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नवम स्कन्ध · अध्याय 7

राजा मान्धाता के वंशज

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (bhagavata.9.7.1)

श्रीशुक उवाच मान्धातुः पुत्रप्रवरो योऽम्बरीषः प्रकीर्तितः । पितामहेन प्रवृतो यौवनाश्वस्तु तत्सुतः । हारीतस्तस्य पुत्रोऽभून्मान्धातृप्रवरा इमे ॥ 7.1 ॥

śrī-śuka uvāca māndhātuḥ putra-pravaro yo ’mbarīṣaḥ prakīrtitaḥ pitāmahena pravṛto yauvanāśvas tu tat-sutaḥ hārītas tasya putro ’bhūn māndhātṛ-pravarā ime

शुकदेव जी ने कहा — मान्धाता के पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ अम्बरीष कहलाए, जिन्हें उनके पितामह युवनाश्व ने अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया था। उनके पुत्र यौवनाश्व हुए, और यौवनाश्व के पुत्र हारीत हुए — मान्धाता-वंश में अम्बरीष, यौवनाश्व और हारीत ये तीनों प्रमुख हुए।

श्लोक 2 (bhagavata.9.7.2)

नर्मदा भ्रातृभिर्दत्ता पुरुकुत्साय योरगैः । तया रसातलं नीतो भुजगेन्द्रप्रयुक्तया ॥ 7.2 ॥

narmadā bhrātṛbhir dattā purukutsāya yoragaiḥ tayā rasātalaṁ nīto bhujagendra-prayuktayā

नर्मदा के सर्प-भ्राताओं ने उसे पुरुकुत्स को अर्पित कर दिया। उसी नर्मदा द्वारा, नागराज वासुकि की प्रेरणा से, पुरुकुत्स को रसातल में ले जाया गया।

श्लोक 3 (bhagavata.9.7.3)

गन्धर्वानवधीत् तत्र वध्यान् वै विष्णुशक्तिधृक् । नागाल्लब्धवरः सर्पादभयं स्मरतामिदम् ॥ 7.3 ॥

gandharvān avadhīt tatra vadhyān vai viṣṇu-śakti-dhṛk nāgāl labdha-varaḥ sarpād abhayaṁ smaratām idam

वहाँ भगवान विष्णु की शक्ति से सम्पन्न होकर उन्होंने वध्य गन्धर्वों का संहार किया। नागों से उन्हें यह वरदान प्राप्त हुआ कि जो कोई भी उनकी इस कथा का स्मरण करेगा, वह सर्पों से निर्भय हो जाएगा।

श्लोक 4 (bhagavata.9.7.4)

त्रसद्दस्युः पौरुकुत्सो योऽनरण्यस्य देहकृत् । हर्यश्वस्तत्सुतस्तस्मात्प्रारुणोऽथ त्रिबन्धनः ॥ 7.4 ॥

trasaddasyuḥ paurukutso yo ’naraṇyasya deha-kṛt haryaśvas tat-sutas tasmāt prāruṇo ’tha tribandhanaḥ

पुरुकुत्स के पुत्र त्रसद्दस्यु हुए, जिनके पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य के पुत्र हर्यश्व, हर्यश्व के पुत्र प्रारुण, और प्रारुण के पुत्र त्रिबन्धन हुए।

श्लोक 5 (bhagavata.9.7.5)

तस्य सत्यव्रतः पुत्रस्त्रिशङ्कुरिति विश्रुतः । प्राप्तश्चाण्डालतां शापाद् गुरोः कौशिकतेजसा ॥ 7.5 ॥

tasya satyavrataḥ putrastriśaṅkuriti viśrutaḥ prāptaścāṇḍālatāṁ śāpād guroḥ kauśikatejasā

त्रिबन्धन के पुत्र सत्यव्रत हुए, जो त्रिशंकु नाम से विख्यात हैं। कौशिक (विश्वामित्र) के तेज के कारण, गुरु के शाप से चाण्डालत्व पाकर भी वे,

श्लोक 6 (bhagavata.9.7.6)

सशरीरो गतः स्वर्गमद्यापि दिवि दृश्यते । पातितोऽवाक् शिरा देवैस्तेनैव स्तम्भितो बलात् ॥ 7.6 ॥

saśarīro gataḥ svargamadyāpi divi dṛśyate pātito ’vāk śirā devaistenaiva stambhito balāt

अपने शरीर सहित स्वर्ग को गए और आज भी आकाश में दिखाई देते हैं — देवताओं द्वारा नीचे गिराए गए, सिर के बल उलटे, उन्हीं विश्वामित्र के बल से वहीं स्तम्भित होकर।

