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नवम स्कन्ध · अध्याय 10

भगवान रामचंद्र का चरित्र

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (bhagavata.9.10.1)

श्रीशुक उवाच खट्वाङ्गाद् दीर्घबाहुश्च रघुस्तस्मात् पृथुश्रवाः । अजस्ततो महाराजस्तस्माद् दशरथोऽभवत् ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca khaṭvāṅgād dīrghabāhuś ca raghus tasmāt pṛthu-śravāḥ ajas tato mahā-rājas tasmād daśaratho ’bhavat

श्रीशुकदेव जी ने कहा — खट्वांग से दीर्घबाहु उत्पन्न हुए; उनसे कीर्तिमान रघु उत्पन्न हुए; उनसे महाराज अज तथा अज से दशरथ उत्पन्न हुए।

श्लोक 2 (bhagavata.9.10.2)

तस्यापि भगवानेष साक्षाद् ब्रह्ममयो हरिः । अंशांशेन चतुर्धागात् पुत्रत्वं प्रार्थितः सुरैः । रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्ना इति संज्ञया ॥ २ ॥

tasyāpi bhagavān eṣa sākṣād brahmamayo hariḥ aṁśāṁśena caturdhāgāt putratvaṁ prārthitaḥ suraiḥ rāma-lakṣmaṇa-bharata- śatrughnā iti saṁjñayā

उन्हीं दशरथ के यहाँ भगवान हरि, जो साक्षात् ब्रह्ममय हैं, देवताओं की प्रार्थना पर अपने अंश और अंशांशों सहित चार रूपों में अवतरित हुए — राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न इन नामों से।

श्लोक 3 (bhagavata.9.10.3)

तस्यानुचरितं राजन्नृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । श्रुतं हि वर्णितं भूरि त्वया सीतापतेर्मुहुः ॥ ३ ॥

tasyānucaritaṁ rājann ṛṣibhis tattva-darśibhiḥ śrutaṁ hi varṇitaṁ bhūri tvayā sītā-pater muhuḥ

हे राजन्, सीतापति के चरित्र का वर्णन तत्त्वदर्शी ऋषियों ने विस्तार से किया है, और तुमने भी उसे बारंबार सुना है।

श्लोक 4 (bhagavata.9.10.4)

गुर्वर्थे त्यक्तराज्यो व्यचरदनुवनं पद्मपद्भ्यां प्रियायाः पाणिस्पर्शाक्षमाभ्यां मृजितपथरुजो यो हरीन्द्रानुजाभ्याम् । वैरूप्याच्छूर्पणख्याः प्रियविरहरुषारोपितभ्रूविजृम्भ- त्रस्ताब्धिर्बद्धसेतुः खलदवदहनः कोसलेन्द्रोऽवतान्नः ॥ ४ ॥

gurv-arthe tyakta-rājyo vyacarad anuvanaṁ padma-padbhyāṁ priyāyāḥ pāṇi-sparśākṣamābhyāṁ mṛjita-patha-rujo yo harīndrānujābhyām vairūpyāc chūrpaṇakhyāḥ priya-viraha-ruṣāropita-bhrū-vijṛmbha- trastābdhir baddha-setuḥ khala-dava-dahanaḥ kosalendro ’vatān naḥ

जिन्होंने पिता के वचन की रक्षा के लिए राज्य त्याग दिया और अपनी प्रिया के कोमल हाथों के स्पर्श से भी अधिक कोमल अपने चरण-कमलों से वन-वन विचरण किया, जिनके मार्ग की पीड़ा को वानरराज और अपने अनुज ने दूर किया; जिन्होंने शूर्पणखा को विरूप किया और फिर प्रिया-वियोग के क्रोध में अपनी भ्रू-भंगिमा मात्र से समुद्र को कंपा दिया, जिसने भयभीत होकर सेतु-निर्माण की अनुमति दी, तथा जिन्होंने वन-दहन करने वाली अग्नि के समान दुष्टों का संहार किया — वे कोसलाधीश हमारी रक्षा करें।

श्लोक 5 (bhagavata.9.10.5)

विश्वामित्राध्वरे येन मारीचाद्या निशाचराः । पश्यतो लक्ष्मणस्यैव हता नैर्ऋतपुङ्गवाः ॥ ५ ॥

viśvāmitrādhvare yena mārīcādyā niśā-carāḥ paśyato lakṣmaṇasyaiva hatā nairṛta-puṅgavāḥ

विश्वामित्र के यज्ञ में, लक्ष्मण के देखते-देखते ही, उन्होंने मारीच आदि श्रेष्ठ निशाचरों का वध किया।

श्लोक 6 (bhagavata.9.10.6)

यो लोकवीरसमितौ धनुरैशमुग्रं सीतास्वयंवरगृहे त्रिशतोपनीतम् । आदाय बालगजलील इवेक्षुयष्टिं सज्ज्यीकृतं नृप विकृष्य बभञ्ज मध्ये ॥ ६ ॥

yo loka-vīra-samitau dhanur aiśam ugraṁ sītā-svayaṁvara-gṛhe triśatopanītam ādāya bāla-gaja-līla ivekṣu-yaṣṭiṁ sajjyī-kṛtaṁ nṛpa vikṛṣya babhañja madhye

हे राजन्, सीता के स्वयंवर में लोक-वीरों की उस सभा में, जिस भयंकर धनुष को तीन सौ पुरुष उठाकर लाए थे, उसे उन्होंने उठाकर, जैसे बाल-गज गन्ने की डंडी को तोड़ देता है, उसी सहजता से चढ़ाकर बीच से तोड़ डाला।

