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एकादश स्कन्ध · अध्याय 24

प्रातश्चिन्तन-सदाचारनिरूपण

अध्याय 23अध्याय-सूची

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.24.1)

नारद उवाच । नारायण महाभाग गायत्र्यास्तु समासतः । शान्त्यादिकान्प्रयोगांस्तु वदस्व करुणानिधे ॥

nārada uvāca nārāyaṇa mahābhāga gāyatryāstu samāsataḥ śāntyādikānprayogāṁstu vadasva karuṇānidhe

नारद ने कहा — हे नारायण, महाभाग! हे करुणानिधे! संक्षेप में गायत्री के शान्ति आदि प्रयोगों को बताइए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.24.2)

श्रीनारायण उवाच । अतिगुह्यमिदं पृष्टं त्वया ब्रह्यतनूद्भव । न कस्यापि च वक्तव्यं दुष्टाय पिशुनाय च ॥

śrīnārāyaṇa uvāca atiguhyamidaṁ pṛṣṭaṁ tvayā brahyatanūdbhava na kasyāpi ca vaktavyaṁ duṣṭāya piśunāya ca

श्री नारायण ने कहा — हे ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न! तुमने यह अत्यंत गोपनीय बात पूछी है; यह किसी दुष्ट अथवा चुगलखोर को कभी नहीं बताना चाहिए।

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.24.3)

अथ शान्तिः पयोऽक्ताभिः समिद्भिर्जुहुयाद् द्विजः । शमीसमिद्भिः शाम्यन्ति भूतरोगग्रहादयः ॥

atha śāntiḥ payo'ktābhiḥ samidbhirjuhuyād dvijaḥ śamīsamidbhiḥ śāmyanti bhūtarogagrahādayaḥ

अब शान्ति के लिए द्विज को दूध से सने समिधाओं की आहुति देनी चाहिए; शमी की समिधाओं से भूत, रोग, ग्रह आदि की बाधाएँ शांत होती हैं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.24.4)

आर्द्राभिः क्षीरवृक्षस्य समिद्भिर्जुहुयाद् द्विजः । जुहुयाच्छकलैर्वापि भूतरोगादिशान्तये ॥

ārdrābhiḥ kṣīravṛkṣasya samidbhirjuhuyād dvijaḥ juhuyācchakalairvāpi bhūtarogādiśāntaye

द्विज को दूधवाले वृक्ष की हरी समिधाओं से आहुति देनी चाहिए; अथवा भूत-रोग आदि की शान्ति के लिए लकड़ी के टुकड़ों से भी हवन कर सकता है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.24.5)

जलेन तर्पयेत्सूर्यं पाणिभ्यां शान्तिमाप्नुयात् । जानुदघ्ने जले जप्त्वा सर्वान्दोषाञ्छमं नयेत् ॥

jalena tarpayetsūryaṁ pāṇibhyāṁ śāntimāpnuyāt jānudaghne jale japtvā sarvāndoṣāñchamaṁ nayet

जल से सूर्य को तर्पण देना चाहिए, हाथों से शान्ति प्राप्त होती है। घुटनों तक जल में खड़े होकर जप करने से समस्त दोष शांत हो जाते हैं;

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.24.6)

कण्ठदघ्ने जले जप्त्वा मुच्येत्प्राणान्तिकाद्भयात् । सर्वेभ्यः शान्तिकर्मभ्यो निमज्याप्सु जपः स्मृतः ॥

kaṇṭhadaghne jale japtvā mucyetprāṇāntikādbhayāt sarvebhyaḥ śāntikarmabhyo nimajyāpsu japaḥ smṛtaḥ

कंठ तक जल में खड़े होकर जप करने से मृत्यु के भय से भी मुक्ति मिलती है। समस्त शान्ति-कर्मों में जल में डूबकर किया गया जप सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.24.7)

सौवर्णे राजते वापि पात्रे ताम्रमयेऽपि वा । क्षीरवृक्षमये वापि निर्व्रणे मृण्मयेऽपि वा ॥

sauvarṇe rājate vāpi pātre tāmramaye'pi vā kṣīravṛkṣamaye vāpi nirvraṇe mṛṇmaye'pi vā

स्वर्ण के, चाँदी के, अथवा ताँबे के पात्र में, या दूधवाले वृक्ष की लकड़ी के, या दरार-रहित मिट्टी के पात्र में,

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.24.8)

सहस्रं पञ्चगव्येन हुत्वा सुज्वलितेऽनले । क्षीरवृक्षमयैः काष्ठैः शेषं सम्पादयेच्छनैः ॥

sahasraṁ pañcagavyena hutvā sujvalite'nale kṣīravṛkṣamayaiḥ kāṣṭhaiḥ śeṣaṁ sampādayecchanaiḥ

अच्छी प्रज्वलित अग्नि में पंचगव्य से एक हज़ार आहुतियाँ देकर, शेष कार्य दूधवाले वृक्ष की लकड़ियों से धीरे-धीरे पूरा करना चाहिए।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.24.9)

प्रत्याहुतिं स्पृशञ्जप्त्वा सहस्रं पात्रसंस्थितम् । तेन तं प्रोक्षयेद्देशं कुशैर्मन्त्रमनुस्मरन् ॥

pratyāhutiṁ spṛśañjaptvā sahasraṁ pātrasaṁsthitam tena taṁ prokṣayeddeśaṁ kuśairmantramanusmaran

प्रत्येक आहुति के समय पात्र में रखे जल को स्पर्श करके एक हज़ार बार जप करके, कुश से मंत्र का स्मरण करते हुए उस स्थान का प्रोक्षण करना चाहिए।

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.24.10)

बलिं किरंस्ततस्तस्मिन्ध्यायेत्तु परदेवताम् । अभिचारसमुत्पन्ना कृत्या पापं च नश्यति ॥

baliṁ kiraṁstatastasmindhyāyettu paradevatām abhicārasamutpannā kṛtyā pāpaṁ ca naśyati

तत्पश्चात् वहाँ बलि अर्पित करते हुए परम देवता का ध्यान करना चाहिए; इससे अभिचार से उत्पन्न कृत्या तथा पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.24.11)

देवभूतपिशाचाद्यान् यद्येवं कुरुते वशे । गृहं ग्रामं पुरं राष्ट्रं सर्वं तेभ्यो विमुच्यते ॥

devabhūtapiśācādyān yadyevaṁ kurute vaśe gṛhaṁ grāmaṁ puraṁ rāṣṭraṁ sarvaṁ tebhyo vimucyate