श्लोक 7 (bhagavata.9.7.7)

त्रैशङ्कवो हरिश्चन्द्रो विश्वामित्रवसिष्ठयोः । यन्निमित्तमभूद् युद्धं पक्षिणोर्बहुवार्षिकम् ॥ 7.7 ॥

traiśaṅkavo hariścandro viśvāmitra-vasiṣṭhayoḥ yan-nimittam abhūd yuddhaṁ pakṣiṇor bahu-vārṣikam

त्रिशंकु के पुत्र हरिश्चन्द्र हुए, जिनके ही निमित्त विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच पक्षी-रूप धारण कर वर्षों तक चलने वाला युद्ध हुआ।

श्लोक 8 (bhagavata.9.7.8)

सोऽनपत्यो विषण्णात्मा नारदस्योपदेशतः । वरुणं शरणं यातः पुत्रो मे जायतां प्रभो ॥ 7.8 ॥

so ’napatyo viṣaṇṇātmā nāradasyopadeśataḥ varuṇaṁ śaraṇaṁ yātaḥ putro me jāyatāṁ prabho

वे सन्तानहीन होने से अत्यन्त दुःखी थे। नारद के उपदेश से उन्होंने वरुण देव की शरण ली और कहा — "हे प्रभो! मुझे एक पुत्र प्रदान कीजिए।"

श्लोक 9 (bhagavata.9.7.9)

यदि वीरो महाराज तेनैव त्वां यजे इति । तथेति वरुणेनास्य पुत्रो जातस्तु रोहितः ॥ 7.9 ॥

yadi vīro mahārāja tenaiva tvāṁ yaje iti tatheti varuṇenāsya putro jātas tu rohitaḥ

हे महाराज! "यदि मुझे पुत्र प्राप्त हो, तो मैं उसी से आपका यज्ञ करूँगा" — ऐसा कहने पर वरुण ने "तथास्तु" कहा, और उसी वरदान से हरिश्चन्द्र को रोहित नामक पुत्र प्राप्त हुआ।

श्लोक 10 (bhagavata.9.7.10)

जातः सुतो ह्यनेनाङ्ग मां यजस्वेति सोऽब्रवीत् । यदा पशुर्निर्दशः स्यादथ मेध्यो भवेदिति ॥ 7.10 ॥

jātaḥ suto hy anenāṅga māṁ yajasveti so ’bravīt yadā paśur nirdaśaḥ syād atha medhyo bhaved iti

पुत्र जन्म लेने पर वरुण ने कहा — "अब मेरे लिए यज्ञ करो।" हरिश्चन्द्र ने उत्तर दिया — "जब पशु दस दिन का हो जाए, तभी वह यज्ञ के योग्य होता है।"

श्लोक 11 (bhagavata.9.7.11)

निर्दशे च स आगत्य यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत् । दन्ताः पशोर्यज्जायेरन्नथ मेध्यो भवेदिति ॥ 7.11 ॥

nirdaśe ca sa āgatya yajasvety āha so ’bravīt dantāḥ paśor yaj jāyerann atha medhyo bhaved iti

दस दिन बीतने पर वरुण ने आकर कहा — "अब यज्ञ करो।" हरिश्चन्द्र बोले — "जब पशु के दाँत निकल आएँ, तभी वह यज्ञ योग्य होगा।"

श्लोक 12 (bhagavata.9.7.12)

दन्ता जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत् । यदा पतन्त्यस्य दन्ता अथ मेध्यो भवेदिति ॥ 7.12 ॥

dantā jātā yajasveti sa pratyāhātha so ’bravīt yadā patanty asya dantā atha medhyo bhaved iti

दाँत निकलने पर वरुण ने आकर कहा — "अब यज्ञ करो।" उसने उत्तर दिया — "जब इसके दाँत गिर जाएँगे, तभी यह यज्ञ योग्य होगा।"

श्लोक 13 (bhagavata.9.7.13)

पशोर्निपतिता दन्ता यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत् । यदा पशोः पुनर्दन्ता जायन्तेऽथ पशुः शुचिः ॥ 7.13 ॥

paśor nipatitā dantā yajasvety āha so ’bravīt yadā paśoḥ punar dantā jāyante ’tha paśuḥ śuciḥ

दाँत गिरने पर वरुण ने आकर कहा — "अब यज्ञ करो।" उसने कहा — "जब पशु के दाँत पुनः उग आएँगे, तभी वह शुद्ध होगा।"

