नवम स्कन्ध · अध्याय 11
भगवान रामचंद्र का राज्य और लीला-संवरण
श्लोक 1 (bhagavata.9.11.1)
श्रीशुक उवाच भगवानात्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकैः । सर्वदेवमयं देवमीजेऽथाचार्यवान् मखैः ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca bhagavān ātmanātmānaṁ rāma uttama-kalpakaiḥ sarva-devamayaṁ devam īje ’thācāryavān makhaiḥ
श्रीशुकदेव जी ने कहा — तत्पश्चात भगवान राम ने आचार्य को नियुक्त कर उत्तम सामग्री से यज्ञों द्वारा स्वयं अपनी ही आराधना की, क्योंकि वे स्वयं ही समस्त देवताओं के स्वरूप हैं।
श्लोक 2 (bhagavata.9.11.2)
होत्रेऽददाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः । अध्वर्यवे प्रतीचीं वा उत्तरां सामगाय सः ॥ २ ॥
hotre ’dadād diśaṁ prācīṁ brahmaṇe dakṣiṇāṁ prabhuḥ adhvaryave pratīcīṁ vā uttarāṁ sāmagāya saḥ
प्रभु राम ने होता को पूर्व दिशा, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा, अध्वर्यु को पश्चिम दिशा तथा सामवेद के गायक उद्गाता को उत्तर दिशा प्रदान की।
श्लोक 3 (bhagavata.9.11.3)
आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा । मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः ॥ ३ ॥
ācāryāya dadau śeṣāṁ yāvatī bhūs tad-antarā manyamāna idaṁ kṛtsnaṁ brāhmaṇo ’rhati niḥspṛhaḥ
यह सोचकर कि निःस्पृह ब्राह्मण ही इस संपूर्ण पृथ्वी के अधिकारी हैं, उन्होंने शेष बची हुई मध्यवर्ती भूमि अपने आचार्य को दे दी।
श्लोक 4 (bhagavata.9.11.4)
इत्ययं तदलङ्कारवासोभ्यामवशेषितः । तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमङ्गल्यावशेषिता ॥ ४ ॥
ity ayaṁ tad-alaṅkāra- vāsobhyām avaśeṣitaḥ tathā rājñy api vaidehī saumaṅgalyāvaśeṣitā
इस प्रकार सब कुछ दान करने के पश्चात उनके पास केवल अपने आभूषण और वस्त्र ही शेष रहे; वैसे ही रानी वैदेही (सीता) के पास भी केवल सौभाग्य-चिह्न ही शेष रह गए।
श्लोक 5 (bhagavata.9.11.5)
ते तु ब्राह्मणदेवस्य वात्सल्यं वीक्ष्य संस्तुतम् । प्रीताः क्लिन्नधियस्तस्मै प्रत्यर्प्येदं बभाषिरे ॥ ५ ॥
te tu brāhmaṇa-devasya vātsalyaṁ vīkṣya saṁstutam prītāḥ klinna-dhiyas tasmai pratyarpyedaṁ babhāṣire
जिनके ब्राह्मणों के प्रति वात्सल्य की भूरि-भूरि प्रशंसा होती है, उस भगवान की यह करुणा देखकर वे ब्राह्मण द्रवित हृदय से प्रसन्न हो उठे और सब कुछ उन्हें लौटाते हुए यह बोले।
श्लोक 6 (bhagavata.9.11.6)
अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्वर । यन्नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा ॥ ६ ॥
aprattaṁ nas tvayā kiṁ nu bhagavan bhuvaneśvara yan no ’ntar-hṛdayaṁ viśya tamo haṁsi sva-rociṣā
"हे भगवन्, हे भुवनेश्वर! आपने हमें क्या नहीं दिया? आपने तो हमारे हृदय में प्रविष्ट होकर अपने ही तेज से अज्ञान का अंधकार दूर कर दिया है।"
श्लोक 7 (bhagavata.9.11.7)
नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे । उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताङ्घ्रये ॥ ७ ॥
namo brahmaṇya-devāya rāmāyākuṇṭha-medhase uttamaśloka-dhuryāya nyasta-daṇḍārpitāṅghraye
"ब्राह्मणों को अपना आराध्य देव मानने वाले, अक्षुण्ण बुद्धि वाले, यशस्वियों में अग्रगण्य, दण्ड त्याग चुके मुनियों द्वारा पूजित चरणों वाले भगवान राम को नमस्कार है।"