श्लोक 7 (bhagavata.9.10.7)

जित्वानुरूपगुणशीलवयोऽङ्गरूपां सीताभिधां श्रियमुरस्यभिलब्धमानाम् । मार्गे व्रजन् भृगुपतेर्व्यनयत् प्ररूढं दर्पं महीमकृत यस्त्रिरराजबीजाम् ॥ ७ ॥

jitvānurūpa-guṇa-śīla-vayo ’ṅga-rūpāṁ sītābhidhāṁ śriyam urasy abhilabdhamānām mārge vrajan bhṛgupater vyanayat prarūḍhaṁ darpaṁ mahīm akṛta yas trir arāja-bījām

इस प्रकार उन्होंने गुण, शील, आयु, अंग और रूप में समान उस लक्ष्मी-स्वरूपा सीता को प्राप्त किया, जो सदा उनके वक्षस्थल पर निवास करती हैं। मार्ग में लौटते समय उन्होंने परशुराम के, जिन्होंने पृथ्वी को तीन बार क्षत्रिय-रहित किया था, बढ़े हुए अभिमान को नष्ट कर दिया।

श्लोक 8 (bhagavata.9.10.8)

यः सत्यपाशपरिवीतपितुर्निदेशं स्त्रैणस्य चापि शिरसा जगृहे सभार्यः । राज्यं श्रियं प्रणयिनः सुहृदो निवासं त्यक्त्वा ययौ वनमसूनिव मुक्तसङ्गः ॥ ८ ॥

yaḥ satya-pāśa-parivīta-pitur nideśaṁ straiṇasya cāpi śirasā jagṛhe sabhāryaḥ rājyaṁ śriyaṁ praṇayinaḥ suhṛdo nivāsaṁ tyaktvā yayau vanam asūn iva mukta-saṅgaḥ

जिन्होंने अपनी पत्नी से बंधे पिता की आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार किया, और पत्नी सहित राज्य, संपत्ति, स्नेहीजन, मित्र तथा निवास — सब कुछ त्यागकर, जैसे मुक्त पुरुष प्राण त्याग देता है, उसी सहजता से वन को चले गए।

श्लोक 9 (bhagavata.9.10.9)

रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे- स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् । जघ्ने चतुर्दशसहस्रमपारणीय- कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम् ॥ ९ ॥

rakṣaḥ-svasur vyakṛta rūpam aśuddha-buddhes tasyāḥ khara-triśira-dūṣaṇa-mukhya-bandhūn jaghne caturdaśa-sahasram apāraṇīya- kodaṇḍa-pāṇir aṭamāna uvāsa kṛcchram

वन में कठिनाइयाँ सहते हुए, अजेय धनुष हाथ में धारण किए विचरण करते हुए उन्होंने काम-मोहित बुद्धि वाली राक्षस-भगिनी (शूर्पणखा) को विरूप किया तथा खर, त्रिशिरा और दूषण के नेतृत्व में उसके चौदह हजार बंधु-बांधवों का वध किया।

श्लोक 10 (bhagavata.9.10.10)

सीताकथाश्रवणदीपितहृच्छयेन सृष्टं विलोक्य नृपते दशकन्धरेण । जघ्नेऽद्भुतैणवपुषाश्रमतोऽपकृष्टो मारीचमाशु विशिखेन यथा कमुग्रः ॥ १० ॥

sītā-kathā-śravaṇa-dīpita-hṛc-chayena sṛṣṭaṁ vilokya nṛpate daśa-kandhareṇa jaghne ’dbhutaiṇa-vapuṣāśramato ’pakṛṣṭo mārīcam āśu viśikhena yathā kam ugraḥ

हे राजन्, सीता की सुंदरता की चर्चा सुनकर दशकंधर रावण का हृदय काम से प्रज्वलित हो उठा; उसने मारीच को अद्भुत स्वर्णमृग के रूप में भेजा, जिसे देखकर आश्रम से दूर खींचे गए राम ने उसे शीघ्र ही बाण से वैसे ही मार गिराया जैसे उग्र शिव ने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया था।

श्लोक 11 (bhagavata.9.10.11)

रक्षोऽधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं वैदेहराजदुहितर्यपयापितायाम् । भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्तः स्त्रीसङ्गिनां गतिमिति प्रथयंश्चचार ॥ ११ ॥

rakṣo-’dhamena vṛkavad vipine ’samakṣaṁ vaideha-rāja-duhitary apayāpitāyām bhrātrā vane kṛpaṇavat priyayā viyuktaḥ strī-saṅgināṁ gatim iti prathayaṁś cacāra

जब राम और लक्ष्मण दोनों अनुपस्थित थे, तब नीच राक्षस रावण ने भेड़िये की भाँति वैदेहराजपुत्री सीता का अपहरण कर लिया; तत्पश्चात राम अपने भाई के साथ वन में प्रिया-वियोग से दीन-हीन की भाँति विचरण करने लगे, मानो स्त्री में आसक्त पुरुष की दशा को अपने ही उदाहरण से प्रकट कर रहे हों।

श्लोक 12 (bhagavata.9.10.12)

दग्ध्वात्मकृत्यहतकृत्यमहन् कबन्धं सख्यं विधाय कपिभिर्दयितागतिं तैः । बुद्ध्वाथ वालिनि हते प्लवगेन्द्रसैन्यै- र्वेलामगात् स मनुजोऽजभवार्चिताङ्घ्रिः ॥ १२ ॥

dagdhvātma-kṛtya-hata-kṛtyam ahan kabandhaṁ sakhyaṁ vidhāya kapibhir dayitā-gatiṁ taiḥ buddhvātha vālini hate plavagendra-sainyair velām agāt sa manujo ’ja-bhavārcitāṅghriḥ

