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नवम स्कन्ध · अध्याय 1

राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (bhagavata.9.1.1)

श्रीराजोवाच मन्वन्तराणि सर्वाणि त्वयोक्तानि श्रुतानि मे । वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य हरेस्तत्र कृतानि च ॥ 1.1 ॥

śrī-rājovāca manvantarāṇi sarvāṇi tvayoktāni śrutāni me vīryāṇy ananta-vīryasya hares tatra kṛtāni ca

राजा परीक्षित ने कहा — आपने मुझे सभी मन्वन्तरों का तथा उनमें हुए अनन्त शक्तिशाली भगवान हरि के पराक्रमों का वर्णन सुनाया, जिसे मैंने सुना।

श्लोक 2 (bhagavata.9.1.2)

योऽसौ सत्यव्रतो नाम राजर्षिर्द्रविडेश्वरः । ज्ञानं योऽतीतकल्पान्ते लेभे पुरुषसेवया ॥ 1.2 ॥

yo ’sau satyavrato nāma rājarṣirdraviḍeśvaraḥ jñānaṁ yo ’tītakalpānte lebhe puruṣasevayā

वही सत्यव्रत नामक राजर्षि, द्रविड़ देश के स्वामी, जिन्होंने पूर्व कल्प के अन्त में भगवान की सेवा द्वारा ज्ञान प्राप्त किया था —

श्लोक 3 (bhagavata.9.1.3)

स वै विवस्वतः पुत्रो मनुरासीदिति श्रुतम् । त्वत्तस्तस्य सुताःप्रोक्ता इक्ष्वाकुप्रमुखा नृपाः ॥ 1.3 ॥

sa vai vivasvataḥ putro manurāsīditi śrutam tvattastasya sutāḥproktā ikṣvākupramukhā nṛpāḥ

वही विवस्वान के पुत्र मनु हुए, ऐसा मैंने सुना है, और आपसे ही यह भी ज्ञात हुआ कि इक्ष्वाकु आदि राजा उन्हीं के पुत्र थे।

श्लोक 4 (bhagavata.9.1.4)

तेषां वंशं पृथग् ब्रह्मन् वंशानुचरितानि च । कीर्तयस्व महाभाग नित्यं शुश्रूषतां हि नः ॥ 1.4 ॥

teṣāṁ vaṁśaṁ pṛthag brahman vaṁśānucaritāni ca kīrtayasva mahā-bhāga nityaṁ śuśrūṣatāṁ hi naḥ

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, हे परम सौभाग्यशाली शुकदेव जी! उन सबके वंश और वंशचरित्र को हमें अलग-अलग सुनाइए, क्योंकि हम सदैव आपसे यह सुनने के इच्छुक हैं।

श्लोक 5 (bhagavata.9.1.5)

ये भूता ये भविष्याश्च भवन्त्यद्यतनाश्च ये । तेषां नः पुण्यकीर्तीनां सर्वेषां वद विक्रमान् ॥ 1.5 ॥

ye bhūtā ye bhaviṣyāś ca bhavanty adyatanāś ca ye teṣāṁ naḥ puṇya-kīrtīnāṁ sarveṣāṁ vada vikramān

जो हो चुके हैं, जो भविष्य में होंगे, और जो वर्तमान में हैं — उन सभी पुण्यकीर्ति राजाओं के पराक्रम का वर्णन हमें कीजिए।

श्लोक 6 (bhagavata.9.1.6)

श्रीसूत उवाच एवं परीक्षिता राज्ञा सदसि ब्रह्मवादिनाम् । पृष्टः प्रोवाच भगवाञ्छुकः परमधर्मवित् ॥ 1.6 ॥

śrī-sūta uvāca evaṁ parīkṣitā rājñā sadasi brahma-vādinām pṛṣṭaḥ provāca bhagavāñ chukaḥ parama-dharma-vit

श्री सूत जी ने कहा — वेदज्ञ विद्वानों की उस सभा में राजा परीक्षित द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, धर्म के परम ज्ञाता भगवान शुकदेव जी ने कहना आरम्भ किया।