यदि इस प्रकार देव, भूत, पिशाच आदि को वश में कर लिया जाए, तो घर, गाँव, नगर और राष्ट्र — सभी उनसे मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.24.12)

निखने मुच्यते तेभ्यो लिखने मध्यतोऽपि च । मण्डले शूलमालिख्य पूर्वोक्ते च क्रमेऽपि वा ॥

nikhane mucyate tebhyo likhane madhyato'pi ca maṇḍale śūlamālikhya pūrvokte ca krame'pi vā

(पात्र को) गाड़ देने से उनसे मुक्ति मिलती है, और मंडल के मध्य में रेखा खींचने से भी। त्रिशूल को मंडल में अंकित करके, पूर्वोक्त क्रम से अथवा अन्य किसी क्रम से भी,

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.24.13)

अभिमन्त्र्य सहस्रं तन्निखनेत्सर्वशान्तये । सौवर्णं राजतं वापि कुम्भं ताम्रमयं च वा ॥

abhimantrya sahasraṁ tannikhanetsarvaśāntaye sauvarṇaṁ rājataṁ vāpi kumbhaṁ tāmramayaṁ ca vā

एक हज़ार बार अभिमंत्रित करके उसे सर्व-शान्ति के लिए गाड़ देना चाहिए। स्वर्ण का, अथवा चाँदी का, अथवा ताँबे का कुंभ,

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.24.14)

मृण्मयं वा नवं दिव्यं सूत्रवेष्टितमव्रणम् । स्थण्डिले सैकते स्थाप्य पूरयेन्मन्त्रविज्जलैः ॥

mṛṇmayaṁ vā navaṁ divyaṁ sūtraveṣṭitamavraṇam sthaṇḍile saikate sthāpya pūrayenmantravijjalaiḥ

अथवा मिट्टी का, नया, उत्तम, धागे से लपेटा हुआ, दरार-रहित — इसे तैयार, बालू वाली वेदी पर रखकर मंत्रज्ञ को जल से भरना चाहिए,

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.24.15)

दिग्भ्य आहृत्य तीर्थानि चतसृभ्यो द्विजोत्तमैः । एलाचन्दनकर्पूरजातीपाटलमल्लिकाः ॥

digbhya āhṛtya tīrthāni catasṛbhyo dvijottamaiḥ elācandanakarpūrajātīpāṭalamallikāḥ

जो चारों दिशाओं के तीर्थों से श्रेष्ठ द्विजों द्वारा लाए गए हों। इलायची, चन्दन, कपूर, जाति (चमेली), पाटल तथा मल्लिका के फूल,

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.24.16)

बिल्वपत्रं तथा क्रान्तां देवीं व्रीहियवांस्तिलान् । सर्षपान्क्षीरवृक्षाणां प्रवालानि च निक्षिपेत् ॥

bilvapatraṁ tathā krāntāṁ devīṁ vrīhiyavāṁstilān sarṣapānkṣīravṛkṣāṇāṁ pravālāni ca nikṣipet

बिल्वपत्र, तथा क्रान्ता देवी (एक विशेष औषधि), धान, जौ, तिल, सरसों तथा दूधवाले वृक्षों के अंकुर भी उसमें डालने चाहिए।

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.24.17)

सर्वाण्यभिविधायैव कुशकूर्चसमन्वितम् । स्नातः समाहितो विप्रः सहस्रं मन्त्रयेद् बुधः ॥

sarvāṇyabhividhāyaiva kuśakūrcasamanvitam snātaḥ samāhito vipraḥ sahasraṁ mantrayed budhaḥ

इन सबको कुश के गुच्छे सहित व्यवस्थित करके, स्नान किया हुआ, सावधान बुद्धिमान विप्र उस पर एक हज़ार बार मंत्र-जप करे।

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.24.18)

दिक्षु सौरानधीयीरन्मन्त्रान्विप्रास्त्रयीविदः । प्रोक्षयेत्पाययेदेनं नीरं तेनाभिषिञ्चयेत् ॥

dikṣu saurānadhīyīranmantrānviprāstrayīvidaḥ prokṣayetpāyayedenaṁ nīraṁ tenābhiṣiñcayet

तीनों वेदों के ज्ञाता विप्रों को दिशाओं में सूर्य-मंत्रों का पाठ करना चाहिए। उस जल से प्रोक्षण करना चाहिए, पिलाना चाहिए और उससे अभिषेक करना चाहिए।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.24.19)

भूतरोगाभिचारेभ्यः स निर्मुक्तः सुखी भवेत् । अभिषेकेण मुच्येत मृत्योरास्यगतो नरः ॥

bhūtarogābhicārebhyaḥ sa nirmuktaḥ sukhī bhavet abhiṣekeṇa mucyeta mṛtyorāsyagato naraḥ

वह भूत-रोग-अभिचार से मुक्त होकर सुखी हो जाता है। इस अभिषेक से मृत्यु के मुख में गया हुआ मनुष्य भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.24.20)

अवश्यं कारयेद्विद्वान्राजा दीर्घं जिजीविषुः । गावो देयाश्च ऋत्विग्भ्य अभिषेके शतं मुने ॥

avaśyaṁ kārayedvidvānrājā dīrghaṁ jijīviṣuḥ gāvo deyāśca ṛtvigbhya abhiṣeke śataṁ mune

दीर्घ जीवन की इच्छा रखने वाले विद्वान राजा को यह अवश्य करवाना चाहिए। हे मुने! अभिषेक में ऋत्विजों को सौ गौएँ देनी चाहिए,

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.24.21)

दक्षिणा येन वा तुष्टिर्यथाशक्त्याथवा भवेत् । जपेदश्वत्थमालभ्य मन्दवारे शतं द्विजः ॥

dakṣiṇā yena vā tuṣṭiryathāśaktyāthavā bhavet japedaśvatthamālabhya mandavāre śataṁ dvijaḥ

अथवा जितनी दक्षिणा से उन्हें संतोष हो, अथवा यथाशक्ति। द्विज को अश्वत्थ वृक्ष का स्पर्श करके शनिवार को सौ बार जप करना चाहिए,

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.24.22)

