति सप्तार्णवां महीम् ॥ २५ ॥

prajāpati-sutaḥ samrāṇ manur vikhyāta-maṅgalaḥ brahmāvartaṁ yo ’dhivasan śāsti saptārṇavāṁ mahīm

प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र, सम्राट मनु, जो अपने प्रसिद्ध शुभ कर्मों के लिए विख्यात हैं और ब्रह्मावर्त में निवास करते हैं, सप्तसागरा पृथ्वी पर शासन करते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.3.21.26)

स चेह विप्र राजर्षिर्महिष्या शतरूपया । आयास्यति दिदृक्षुस्त्वां परश्वो धर्मकोविदः ॥ २६ ॥

sa ceha vipra rājarṣir mahiṣyā śatarūpayā āyāsyati didṛkṣus tvāṁ paraśvo dharma-kovidaḥ

हे विप्र! धर्म में निपुण वह राजर्षि परसों अपनी महारानी शतरूपा के साथ, तुम्हारे दर्शन की इच्छा से यहाँ आएगा।

श्लोक 27 (bhagavata.3.21.27)

आत्मजामसितापाङ्गीं वयःशीलगुणान्विताम् । मृगयन्तीं पतिं दास्यत्यनुरूपाय ते प्रभो ॥ २७ ॥

ātmajām asitāpāṅgīṁ vayaḥ-śīla-guṇānvitām mṛgayantīṁ patiṁ dāsyaty anurūpāya te prabho

हे प्रभो! अपनी उस पुत्री को, जो श्यामनयना है, विवाह-योग्य आयु तथा सुशील गुणों से सम्पन्न है और पति की खोज में है, वह तुम्हारे योग्य पात्र जानकर तुम्हें प्रदान करेगा।

श्लोक 28 (bhagavata.3.21.28)

समाहितं ते हृदयं यत्रेमान् परिवत्सरान् । सा त्वां ब्रह्मन्नृपवधूः काममाशु भजिष्यति ॥ २८ ॥

samāhitaṁ te hṛdayaṁ yatremān parivatsarān sā tvāṁ brahman nṛpa-vadhūḥ kāmam āśu bhajiṣyati

हे ब्रह्मन्! जिस पर तुम्हारा हृदय इतने वर्षों से टिका हुआ है, वह राजकुमारी शीघ्र ही तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हें समर्पित हो जाएगी।

श्लोक 29 (bhagavata.3.21.29)

या त आत्मभृतं वीर्यं नवधा प्रसविष्यति । वीर्ये त्वदीये ऋषय आधास्यन्त्यञ्जसात्मनः ॥ २९ ॥

yā ta ātma-bhṛtaṁ vīryaṁ navadhā prasaviṣyati vīrye tvadīye ṛṣaya ādhāsyanty añjasātmanaḥ

वह तुम्हारे द्वारा स्थापित बीज से नौ बार सन्तान उत्पन्न करेगी; और तुम्हारे द्वारा उत्पन्न उन पुत्रियों में ऋषिगण अपनी सन्तान उत्पन्न करेंगे।

श्लोक 30 (bhagavata.3.21.30)

त्वं च सम्यगनुष्ठाय निदेशं म उशत्तमः । मयि तीर्थीकृताशेषक्रियार्थो मां प्रपत्स्यसे ॥ ३० ॥

tvaṁ ca samyag anuṣṭhāya nideśaṁ ma uśattamaḥ mayi tīrthī-kṛtāśeṣa- kriyārtho māṁ prapatsyase

और तुम, मेरी आज्ञा का भलीभाँति पालन करते हुए, अत्यन्त शुद्ध होकर, अपने समस्त कर्मों के फलों को मुझमें तीर्थ के समान अर्पित करके, अन्ततः मुझे ही प्राप्त करोगे।

श्लोक 31 (bhagavata.3.21.31)

कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान् । मय्यात्मानं सह जगद् द्रक्ष्यस्यात्मनि चापि माम् ॥ ३१ ॥

kṛtvā dayāṁ ca jīveṣu dattvā cābhayam ātmavān mayy ātmānaṁ saha jagad drakṣyasy ātmani cāpi mām