श्लोक 7 (bhagavata.9.1.7)

श्रीशुक उवाच श्रूयतां मानवो वंशः प्राचुर्येण परन्तप । न शक्यते विस्तरतो वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ 1.7 ॥

śrī-śuka uvāca śrūyatāṁ mānavo vaṁśaḥ prācuryeṇa parantapa na śakyate vistarato vaktuṁ varṣa-śatair api

श्री शुकदेव जी ने कहा — हे शत्रुदमन! अब मनु के वंश का विस्तारपूर्वक श्रवण कीजिए, यद्यपि उसका सम्पूर्ण वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी सम्भव नहीं है।

श्लोक 8 (bhagavata.9.1.8)

परावरेषां भूतानामात्मा यः पुरुषः परः । स एवासीदिदं विश्वं कल्पान्तेऽन्यन्न किञ्चन ॥ 1.8 ॥

parāvareṣāṁ bhūtānām ātmā yaḥ puruṣaḥ paraḥ sa evāsīd idaṁ viśvaṁ kalpānte ’nyan na kiñcana

जो परम पुरुष उच्च और निम्न सभी प्राणियों की आत्मा हैं, कल्प के अन्त में केवल वे ही विद्यमान थे — यह विश्व और अन्य कुछ भी नहीं था।

श्लोक 9 (bhagavata.9.1.9)

तस्य नाभेः समभवत् पद्मकोषो हिरण्मयः । तस्मिञ्जज्ञे महाराज स्वयम्भूश्चतुराननः ॥ 1.9 ॥

tasya nābheḥ samabhavat padma-koṣo hiraṇmayaḥ tasmiñ jajñe mahārāja svayambhūś catur-ānanaḥ

हे महाराज! उन्हीं की नाभि से एक स्वर्णिम कमल-कोष प्रकट हुआ, जिसमें स्वयम्भू चतुर्मुख ब्रह्मा का जन्म हुआ।

श्लोक 10 (bhagavata.9.1.10)

मरीचिर्मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यपः । दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वानभवत् सुतः ॥ 1.10 ॥

marīcir manasas tasya jajñe tasyāpi kaśyapaḥ dākṣāyaṇyāṁ tato ’dityāṁ vivasvān abhavat sutaḥ

ब्रह्मा के मन से मरीचि उत्पन्न हुए, मरीचि से कश्यप हुए, और कश्यप से, दक्षकन्या अदिति के गर्भ से, विवस्वान का जन्म हुआ।

श्लोक 11 (bhagavata.9.1.11)

ततो मनुः श्राद्धदेवः संज्ञायामास भारत । श्रद्धायां जनयामास दश पुत्रान् स आत्मवान् ॥ 1.11 ॥

tato manuḥ śrāddhadevaḥ saṁjñāyāmāsa bhārata śraddhāyāṁ janayāmāsa daśa putrān sa ātmavān

हे भरतवंशी! उन्हीं विवस्वान से, संज्ञा के गर्भ से श्राद्धदेव मनु उत्पन्न हुए। जितेन्द्रिय मनु ने अपनी पत्नी श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 12 (bhagavata.9.1.12)

इक्ष्वाकुनृगशर्यातिदिष्टधृष्टकरूषकान् । नरिष्यन्तं पृषध्रं च नभगं च कविं विभुः ॥ 1.12 ॥

ikṣvākunṛgaśaryātidiṣṭadhṛṣṭakarūṣakān nariṣyantaṁ pṛṣadhraṁ ca nabhagaṁ ca kaviṁ vibhuḥ

वे दस पुत्र थे — इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूषक, नरिष्यन्त, पृषध्र, नभग और कवि।

श्लोक 13 (bhagavata.9.1.13)

अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल । मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजार्थमकरोद् विभुः ॥ 1.13 ॥

aprajasya manoḥ pūrvaṁ vasiṣṭho bhagavān kila mitrā-varuṇayor iṣṭiṁ prajārtham akarod vibhuḥ