भूतरोगाभिचारेभ्यो मुच्यते महतो भयात् । गुडूच्याः पर्वविच्छिन्नाः पयोऽक्ता जुहुयाद् द्विजः ॥

bhūtarogābhicārebhyo mucyate mahato bhayāt guḍūcyāḥ parvavicchinnāḥ payo'ktā juhuyād dvijaḥ

इससे भूत-रोग-अभिचार तथा महान भय से मुक्ति मिलती है। द्विज को गिलोय की, गाँठों पर काटी हुई, दूध से सनी लताओं की आहुति देनी चाहिए;

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.24.23)

एवं मृत्युञ्जयो होमः सर्वव्याधिविनाशनः । आम्रस्य जुहुयात्पत्रैः पयोऽक्तैर्ज्वरशान्तये ॥

evaṁ mṛtyuñjayo homaḥ sarvavyādhivināśanaḥ āmrasya juhuyātpatraiḥ payo'ktairjvaraśāntaye

यह मृत्युंजय होम है, जो समस्त व्याधियों का नाश करने वाला है। ज्वर की शान्ति के लिए आम के दूध-सने पत्तों की आहुति देनी चाहिए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.24.24)

वचाभिः पयसाक्ताभिः क्षयं हुत्वा विनाशयेत् । मधुत्रितयहोमेन राजयक्ष्मा विनश्यति ॥

vacābhiḥ payasāktābhiḥ kṣayaṁ hutvā vināśayet madhutritayahomena rājayakṣmā vinaśyati

दूध से सनी वच (बच) की जड़ों की आहुति देकर क्षय रोग का नाश करना चाहिए। मधु-त्रय (मधु, शर्करा, घृत) के होम से राजयक्ष्मा नष्ट हो जाता है।

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.24.25)

निवेद्य भास्करायान्नं पायसं होमपूर्वकम् । राजयक्ष्माभिभूतं च प्राशयेच्छान्तिमाप्नुयात् ॥

nivedya bhāskarāyānnaṁ pāyasaṁ homapūrvakam rājayakṣmābhibhūtaṁ ca prāśayecchāntimāpnuyāt

सूर्य को अन्न निवेदित करके, होम-पूर्वक बनाई गई खीर राजयक्ष्मा से पीड़ित व्यक्ति को खिलानी चाहिए, इससे उसे शान्ति मिलती है।

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.24.26)

लताः पर्वसु विच्छिद्य सोमस्य जुहुयाद् द्विजः । सोमे सूर्येण संयुक्ते पयोऽक्ताः क्षयशान्तये ॥

latāḥ parvasu vicchidya somasya juhuyād dvijaḥ some sūryeṇa saṁyukte payo'ktāḥ kṣayaśāntaye

द्विज को अमावस्या के दिन, गाँठों पर काटी गई सोम-लता की, दूध से सनी हुई आहुति देनी चाहिए, क्षय-रोग की शान्ति के लिए।

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.24.27)

कुसुमैः शङ्खवृक्षस्य हुत्वा कुष्ठं विनाशयेत् । अपस्मारविनाशः स्यादपामार्गस्य तण्डुलैः ॥

kusumaiḥ śaṅkhavṛkṣasya hutvā kuṣṭhaṁ vināśayet apasmāravināśaḥ syādapāmārgasya taṇḍulaiḥ

शंख-वृक्ष के फूलों से आहुति देकर कुष्ठ का नाश करना चाहिए। अपामार्ग के बीजों से अपस्मार (मिर्गी) का नाश होता है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.24.28)

क्षीरवृक्षसमिद्धोमादुन्मादोऽपि विनश्यति । औदुम्बरसमिद्धोमादतिमेहः क्षयं व्रजेत् ॥

kṣīravṛkṣasamiddhomādunmādo'pi vinaśyati audumbarasamiddhomādatimehaḥ kṣayaṁ vrajet

दूधवाले वृक्ष की समिधाओं के होम से उन्माद भी नष्ट हो जाता है। गूलर की समिधाओं के होम से अत्यधिक मूत्र-रोग समाप्त हो जाता है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.24.29)

प्रमेहं शमयेद्धुत्वा मधुनेक्षुरसेन वा । मधुत्रितयहोमेन नयेच्छान्तिं मसूरिकाम् ॥

pramehaṁ śamayeddhutvā madhunekṣurasena vā madhutritayahomena nayecchāntiṁ masūrikām

मधु अथवा गन्ने के रस से आहुति देकर प्रमेह को शांत करना चाहिए। मधु-त्रय के होम से मसूरिका (चेचक) को शान्ति की ओर ले जाना चाहिए।

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.24.30)

कपिलासर्पिषा हुत्वा नयेच्छान्तिं मसूरिकाम् । उदुम्बरवटाश्वत्थैर्गोगजाश्वामयं हरेत् ॥

kapilāsarpiṣā hutvā nayecchāntiṁ masūrikām udumbaravaṭāśvatthairgogajāśvāmayaṁ haret

कपिला गाय के घी से आहुति देकर मसूरिका को शान्त करना चाहिए। गूलर, बरगद और पीपल की लकड़ी से गौ, हाथी तथा घोड़े के रोग को दूर करना चाहिए।

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.24.31)

पिपीलिमधुवल्मीके गृहे जाते शतं शतम् । शमीसमिद्भिरन्नेन सर्पिषा जुहुयाद् द्विजः ॥

pipīlimadhuvalmīke gṛhe jāte śataṁ śatam śamīsamidbhirannena sarpiṣā juhuyād dvijaḥ

घर में शहद-चींटियों वाला बाँबी उत्पन्न होने पर द्विज को शमी की समिधाओं से, अन्न से तथा घी से सौ-सौ बार आहुति देनी चाहिए;

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.24.32)

तदुत्थं शान्तिमायाति शेषैस्तत्र बलिं हरेत् । अभ्रस्तनितभूकम्पालक्ष्यादौ वनवेतसः ॥

tadutthaṁ śāntimāyāti śeṣaistatra baliṁ haret abhrastanitabhūkampālakṣyādau vanavetasaḥ

इससे उससे उत्पन्न उपद्रव शांत हो जाता है, और शेष से वहाँ बलि अर्पित करनी चाहिए। बादल की गरज, भूकंप आदि के लक्षण दिखने पर वनवेतस से,

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.24.33)

सप्ताहं जुहुयादेवं राष्ट्रे राज्यं सुखी भवेत् । यां दिशं शतजप्तेन लोष्ठेनाभिप्रताडयेत् ॥

saptāhaṁ juhuyādevaṁ rāṣṭre rājyaṁ sukhī bhavet yāṁ diśaṁ śatajaptena loṣṭhenābhipratāḍayet