श्लोक 14 (bhagavata.9.7.14)

पुनर्जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत् । सान्नाहिको यदा राजन् राजन्योऽथ पशुः शुचिः ॥ 7.14 ॥

punar jātā yajasveti sa pratyāhātha so ’bravīt sānnāhiko yadā rājan rājanyo ’tha paśuḥ śuciḥ

दाँत पुनः उग आने पर वरुण ने कहा — "अब यज्ञ करो।" उसने कहा — "हे राजन्! जब यह पशु सन्नद्ध क्षत्रिय होकर शत्रु से युद्ध करने योग्य हो जाएगा, तभी यह शुद्ध होगा।"

श्लोक 15 (bhagavata.9.7.15)

इति पुत्रानुरागेण स्नेहयन्त्रितचेतसा । कालं वञ्चयता तं तमुक्तो देवस्तमैक्षत ॥ 7.15 ॥

iti putrānurāgeṇa sneha-yantrita-cetasā kālaṁ vañcayatā taṁ tam ukto devas tam aikṣata

इस प्रकार पुत्र-स्नेह से बँधे हुए मन के कारण, बारम्बार समय टालते हुए हरिश्चन्द्र यह सब कहते रहे, और वरुण देव प्रतीक्षा करते रहे।

श्लोक 16 (bhagavata.9.7.16)

रोहितस्तदभिज्ञाय पितुः कर्म चिकीर्षितम् । प्राणप्रेप्सुर्धनुष्पाणिररण्यं प्रत्यपद्यत ॥ 7.16 ॥

rohitas tad abhijñāya pituḥ karma cikīrṣitam prāṇa-prepsur dhanuṣ-pāṇir araṇyaṁ pratyapadyata

रोहित यह जानकर कि उसके पिता उसे ही यज्ञ में अर्पित करना चाहते हैं, अपने प्राणों की रक्षा हेतु धनुष हाथ में लिए वन की ओर चला गया।

श्लोक 17 (bhagavata.9.7.17)

पितरं वरुणग्रस्तं श्रुत्वा जातमहोदरम् । रोहितो ग्राममेयाय तमिन्द्रः प्रत्यषेधत ॥ 7.17 ॥

pitaraṁ varuṇa-grastaṁ śrutvā jāta-mahodaram rohito grāmam eyāya tam indraḥ pratyaṣedhata

जब उसने सुना कि उसके पिता वरुण द्वारा दिए गए जलोदर रोग से ग्रस्त हो गए हैं, तो वह नगर लौटने ही वाला था कि इन्द्र ने उसे रोक दिया।

श्लोक 18 (bhagavata.9.7.18)

भूमेः पर्यटनं पुण्यं तीर्थक्षेत्रनिषेवणैः । रोहितायादिशच्छक्रः सोऽप्यरण्येऽवसत् समाम् ॥ 7.18 ॥

bhūmeḥ paryaṭanaṁ puṇyaṁ tīrtha-kṣetra-niṣevaṇaiḥ rohitāyādiśac chakraḥ so ’py araṇye ’vasat samām

इन्द्र ने रोहित को तीर्थों और पुण्य-क्षेत्रों में पर्यटन करने की सलाह दी। उसकी बात मानकर वह एक वर्ष तक वन में ही रहा।

श्लोक 19 (bhagavata.9.7.19)

एवं द्वितीये तृतीये चतुर्थे पञ्चमे तथा । अभ्येत्याभ्येत्य स्थविरो विप्रो भूत्वाह वृत्रहा ॥ 7.19 ॥

evaṁ dvitīye tṛtīye caturthe pañcame tathā abhyetyābhyetya sthaviro vipro bhūtvāha vṛtra-hā

इसी प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें वर्ष भी, जब-जब रोहित लौटना चाहता, वृत्रहन्ता इन्द्र वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर आते और उसे रोक देते।

श्लोक 20 (bhagavata.9.7.20)

षष्ठं संवत्सरं तत्र चरित्वा रोहितः पुरीम् । उपव्रजन्नजीगर्तादक्रीणान्मध्यमं सुतम् । शुनःशेफं पशुं पित्रे प्रदाय समवन्दत ॥ 7.20 ॥

ṣaṣṭhaṁ saṁvatsaraṁ tatra caritvā rohitaḥ purīm upavrajann ajīgartād akrīṇān madhyamaṁ sutam śunaḥśephaṁ paśuṁ pitre pradāya samavandata