श्लोक 8 (bhagavata.9.11.8)
कदाचिल्लोकजिज्ञासुर्गूढो रात्र्यामलक्षितः । चरन्वाचोऽशृणोद् रामो भार्यामुद्दिश्य कस्यचित् ॥ ८ ॥
kadācil loka-jijñāsur gūḍho rātryām alakṣitaḥ caran vāco ’śṛṇod rāmo bhāryām uddiśya kasyacit
एक बार लोगों की राय जानने की इच्छा से राम रात्रि में अपना वेश बदलकर अज्ञात रूप में नगर में विचरण कर रहे थे, तभी उन्होंने एक पुरुष को अपनी पत्नी के विषय में यह कहते सुना।
श्लोक 9 (bhagavata.9.11.9)
नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टामसतीं परवेश्मगाम् । स्त्रैणो हि बिभृयात् सीतां रामो नाहं भजे पुनः ॥ ९ ॥
nāhaṁ bibharmi tvāṁ duṣṭām asatīṁ para-veśma-gām straiṇo hi bibhṛyāt sītāṁ rāmo nāhaṁ bhaje punaḥ
"मैं तुझे नहीं रखूँगा, हे दुष्टे, कुलटे, जो दूसरे के घर गई है। सीता जैसी पत्नी को तो स्त्री के वशीभूत राम जैसा पुरुष ही स्वीकार कर सकता है; मैं उनकी भाँति स्त्री के अधीन नहीं हूँ, अतः मैं तुझे पुनः स्वीकार नहीं करूँगा।"
श्लोक 10 (bhagavata.9.11.10)
इति लोकाद् बहुमुखाद् दुराराध्यादसंविदः । पत्या भीतेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्राचेतसाश्रमम् ॥ १० ॥
iti lokād bahu-mukhād durārādhyād asaṁvidaḥ patyā bhītena sā tyaktā prāptā prācetasāśramam
इस प्रकार बहुमुखी, दुराराध्य और अविवेकी लोकापवाद से भयभीत होकर पति ने सीता को त्याग दिया; तब वे प्राचेतस मुनि (वाल्मीकि) के आश्रम में पहुँचीं।
श्लोक 11 (bhagavata.9.11.11)
अन्तर्वत्न्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ । कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्चक्रे क्रिया मुनिः ॥ ११ ॥
antarvatny āgate kāle yamau sā suṣuve sutau kuśo lava iti khyātau tayoś cakre kriyā muniḥ
गर्भवती सीता ने समय आने पर जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया, जो कुश और लव के नाम से प्रसिद्ध हुए; मुनि वाल्मीकि ने उनके संस्कार संपन्न किए।
श्लोक 12 (bhagavata.9.11.12)
अङ्गदश्चित्रकेतुश्च लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ । तक्षः पुष्कल इत्यास्तां भरतस्य महीपते ॥ १२ ॥
aṅgadaś citraketuś ca lakṣmaṇasyātmajau smṛtau takṣaḥ puṣkala ity āstāṁ bharatasya mahīpate
हे राजन्, लक्ष्मण के पुत्र अंगद और चित्रकेतु कहे जाते हैं, और भरत के पुत्र तक्ष तथा पुष्कल हुए।
श्लोक 13 (bhagavata.9.11.13)
सुबाहुः श्रुतसेनश्च शत्रुघ्नस्य बभूवतुः । गन्धर्वान् कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम् ॥ १३ ॥
subāhuḥ śrutasenaś ca śatrughnasya babhūvatuḥ gandharvān koṭiśo jaghne bharato vijaye diśām
शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और श्रुतसेन हुए। दिग्विजय के समय भरत ने करोड़ों गंधर्वों का वध किया।
श्लोक 14 (bhagavata.9.11.14)
तदीयं धनमानीय सर्वं राज्ञे न्यवेदयत् । शत्रुघ्नश्च मधोः पुत्रं लवणं नाम राक्षसम् । हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम् ॥ १४ ॥
tadīyaṁ dhanam ānīya sarvaṁ rājñe nyavedayat śatrughnaś ca madhoḥ putraṁ lavaṇaṁ nāma rākṣasam hatvā madhuvane cakre mathurāṁ nāma vai purīm