समस्त जीवों पर दया करते हुए, उन्हें अभय प्रदान करते हुए, आत्मज्ञानी बनकर, तुम अपने आपको तथा सम्पूर्ण जगत् को मुझमें और मुझे भी अपने भीतर देखोगे।

श्लोक 32 (bhagavata.3.21.32)

सहाहं स्वांशकलया त्वद्वीर्येण महामुने । तव क्षेत्रे देवहूत्यां प्रणेष्ये तत्त्वसंहिताम् ॥ ३२ ॥

sahāhaṁ svāṁśa-kalayā tvad-vīryeṇa mahā-mune tava kṣetre devahūtyāṁ praṇeṣye tattva-saṁhitām

हे महामुने! मैं अपने अंश-कला सहित तुम्हारे ही वीर्य द्वारा, तुम्हारी पत्नी देवहूति के गर्भ में जन्म लेकर, तत्त्वों का यह सिद्धान्त प्रदान करूँगा।

श्लोक 33 (bhagavata.3.21.33)

मैत्रेय उवाच एवं तमनुभाष्याथ भगवान् प्रत्यगक्षजः । जगाम बिन्दुसरसः सरस्वत्या परिश्रितात् ॥ ३३ ॥

maitreya uvāca evaṁ tam anubhāṣyātha bhagavān pratyag-akṣajaḥ jagāma bindusarasaḥ sarasvatyā pariśritāt

मैत्रेय ने कहा — उससे इस प्रकार कहकर, अन्तर्मुखी इन्द्रियों द्वारा अनुभव किए जाने वाले भगवान सरस्वती से घिरे उस बिन्दुसरोवर से चले गए।

श्लोक 34 (bhagavata.3.21.34)

निरीक्षतस्तस्य ययावशेष- सिद्धेश्वराभिष्टुतसिद्धमार्गः । आकर्णयन् पत्ररथेन्द्रपक्षै- रुच्चारितं स्तोममुदीर्णसाम ॥ ३४ ॥

nirīkṣatas tasya yayāv aśeṣa- siddheśvarābhiṣṭuta-siddha-mārgaḥ ākarṇayan patra-rathendra-pakṣair uccāritaṁ stomam udīrṇa-sāma

उसके देखते-देखते ही भगवान उस सिद्ध-मार्ग से चले गए, जिसकी स्तुति समस्त सिद्धेश्वर करते हैं, तथा पक्षिराज गरुड़ के पंखों से उठते हुए उदात्त सामगान को सुनते हुए।

श्लोक 35 (bhagavata.3.21.35)

अथ सम्प्रस्थिते शुक्ले कर्दमो भगवानृषिः । आस्ते स्म बिन्दुसरसि तं कालं प्रतिपालयन् ॥ ३५ ॥

atha samprasthite śukle kardamo bhagavān ṛṣiḥ āste sma bindusarasi taṁ kālaṁ pratipālayan

तत्पश्चात् उस निर्मल भगवान के चले जाने पर, पूजनीय ऋषि कर्दम उस नियत समय की प्रतीक्षा करते हुए बिन्दुसरोवर पर ही रहने लगे।

श्लोक 36 (bhagavata.3.21.36)

मनुः स्यन्दनमास्थाय शातकौम्भपरिच्छदम् । आरोप्य स्वां दुहितरं सभार्यः पर्यटन्महीम् ॥ ३६ ॥

manuḥ syandanam āsthāya śātakaumbha-paricchadam āropya svāṁ duhitaraṁ sa-bhāryaḥ paryaṭan mahīm

मनु स्वर्ण से सुसज्जित रथ पर सवार होकर, अपनी पुत्री को उस पर बिठाकर, अपनी पत्नी सहित पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे।

श्लोक 37 (bhagavata.3.21.37)

तस्मिन् सुधन्वन्नहनि भगवान् यत्समादिशत् । उपायादाश्रमपदं मुनेः शान्तव्रतस्य तत् ॥ ३७ ॥

tasmin sudhanvann ahani bhagavān yat samādiśat upāyād āśrama-padaṁ muneḥ śānta-vratasya tat