इससे पूर्व, जब मनु सन्तानहीन थे, तब परम शक्तिशाली भगवान वसिष्ठ ने सन्तान-प्राप्ति हेतु मित्र और वरुण देवताओं के निमित्त यज्ञ किया।

श्लोक 14 (bhagavata.9.1.14)

तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत । दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता ॥ 1.14 ॥

tatra śraddhā manoḥ patnī hotāraṁ samayācata duhitrartham upāgamya praṇipatya payovratā

उस यज्ञ में मनु की पत्नी श्रद्धा, जो केवल दुग्धपान का व्रत धारण किए हुए थीं, होता के पास जाकर उन्हें प्रणाम कर एक पुत्री की याचना करने लगीं।

श्लोक 15 (bhagavata.9.1.15)

प्रेषितोऽध्वर्युणा होता व्यचरत् तत् समाहितः । गृहीते हविषि वाचा वषट्कारं गृणन्द्विजः ॥ 1.15 ॥

preṣito ’dhvaryuṇā hotā vyacarat tat samāhitaḥ gṛhīte haviṣi vācā vaṣaṭ-kāraṁ gṛṇan dvijaḥ

अध्वर्यु द्वारा आज्ञा दिए जाने पर होता ने एकाग्रचित्त होकर हवि ग्रहण करते हुए "वषट्" शब्द का उच्चारण करते हुए यज्ञ-कर्म सम्पन्न किया।

श्लोक 16 (bhagavata.9.1.16)

होतुस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत् । तां विलोक्य मनुः प्राह नातितुष्टमना गुरुम् ॥ 1.16 ॥

hotus tad-vyabhicāreṇa kanyelā nāma sābhavat tāṁ vilokya manuḥ prāha nātituṣṭamanā gurum

होता के इस विचलन के कारण इला नामक कन्या उत्पन्न हुई। उसे देखकर मनु अत्यन्त असंतुष्ट हुए और अपने गुरु से इस प्रकार बोले।

श्लोक 17 (bhagavata.9.1.17)

भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् । विपर्ययमहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया ॥ 1.17 ॥

bhagavan kim idaṁ jātaṁ karma vo brahma-vādinām viparyayam aho kaṣṭaṁ maivaṁ syād brahma-vikriyā

हे भगवन्! आप जैसे वेदज्ञों का यह कैसा कर्म-फल हुआ? यह विपरीत परिणाम अत्यन्त खेदजनक है। वेद-मन्त्रों का ऐसा विकार नहीं होना चाहिए था।

श्लोक 18 (bhagavata.9.1.18)

यूयं ब्रह्मविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्बिषाः । कुतः सङ्कल्पवैषम्यमनृतं विबुधेष्विव ॥ 1.18 ॥

yūyaṁ brahma-vido yuktās tapasā dagdha-kilbiṣāḥ kutaḥ saṅkalpa-vaiṣamyam anṛtaṁ vibudheṣv iva

आप सभी ब्रह्मज्ञानी, संयमी और तप के द्वारा समस्त पापों को भस्म कर चुके हैं। फिर देवताओं के समान आपके संकल्प में यह असत्यता, यह विषमता कैसे हुई?

श्लोक 19 (bhagavata.9.1.19)

निशम्य तद् वचस्तस्य भगवान् प्रपितामहः । होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम् ॥ 1.19 ॥

niśamya tad vacas tasya bhagavān prapitāmahaḥ hotur vyatikramaṁ jñātvā babhāṣe ravi-nandanam

मनु के ये वचन सुनकर, प्रपितामह भगवान वसिष्ठ ने होता की चूक को समझते हुए सूर्यपुत्र मनु से इस प्रकार कहा।

श्लोक 20 (bhagavata.9.1.20)

एतत् सङ्कल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः । तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा ॥ 1.20 ॥

etat saṅkalpa-vaiṣamyaṁ hotus te vyabhicārataḥ tathāpi sādhayiṣye te suprajāstvaṁ sva-tejasā

यह संकल्प-विपर्यय तुम्हारे होता के विचलन के कारण हुआ है। फिर भी, मैं अपने ही तेज से तुम्हें उत्तम सन्तान की प्राप्ति करा दूँगा।