उनका सारा धन लाकर उन्होंने राजा राम को अर्पित कर दिया। शत्रुघ्न ने मधु राक्षस के पुत्र लवण नामक राक्षस का वध कर मधुवन में मथुरा नामक नगरी बसाई।
श्लोक 15 (bhagavata.9.11.15)
मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता । ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥
munau nikṣipya tanayau sītā bhartrā vivāsitā dhyāyantī rāma-caraṇau vivaraṁ praviveśa ha
अपने दोनों पुत्रों को मुनि के पास छोड़कर, पति द्वारा त्याग दी गई सीता राम के चरणों का ध्यान करती हुई पृथ्वी के विवर में समा गईं।
श्लोक 16 (bhagavata.9.11.16)
तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः । स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान्नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥
tac chrutvā bhagavān rāmo rundhann api dhiyā śucaḥ smaraṁs tasyā guṇāṁs tāṁs tān nāśaknod roddhum īśvaraḥ
यह सुनकर भगवान राम, यद्यपि बुद्धि से शोक को रोकने का प्रयत्न करते रहे, तथापि सीता के उन-उन गुणों का स्मरण करते हुए, स्वयं ईश्वर होते हुए भी अपने शोक को न रोक सके।
श्लोक 17 (bhagavata.9.11.17)
स्त्रीपुंप्रसङ्ग एतादृक्सर्वत्र त्रासमावहः । अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः ॥ १७ ॥
strī-puṁ-prasaṅga etādṛk sarvatra trāsam-āvahaḥ apīśvarāṇāṁ kim uta grāmyasya gṛha-cetasaḥ
स्त्री-पुरुष का ऐसा संबंध सर्वत्र भय उत्पन्न करने वाला है — यह ब्रह्मा और शिव जैसे महान नियंताओं में भी विद्यमान है, तो फिर गृहासक्त साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या!
श्लोक 18 (bhagavata.9.11.18)
तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धार्यन्नजुहोत् प्रभुः । त्रयोदशाब्दसाहस्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥
tata ūrdhvaṁ brahmacaryaṁ dhāryann ajuhot prabhuḥ trayodaśābda-sāhasram agnihotram akhaṇḍitam
उसके पश्चात प्रभु राम ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तेरह हजार वर्षों तक अखंड अग्निहोत्र किया।
श्लोक 19 (bhagavata.9.11.19)
स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः । स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥
smaratāṁ hṛdi vinyasya viddhaṁ daṇḍaka-kaṇṭakaiḥ sva-pāda-pallavaṁ rāma ātma-jyotir agāt tataḥ
स्मरण करने वालों के हृदय में अपने उन कोमल चरणों को स्थापित कर, जो कभी दंडकारण्य के कांटों से बिंधे थे, राम तत्पश्चात अपने ही तेज (परमधाम) में लीन हो गए।
श्लोक 20 (bhagavata.9.11.20)
नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयात्त- लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः । रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥ २० ॥
nedaṁ yaśo raghupateḥ sura-yācñayātta- līlā-tanor adhika-sāmya-vimukta-dhāmnaḥ rakṣo-vadho jaladhi-bandhanam astra-pūgaiḥ kiṁ tasya śatru-hanane kapayaḥ sahāyāḥ
देवताओं की प्रार्थना पर लीलामय शरीर धारण करने वाले, जिनके समान अथवा जिनसे बढ़कर कोई नहीं है, उन रघुपति की यह ख्याति — बाणों से राक्षस-वध और समुद्र-बंधन — वास्तव में उनकी सम्पूर्ण महिमा नहीं है; क्योंकि शत्रु-वध के लिए उन्हें वानरों की सहायता की क्या आवश्यकता थी?