मनुष्य-रूप धारण किए हुए, ब्रह्मा और शिव द्वारा जिनके चरण पूजित हैं, उन राम ने जटायु का अंत्येष्टि-संस्कार किया, कबंध राक्षस का वध किया, वानरों से मित्रता की, और वालि का वध होने पर वानर-सेना द्वारा अपनी प्रिया का पता जानकर समुद्र-तट की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 13 (bhagavata.9.10.13)

यद्रोषविभ्रमविवृत्तकटाक्षपात- सम्भ्रान्तनक्रमकरो भयगीर्णघोषः । सिन्धुः शिरस्यर्हणं परिगृह्य रूपी पादारविन्दमुपगम्य बभाष एतत् ॥ १३ ॥

yad-roṣa-vibhrama-vivṛtta-kaṭākṣa-pāta- sambhrānta-nakra-makaro bhaya-gīrṇa-ghoṣaḥ sindhuḥ śirasy arhaṇaṁ parigṛhya rūpī pādāravindam upagamya babhāṣa etat

जिनके क्रोधयुक्त कटाक्षपात से भयभीत होकर मगर और नक्र व्याकुल हो उठे और जिसकी गर्जना भय से लुप्त हो गई, वह समुद्र स्वयं मूर्तिमान होकर सिर पर अर्घ्य-सामग्री लिए हुए राम के चरण-कमलों के पास आकर यह बोला।

श्लोक 14 (bhagavata.9.10.14)

न त्वां वयं जडधियो नु विदाम भूमन् कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम् । यत्सत्त्वतः सुरगणा रजसः प्रजेशा मन्योश्च भूतपतयः स भवान् गुणेशः ॥ १४ ॥

na tvāṁ vayaṁ jaḍa-dhiyo nu vidāma bhūman kūṭa-stham ādi-puruṣaṁ jagatām adhīśam yat-sattvataḥ sura-gaṇā rajasaḥ prajeśā manyoś ca bhūta-patayaḥ sa bhavān guṇeśaḥ

"हे सर्वव्यापी! हम मंदबुद्धि आपको न पहचान सके — आप ही वह अपरिवर्तनीय आदिपुरुष हैं, समस्त लोकों के स्वामी हैं, जिनसे ही सत्त्वगुण से देवगण, रजोगुण से प्रजापतिगण और तमोगुण से भूतपति उत्पन्न होते हैं; आप ही उन समस्त गुणों के स्वामी हैं।"

श्लोक 15 (bhagavata.9.10.15)

कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं त्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्नीम् । बध्नीहि सेतुमिह ते यशसो वितत्यै गायन्ति दिग्विजयिनो यमुपेत्य भूपाः ॥ १५ ॥

kāmaṁ prayāhi jahi viśravaso ’vamehaṁ trailokya-rāvaṇam avāpnuhi vīra patnīm badhnīhi setum iha te yaśaso vitatyai gāyanti dig-vijayino yam upetya bhūpāḥ

"हे वीर, आप निःसंकोच जाइए और उस विश्रवा-पुत्र, मूत्रवत् निंदनीय, त्रिलोक-रावक रावण का वध कर अपनी पत्नी को प्राप्त कीजिए। यहाँ सेतु बांधिए, जिससे आपका यश फैले — जिसे भविष्य में दिग्विजयी राजा गाते रहेंगे।"

श्लोक 16 (bhagavata.9.10.16)

बद्ध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः । सुग्रीवनीलहनुमत्प्रमुखैरनीकै- र्लङ्कां विभीषणदृशाविशदग्रदग्धाम् ॥ १६ ॥

baddhvodadhau raghu-patir vividhādri-kūṭaiḥ setuṁ kapīndra-kara-kampita-bhūruhāṅgaiḥ sugrīva-nīla-hanumat-pramukhair anīkair laṅkāṁ vibhīṣaṇa-dṛśāviśad agra-dagdhām

रघुपति ने विशाल वानरों के हाथों से हिलाए गए वृक्षों सहित पर्वत-शिखरों से समुद्र पर सेतु बांधा और सुग्रीव, नील तथा हनुमान आदि सेनाओं सहित, विभीषण के मार्गदर्शन में, पहले ही जलाई जा चुकी लंका में प्रवेश किया।

श्लोक 17 (bhagavata.9.10.17)

सा वानरेन्द्रबलरुद्धविहारकोष्ठ- श्रीद्वारगोपुरसदोवलभीविटङ्का । निर्भज्यमानधिषणध्वजहेमकुम्भ- शृङ्गाटका गजकुलैर्ह्रदिनीव घूर्णा ॥ १७ ॥

sā vānarendra-bala-ruddha-vihāra-koṣṭha- śrī-dvāra-gopura-sado-valabhī-viṭaṅkā nirbhajyamāna-dhiṣaṇa-dhvaja-hema-kumbha- śṛṅgāṭakā gaja-kulair hradinīva ghūrṇā

वानरराज की सेना द्वारा घिरी हुई वह नगरी — जिसके क्रीड़ागृह, भंडार, सुंदर द्वार, नगर-द्वार, सभा-भवन, अटारियाँ और कबूतरखाने सब अवरुद्ध हो गए, जिसके चौराहे, ध्वज-दंड और स्वर्ण-कलश तोड़े जा रहे थे — गजों के झुंड से क्षुब्ध नदी के समान डोलने लगी।

श्लोक 18 (bhagavata.9.10.18)