सात दिन तक इस प्रकार आहुति देनी चाहिए, इससे राष्ट्र में राज्य सुखी होता है। जिस दिशा में सौ बार अभिमंत्रित मिट्टी के ढेले को फेंका जाए,

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.24.34)

ततोऽग्निमारुतारिभ्यो भयं तस्य विनश्यति । मनसैव जपेदेनां बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥

tato'gnimārutāribhyo bhayaṁ tasya vinaśyati manasaiva japedenāṁ baddho mucyeta bandhanāt

उस दिशा से अग्नि, वायु तथा शत्रुओं का भय नष्ट हो जाता है। इस गायत्री का केवल मन से जप करने से बंधन में पड़ा व्यक्ति भी बंधन से मुक्त हो जाता है;

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.24.35)

भूतरोगविषादिभ्यः स्पृशञ्जप्त्वा विमोचयेत् । भूतादिभ्यो विमुच्येत जलं पीत्वाभिमन्त्रितम् ॥

bhūtarogaviṣādibhyaḥ spṛśañjaptvā vimocayet bhūtādibhyo vimucyeta jalaṁ pītvābhimantritam

स्पर्श करके जप करके भूत, रोग, विष आदि से किसी और को भी मुक्त किया जा सकता है। अभिमंत्रित जल पीने से भूत आदि से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.24.36)

अभिमन्त्र्य शतं भस्म न्यसेद्भूतादिशान्तये । शिरसा धारयेद्भस्म मन्त्रयित्वा तदित्यृचा ॥

abhimantrya śataṁ bhasma nyasedbhūtādiśāntaye śirasā dhārayedbhasma mantrayitvā tadityṛcā

सौ बार अभिमंत्रित भस्म को भूत आदि की शान्ति के लिए लगाना चाहिए। 'तत्' ऋचा से अभिमंत्रित भस्म को सिर पर धारण करना चाहिए।

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.24.37)

सर्वव्याधिविनिर्मुक्तः सुखी जीवेच्छतं समाः । अशक्तः कारयेच्छान्तिं विप्रं दत्त्वा तु दक्षिणाम् ॥

sarvavyādhivinirmuktaḥ sukhī jīvecchataṁ samāḥ aśaktaḥ kārayecchāntiṁ vipraṁ dattvā tu dakṣiṇām

समस्त व्याधियों से मुक्त होकर व्यक्ति सौ वर्षों तक सुखी जीवन जीता है। जो स्वयं असमर्थ हो, वह ब्राह्मण को दक्षिणा देकर उससे यह शान्ति-कर्म करवाए।

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.24.38)

अथ पुष्टिं श्रियं लक्ष्मीं पुष्पैर्हुत्वाप्नुयाद् द्विजः । श्रीकामो जुहुयात्पद्मै रक्तैः श्रियमवाप्नुयात् ॥

atha puṣṭiṁ śriyaṁ lakṣmīṁ puṣpairhutvāpnuyād dvijaḥ śrīkāmo juhuyātpadmai raktaiḥ śriyamavāpnuyāt

अब द्विज फूलों से आहुति देकर पुष्टि, श्री और लक्ष्मी प्राप्त करता है। श्री की कामना करने वाला लाल कमलों से आहुति दे, तो श्री प्राप्त होती है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.24.39)

हुत्वा श्रियमवाप्नोति जातीपुष्पैर्नवैः शुभैः । शालितण्डुलहोमेन श्रियमाप्नोति पुष्कलाम् ॥

hutvā śriyamavāpnoti jātīpuṣpairnavaiḥ śubhaiḥ śālitaṇḍulahomena śriyamāpnoti puṣkalām

नए, शुभ जाति (चमेली) के फूलों से आहुति देकर श्री प्राप्त होती है। शालि (धान) के चावलों के होम से प्रचुर श्री प्राप्त होती है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.24.40)

समिद्भिर्बिल्ववृक्षस्य हुत्वा श्रियमवाप्नुयात् । बिल्वस्य शकलैर्हुत्वा पत्रैः पुष्पैः फलैरपि ॥

samidbhirbilvavṛkṣasya hutvā śriyamavāpnuyāt bilvasya śakalairhutvā patraiḥ puṣpaiḥ phalairapi

बिल्व-वृक्ष की समिधाओं से आहुति देकर श्री प्राप्त होती है। बिल्व के टुकड़ों, पत्तों, फूलों तथा फलों से भी आहुति देकर,

श्लोक 41 (devibhagavatam.11.24.41)

श्रियमाप्नोति परमां मूलस्य शकलैरपि । समिद्भिर्बिल्ववृक्षस्य पायसेन च सर्पिषा ॥

śriyamāpnoti paramāṁ mūlasya śakalairapi samidbhirbilvavṛkṣasya pāyasena ca sarpiṣā

परम श्री प्राप्त होती है, तथा उसकी जड़ के टुकड़ों से भी। बिल्व-वृक्ष की समिधाओं से, खीर से तथा घी से,

श्लोक 42 (devibhagavatam.11.24.42)

शतं शतं च सप्ताहं हुत्वा श्रियमवाप्नुयात् । लाजैस्त्रिमधुरोपेतैर्होमे कन्यामवाप्नुयात् ॥

śataṁ śataṁ ca saptāhaṁ hutvā śriyamavāpnuyāt lājaistrimadhuropetairhome kanyāmavāpnuyāt

सात दिन तक सौ-सौ बार आहुति देकर श्री प्राप्त होती है। तीन मीठे पदार्थों से युक्त लाजा (खील) के होम से कन्या प्राप्त होती है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.11.24.43)

अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाञ्छितम् । रक्तोत्पलशतं हुत्वा सप्ताहं हेम चाप्नुयात् ॥

anena vidhinā kanyā varamāpnoti vāñchitam raktotpalaśataṁ hutvā saptāhaṁ hema cāpnuyāt

इस विधि से कन्या को इच्छित वर की प्राप्ति होती है। सौ लाल कमलों से सात दिन तक आहुति देकर स्वर्ण प्राप्त होता है।

श्लोक 44 (devibhagavatam.11.24.44)

