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दशम स्कन्ध · अध्याय 2

विंध्याचल की कथा

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (devibhagavatam.10.2.1)

श्रीदेव्युवाच । भूमिपाल महाबाहो सर्वमेतद्भविष्यति । यत्त्वया प्रार्थितं तत्ते ददामि मनुजाधिप ॥

śrīdevyuvāca bhūmipāla mahābāho sarvametadbhaviṣyati yattvayā prārthitaṁ tatte dadāmi manujādhipa

श्री देवी ने कहा — हे पृथ्वीपाल, महाबाहो! यह सब वैसा ही होगा। हे मनुजाधिप! तुमने जो कुछ प्रार्थना की, वह मैं तुम्हें देती हूँ।

श्लोक 2 (devibhagavatam.10.2.2)

अहं प्रसन्ना दैत्येन्द्रनाशनामोघविक्रमा । वाग्भवस्य जपेनैव तपसा ते सुनिश्चितम् ॥

ahaṁ prasannā daityendranāśanāmoghavikramā vāgbhavasya japenaiva tapasā te suniścitam

मैं प्रसन्न हूँ — दैत्येन्द्र का नाश करने वाली, अमोघ पराक्रम वाली मैं — तुम्हारे वाग्भव-मंत्र के जप और तप से यह अब सुनिश्चित है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.10.2.3)

राज्यं निष्कण्टकं तेऽस्तु पुत्रा वंशकरा अपि । मयि भक्तिर्दृढा वत्स मोक्षान्ते सत्पदे भवेत् ॥

rājyaṁ niṣkaṇṭakaṁ te'stu putrā vaṁśakarā api mayi bhaktirdṛḍhā vatsa mokṣānte satpade bhavet

तुम्हारा राज्य निष्कंटक हो, तुम्हारे पुत्र वंश चलाने वाले हों। हे वत्स! मुझमें दृढ़ भक्ति बनी रहे, और अंत में मोक्ष के सत्पद को प्राप्त हो।

श्लोक 4 (devibhagavatam.10.2.4)

एवं वरान्महादेवी तस्मै दत्त्वा महात्मने । पश्यतस्तु मनोरेव जगाम विन्ध्यपर्वतम् ॥

evaṁ varānmahādevī tasmai dattvā mahātmane paśyatastu manoreva jagāma vindhyaparvatam

इस प्रकार उस महात्मा को वर देकर, मनु के देखते-देखते ही महादेवी विंध्य पर्वत की ओर चली गईं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.10.2.5)

योऽसौ विन्ध्याचलो रुद्धः कुम्भोद्भवमहर्षिणा । भानुमार्गावरोधार्थं प्रवृत्तो गगनं स्पृशन् ॥

yo'sau vindhyācalo ruddhaḥ kumbhodbhavamaharṣiṇā bhānumārgāvarodhārthaṁ pravṛtto gaganaṁ spṛśan

वही विंध्याचल, जिसे कुम्भोद्भव महर्षि (अगस्त्य) ने रोका था, जब वह सूर्य के मार्ग को रोकने के लिए आकाश को छूता हुआ बढ़ रहा था —

श्लोक 6 (devibhagavatam.10.2.6)

सा विन्ध्यवासिनी विष्णोरनुजा वरदेश्वरी । बभूव पूज्या लोकानां सर्वेषां मुनिसत्तम ॥

sā vindhyavāsinī viṣṇoranujā varadeśvarī babhūva pūjyā lokānāṁ sarveṣāṁ munisattama

— वही विंध्यवासिनी, विष्णु की अनुजा, वरदेश्वरी देवी, हे मुनिश्रेष्ठ! सब लोकों के लिए पूज्य हो गईं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.10.2.7)

ऋषय ऊचुः । कोऽसौ विन्ध्याचलः सूत किमर्थं गगनं स्पृशन् । भानुमार्गावरोधं च किमर्थं कृतवानसौ ॥

ṛṣaya ūcuḥ ko'sau vindhyācalaḥ sūta kimarthaṁ gaganaṁ spṛśan bhānumārgāvarodhaṁ ca kimarthaṁ kṛtavānasau

ऋषियों ने कहा — हे सूत! यह विंध्याचल कौन है, और आकाश को छूने का प्रयास किसलिए किया? और सूर्य के मार्ग को रोकने का कार्य किसलिए किया?