छठे वर्ष तक वहाँ भ्रमण करने के बाद रोहित अपनी नगरी लौट आया। मार्ग में उसने अजीगर्त के दूसरे पुत्र शुनःशेफ को मोल ले लिया, और उसे यज्ञ-पशु के रूप में अपने पिता को अर्पित कर उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 21 (bhagavata.9.7.21)

ततः पुरुषमेधेन हरिश्चन्द्रो महायशाः । मुक्तोदरोऽयजद् देवान् वरुणादीन् महत्कथः ॥ 7.21 ॥

tataḥ puruṣa-medhena hariścandro mahā-yaśāḥ muktodaro ’yajad devān varuṇādīn mahat-kathaḥ

तत्पश्चात् महायशस्वी हरिश्चन्द्र ने पुरुषमेध यज्ञ द्वारा जलोदर से मुक्त होकर वरुण आदि देवताओं की आराधना की।

श्लोक 22 (bhagavata.9.7.22)

विश्वामित्रोऽभवत् तस्मिन् होता चाध्वर्युरात्मवान् । जमदग्निरभूद् ब्रह्मा वसिष्ठोऽयास्यः सामगः ॥ 7.22 ॥

viśvāmitro ’bhavat tasmin hotā cādhvaryur ātmavān jamadagnir abhūd brahmā vasiṣṭho ’yāsyaḥ sāma-gaḥ

उस यज्ञ में विश्वामित्र होता बने, आत्मज्ञानी जमदग्नि अध्वर्यु बने, वसिष्ठ ब्रह्मा बने, और अयास्य साम-गान करने वाले उद्गाता बने।

श्लोक 23 (bhagavata.9.7.23)

तस्मै तुष्टो ददाविन्द्रः शातकौम्भमयं रथम् । शुनःशेफस्य माहात्म्यमुपरिष्टात् प्रचक्ष्यते ॥ 7.23 ॥

tasmai tuṣṭo dadāv indraḥ śātakaumbhamayaṁ ratham śunaḥśephasya māhātmyam upariṣṭāt pracakṣyate

इससे प्रसन्न होकर इन्द्र ने उन्हें एक स्वर्णमय रथ प्रदान किया। शुनःशेफ की महिमा का वर्णन आगे विश्वामित्र के पुत्रों के प्रसंग में किया जाएगा।

श्लोक 24 (bhagavata.9.7.24)

सत्यं सारं धृतिं दृष्ट्वा सभार्यस्य च भूपतेः । विश्वामित्रो भृशं प्रीतो ददावविहतां गतिम् ॥ 7.24 ॥

satyaṁ sāraṁ dhṛtiṁ dṛṣṭvā sabhāryasya ca bhūpateḥ viśvāmitro bhṛśaṁ prīto dadāv avihatāṁ gatim

राजा हरिश्चन्द्र और उनकी पत्नी की सत्यनिष्ठा, धैर्य और सार-ग्राहिता देखकर विश्वामित्र अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें अविनाशी ज्ञान प्रदान किया।

श्लोक 25 (bhagavata.9.7.25)

मनः पृथिव्यां तामद्भिस्तेजसापोऽनिलेन तत् । खे वायुं धारयंस्तच्च भूतादौ तं महात्मनि । तस्मिञ्ज्ञानकलां ध्यात्वा तयाज्ञानं विनिर्दहन् ॥ 7.25 ॥

manaḥ pṛthivyāṁ tāmadbhistejasāpo ’nilena tat khe vāyuṁ dhārayaṁstacca bhūtādau taṁ mahātmani tasmiñjñānakalāṁ dhyātvā tayājñānaṁ vinirdahan

उन्होंने अपने मन को पृथ्वी में, पृथ्वी को जल में, जल को तेज में, तेज को वायु में, वायु को आकाश में लीन करते हुए, आकाश को महत्तत्व में स्थापित कर, उसी महत्तत्व में स्थित परमात्मा का ध्यान करते हुए अज्ञान को भस्म कर दिया।

श्लोक 26 (bhagavata.9.7.26)

हित्वा तां स्वेन भावेन निर्वाणसुखसंविदा । अनिर्देश्याप्रतर्क्येण तस्थौ विध्वस्तबन्धनः ॥ 7.26 ॥

hitvā tāṁ svena bhāvena nirvāṇasukhasaṁvidā anirdeśyāpratarkyeṇa tasthau vidhvastabandhanaḥ

इस प्रकार उसे भी अपने ही स्वरूप में त्यागकर, निर्वाण-सुख की उस अनुभूति में, जो अवर्णनीय और तर्कातीत है, वे समस्त बन्धनों से मुक्त होकर स्थित हो गए।

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