हे सुधन्वा विदुर! भगवान द्वारा नियत उसी दिन, वे उस मुनि के आश्रम में जा पहुँचे, जिनका व्रत उस समय शान्तिपूर्वक पूर्ण हो चुका था।

श्लोक 38 (bhagavata.3.21.38)

यस्मिन् भगवतो नेत्रान्न्यपतन्नश्रुबिन्दवः । कृपया सम्परीतस्य प्रपन्नेऽर्पितया भृशम् ॥ ३८ ॥

yasmin bhagavato netrān nyapatann aśru-bindavaḥ kṛpayā samparītasya prapanne ’rpitayā bhṛśam

जिस सरोवर में उन भगवान की आँखों से अश्रुबिन्दु गिरे थे, जो शरणागत भक्त पर अर्पित अपार करुणा से अभिभूत हो गए थे।

श्लोक 39 (bhagavata.3.21.39)

तद्वै बिन्दुसरो नाम सरस्वत्या परिप्लुतम् । पुण्यं शिवामृतजलं महर्षिगणसेवितम् ॥ ३९ ॥

tad vai bindusaro nāma sarasvatyā pariplutam puṇyaṁ śivāmṛta-jalaṁ maharṣi-gaṇa-sevitam

वही सरोवर बिन्दुसरोवर के नाम से प्रसिद्ध है, जो सरस्वती के जल से परिपूर्ण है; उसका जल पवित्र, कल्याणकारी तथा अमृत के समान है, और महर्षिगण उसकी सेवा करते हैं।

श्लोक 40 (bhagavata.3.21.40)

पुण्यद्रुमलताजालैः कूजत्पुण्यमृगद्विजैः । सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं वनराजिश्रियान्वितम् ॥ ४० ॥

puṇya-druma-latā-jālaiḥ kūjat-puṇya-mṛga-dvijaiḥ sarvartu-phala-puṣpāḍhyaṁ vana-rāji-śriyānvitam

पवित्र वृक्षों और लताओं के समूहों से घिरा हुआ, कलरव करते पुण्य पशु-पक्षियों से युक्त, सभी ऋतुओं के फल-फूलों से समृद्ध, तथा वनश्रेणियों की शोभा से सुसज्जित था।

श्लोक 41 (bhagavata.3.21.41)

मत्तद्विजगणैर्घुष्टं मत्तभ्रमरविभ्रमम् । मत्तबर्हिनटाटोपमाह्वयन्मत्तकोकिलम् ॥ ४१ ॥

matta-dvija-gaṇair ghuṣṭaṁ matta-bhramara-vibhramam matta-barhi-naṭāṭopam āhvayan-matta-kokilam

उन्मत्त पक्षी-समूहों की ध्वनि से गूँजता, मतवाले भ्रमरों के विचरण से युक्त, मस्त मयूरों के नर्तन-गर्व से भरा हुआ, तथा एक-दूसरे को पुकारते मस्त कोयलों से भरा हुआ वह स्थान था।

श्लोक 42 (bhagavata.3.21.42)

कदम्बचम्पकाशोककरञ्जबकुलासनैः । कुन्दमन्दारकुटजैश्चूतपोतैरलङ्कृतम् ॥ ४२ ॥

kadamba-campakāśoka- karañja-bakulāsanaiḥ kunda-mandāra-kuṭajaiś cūta-potair alaṅkṛtam

वह कदम्ब, चम्पक, अशोक, करंज, बकुल तथा आसन वृक्षों से, और कुन्द, मन्दार, कुटज तथा नवोदित आम्र-वृक्षों से सुशोभित था।

श्लोक 43 (bhagavata.3.21.43)

कारण्डवैः प्लवैर्हंसैः कुररैर्जलकुक्कुटैः । सारसैश्चक्रवाकैश्च चकोरैर्वल्गु कूजितम् ॥ ४३ ॥

kāraṇḍavaiḥ plavair haṁsaiḥ kurarair jala-kukkuṭaiḥ sārasaiś cakravākaiś ca cakorair valgu kūjitam

करण्डव, प्लव, हंस, कुरर, जलकुक्कुट, सारस, चक्रवाक तथा चकोर पक्षियों की मधुर बोली से वह गुँजायमान था।

श्लोक 44 (bhagavata.3.21.44)