श्लोक 8 (devibhagavatam.10.2.8)

कथं च मैत्रावरुणिः पर्वतं तं महोन्नतम् । प्रकृतिस्थं चकारेति सर्वं विस्तरतो वद ॥

kathaṁ ca maitrāvaruṇiḥ parvataṁ taṁ mahonnatam prakṛtisthaṁ cakāreti sarvaṁ vistarato vada

और मित्रावरुण-पुत्र (अगस्त्य) ने उस अत्यंत ऊँचे पर्वत को कैसे अपनी प्रकृति में स्थिर किया — यह सब विस्तार से बताइए।

श्लोक 9 (devibhagavatam.10.2.9)

न हि तृप्यामहे साधो त्वदास्यगलितामृतम् । देव्याश्चरित्ररूपाख्यं पीत्वा तृष्णा प्रवर्धते ॥

na hi tṛpyāmahe sādho tvadāsyagalitāmṛtam devyāścaritrarūpākhyaṁ pītvā tṛṣṇā pravardhate

हे साधो! आपके मुख से झरते अमृत, अर्थात् देवी के चरित्र-रूपी कथा को पीकर भी हम तृप्त नहीं होते — हमारी तृष्णा तो और बढ़ती जाती है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.10.2.10)

सूत उवाच । आसीद्विन्ध्याचलो नाम मान्यः सर्वधराभृताम् । महावनसमूहाढ्यो महापादपसंवृतः ॥

sūta uvāca āsīdvindhyācalo nāma mānyaḥ sarvadharābhṛtām mahāvanasamūhāḍhyo mahāpādapasaṁvṛtaḥ

सूत ने कहा — विंध्याचल नामक एक पर्वत था, जो पृथ्वी के सब पर्वतों में मान्य था, महान वनों से समृद्ध और विशाल वृक्षों से आच्छादित।

श्लोक 11 (devibhagavatam.10.2.11)

सुपुष्पितैरनेकैश्च लतागुल्मैस्तु संवृतः । मृगा वराहा महिषा व्याघ्राः शार्दूलका अपि ॥

supuṣpitairanekaiśca latāgulmaistu saṁvṛtaḥ mṛgā varāhā mahiṣā vyāghrāḥ śārdūlakā api

वह अनेक सुपुष्पित लताओं और झाड़ियों से घिरा था। मृग, वराह, भैंसे, बाघ और चीते —

श्लोक 12 (devibhagavatam.10.2.12)

वानराः शशका ऋक्षाः शृगालाश्च समन्ततः । विचरन्ति सदा हृष्टा पुष्टा एव महोद्यमाः ॥

vānarāḥ śaśakā ṛkṣāḥ śṛgālāśca samantataḥ vicaranti sadā hṛṣṭā puṣṭā eva mahodyamāḥ

— बंदर, खरगोश, भालू और सियार — ये सब सर्वत्र सदा प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट और महान उद्यमी होकर विचरण करते थे।

श्लोक 13 (devibhagavatam.10.2.13)

नदीनदजलाक्रान्तो देवगन्धर्वकिन्नरैः । अप्सरोभिः किम्पुरुषैः सर्वकामफलद्रुमैः ॥

nadīnadajalākrānto devagandharvakinnaraiḥ apsarobhiḥ kimpuruṣaiḥ sarvakāmaphaladrumaiḥ

वह नदी-नदों के जल से व्याप्त था, तथा देव, गंधर्व, किन्नर, अप्सराओं, किंपुरुषों और सभी कामनाओं को फल देने वाले वृक्षों से युक्त था।

श्लोक 14 (devibhagavatam.10.2.14)

एतादृशे विन्ध्यनगे कदाचित्पर्यटन् महीम् । देवर्षिः परमप्रीतो जगाम स्वेच्छया मुनिः ॥

etādṛśe vindhyanage kadācitparyaṭan mahīm devarṣiḥ paramaprīto jagāma svecchayā muniḥ

ऐसे ही विंध्य पर्वत पर एक बार पृथ्वी में विचरण करते हुए देवर्षि नारद मुनि अत्यंत प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से पहुँचे।