रक्षःपतिस्तदवलोक्य निकुम्भकुम्भ- धूम्राक्षदुर्मुखसुरान्तकनरान्तकादीन् । पुत्रं प्रहस्तमतिकायविकम्पनादीन् सर्वानुगान् समहिनोदथ कुम्भकर्णम् ॥ १८ ॥

rakṣaḥ-patis tad avalokya nikumbha-kumbha- dhūmrākṣa-durmukha-surāntaka-narāntakādīn putraṁ prahastam atikāya-vikampanādīn sarvānugān samahinod atha kumbhakarṇam

यह देखकर राक्षसराज रावण ने निकुम्भ, कुम्भ, धूम्राक्ष, दुर्मुख, सुरांतक, नरांतक आदि, अपने पुत्र प्रहस्त, अतिकाय, विकंपन तथा अंततः कुम्भकर्ण को युद्ध के लिए भेजा।

श्लोक 19 (bhagavata.9.10.19)

तां यातुधानपृतनामसिशूलचाप- प्रासर्ष्टिशक्तिशरतोमरखड्गदुर्गाम् । सुग्रीवलक्ष्मणमरुत्सुतगन्धमाद- नीलाङ्गदर्क्षपनसादिभिरन्वितोऽगात् ॥ १९ ॥

tāṁ yātudhāna-pṛtanām asi-śūla-cāpa- prāsarṣṭi-śaktiśara-tomara-khaḍga-durgām sugrīva-lakṣmaṇa-marutsuta-gandhamāda- nīlāṅgadarkṣa-panasādibhir anvito ’gāt

तलवार, त्रिशूल, धनुष, प्रास, ऋष्टि, शक्ति, बाण, तोमर और खड्ग से सुसज्जित उस राक्षस-सेना के विरुद्ध राम सुग्रीव, लक्ष्मण, हनुमान, गंधमादन, नील, अंगद, जांबवान और पनस आदि से घिरे हुए आगे बढ़े।

श्लोक 20 (bhagavata.9.10.20)

तेऽनीकपा रघुपतेरभिपत्य सर्वे द्वन्द्वं वरूथमिभपत्तिरथाश्वयोधैः । जघ्नुर्द्रुमैर्गिरिगदेषुभिरङ्गदाद्याः सीताभिमर्षहतमङ्गलरावणेशान् ॥ २० ॥

te ’nīkapā raghupater abhipatya sarve dvandvaṁ varūtham ibha-patti-rathāśva-yodhaiḥ jaghnur drumair giri-gadeṣubhir aṅgadādyāḥ sītābhimarṣa-hata-maṅgala-rāvaṇeśān

रघुपति के अंगद आदि सेनापतियों ने गजों, पैदल सैनिकों, रथों और अश्वारोहियों की सेना पर एक साथ टूट पड़कर वृक्षों, पर्वत-शिखरों, गदाओं और बाणों से रावण के उन सैनिकों का वध किया, जिनका सौभाग्य सीता के क्रोध से पहले ही नष्ट हो चुका था।

श्लोक 21 (bhagavata.9.10.21)

रक्षःपतिः स्वबलनष्टिमवेक्ष्य रुष्ट आरुह्य यानकमथाभिससार रामम् । स्वःस्यन्दने द्युमति मातलिनोपनीते विभ्राजमानमहनन्निशितैः क्षुरप्रैः ॥ २१ ॥

rakṣaḥ-patiḥ sva-bala-naṣṭim avekṣya ruṣṭa āruhya yānakam athābhisasāra rāmam svaḥ-syandane dyumati mātalinopanīte vibhrājamānam ahanan niśitaiḥ kṣurapraiḥ

राक्षसराज रावण अपनी सेना का विनाश देखकर क्रुद्ध हो उठा; अपने विमान पर चढ़कर वह मातलि द्वारा लाए गए तेजस्वी रथ पर सुशोभित राम की ओर बढ़ा और तीक्ष्ण बाणों से उन्हें बींध डाला।

श्लोक 22 (bhagavata.9.10.22)

रामस्तमाह पुरुषादपुरीष यन्नः कान्तासमक्षमसतापहृता श्ववत् ते । त्यक्तत्रपस्य फलमद्य जुगुप्सितस्य यच्छामि काल इव कर्तुरलङ्घ्यवीर्यः ॥ २२ ॥

rāmas tam āha puruṣāda-purīṣa yan naḥ kāntāsamakṣam asatāpahṛtā śvavat te tyakta-trapasya phalam adya jugupsitasya yacchāmi kāla iva kartur alaṅghya-vīryaḥ

राम ने उससे कहा — "हे नरभक्षियों में मल-समान नीच! तूने कुत्ते की भाँति मेरी अनुपस्थिति में, छिपकर मेरी पत्नी का अपहरण किया। आज मैं, जिसका प्रयास कभी विफल नहीं होता, तुझे तेरे इस निर्लज्ज और घृणित कर्म का फल उसी प्रकार दूँगा जैसे काल कर्ता को उसका फल देता है।"

श्लोक 23 (bhagavata.9.10.23)

एवं क्षिपन् धनुषि संधितमुत्ससर्ज बाणं स वज्रमिव तद्धृदयं बिभेद । सोऽसृग् वमन् दशमुखैर्न्यपतद् विमाना- द्धाहेति जल्पति जने सुकृतीव रिक्तः ॥ २३ ॥

evaṁ kṣipan dhanuṣi sandhitam utsasarja bāṇaṁ sa vajram iva tad-dhṛdayaṁ bibheda so ’sṛg vaman daśa-mukhair nyapatad vimānād dhāheti jalpati jane sukṛtīva riktaḥ