श्लोक 21 (bhagavata.9.11.21)
यस्यामलं नृपसदःसु यशोऽधुनापि गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम् । तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट- पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥ २१ ॥
yasyāmalaṁ nṛpa-sadaḥsu yaśo ’dhunāpi gāyanty agha-ghnam ṛṣayo dig-ibhendra-paṭṭam taṁ nākapāla-vasupāla-kirīṭa-juṣṭa- pādāmbujaṁ raghupatiṁ śaraṇaṁ prapadye
जिनकी निर्मल कीर्ति का, जो पाप का नाश करने वाली है, ऋषिगण आज भी राजसभाओं में उसी प्रकार गान करते हैं जैसे दिग्विजयी गजराज के पताके का गान होता है, और जिनके चरण-कमलों में स्वर्गपति और भूपाल अपने मुकुट झुकाते हैं, उन्हीं रघुपति की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 22 (bhagavata.9.11.22)
स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा । कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥ २२ ॥
sa yaiḥ spṛṣṭo ’bhidṛṣṭo vā saṁviṣṭo ’nugato ’pi vā kosalās te yayuḥ sthānaṁ yatra gacchanti yoginaḥ
जिन कोसलवासियों ने उन्हें स्पर्श किया, देखा, उनके साथ बैठे अथवा उनका अनुसरण किया, वे सभी उसी परमधाम को प्राप्त हुए जहाँ योगीजन जाते हैं।
श्लोक 23 (bhagavata.9.11.23)
पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् । आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥
puruṣo rāma-caritaṁ śravaṇair upadhārayan ānṛśaṁsya-paro rājan karma-bandhair vimucyate
हे राजन्, जो मनुष्य कानों से रामचरित्र को श्रवण करता है, वह निष्ठुरता से मुक्त होकर कर्म-बंधन से छूट जाता है।
श्लोक 24 (bhagavata.9.11.24)
श्रीराजोवाच कथं स भगवान् रामो भ्रातृन् वा स्वयमात्मनः । तस्मिन् वा तेऽन्ववर्तन्त प्रजाः पौराश्च ईश्वरे ॥ २४ ॥
śrī-rājovāca kathaṁ sa bhagavān rāmo bhrātṝn vā svayam ātmanaḥ tasmin vā te ’nvavartanta prajāḥ paurāś ca īśvare
राजा परीक्षित ने पूछा — भगवान राम स्वयं अपने भाइयों के साथ, जो उन्हीं के स्वरूप थे, कैसा व्यवहार करते थे? और वे भाई तथा नगरवासी उन ईश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते थे?