श्लोक 21 (bhagavata.9.1.21)

एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः । अस्तौषीदादिपुरुषमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥ 1.21 ॥

evaṁ vyavasito rājan bhagavān sa mahā-yaśāḥ astauṣīd ādi-puruṣam ilāyāḥ puṁstva-kāmyayā

शुकदेव जी ने कहा — हे राजन्! ऐसा निश्चय करके परम यशस्वी भगवान वसिष्ठ ने इला को पुरुषत्व प्रदान कराने की कामना से आदिपुरुष भगवान विष्णु की स्तुति की।

श्लोक 22 (bhagavata.9.1.22)

तस्मै कामवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः । ददाविलाभवत् तेन सुद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥ 1.22 ॥

tasmai kāma-varaṁ tuṣṭo bhagavān harir īśvaraḥ dadāv ilābhavat tena sudyumnaḥ puruṣarṣabhaḥ

उनसे प्रसन्न होकर सर्वेश्वर भगवान हरि ने उन्हें इच्छित वर प्रदान किया। उसी वर के प्रभाव से इला पुरुषश्रेष्ठ सुद्युम्न में परिणत हो गईं।

श्लोक 23 (bhagavata.9.1.23)

स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने । वृतः कतिपयामात्यैरश्वमारुह्य सैन्धवम् ॥ 1.23 ॥

sa ekadā mahārāja vicaran mṛgayāṁ vane vṛtaḥ katipayāmātyairaśvamāruhya saindhavam

हे महाराज! एक बार वह सुद्युम्न कुछ मंत्रियों से घिरा हुआ, सिन्धु देश के घोड़े पर सवार होकर आखेट हेतु वन में विचरण करने लगा।

श्लोक 24 (bhagavata.9.1.24)

प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्च परमाद्भुतान् । दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ 1.24 ॥

pragṛhya ruciraṁ cāpaṁ śarāṁśca paramādbhutān daṁśito ’numṛgaṁ vīro jagāma diśamuttarām

सुन्दर धनुष और अद्भुत बाणों को हाथ में लिए, कवच धारण किए हुए वह वीर पशुओं का पीछा करते हुए उत्तर दिशा की ओर बढ़ गया।

श्लोक 25 (bhagavata.9.1.25)

सुकुमारवनं मेरोरधस्तात् प्रविवेश ह । यत्रास्ते भगवाञ्छर्वो रममाणः सहोमया ॥ 1.25 ॥

sukumāra-vanaṁ meror adhastāt praviveśa ha yatrāste bhagavāñ charvo ramamāṇaḥ sahomayā

वहाँ मेरु पर्वत की तलहटी में स्थित सुकुमार नामक वन में वह प्रविष्ट हुआ, जहाँ भगवान शिव उमा के साथ विहार करते हैं।

श्लोक 26 (bhagavata.9.1.26)

तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्नः परवीरहा । अपश्यत् स्त्रियमात्मानमश्वं च वडवां नृप ॥ 1.26 ॥

tasmin praviṣṭa evāsau sudyumnaḥ para-vīra-hā apaśyat striyam ātmānam aśvaṁ ca vaḍavāṁ nṛpa

हे राजन्! उस वन में प्रवेश करते ही शत्रुवीरों का नाशक वह सुद्युम्न स्वयं को स्त्री रूप में और अपने घोड़े को घोड़ी के रूप में परिणत पाकर चकित रह गया।

श्लोक 27 (bhagavata.9.1.27)

तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिङ्गविपर्ययम् । दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम् ॥ 1.27 ॥

tathā tad-anugāḥ sarve ātma-liṅga-viparyayam dṛṣṭvā vimanaso ’bhūvan vīkṣamāṇāḥ parasparam

उसके साथ आए सभी अनुचरों ने भी अपने-अपने लिंग में यह विपर्यय देखकर, एक-दूसरे को देखते हुए, अत्यन्त उदास हो गए।

श्लोक 28 (bhagavata.9.1.28)