ऐसा कहकर राम ने धनुष पर बाण चढ़ाकर छोड़ा, जिसने वज्र के समान रावण के हृदय को बींध डाला; वह अपने दस मुखों से रक्त वमन करता हुआ विमान से नीचे गिर पड़ा, जबकि लोग 'हाय! हाय!' पुकारते रहे — मानो पुण्य क्षीण हो जाने पर कोई पुण्यात्मा स्वर्ग से गिर रहा हो।

श्लोक 24 (bhagavata.9.10.24)

ततो निष्क्रम्य लङ्काया यातुधान्यः सहस्रशः । मन्दोदर्या समं तत्र प्ररुदन्त्य उपाद्रवन् ॥ २४ ॥

tato niṣkramya laṅkāyā yātudhānyaḥ sahasraśaḥ mandodaryā samaṁ tatra prarudantya upādravan

तत्पश्चात मंदोदरी सहित सहस्रों राक्षसियाँ रोती-बिलखती हुई लंका से बाहर निकलीं।

श्लोक 25 (bhagavata.9.10.25)

स्वान् स्वान् बन्धून् परिष्वज्य लक्ष्मणेषुभिरर्दितान् । रुरुदुः सुस्वरं दीना घ्नन्त्य आत्मानमात्मना ॥ २५ ॥

svān svān bandhūn pariṣvajya lakṣmaṇeṣubhir arditān ruruduḥ susvaraṁ dīnā ghnantya ātmānam ātmanā

लक्ष्मण के बाणों से मारे गए अपने-अपने बंधुओं को आलिंगन कर वे दीन स्त्रियाँ स्वयं को पीटती हुई करुण स्वर में विलाप करने लगीं।

श्लोक 26 (bhagavata.9.10.26)

हा हताः स्म वयं नाथ लोकरावण रावण । कं यायाच्छरणं लङ्का त्वद्विहीना परार्दिता ॥ २६ ॥

hā hatāḥ sma vayaṁ nātha loka-rāvaṇa rāvaṇa kaṁ yāyāc charaṇaṁ laṅkā tvad-vihīnā parārditā

"हाय नाथ! हे लोक-रावक रावण! हम नष्ट हो गईं। तुम्हारे बिना शत्रु से पीड़ित यह लंका किसकी शरण जाएगी?"

श्लोक 27 (bhagavata.9.10.27)

न वै वेद महाभाग भवान् कामवशं गतः । तेजोऽनुभावं सीताया येन नीतो दशामिमाम् ॥ २७ ॥

na vai veda mahā-bhāga bhavān kāma-vaśaṁ gataḥ tejo ’nubhāvaṁ sītāyā yena nīto daśām imām

"हे महाभाग्यशाली! तुम काम के वशीभूत होकर सीता के तेज-प्रभाव को नहीं समझ सके, जिसके कारण तुम इस दशा को प्राप्त हुए।"

श्लोक 28 (bhagavata.9.10.28)

कृतैषा विधवा लङ्का वयं च कुलनन्दन । देहः कृतोऽन्नं गृध्राणामात्मा नरकहेतवे ॥ २८ ॥

kṛtaiṣā vidhavā laṅkā vayaṁ ca kula-nandana dehaḥ kṛto ’nnaṁ gṛdhrāṇām ātmā naraka-hetave

"हे कुलनंदन! तुमने लंका को और हमें भी विधवा बना दिया; तुमने अपने शरीर को गिद्धों का भोजन और अपनी आत्मा को नरक का कारण बना डाला।"

श्लोक 29 (bhagavata.9.10.29)

श्रीशुक उवाच स्वानां विभीषणश्चक्रे कोसलेन्द्रानुमोदितः । पितृमेधविधानेन यदुक्तं साम्परायिकम् ॥ २९ ॥

śrī-śuka uvāca svānāṁ vibhīṣaṇaś cakre kosalendrānumoditaḥ pitṛ-medha-vidhānena yad uktaṁ sāmparāyikam

श्रीशुकदेव जी ने कहा — कोसलाधीश राम की अनुमति से विभीषण ने अपने बंधुजनों के लिए शास्त्रविहित पितृमेध-विधि से अंत्येष्टि संस्कार संपन्न किया।

श्लोक 30 (bhagavata.9.10.30)

ततो ददर्श भगवानशोकवनिकाश्रमे । क्षामां स्वविरहव्याधिं शिंशपामूलमाश्रिताम् ॥ ३० ॥

tato dadarśa bhagavān aśoka-vanikāśrame kṣāmāṁ sva-viraha-vyādhiṁ śiṁśapā-mūlam-āśritām

तत्पश्चात भगवान राम ने अशोक-वाटिका में शिंशपा वृक्ष के नीचे बैठी सीता को देखा, जो विरह-व्याधि से कृश हो चुकी थीं।

श्लोक 31 (bhagavata.9.10.31)

रामः प्रियतमां भार्यां दीनां वीक्ष्यान्वकम्पत । आत्मसन्दर्शनाह्लादविकसन्मुखपङ्कजाम् ॥ ३१ ॥

rāmaḥ priyatamāṁ bhāryāṁ dīnāṁ vīkṣyānvakampata ātma-sandarśanāhlāda- vikasan-mukha-paṅkajām

अपनी प्रियतमा पत्नी को इस दुर्दशा में देखकर राम को अत्यंत करुणा हुई; और राम को देखते ही सीता का मुखकमल आनंद से खिल उठा।

श्लोक 32 (bhagavata.9.10.32)

आरोप्यारुरुहे यानं भ्रातृभ्यां हनुमद्युतः । विभीषणाय भगवान् दत्त्वा रक्षोगणेशताम् । लङ्कामायुश्च कल्पान्तं ययौ चीर्णव्रतः पुरीम् ॥ ३२ ॥