सूर्यबिम्बे जलं हुत्वा जलस्थं हेम चाप्नुयात् । अन्नं हुत्वाप्नुयादन्नं व्रीहीन्व्रीहिपतिर्भवेत् ॥

sūryabimbe jalaṁ hutvā jalasthaṁ hema cāpnuyāt annaṁ hutvāpnuyādannaṁ vrīhīnvrīhipatirbhavet

सूर्य-बिम्ब की ओर जल की आहुति देकर जल में स्थित स्वर्ण प्राप्त होता है। अन्न से आहुति देकर अन्न प्राप्त होता है; धान से आहुति देकर धान का स्वामी बनता है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.11.24.45)

करीषचूर्णैर्वत्सस्य हुत्वा पशुमवाप्नुयात् । प्रियङ्गुपायसाज्यैश्च भवेद्धोमादिभिः प्रजा ॥

karīṣacūrṇairvatsasya hutvā paśumavāpnuyāt priyaṅgupāyasājyaiśca bhaveddhomādibhiḥ prajā

बछड़े के गोबर के चूर्ण से आहुति देकर पशु प्राप्त होते हैं। प्रियंगु, खीर तथा घी आदि के होम से संतान प्राप्त होती है।

श्लोक 46 (devibhagavatam.11.24.46)

निवेद्य भास्करायान्नं पायसं होमपूर्वकम् । भोजयेत्तदृतुस्नातां पुत्रं परमवाप्नुयात् ॥

nivedya bhāskarāyānnaṁ pāyasaṁ homapūrvakam bhojayettadṛtusnātāṁ putraṁ paramavāpnuyāt

सूर्य को अन्न निवेदित करके, होम-पूर्वक बनाई गई खीर ऋतु-स्नान की हुई पत्नी को खिलानी चाहिए, इससे उत्तम पुत्र प्राप्त होता है।

श्लोक 47 (devibhagavatam.11.24.47)

सप्ररोहाभिरार्द्राभिरायुर्हुत्वा समाप्नुयात् । समिद्भिः क्षीरवृक्षस्य हुत्वायुषमवाप्नुयात् ॥

saprarohābhirārdrābhirāyurhutvā samāpnuyāt samidbhiḥ kṣīravṛkṣasya hutvāyuṣamavāpnuyāt

अंकुरित, ताज़े अन्नों से आहुति देकर आयु की प्राप्ति होती है। दूधवाले वृक्ष की समिधाओं से आहुति देकर आयु प्राप्त होती है।

श्लोक 48 (devibhagavatam.11.24.48)

सप्ररोहाभिरार्द्राभी रक्ताभिर्मधुरत्रयैः । व्रीहीणां च शतं हुत्वा हेम चायुरवाप्नुयात् ॥

saprarohābhirārdrābhī raktābhirmadhuratrayaiḥ vrīhīṇāṁ ca śataṁ hutvā hema cāyuravāpnuyāt

अंकुरित, लाल धान के दानों को तीन मीठे पदार्थों सहित सौ बार आहुति देकर स्वर्ण और आयु दोनों प्राप्त होते हैं।

श्लोक 49 (devibhagavatam.11.24.49)

सुवर्णकुड्मलं हुत्वा शतमायुरवाप्नुयात् । दूर्वाभिः पयसा वापि मधुना सर्पिषापि वा ॥

suvarṇakuḍmalaṁ hutvā śatamāyuravāpnuyāt dūrvābhiḥ payasā vāpi madhunā sarpiṣāpi vā

स्वर्ण की कली से आहुति देकर सौ वर्षों की आयु प्राप्त होती है। दूर्वा से, दूध से, मधु से अथवा घी से,

श्लोक 50 (devibhagavatam.11.24.50)

शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युं व्यपोहति । शमीसमिद्भिरन्नेन पयसा वा च सर्पिषा ॥

śataṁ śataṁ ca saptāhamapamṛtyuṁ vyapohati śamīsamidbhirannena payasā vā ca sarpiṣā

सात दिन तक सौ-सौ बार आहुति देकर अकाल-मृत्यु दूर हो जाती है। शमी की समिधाओं से, अन्न से, दूध से अथवा घी से,

श्लोक 51 (devibhagavatam.11.24.51)

शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युं व्यपोहति । न्यग्रोधसमिधो हुत्वा पायसं होमयेत्ततः ॥

śataṁ śataṁ ca saptāhamapamṛtyuṁ vyapohati nyagrodhasamidho hutvā pāyasaṁ homayettataḥ

सात दिन तक सौ-सौ बार आहुति देकर अकाल-मृत्यु दूर हो जाती है। बरगद की समिधाओं से आहुति देकर तत्पश्चात् खीर का होम करना चाहिए,

श्लोक 52 (devibhagavatam.11.24.52)

शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युं व्यपोहति । क्षीराहारो जपेन्मृत्योः सप्ताहाद्विजयी भवेत् ॥

śataṁ śataṁ ca saptāhamapamṛtyuṁ vyapohati kṣīrāhāro japenmṛtyoḥ saptāhādvijayī bhavet

सात दिन तक सौ-सौ बार आहुति देकर अकाल-मृत्यु दूर हो जाती है। केवल दूध का आहार करते हुए जप करने वाला सात दिनों में मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 53 (devibhagavatam.11.24.53)

अनश्नन्वाग्यतो जप्त्वा त्रिरात्रं मुच्यते यमात् । निमज्ज्याप्सु जपेदेवं सद्यो मृत्योर्विमुच्यते ॥

anaśnanvāgyato japtvā trirātraṁ mucyate yamāt nimajjyāpsu japedevaṁ sadyo mṛtyorvimucyate

बिना भोजन किए, वाणी को संयमित करके तीन रात्रि जप करने से यम से मुक्ति मिलती है। इसी प्रकार जल में डूबकर जप करने से तुरन्त मृत्यु से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 54 (devibhagavatam.11.24.54)

जपेद् बिल्वं समाश्रित्य मासं राज्यमवाप्नुयात् । बिल्वं हुत्वाप्नुयाद्राज्यं समूलफलपल्लवम् ॥

japed bilvaṁ samāśritya māsaṁ rājyamavāpnuyāt bilvaṁ hutvāpnuyādrājyaṁ samūlaphalapallavam

बिल्व-वृक्ष का आश्रय लेकर एक महीने जप करने से राज्य प्राप्त होता है। जड़, फल तथा नवपल्लव सहित बिल्व से आहुति देकर राज्य प्राप्त होता है।

श्लोक 55 (devibhagavatam.11.24.55)