तथैव हरिणैः क्रोडैः श्वाविद्गवयकुञ्जरैः । गोपुच्छैर्हरिभिर्मर्कैर्नकुलैर्नाभिभिर्वृतम् ॥ ४४ ॥

tathaiva hariṇaiḥ kroḍaiḥ śvāvid-gavaya-kuñjaraiḥ gopucchair haribhir markair nakulair nābhibhir vṛtam

उसी प्रकार वह हिरणों, वराहों, साहियों, गवयों, हाथियों, गोपुच्छ वानरों, सिंहों, बन्दरों, नेवलों तथा कस्तूरी-मृगों से घिरा हुआ था।

श्लोक 45 (bhagavata.3.21.45)

प्रविश्य तत्तीर्थवरमादिराजः सहात्मजः । ददर्श मुनिमासीनं तस्मिन् हुतहुताशनम् ॥ ४५ ॥

praviśya tat tīrtha-varam ādi-rājaḥ sahātmajaḥ dadarśa munim āsīnaṁ tasmin huta-hutāśanam

उस श्रेष्ठ तीर्थ में अपनी पुत्री सहित प्रवेश करके, आदि सम्राट मनु ने वहाँ उस मुनि को देखा, जिसने अभी-अभी अग्नि में हवन किया था।

श्लोक 46 (bhagavata.3.21.46)

विद्योतमानं वपुषा तपस्युग्रयुजा चिरम् । नातिक्षामं भगवतः स्निग्धापाङ्गावलोकनात् । त द्वयहृतामृतकलापीयूषश्रवणेन च ॥ ४६ ॥

vidyotamānaṁ vapuṣā tapasy ugra-yujā ciram nātikṣāmaṁ bhagavataḥ snigdhāpāṅgāvalokanāt tad-vyāhṛtāmṛta-kalā- pīyūṣa-śravaṇena ca

दीर्घकाल तक कठोर तपस्या में लगे रहने पर भी उनका शरीर तेजस्वी था और तनिक भी क्षीण नहीं हुआ था, क्योंकि भगवान की स्नेहपूर्ण कटाक्ष-दृष्टि तथा उनके अमृततुल्य वचनों को सुनने का प्रभाव उन पर था।

श्लोक 47 (bhagavata.3.21.47)

प्रांशुं पद्मपलाशाक्षं जटिलं चीरवाससम् । उपसंश्रित्य मलिनं यथार्हणमसंस्कृतम् ॥ ४७ ॥

prāṁśuṁ padma-palāśākṣaṁ jaṭilaṁ cīra-vāsasam upasaṁśritya malinaṁ yathārhaṇam asaṁskṛtam

मनु ने उस लम्बे कद वाले, कमल-दल के समान नेत्रों वाले, जटाधारी, चीवरधारी मुनि के पास जाकर उन्हें ऐसा पाया, मानो कोई अनगढ़, मैला रत्न हो।

श्लोक 48 (bhagavata.3.21.48)

अथोटजमुपायातं नृदेवं प्रणतं पुरः । सपर्यया पर्यगृह्णात्प्रतिनन्द्यानुरूपया ॥ ४८ ॥

athoṭajam upāyātaṁ nṛdevaṁ praṇataṁ puraḥ saparyayā paryagṛhṇāt pratinandyānurūpayā

तत्पश्चात् अपने आश्रम में आए हुए, अपने समक्ष प्रणाम करते हुए नृपति को देखकर, कर्दम ने उचित सत्कार से उनका अभिनन्दन करते हुए स्वागत किया।

श्लोक 49 (bhagavata.3.21.49)

गृहीतार्हणमासीनं संयतं प्रीणयन्मुनिः । स्मरन् भगवदादेशमित्याह श्लक्ष्णया गिरा ॥ ४९ ॥

gṛhītārhaṇam āsīnaṁ saṁyataṁ prīṇayan muniḥ smaran bhagavad-ādeśam ity āha ślakṣṇayā girā

अतिथि-सत्कार ग्रहण कर चुके, शान्तचित्त बैठे हुए राजा को प्रसन्न करते हुए, भगवान की आज्ञा का स्मरण करते हुए मुनि ने कोमल वाणी में इस प्रकार कहा।