āropyāruruhe yānaṁ bhrātṛbhyāṁ hanumad-yutaḥ vibhīṣaṇāya bhagavān dattvā rakṣo-gaṇeśatām laṅkām āyuś ca kalpāntaṁ yayau cīrṇa-vrataḥ purīm

विभीषण को लंका के राक्षस-गणों का स्वामित्व तथा कल्प के अंत तक की आयु प्रदान कर, अपना व्रत पूर्ण कर चुके भगवान राम सीता को विमान पर बिठाकर, हनुमान और भाइयों सहित स्वयं भी आरूढ़ होकर अपनी नगरी की ओर चल पड़े।

श्लोक 33 (bhagavata.9.10.33)

अवकीर्यमाणः सुकुसुमैर्लोकपालार्पितैः पथि । उपगीयमानचरितः शतधृत्यादिभिर्मुदा ॥ ३३ ॥

avakīryamāṇaḥ sukusumair lokapālārpitaiḥ pathi upagīyamāna-caritaḥ śatadhṛty-ādibhir mudā

मार्ग में लोकपालों द्वारा अर्पित सुंदर पुष्पों की वर्षा होती रही, और ब्रह्मा आदि देवगण हर्षपूर्वक उनके चरित्र का गान करते रहे।

श्लोक 34 (bhagavata.9.10.34)

गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं वल्कलाम्बरम् । महाकारुणिकोऽतप्यज्जटिलं स्थण्डिलेशयम् ॥ ३४ ॥

go-mūtra-yāvakaṁ śrutvā bhrātaraṁ valkalāmbaram mahā-kāruṇiko ’tapyaj jaṭilaṁ sthaṇḍile-śayam

जब उन्होंने सुना कि उनके भाई भरत गोमूत्र में पकाया जौ खाकर, वल्कल वस्त्र पहनकर, जटा धारण किए भूमि पर सो रहे हैं, तो अत्यंत करुणामय भगवान राम को बड़ा दुःख हुआ।

श्लोक 35 (bhagavata.9.10.35)

भरतः प्राप्तमाकर्ण्य पौरामात्यपुरोहितैः । पादुके शिरसि न्यस्य रामं प्रत्युद्यतोऽग्रजम् ॥ ३५ ॥

bharataḥ prāptam ākarṇya paurāmātya-purohitaiḥ pāduke śirasi nyasya rāmaṁ pratyudyato ’grajam

राम के आगमन का समाचार सुनकर भरत नगरवासियों, मंत्रियों और पुरोहितों सहित, राम की खड़ाऊँ को अपने सिर पर रखकर उनसे मिलने के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 36 (bhagavata.9.10.36)

नन्दिग्रामात् स्वशिबिराद् गीतवादित्रनिःस्वनैः । ब्रह्मघोषेण च मुहुः पठद्भिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ३६ ॥

nandigrāmāt sva-śibirād gīta-vāditra-niḥsvanaiḥ brahma-ghoṣeṇa ca muhuḥ paṭhadbhir brahmavādibhiḥ

नंदिग्राम स्थित अपने शिविर से वे गीत-वाद्य की ध्वनि के साथ तथा ब्रह्मवादी विद्वानों के निरंतर वेद-पाठ के साथ चले।

श्लोक 37 (bhagavata.9.10.37)

स्वर्णकक्षपताकाभिर्हैमैश्चित्रध्वजै रथैः । सदश्वै रुक्मसन्नाहैर्भटैः पुरटवर्मभिः ॥ ३७ ॥

svarṇa-kakṣa-patākābhir haimaiś citra-dhvajai rathaiḥ sad-aśvai rukma-sannāhair bhaṭaiḥ puraṭa-varmabhiḥ

स्वर्ण-कक्ष-पताकाओं से सुशोभित, विविध रंगों की ध्वजाओं से युक्त रथ, उत्तम अश्व, स्वर्ण-कवच से सज्जित सैनिक — ये सब उनके साथ चले।

श्लोक 38 (bhagavata.9.10.38)

श्रेणीभिर्वारमुख्याभिर्भृत्यैश्चैव पदानुगैः । पारमेष्ठ्यान्युपादाय पण्यान्युच्चावचानि च । पादयोर्न्यपतत् प्रेम्णा प्रक्लिन्नहृदयेक्षणः ॥ ३८ ॥

śreṇībhir vāra-mukhyābhir bhṛtyaiś caiva padānugaiḥ pārameṣṭhyāny upādāya paṇyāny uccāvacāni ca pādayor nyapatat premṇā praklinna-hṛdayekṣaṇaḥ

श्रेष्ठ वारांगनाओं के समूह, पैदल चलने वाले सेवकगण, राजोचित वस्तुएँ और नाना प्रकार की बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर वे चले; और भरत, प्रेम से हृदय और नेत्र द्रवित होकर, राम के चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 39 (bhagavata.9.10.39)

पादुके न्यस्य पुरतः प्राञ्जलिर्बाष्पलोचनः । तमाश्लिष्य चिरं दोर्भ्यां स्नापयन् नेत्रजैर्जलैः ॥ ३९ ॥

pāduke nyasya purataḥ prāñjalir bāṣpa-locanaḥ tam āśliṣya ciraṁ dorbhyāṁ snāpayan netrajair jalaiḥ

खड़ाऊँ को सामने रखकर, हाथ जोड़े, अश्रुपूरित नेत्रों से भरत खड़े हुए; राम ने उन्हें बहुत देर तक दोनों भुजाओं से आलिंगन कर अपने नेत्रों के जल से स्नान कराया।