श्लोक 15 (devibhagavatam.10.2.15)

तं दृष्ट्वा स नगो मङ्क्षु तूर्णमुत्थाय सम्भ्रमात् । पाद्यमर्घ्यं तथा दत्त्वा वरासनमथार्पयत् ॥

taṁ dṛṣṭvā sa nago maṅkṣu tūrṇamutthāya sambhramāt pādyamarghyaṁ tathā dattvā varāsanamathārpayat

उन्हें देखकर वह पर्वत तुरंत घबराकर उठ खड़ा हुआ, और पाद्य-अर्घ्य देकर उत्तम आसन अर्पित किया।

श्लोक 16 (devibhagavatam.10.2.16)

सुखोपविष्टं देवर्षिं प्रसन्नं नग ऊचिवान् । विन्ध्य उवाच । देवर्षे कथ्यतां जात आगमः कुत उत्तमः ॥

sukhopaviṣṭaṁ devarṣiṁ prasannaṁ naga ūcivān vindhya uvāca devarṣe kathyatāṁ jāta āgamaḥ kuta uttamaḥ

सुखपूर्वक बैठे प्रसन्न देवर्षि से पर्वत ने कहा। विंध्य ने कहा — हे देवर्षे! बताइए, यह उत्तम आगमन किस कारण हुआ?

श्लोक 17 (devibhagavatam.10.2.17)

तवागमनतो जातमनर्घ्यं मम मन्दिरम् । तव चङ्क्रमणं देवाभयार्थं हि यथा रवेः ॥

tavāgamanato jātamanarghyaṁ mama mandiram tava caṅkramaṇaṁ devābhayārthaṁ hi yathā raveḥ

आपके आगमन से मेरा यह भवन अमूल्य हो गया। हे देव! आपका विचरण तो सूर्य के समान भय दूर करने के लिए ही होता है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.10.2.18)

अपूर्वं यन्मनोवृत्तं तद् ब्रूहि मम नारद । नारद उवाच । ममागमनमिन्द्रारे जातं स्वर्णगिरेरथ ॥

apūrvaṁ yanmanovṛttaṁ tad brūhi mama nārada nārada uvāca mamāgamanamindrāre jātaṁ svarṇagireratha

हे नारद! जो भी अपूर्व बात आपके मन में है, वह मुझे बताइए। नारद ने कहा — हे इन्द्र के शत्रु (पर्वतश्रेष्ठ)! मेरा यह आगमन स्वर्णगिरि (मेरु) से हुआ है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.10.2.19)

तत्र दृष्टा मया लोकाः शक्राग्नियमपाशिनाम् । सर्वेषां लोकपालानां भवनानि समन्ततः ॥

tatra dṛṣṭā mayā lokāḥ śakrāgniyamapāśinām sarveṣāṁ lokapālānāṁ bhavanāni samantataḥ

वहाँ मैंने शक्र, अग्नि, यम और पाशधारी वरुण के तथा समस्त लोकपालों के भवन सब ओर देखे।

श्लोक 20 (devibhagavatam.10.2.20)

मया दृष्टानि विन्ध्याग नानाभोगप्रदानि च । इति चोक्त्वा ब्रह्मयोनिः पुनरुच्छ्वासमाविशत् ॥

mayā dṛṣṭāni vindhyāga nānābhogapradāni ca iti coktvā brahmayoniḥ punarucchvāsamāviśat

हे विंध्य-पुत्र! मैंने उनके अनेक भोग देने वाले स्थान देखे — ऐसा कहकर ब्रह्मयोनि नारद फिर से दीर्घ श्वास लेने लगे।

श्लोक 21 (devibhagavatam.10.2.21)

उच्छ्वसन्तं मुनिं दृष्ट्वा पुनः पप्रच्छ शैलराट् । उच्छ्वासकारणं किं तद् ब्रूहि देवऋषे मम ॥

ucchvasantaṁ muniṁ dṛṣṭvā punaḥ papraccha śailarāṭ ucchvāsakāraṇaṁ kiṁ tad brūhi devaṛṣe mama

मुनि को श्वास लेते देखकर पर्वतराज ने फिर पूछा — हे देवर्षे! उस श्वास का कारण क्या है, मुझे बताइए।