श्रीराजोवाच कथमेवं गुणो देशः केन वा भगवन् कृतः । प्रश्नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः ॥ 1.28 ॥

śrī-rājovāca katham evaṁ guṇo deśaḥ kena vā bhagavan kṛtaḥ praśnam enaṁ samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

राजा परीक्षित ने कहा — हे भगवन्! यह स्थान इस प्रकार के गुणवाला कैसे और किसके द्वारा बनाया गया? कृपया इस प्रश्न का उत्तर दीजिए, क्योंकि हमें इसे जानने की अत्यन्त उत्कण्ठा है।

श्लोक 29 (bhagavata.9.1.29)

श्रीशुक उवाच एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयस्तत्र सुव्रताः । दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन् ॥ 1.29 ॥

śrī-śuka uvāca ekadā giriśaṁ draṣṭum ṛṣayas tatra suvratāḥ diśo vitimirābhāsāḥ kurvantaḥ samupāgaman

शुकदेव जी ने कहा — एक बार दृढ़-व्रती ऋषिगण भगवान शिव के दर्शन हेतु वहाँ आए, जिनकी दिव्य कान्ति से समस्त दिशाओं का अन्धकार दूर हो गया।

श्लोक 30 (bhagavata.9.1.30)

तान् विलोक्याम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम् । भर्तुरङ्कात् समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥ 1.30 ॥

tān vilokyāmbikā devī vivāsā vrīḍitā bhṛśam bhartur aṅkāt samutthāya nīvīm āśv atha paryadhāt

उन्हें देखकर देवी अम्बिका, जो उस समय निर्वस्त्र थीं, अत्यन्त लज्जित होकर अपने पति की गोद से उठ खड़ी हुईं और शीघ्रता से वस्त्र धारण करने लगीं।

श्लोक 31 (bhagavata.9.1.31)

ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्गं रममाणयोः । निवृत्ताः प्रययुस्तस्मान्नरनारायणाश्रमम् ॥ 1.31 ॥

ṛṣayo ’pi tayor vīkṣya prasaṅgaṁ ramamāṇayoḥ nivṛttāḥ prayayus tasmān nara-nārāyaṇāśramam

उन दोनों को रतिक्रीड़ा में लीन देखकर ऋषिगण भी वहाँ से लौट गए और नर-नारायण के आश्रम की ओर प्रस्थान कर गए।

श्लोक 32 (bhagavata.9.1.32)

तदिदं भगवानाह प्रियायाः प्रियकाम्यया । स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥ 1.32 ॥

tad idaṁ bhagavān āha priyāyāḥ priya-kāmyayā sthānaṁ yaḥ praviśed etat sa vai yoṣid bhaved iti

तब भगवान शिव ने अपनी प्रिया को प्रसन्न करने की इच्छा से यह कह दिया — "जो भी पुरुष इस स्थान में प्रवेश करेगा, वह स्त्री बन जाएगा।"

श्लोक 33 (bhagavata.9.1.33)

तत ऊर्ध्वं वनं तद् वै पुरुषा वर्जयन्ति हि । सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥ 1.33 ॥

tata ūrdhvaṁ vanaṁ tad vai puruṣā varjayanti hi sā cānucara-saṁyuktā vicacāra vanād vanam

तभी से पुरुष उस वन में प्रवेश नहीं करते। और अब वह (सुद्युम्न, स्त्री-रूप में) अपने अनुचरों के साथ वन-वन में विचरण करने लगी।

श्लोक 34 (bhagavata.9.1.34)

अथ तामाश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम् । स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः ॥ 1.34 ॥

atha tām āśramābhyāśe carantīṁ pramadottamām strībhiḥ parivṛtāṁ vīkṣya cakame bhagavān budhaḥ

अपने आश्रम के निकट विचरण करती हुई, अन्य स्त्रियों से घिरी उस परम सुन्दरी को देखकर बुध ने उसकी कामना कर ली।

श्लोक 35 (bhagavata.9.1.35)

सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम् । स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम् ॥ 1.35 ॥

sāpi taṁ cakame subhrūḥ somarāja-sutaṁ patim sa tasyāṁ janayām āsa purūravasam ātmajam