श्लोक 40 (bhagavata.9.10.40)

रामो लक्ष्मणसीताभ्यां विप्रेभ्यो येऽर्हसत्तमाः । तेभ्यः स्वयं नमश्चक्रे प्रजाभिश्च नमस्कृतः ॥ ४० ॥

rāmo lakṣmaṇa-sītābhyāṁ viprebhyo ye ’rha-sattamāḥ tebhyaḥ svayaṁ namaścakre prajābhiś ca namaskṛtaḥ

तब राम ने लक्ष्मण और सीता सहित सबसे पूज्य ब्राह्मणों को स्वयं प्रणाम किया, और प्रजाजनों ने उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 41 (bhagavata.9.10.41)

धुन्वन्त उत्तरासङ्गान् पतिं वीक्ष्य चिरागतम् । उत्तराः कोसला माल्यैः किरन्तो ननृतुर्मुदा ॥ ४१ ॥

dhunvanta uttarāsaṅgān patiṁ vīkṣya cirāgatam uttarāḥ kosalā mālyaiḥ kiranto nanṛtur mudā

दीर्घकाल बाद अपने स्वामी को लौटते देख उत्तर कोसल के निवासी अपने उत्तरीय वस्त्र लहराते हुए, मालाएँ बिखेरते हुए हर्षपूर्वक नाचने लगे।

श्लोक 42 (bhagavata.9.10.42)

पादुके भरतोऽगृह्णाच्चामरव्यजनोत्तमे । विभीषणः ससुग्रीवः श्वेतच्छत्रं मरुत्सुतः ॥ ४२ ॥

pāduke bharato ’gṛhṇāc cāmara-vyajanottame vibhīṣaṇaḥ sasugrīvaḥ śveta-cchatraṁ marut-sutaḥ

भरत ने खड़ाऊँ तथा उत्तम चँवर और पंखा धारण किया; विभीषण और सुग्रीव ने भी वैसा ही किया; हनुमान ने श्वेत छत्र धारण किया।

श्लोक 43 (bhagavata.9.10.43)

धनुर्निषङ्गाञ्छत्रुघ्नः सीता तीर्थकमण्डलुम् । अबिभ्रदङ्गदः खड्गं हैमं चर्मर्क्षराण्नृप ॥ ४३ ॥

dhanur-niṣaṅgāñ chatrughnaḥ sītā tīrtha-kamaṇḍalum abibhrad aṅgadaḥ khaḍgaṁ haimaṁ carmarkṣa-rāṇ nṛpa

शत्रुघ्न ने धनुष-तूणीर, सीता ने तीर्थ-जल से भरा कमंडलु धारण किया; अंगद ने तलवार तथा हे राजन्, ऋक्षराज (जांबवान) ने स्वर्ण-ढाल धारण की।

श्लोक 44 (bhagavata.9.10.44)

पुष्पकस्थो नुतः स्त्रीभिः स्तूयमानश्च वन्दिभिः । विरेजे भगवान् राजन् ग्रहैश्चन्द्र इवोदितः ॥ ४४ ॥

puṣpaka-stho nutaḥ strībhiḥ stūyamānaś ca vandibhiḥ vireje bhagavān rājan grahaiś candra ivoditaḥ

पुष्पक विमान पर आसीन, स्त्रियों द्वारा वंदित तथा बंदीजनों द्वारा स्तुत भगवान राम, हे राजन्, ग्रहों-नक्षत्रों के मध्य उदित चंद्रमा के समान सुशोभित हुए।

श्लोक 45 (bhagavata.9.10.45)

भ्रात्राभिनन्दितः सोऽथ सोत्सवां प्राविशत् पुरीम् । प्रविश्य राजभवनं गुरुपत्नीः स्वमातरम् ॥ ४५ ॥

bhrātrābhinanditaḥ so ’tha sotsavāṁ prāviśat purīm praviśya rāja-bhavanaṁ guru-patnīḥ sva-mātaram

भाई भरत द्वारा अभिनंदित होकर वे उत्सवमय नगरी में प्रविष्ट हुए; राजमहल में प्रवेश कर उन्होंने गुरुपत्नियों तथा अपनी माताओं को प्रणाम किया।

श्लोक 46 (bhagavata.9.10.46)

गुरून् वयस्यावरजान् पूजितः प्रत्यपूजयत् । वैदेही लक्ष्मणश्चैव यथावत् समुपेयतुः ॥ ४६ ॥

gurūn vayasyāvarajān pūjitaḥ pratyapūjayat vaidehī lakṣmaṇaś caiva yathāvat samupeyatuḥ

उन्होंने गुरुजनों तथा समवयस्क एवं छोटे बंधुओं को भी प्रणाम किया, और जिनसे वे स्वयं पूजित हुए उन्हें प्रति-सम्मान दिया; वैदेही और लक्ष्मण ने भी यथोचित रूप से ऐसा ही किया।

श्लोक 47 (bhagavata.9.10.47)

पुत्रान् स्वमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोत्थिताः । आरोप्याङ्केऽभिषिञ्चन्त्यो बाष्पौघैर्विजहुः शुचः ॥ ४७ ॥

putrān sva-mātaras tās tu prāṇāṁs tanva ivotthitāḥ āropyāṅke ’bhiṣiñcantyo bāṣpaughair vijahuḥ śucaḥ

अपने पुत्रों को देखकर माताएँ, मानो प्राण लौट आने पर शरीर सचेत हो उठा हो, उठ खड़ी हुईं; उन्हें गोद में बिठाकर अश्रुधारा से अभिषिक्त करती हुई उन्होंने अपना समस्त शोक त्याग दिया।