श्लोक 25 (bhagavata.9.11.25)
श्रीबादरायणिरुवाच अथादिशद् दिग्विजये भ्रातृंस्त्रिभुवनेश्वरः । आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैक्षत सानुगः ॥ २५ ॥
śrī-bādarāyaṇir uvāca athādiśad dig-vijaye bhrātṝṁs tri-bhuvaneśvaraḥ ātmānaṁ darśayan svānāṁ purīm aikṣata sānugaḥ
श्री बादरायणि (शुकदेव) ने कहा — तत्पश्चात त्रिभुवन के स्वामी राम ने अपने भाइयों को दिग्विजय के लिए भेजा, और स्वयं अपने अनुचरों सहित अपनी प्रजा को दर्शन देते हुए नगरी की देखभाल करते रहे।
श्लोक 26 (bhagavata.9.11.26)
आसिक्तमार्गां गन्धोदैः करिणां मदशीकरैः । स्वामिनं प्राप्तमालोक्य मत्तां वा सुतरामिव ॥ २६ ॥
āsikta-mārgāṁ gandhodaiḥ kariṇāṁ mada-śīkaraiḥ svāminaṁ prāptam ālokya mattāṁ vā sutarām iva
गजों की सूँड़ों से छिड़के गए सुगंधित जल और मद-कणों से सिंचित मार्गों वाली वह नगरी, दीर्घकाल बाद अपने स्वामी को लौटता देख मानो आनंद से मतवाली हो उठी।
श्लोक 27 (bhagavata.9.11.27)
प्रासादगोपुरसभाचैत्यदेवगृहादिषु । विन्यस्तहेमकलशैः पताकाभिश्च मण्डिताम् ॥ २७ ॥
prāsāda-gopura-sabhā- caitya-deva-gṛhādiṣu vinyasta-hema-kalaśaiḥ patākābhiś ca maṇḍitām
राजमहल, नगर-द्वार, सभाभवन, चैत्य और देवालय आदि सभी स्वर्ण-कलशों और पताकाओं से सुसज्जित थे।
श्लोक 28 (bhagavata.9.11.28)
पूगैः सवृन्तै रम्भाभिः पट्टिकाभिः सुवाससाम् । आदर्शैरंशुकैः स्रग्भिः कृतकौतुकतोरणाम् ॥ २८ ॥
pūgaiḥ savṛntai rambhābhiḥ paṭṭikābhiḥ suvāsasām ādarśair aṁśukaiḥ sragbhiḥ kṛta-kautuka-toraṇām
फल-फूलों सहित सुपारी और केले के वृक्षों, सुंदर वस्त्रों की पट्टिकाओं, दर्पणों, रेशमी वस्त्रों और मालाओं से मंगल-तोरण बनाए गए थे।
श्लोक 29 (bhagavata.9.11.29)
तमुपेयुस्तत्र तत्र पौरा अर्हणपाणयः । आशिषो युयुजुर्देव पाहीमां प्राक्त्वयोद्धृताम् ॥ २९ ॥
tam upeyus tatra tatra paurā arhaṇa-pāṇayaḥ āśiṣo yuyujur deva pāhīmāṁ prāk tvayoddhṛtām
वहाँ-वहाँ नगरवासी हाथों में पूजा-सामग्री लेकर उनके समीप आते और आशीर्वाद देते — "हे देव, जिस पृथ्वी का आपने पहले (वराह अवतार में) उद्धार किया था, अब उसकी रक्षा कीजिए।"
श्लोक 30 (bhagavata.9.11.30)
ततः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतं दिदृक्षयोत्सृष्टगृहाः स्त्रियो नराः । आरुह्य हर्म्याण्यरविन्दलोचन- मतृप्तनेत्राः कुसुमैरवाकिरन् ॥ ३० ॥
tataḥ prajā vīkṣya patiṁ cirāgataṁ didṛkṣayotsṛṣṭa-gṛhāḥ striyo narāḥ āruhya harmyāṇy aravinda-locanam atṛpta-netrāḥ kusumair avākiran
तत्पश्चात दीर्घकाल बाद अपने स्वामी को लौटता देखकर, उन्हें देखने की उत्कंठा से घर छोड़कर स्त्री-पुरुष महलों की छतों पर चढ़ गए, और कमल-नयन राम को देखते हुए भी तृप्त न होते नेत्रों से उन पर पुष्प बरसाने लगे।