हुत्वा पद्मशतं मासं राज्यमाप्नोत्यकण्टकम् । यवागूं ग्राममाप्नोति हुत्वा शालिसमन्वितम् ॥

hutvā padmaśataṁ māsaṁ rājyamāpnotyakaṇṭakam yavāgūṁ grāmamāpnoti hutvā śālisamanvitam

सौ कमलों से एक महीने आहुति देकर निष्कंटक राज्य प्राप्त होता है। जौ के दलिये को शालि सहित आहुति देकर गाँव प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (devibhagavatam.11.24.56)

अश्वत्थसमिधो हुत्वा युद्धादौ जयमाप्नुयात् । अर्कस्य समिधो हुत्वा सर्वत्र विजयी भवेत् ॥

aśvatthasamidho hutvā yuddhādau jayamāpnuyāt arkasya samidho hutvā sarvatra vijayī bhavet

अश्वत्थ की समिधाओं से आहुति देकर युद्ध आदि में विजय प्राप्त होती है। अर्क की समिधाओं से आहुति देकर सर्वत्र विजयी होता है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.11.24.57)

संयुक्तैः पयसा पत्रैः पुष्पैर्वा वेतसस्य च । पायसेन शतं हुत्वा सप्ताहं वृष्टिमाप्नुयात् ॥

saṁyuktaiḥ payasā patraiḥ puṣpairvā vetasasya ca pāyasena śataṁ hutvā saptāhaṁ vṛṣṭimāpnuyāt

दूध से युक्त वेतस के पत्तों अथवा फूलों से, या खीर से सौ बार आहुति देकर सात दिनों में वर्षा प्राप्त होती है।

श्लोक 58 (devibhagavatam.11.24.58)

नाभिदघ्ने जले जप्त्वा सप्ताहं वृष्टिमाप्नुयात् । जले भस्मशतं हुत्वा महावृष्टिं निवारयेत् ॥

nābhidaghne jale japtvā saptāhaṁ vṛṣṭimāpnuyāt jale bhasmaśataṁ hutvā mahāvṛṣṭiṁ nivārayet

नाभि तक जल में खड़े होकर सात दिन जप करने से वर्षा प्राप्त होती है। जल में सौ बार भस्म की आहुति देकर अत्यधिक वर्षा को रोका जा सकता है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.11.24.59)

पालाशाभिरवाप्नोति समिद्भिर्ब्रह्मवर्चसम् । पलाशकुसुमैर्हुत्वा सर्वमिष्टमवाप्नुयात् ॥

pālāśābhiravāpnoti samidbhirbrahmavarcasam palāśakusumairhutvā sarvamiṣṭamavāpnuyāt

पलाश की समिधाओं से ब्रह्मवर्चस् प्राप्त होता है। पलाश के फूलों से आहुति देकर समस्त इच्छित वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

श्लोक 60 (devibhagavatam.11.24.60)

पयो हुत्वाऽऽप्नुयान्मेधामाज्यं बुद्धिमवाप्नुयात् । अभिमन्त्र्य पिबेद् ब्राह्मं रसं मेधामवाप्नुयात् ॥

payo hutvā''pnuyānmedhāmājyaṁ buddhimavāpnuyāt abhimantrya pibed brāhmaṁ rasaṁ medhāmavāpnuyāt

दूध से आहुति देकर तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है, घी से समझ प्राप्त होती है। अभिमंत्रित करके ब्राह्मी का रस पीने से तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 61 (devibhagavatam.11.24.61)

पुष्पहोमे भवेद्वासस्तन्तुभिस्तद्विधं पटम् । लवणं मधुसम्मिश्रं हुत्वेष्टं वशमानयेत् ॥

puṣpahome bhavedvāsastantubhistadvidhaṁ paṭam lavaṇaṁ madhusammiśraṁ hutveṣṭaṁ vaśamānayet

पुष्प-होम से वस्त्र प्राप्त होते हैं, धागों से आहुति देकर उसी प्रकार का कपड़ा मिलता है। मधु मिश्रित नमक से आहुति देकर इच्छित व्यक्ति को वश में किया जा सकता है।

श्लोक 62 (devibhagavatam.11.24.62)

नयेदिष्टं वशं हुत्वा लक्ष्मीपुष्पैर्मधुप्लुतैः । नित्यमञ्जलिनाऽऽत्मानमभिषिञ्चेज्जले स्थितः ॥

nayediṣṭaṁ vaśaṁ hutvā lakṣmīpuṣpairmadhuplutaiḥ nityamañjalinā''tmānamabhiṣiñcejjale sthitaḥ

मधु में डूबे हुए लक्ष्मी-पुष्पों से आहुति देकर इच्छित व्यक्ति को वश में किया जा सकता है। जल में खड़े होकर नित्य अंजलि से अपने ऊपर अभिषेक करना चाहिए —

श्लोक 63 (devibhagavatam.11.24.63)

मतिमारोग्यमायुष्यमग्र्यं स्वास्थ्यमवाप्नुयात् । कुर्याद्विप्रोऽन्यमुद्दिश्य सोऽपि पुष्टिमवाप्नुयात् ॥

matimārogyamāyuṣyamagryaṁ svāsthyamavāpnuyāt kuryādvipro'nyamuddiśya so'pi puṣṭimavāpnuyāt

इससे बुद्धि, आरोग्य, आयु तथा उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है। यदि ब्राह्मण किसी अन्य के लिए यह करे, तो वह अन्य व्यक्ति भी पुष्टि प्राप्त करता है।

श्लोक 64 (devibhagavatam.11.24.64)

अथ चारुविधिर्मासं सहस्रं प्रत्यहं जपेत् । आयुष्कामः शुचौ देशे प्राप्नुयादायुरूत्तमम् ॥

atha cāruvidhirmāsaṁ sahasraṁ pratyahaṁ japet āyuṣkāmaḥ śucau deśe prāpnuyādāyurūttamam

अब उत्तम विधि — एक महीने तक प्रतिदिन एक हज़ार बार जप करना चाहिए। आयु की कामना करने वाला शुद्ध स्थान में उत्तम आयु प्राप्त करता है।

श्लोक 65 (devibhagavatam.11.24.65)

आयुरारोग्यकामस्तु जपेन्मासद्वयं द्विजः । भवेदायुष्यमारोग्यं श्रियै मासत्रयं जपेत् ॥

āyurārogyakāmastu japenmāsadvayaṁ dvijaḥ bhavedāyuṣyamārogyaṁ śriyai māsatrayaṁ japet