श्लोक 48 (bhagavata.9.10.48)

जटा निर्मुच्य विधिवत् कुलवृद्धैः समं गुरुः । अभ्यषिञ्चद् यथैवेन्द्रं चतुःसिन्धुजलादिभिः ॥ ४८ ॥

jaṭā nirmucya vidhivat kula-vṛddhaiḥ samaṁ guruḥ abhyaṣiñcad yathaivendraṁ catuḥ-sindhu-jalādibhiḥ

गुरु वसिष्ठ ने कुल के वृद्धजनों सहित विधिपूर्वक उनकी जटाएँ उतरवाईं और चारों समुद्रों के जल आदि से उनका उसी प्रकार अभिषेक किया जैसे इंद्र का किया जाता है।

श्लोक 49 (bhagavata.9.10.49)

एवं कृतशिरःस्नानः सुवासाः स्रग्व्यलङ्कृतः । स्वलङ्कृतैः सुवासोभिर्भ्रातृभिर्भार्यया बभौ ॥ ४९ ॥

evaṁ kṛta-śiraḥ-snānaḥ suvāsāḥ sragvy-alaṅkṛtaḥ svalaṅkṛtaiḥ suvāsobhir bhrātṛbhir bhāryayā babhau

इस प्रकार मस्तक-स्नान कर, सुंदर वस्त्र धारण कर, माला और आभूषणों से अलंकृत होकर, वे अपने समान रूप से सुसज्जित भाइयों और पत्नी सहित सुशोभित हुए।

श्लोक 50 (bhagavata.9.10.50)

अग्रहीदासनं भ्रात्रा प्रणिपत्य प्रसादितः । प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः । जुगोप पितृवद् रामो मेनिरे पितरं च तम् ॥ ५० ॥

agrahīd āsanaṁ bhrātrā praṇipatya prasāditaḥ prajāḥ sva-dharma-niratā varṇāśrama-guṇānvitāḥ jugopa pitṛvad rāmo menire pitaraṁ ca tam

भाई भरत के पूर्ण समर्पण और विनय से प्रसन्न होकर राम ने राजसिंहासन ग्रहण किया; उन्होंने प्रजा का, जो वर्णाश्रम-धर्म में निरत थी, पिता के समान पालन किया, और प्रजा ने भी उन्हें पिता के समान माना।

श्लोक 51 (bhagavata.9.10.51)

त्रेतायां वर्तमानायां कालः कृतसमोऽभवत् । रामे राजनि धर्मज्ञे सर्वभूतसुखावहे ॥ ५१ ॥

tretāyāṁ vartamānāyāṁ kālaḥ kṛta-samo ’bhavat rāme rājani dharma-jñe sarva-bhūta-sukhāvahe

त्रेतायुग होते हुए भी, धर्मज्ञ और सर्वभूतसुखकारी राजा राम के राज्य में समय सतयुग के समान हो गया।

श्लोक 52 (bhagavata.9.10.52)

वनानि नद्यो गिरयो वर्षाणि द्वीपसिन्धवः । सर्वे कामदुघा आसन् प्रजानां भरतर्षभ ॥ ५२ ॥

vanāni nadyo girayo varṣāṇi dvīpa-sindhavaḥ sarve kāma-dughā āsan prajānāṁ bharatarṣabha

हे भरतवंशश्रेष्ठ, राम के राज्य में वन, नदियाँ, पर्वत, प्रदेश, द्वीप और समुद्र — सभी प्रजा को कामधेनु के समान इच्छित वस्तुएँ प्रदान करते थे।

श्लोक 53 (bhagavata.9.10.53)

नाधिव्याधिजराग्लानिदुःखशोकभयक्लमाः । मृत्युश्चानिच्छतां नासीद् रामे राजन्यधोक्षजे ॥ ५३ ॥

nādhi-vyādhi-jarā-glāni- duḥkha-śoka-bhaya-klamāḥ mṛtyuś cānicchatāṁ nāsīd rāme rājany adhokṣaje

इंद्रियातीत भगवान राम के राज्य में मानसिक पीड़ा, रोग, बुढ़ापा, ग्लानि, दुःख, शोक, भय अथवा थकान नहीं थी; और जो मृत्यु नहीं चाहते थे, उनकी मृत्यु भी नहीं होती थी।

श्लोक 54 (bhagavata.9.10.54)

एकपत्नीव्रतधरो राजर्षिचरितः शुचिः । स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत् ॥ ५४ ॥

eka-patnī-vrata-dharo rājarṣi-caritaḥ śuciḥ sva-dharmaṁ gṛha-medhīyaṁ śikṣayan svayam ācarat

एक-पत्नी-व्रत का पालन करने वाले, पवित्र आचरण वाले राजर्षि राम ने गृहस्थ-धर्म का स्वयं आचरण करते हुए प्रजा को उसकी शिक्षा दी।

श्लोक 55 (bhagavata.9.10.55)

प्रेम्णानुवृत्त्या शीलेन प्रश्रयावनता सती । भिया ह्रिया च भावज्ञा भर्तुः सीताहरन्मनः ॥ ५५ ॥

premṇānuvṛttyā śīlena praśrayāvanatā satī bhiyā hriyā ca bhāva-jñā bhartuḥ sītāharan manaḥ

प्रेमपूर्वक अनुगमन करने वाली, शीलवती, विनयशील, सती सीता अपने पति के भाव को भलीभाँति समझते हुए, भय और लज्जा के साथ, अपने पति का मन पूर्णतः जीत लेती थीं।

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