श्लोक 22 (devibhagavatam.10.2.22)

इत्याकर्ण्य नगस्योक्तं देवर्षिरमितद्युतिः । अब्रवीच्छ्रूयतां वत्स ममोच्छ्वासस्य कारणम् ॥

ityākarṇya nagasyoktaṁ devarṣiramitadyutiḥ abravīcchrūyatāṁ vatsa mamocchvāsasya kāraṇam

पर्वत का यह वचन सुनकर अमित तेजस्वी देवर्षि ने कहा — हे वत्स! सुनो, मेरे श्वास का कारण।

श्लोक 23 (devibhagavatam.10.2.23)

गौरीगुरुस्तु हिमवाञ्छिवस्य श्वशुरः किल । सम्बन्धित्वात्पशुपतेः पूज्य आसीत्क्षमाभृताम् ॥

gaurīgurustu himavāñchivasya śvaśuraḥ kila sambandhitvātpaśupateḥ pūjya āsītkṣamābhṛtām

गौरी के पिता हिमवान, शिव के श्वसुर होने के कारण, पशुपति से संबंध रखने के कारण पर्वतों में पूज्य हुए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.10.2.24)

एवमेव च कैलासः शिवस्यावसथः प्रभुः । पूज्यः पृथ्वीभृतां जातो लोके पापौघदारणः ॥

evameva ca kailāsaḥ śivasyāvasathaḥ prabhuḥ pūjyaḥ pṛthvībhṛtāṁ jāto loke pāpaughadāraṇaḥ

इसी प्रकार कैलास भी, शिव का निवास-स्थान और स्वामी, पृथ्वी के पर्वतों में पूज्य हुआ, लोक में पापसमूह को विदीर्ण करने वाला माना गया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.10.2.25)

निषधः पर्वतो नीलो गन्धमादन एव च । पूज्याः स्वस्थानमासाद्य सर्व एव क्षमाभृतः ॥

niṣadhaḥ parvato nīlo gandhamādana eva ca pūjyāḥ svasthānamāsādya sarva eva kṣamābhṛtaḥ

निषध, नील और गंधमादन पर्वत भी अपने-अपने स्थान को प्राप्त कर सभी पूज्य हो गए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.10.2.26)

यं पर्येति च विश्वात्मा सहस्रकिरणः स्वराट् । सग्रहर्क्षगणोपेतः सोऽयं कनकपर्वतः ॥

yaṁ paryeti ca viśvātmā sahasrakiraṇaḥ svarāṭ sagraharkṣagaṇopetaḥ so'yaṁ kanakaparvataḥ

और जिसकी परिक्रमा विश्वात्मा सहस्रकिरण सूर्य, ग्रहों और नक्षत्रों के समूह सहित करता है, वही यह स्वर्ण पर्वत मेरु है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.10.2.27)

आत्मानं मनुते श्रेष्ठं वरिष्ठं च धराभृताम् । सर्वेषामहमेवाग्र्यो नास्ति लोकेषु मत्समः ॥

ātmānaṁ manute śreṣṭhaṁ variṣṭhaṁ ca dharābhṛtām sarveṣāmahamevāgryo nāsti lokeṣu matsamaḥ

वह अपने को पर्वतों में श्रेष्ठ और सबसे बड़ा मानता है — 'मैं ही सबमें अग्रणी हूँ, लोकों में मेरे समान कोई नहीं है।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.10.2.28)

एवम्मानाभिमानं तं स्मृत्वोच्छ्वासो मयोज्झितः । अस्तु नैतावता कृत्यं तपोबलवतां नग । प्रसङ्गतो मयोक्तं ते गमिष्यामि निजं गृहम् ॥

evammānābhimānaṁ taṁ smṛtvocchvāso mayojjhitaḥ astu naitāvatā kṛtyaṁ tapobalavatāṁ naga prasaṅgato mayoktaṁ te gamiṣyāmi nijaṁ gṛham

मेरु के इस मान और अभिमान का स्मरण कर मैंने वह श्वास छोड़ी। किन्तु हे पर्वत! तपोबलवानों के लिए इससे कोई चिंता नहीं है। यह मैंने प्रसंगवश तुमसे कह दिया, अब मैं अपने घर जाऊँगा।

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