आयु और आरोग्य की कामना करने वाले द्विज को दो महीने जप करना चाहिए, इससे आयु और आरोग्य दोनों प्राप्त होते हैं। श्री के लिए तीन महीने जप करना चाहिए,

श्लोक 66 (devibhagavatam.11.24.66)

आयुः श्रीपुत्रदाराद्याश्चतुर्भिश्च यशो जपात् । पुत्रदारायुरारोग्यं श्रियं विद्यां च पञ्चभिः ॥

āyuḥ śrīputradārādyāścaturbhiśca yaśo japāt putradārāyurārogyaṁ śriyaṁ vidyāṁ ca pañcabhiḥ

इससे आयु, श्री, पुत्र, पत्नी आदि प्राप्त होते हैं; चार महीनों से यश प्राप्त होता है; पाँच महीनों से पुत्र, पत्नी, आयु, आरोग्य, श्री तथा विद्या प्राप्त होती है।

श्लोक 67 (devibhagavatam.11.24.67)

एवमेवोत्तरान्कामान् मासैरेवोत्तरैर्व्रजेत् । एकपादो जपेदूर्ध्वबाहुः स्थित्वा निराश्रयः ॥

evamevottarānkāmān māsairevottarairvrajet ekapādo japedūrdhvabāhuḥ sthitvā nirāśrayaḥ

इसी प्रकार आगे की कामनाएँ आगे-आगे के महीनों से प्राप्त होती हैं। एक पैर पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाकर, बिना किसी सहारे के जप करना चाहिए;

श्लोक 68 (devibhagavatam.11.24.68)

मासं शतत्रयं विप्रः सर्वान्कामानवाप्नुयात् । एवं शतोत्तरं जप्त्वा सहस्रं सर्वमाप्नुयात् ॥

māsaṁ śatatrayaṁ vipraḥ sarvānkāmānavāpnuyāt evaṁ śatottaraṁ japtvā sahasraṁ sarvamāpnuyāt

विप्र एक महीने में तीन सौ (हज़ार) बार जप करके समस्त कामनाएँ प्राप्त करता है। इसी प्रकार सौ अधिक अथवा एक हज़ार बार जप करके सब कुछ प्राप्त होता है।

श्लोक 69 (devibhagavatam.11.24.69)

रुद्ध्वा प्राणमपानं च जपेन्मासं शतत्रयम् । यदिच्छेत्तदवाप्नोति सहस्रात्परमाप्नुयात् ॥

ruddhvā prāṇamapānaṁ ca japenmāsaṁ śatatrayam yadicchettadavāpnoti sahasrātparamāpnuyāt

प्राण और अपान को रोककर एक महीने तीन सौ (हज़ार) बार जप करना चाहिए; जो चाहे वह प्राप्त होता है, एक हज़ार से बढ़कर परम प्राप्ति होती है।

श्लोक 70 (devibhagavatam.11.24.70)

एकपादो जपेदूर्ध्वबाहू रुद्ध्वानिलं वशः । मासं शतमवाप्नोति यदिच्छेदिति कौशिकः ॥

ekapādo japedūrdhvabāhū ruddhvānilaṁ vaśaḥ māsaṁ śatamavāpnoti yadicchediti kauśikaḥ

एक पैर पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाकर, श्वास को रोककर, संयमित होकर एक महीने सौ (हज़ार) बार जप करने से जो चाहे वह प्राप्त होता है — ऐसा कौशिक (विश्वामित्र) कहते हैं।

श्लोक 71 (devibhagavatam.11.24.71)

एवं शतत्रयं जप्त्वा सहस्रं सर्वमाप्नुयात् । निमज्ज्याप्सु जपेन्मासं शतमिष्टमवाप्नुयात् ॥

evaṁ śatatrayaṁ japtvā sahasraṁ sarvamāpnuyāt nimajjyāpsu japenmāsaṁ śatamiṣṭamavāpnuyāt

इस प्रकार तीन सौ (हज़ार) अथवा एक हज़ार बार जप करके सब कुछ प्राप्त होता है। जल में डूबकर एक महीने सौ (हज़ार) बार जप करने से इच्छित वस्तु प्राप्त होती है।

श्लोक 72 (devibhagavatam.11.24.72)

एवं शतत्रयं जप्त्वा सहस्रं सर्वमाप्नुयात् । एकपादो जपेदूर्ध्वबाहू रुद्ध्वा निराश्रयः ॥

evaṁ śatatrayaṁ japtvā sahasraṁ sarvamāpnuyāt ekapādo japedūrdhvabāhū ruddhvā nirāśrayaḥ

इस प्रकार तीन सौ (हज़ार) अथवा एक हज़ार बार जप करके सब कुछ प्राप्त होता है। एक पैर पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाकर, श्वास रोककर, बिना सहारे के जप करना चाहिए,

श्लोक 73 (devibhagavatam.11.24.73)

नक्तमश्नन् हविष्यान्नं वत्सरादृषितामियात् । गीरमोघा भवेदेवं जप्त्वा संवत्सरद्वयम् ॥

naktamaśnan haviṣyānnaṁ vatsarādṛṣitāmiyāt gīramoghā bhavedevaṁ japtvā saṁvatsaradvayam

रात्रि में हविष्यान्न खाते हुए एक वर्ष में ऋषित्व प्राप्त होता है। इस प्रकार दो वर्ष जप करने से वाणी अमोघ (अचूक) हो जाती है।

श्लोक 74 (devibhagavatam.11.24.74)

त्रिवत्सरं जपेदेवं भवेत्त्रैकालदर्शनम् । आयाति भगवान्देवश्चतुःसंवत्सरं जपेत् ॥

trivatsaraṁ japedevaṁ bhavettraikāladarśanam āyāti bhagavāndevaścatuḥsaṁvatsaraṁ japet

तीन वर्ष इस प्रकार जप करने से त्रिकाल-दर्शन प्राप्त होता है। चार वर्ष जप करने से भगवान सूर्यदेव स्वयं प्रकट होते हैं।

श्लोक 75 (devibhagavatam.11.24.75)

पञ्चभिर्वत्सरैरेवमणिमादिगुणो भवेत् । एवं षड्वत्सरं जप्त्वा कामरूपित्वमाप्नुयात् ॥

pañcabhirvatsarairevamaṇimādiguṇo bhavet evaṁ ṣaḍvatsaraṁ japtvā kāmarūpitvamāpnuyāt