वह सुन्दर भौंहों वाली स्त्री भी चन्द्रमा के पुत्र बुध को अपने पति रूप में चाहने लगी। बुध ने उसके गर्भ से पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया।

श्लोक 36 (bhagavata.9.1.36)

एवं स्त्रीत्वमनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः । सस्मार स कुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥ 1.36 ॥

evaṁ strītvam anuprāptaḥ sudyumno mānavo nṛpaḥ sasmāra sa kulācāryaṁ vasiṣṭham iti śuśruma

इस प्रकार स्त्रीत्व को प्राप्त हुए मनुपुत्र राजा सुद्युम्न ने अपने कुलगुरु वसिष्ठ का स्मरण किया — ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 37 (bhagavata.9.1.37)

स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः । सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वमुपाधावत शङ्करम् ॥ 1.37 ॥

sa tasya tāṁ daśāṁ dṛṣṭvā kṛpayā bhṛśa-pīḍitaḥ sudyumnasyāśayan puṁstvam upādhāvata śaṅkaram

सुद्युम्न की उस दशा को देखकर वसिष्ठ करुणा से अत्यन्त द्रवित हुए और उसे पुनः पुरुषत्व दिलाने की इच्छा से भगवान शंकर की आराधना करने लगे।

श्लोक 38 (bhagavata.9.1.38)

तुष्टस्तस्मै स भगवानृषये प्रियमावहन् । स्वां च वाचमृतां कुर्वन्निदमाह विशाम्पते ॥ 1.38 ॥

tuṣṭastasmai sa bhagavānṛṣaye priyamāvahan svāṁ ca vācamṛtāṁ kurvannidamāha viśāmpate

हे राजन्! उनसे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उस ऋषि का प्रिय करते हुए, तथा (उमा को दिए) अपने वचन को भी सत्य रखते हुए, यह कहा।

श्लोक 39 (bhagavata.9.1.39)

मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः । इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ 1.39 ॥

māsaṁ pumān sa bhavitā māsaṁ strī tava gotrajaḥ itthaṁ vyavasthayā kāmaṁ sudyumno ’vatu medinīm

"तुम्हारे कुल में उत्पन्न यह सुद्युम्न एक मास पुरुष रहेगा और एक मास स्त्री। इस व्यवस्था के अनुसार वह इच्छानुसार पृथ्वी का शासन करे।"

श्लोक 40 (bhagavata.9.1.40)

आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया । पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः ॥ 1.40 ॥

ācāryānugrahāt kāmaṁ labdhvā puṁstvaṁ vyavasthayā pālayām āsa jagatīṁ nābhyanandan sma taṁ prajāḥ

गुरु की कृपा से इस व्यवस्था के अनुसार इच्छित पुरुषत्व पाकर सुद्युम्न ने पृथ्वी का पालन किया, यद्यपि प्रजा इससे सन्तुष्ट नहीं थी।

श्लोक 41 (bhagavata.9.1.41)

तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च त्रयः सुताः । दक्षिणापथराजानो बभूवुर्धर्मवत्सलाः ॥ 1.41 ॥

tasyotkalo gayo rājan vimalaś ca trayaḥ sutāḥ dakṣiṇā-patha-rājāno babhūvur dharma-vatsalāḥ

हे राजन्! उसके उत्कल, गय और विमल नामक तीन पुत्र हुए, जो धर्मपरायण होकर दक्षिणापथ के राजा बने।

श्लोक 42 (bhagavata.9.1.42)

ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः । पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम् ॥ 1.42 ॥

tataḥ pariṇate kāle pratiṣṭhāna-patiḥ prabhuḥ purūravasa utsṛjya gāṁ putrāya gato vanam

तत्पश्चात्, समय पूर्ण होने पर, प्रतिष्ठानपुरी के स्वामी सुद्युम्न ने पृथ्वी का राज्य अपने पुत्र पुरूरवा को सौंपकर वन का मार्ग ग्रहण किया।

अध्याय-सूचीअध्याय 2