श्लोक 50 (bhagavata.3.21.50)

नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते । वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालिनी ॥ ५० ॥

nūnaṁ caṅkramaṇaṁ deva satāṁ saṁrakṣaṇāya te vadhāya cāsatāṁ yas tvaṁ hareḥ śaktir hi pālinī

'हे देव! निश्चय ही आपका यह भ्रमण सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए है, क्योंकि आप स्वयं हरि की रक्षक शक्ति हैं।'

श्लोक 51 (bhagavata.3.21.51)

योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् । रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लाय ते नमः ॥ ५१ ॥

yo ’rkendv-agnīndra-vāyūnāṁ yama-dharma-pracetasām rūpāṇi sthāna ādhatse tasmai śuklāya te namaḥ

'सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, धर्म तथा वरुण के रूपों को जो आप आवश्यकतानुसार धारण करते हैं, उन शुद्ध-स्वरूप आपको मेरा नमस्कार है।'

श्लोक 52 (bhagavata.3.21.52)

न यदा रथमास्थाय जैत्रं मणिगणार्पितम् । विस्फूर्जच्चण्डकोदण्डो रथेन त्रासयन्नघान् ॥ ५२ ॥

na yadā ratham āsthāya jaitraṁ maṇi-gaṇārpitam visphūrjac-caṇḍa-kodaṇḍo rathena trāsayann aghān

'यदि आप विजयी, रत्नजड़ित रथ पर सवार होकर, अपने भयंकर धनुष की टंकार से पापियों को भयभीत न करते,'

श्लोक 53 (bhagavata.3.21.53)

स्वसैन्यचरणक्षुण्णं वेपयन्मण्डलं भुवः । विकर्षन् बृहतीं सेनां पर्यटस्यंशुमानिव ॥ ५३ ॥

sva-sainya-caraṇa-kṣuṇṇaṁ vepayan maṇḍalaṁ bhuvaḥ vikarṣan bṛhatīṁ senāṁ paryaṭasy aṁśumān iva

'— अपनी सेना के पैरों से रौंदी जाती पृथ्वी के मण्डल को कँपाते हुए, विशाल सेना को लेकर सूर्य के समान भ्रमण न करते —'

श्लोक 54 (bhagavata.3.21.54)

तदैव सेतवः सर्वे वर्णाश्रमनिबन्धनाः । भगवद्रचिता राजन् भिद्येरन् बत दस्युभिः ॥ ५४ ॥

tadaiva setavaḥ sarve varṇāśrama-nibandhanāḥ bhagavad-racitā rājan bhidyeran bata dasyubhiḥ

'— तो हे राजन्! भगवान द्वारा रचित वर्णाश्रम की समस्त मर्यादाएँ निश्चय ही दुष्टों द्वारा तोड़ दी जातीं।'

श्लोक 55 (bhagavata.3.21.55)

अधर्मश्च समेधेत लोलुपैर्व्यङ्कुशैर्नृभिः । शयाने त्वयि लोकोऽयं दस्युग्रस्तो विनङ्क्ष्यति ॥ ५५ ॥

adharmaś ca samedheta lolupair vyaṅkuśair nṛbhiḥ śayāne tvayi loko ’yaṁ dasyu-grasto vinaṅkṣyati

'और लालची, निरंकुश मनुष्यों के कारण अधर्म बढ़ता जाता; यदि आप निष्क्रिय पड़े रहते, तो दस्युओं के चंगुल में फँसा यह लोक नष्ट हो जाता।'

श्लोक 56 (bhagavata.3.21.56)

अथापि पृच्छे त्वां वीर यदर्थं त्वमिहागतः । तद्वयं निर्व्यलीकेन प्रतिपद्यामहे हृदा ॥ ५६ ॥

athāpi pṛcche tvāṁ vīra yad-arthaṁ tvam ihāgataḥ tad vayaṁ nirvyalīkena pratipadyāmahe hṛdā

'फिर भी, हे वीर! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप यहाँ किस प्रयोजन से पधारे हैं; जो भी वह हो, हम निष्कपट हृदय से उसे स्वीकार करेंगे।'

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