श्लोक 31 (bhagavata.9.11.31)
अथ प्रविष्टः स्वगृहं जुष्टं स्वैः पूर्वराजभिः । अनन्ताखिलकोषाढ्यमनर्घ्योरुपरिच्छदम् ॥ ३१ ॥
atha praviṣṭaḥ sva-gṛhaṁ juṣṭaṁ svaiḥ pūrva-rājabhiḥ anantākhila-koṣāḍhyam anarghyoruparicchadam
तत्पश्चात वे अपने पूर्वजों द्वारा बसाए गए, अनंत कोषों से समृद्ध तथा अमूल्य साज-सज्जा से युक्त अपने महल में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 32 (bhagavata.9.11.32)
विद्रुमोदुम्बरद्वारैर्वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तिभिः । स्थलैर्मारकतैः स्वच्छैर्भ्राजत्स्फटिकभित्तिभिः ॥ ३२ ॥
vidrumodumbara-dvārair vaidūrya-stambha-paṅktibhiḥ sthalair mārakataiḥ svacchair bhrājat-sphaṭika-bhittibhiḥ
जिसके द्वार मूँगे के, स्तंभ-पंक्तियाँ वैदूर्यमणि की, आँगन स्वच्छ मरकतमणि के तथा दीवारें चमकते स्फटिक की थीं।
श्लोक 33 (bhagavata.9.11.33)
चित्रस्रग्भिः पट्टिकाभिर्वासोमणिगणांशुकैः । मुक्ताफलैश्चिदुल्लासैः कान्तकामोपपत्तिभिः ॥ ३३ ॥
citra-sragbhiḥ paṭṭikābhir vāso-maṇi-gaṇāṁśukaiḥ muktā-phalaiś cid-ullāsaiḥ kānta-kāmopapattibhiḥ
जो नाना रंगों की मालाओं, पट्टिकाओं, रत्नजड़ित रेशमी वस्त्रों तथा दैदीप्यमान मोतियों से युक्त था, और प्रेमी-जनों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली सामग्री से भरा था।
श्लोक 34 (bhagavata.9.11.34)
धूपदीपैः सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डनैः । स्त्रीपुम्भिः सुरसङ्काशैर्जुष्टं भूषणभूषणैः ॥ ३४ ॥
dhūpa-dīpaiḥ surabhibhir maṇḍitaṁ puṣpa-maṇḍanaiḥ strī-pumbhiḥ sura-saṅkāśair juṣṭaṁ bhūṣaṇa-bhūṣaṇaiḥ
जो सुगंधित धूप-दीप और पुष्पों की सज्जा से अलंकृत था तथा देवताओं के समान सुंदर स्त्री-पुरुषों से युक्त था, जिनके आभूषण भी उन्हीं से सुशोभित प्रतीत होते थे।
श्लोक 35 (bhagavata.9.11.35)
तस्मिन्स भगवान् रामः स्निग्धया प्रिययेष्टया । रेमे स्वारामधीराणामृषभः सीतया किल ॥ ३५ ॥
tasmin sa bhagavān rāmaḥ snigdhayā priyayeṣṭayā reme svārāma-dhīrāṇām ṛṣabhaḥ sītayā kila
उस महल में स्वारामी-धीर पुरुषों में श्रेष्ठ भगवान राम अपनी स्नेहमयी और प्रिय पत्नी सीता के साथ आनंदपूर्वक विहार करते रहे।
श्लोक 36 (bhagavata.9.11.36)
बुभुजे च यथाकालं कामान् धर्ममपीडयन् । वर्षपूगान् बहून् नृणामभिध्याताङ्घ्रिपल्लवः ॥ ३६ ॥
bubhuje ca yathā-kālaṁ kāmān dharmam apīḍayan varṣa-pūgān bahūn nṝṇām abhidhyātāṅghri-pallavaḥ
धर्म को पीड़ा पहुँचाए बिना, समयानुसार वे अनेक वर्षों तक भोग भोगते रहे — वे राम, जिनके कोमल चरणों का भक्तजन सदा ध्यान करते हैं।