पाँच वर्षों में इसी प्रकार अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इस प्रकार छह वर्ष जप करके कामरूपत्व (इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति) प्राप्त होती है।

श्लोक 76 (devibhagavatam.11.24.76)

सप्तिभिर्वत्सरैरेवममरत्वमवाप्नुयात् । मनुत्वं नवभिः सिद्धमिन्द्रत्वं दशभिर्भवेत् ॥

saptibhirvatsarairevamamaratvamavāpnuyāt manutvaṁ navabhiḥ siddhamindratvaṁ daśabhirbhavet

सात वर्षों में इसी प्रकार अमरत्व प्राप्त होता है। नौ वर्षों से मनुत्व सिद्ध होता है, दस वर्षों से इन्द्रत्व प्राप्त होता है।

श्लोक 77 (devibhagavatam.11.24.77)

एकादशभिराप्नोति प्राजापत्यं सुवत्सरैः । बह्मत्वं प्राप्नुयादेवं जप्त्वा द्वादशवत्सरान् ॥

ekādaśabhirāpnoti prājāpatyaṁ suvatsaraiḥ bahmatvaṁ prāpnuyādevaṁ japtvā dvādaśavatsarān

ग्यारह अच्छे वर्षों से प्राजापत्य पद प्राप्त होता है। इस प्रकार बारह वर्ष जप करके ब्रह्मत्व प्राप्त होता है।

श्लोक 78 (devibhagavatam.11.24.78)

एतेनैव जिता लोकास्तपसा नारदादिभिः । शाकमन्ये परे मूलं फलमन्ये पयः परे ॥

etenaiva jitā lokāstapasā nāradādibhiḥ śākamanye pare mūlaṁ phalamanye payaḥ pare

इसी तप से नारद आदि ने लोकों को जीता है। कोई शाक खाते हैं, कोई मूल, कोई फल, कोई केवल दूध,

श्लोक 79 (devibhagavatam.11.24.79)

घृतमन्ये परे सोममपरे चरुवृत्तयः । ऋषयः पक्षमश्नन्ति केचिद्भैक्ष्याशिनोऽहनि ॥

ghṛtamanye pare somamapare caruvṛttayaḥ ṛṣayaḥ pakṣamaśnanti kecidbhaikṣyāśino'hani

कोई घी, कोई सोम, कोई चरु (यज्ञ-अन्न) से जीवन-यापन करते हैं; कुछ ऋषि पखवाड़े में एक बार भोजन करते हैं, कुछ दिन में केवल भिक्षान्न खाते हैं,

श्लोक 80 (devibhagavatam.11.24.80)

हविष्यमपरेऽश्नन्तः कुर्वन्त्येव परं तपः । अथ शुद्।ह्ध्यै रहस्यानां त्रिसहस्रं जपेद् द्विजः ॥

haviṣyamapare'śnantaḥ kurvantyeva paraṁ tapaḥ atha śud hdhyai rahasyānāṁ trisahasraṁ japed dvijaḥ

और कुछ केवल हविष्यान्न खाते हुए ही परम तप करते हैं। अब गुप्त पापों की शुद्धि के लिए द्विज को तीन हज़ार बार जप करना चाहिए।

श्लोक 81 (devibhagavatam.11.24.81)

मासं शुद्धो भवेत्स्तेयात्सुवर्णस्य द्विजोत्तमः । जपेन्मासं त्रिसाहस्रं सुरापः शुद्धिमाप्नुयात् ॥

māsaṁ śuddho bhavetsteyātsuvarṇasya dvijottamaḥ japenmāsaṁ trisāhasraṁ surāpaḥ śuddhimāpnuyāt

एक महीने में श्रेष्ठ द्विज स्वर्ण-चोरी के पाप से शुद्ध हो जाता है। एक महीने तीन हज़ार बार जप करने से मद्यपायी शुद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 82 (devibhagavatam.11.24.82)

मासं जपेत् त्रिसाहस्रं शुचिः स्याद् गुरुतल्पगः । त्रिसहस्रं जपेन्मासं कुटीं कृत्वा वने वसन् ॥

māsaṁ japet trisāhasraṁ śuciḥ syād gurutalpagaḥ trisahasraṁ japenmāsaṁ kuṭīṁ kṛtvā vane vasan

एक महीने तीन हज़ार बार जप करने से गुरु-पत्नी-गामी शुद्ध हो जाता है। वन में कुटिया बनाकर रहते हुए एक महीने तीन हज़ार बार जप करने से,

श्लोक 83 (devibhagavatam.11.24.83)

ब्रह्महा मुच्यते पापादिति कौशिकभाषितम् । द्वादशाहं निमज्ज्याप्सु सहस्रं प्रत्यहं जपेत् ॥

brahmahā mucyate pāpāditi kauśikabhāṣitam dvādaśāhaṁ nimajjyāpsu sahasraṁ pratyahaṁ japet

ब्रह्महत्यारा भी पाप से मुक्त हो जाता है — ऐसा कौशिक ने कहा है। बारह दिनों तक जल में डूबकर प्रतिदिन एक हज़ार बार जप करने से,

श्लोक 84 (devibhagavatam.11.24.84)

मुच्येरन्नंहसः सर्वे महापातकिनो द्विजाः । त्रिसाहस्रं जपेन्मासं प्राणानायम्य वाग्यतः ॥

mucyerannaṁhasaḥ sarve mahāpātakino dvijāḥ trisāhasraṁ japenmāsaṁ prāṇānāyamya vāgyataḥ

महापातकी द्विज भी सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। श्वास और वाणी को संयमित करके एक महीने तीन हज़ार बार जप करने से,

श्लोक 85 (devibhagavatam.11.24.85)

महापातकयुक्तो वा मुच्यते महतो भयात् । प्राणायामसहस्रेण ब्रह्महापि विशुध्यति ॥

mahāpātakayukto vā mucyate mahato bhayāt prāṇāyāmasahasreṇa brahmahāpi viśudhyati

महापातक से युक्त व्यक्ति भी महान भय से मुक्त हो जाता है। एक हज़ार प्राणायामों से ब्रह्महत्यारा भी पूर्णतः शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 86 (devibhagavatam.11.24.86)

षट्कृत्वस्त्वभ्यसेदूर्ध्वं प्राणापानौ समाहितः । प्राणायामो भवेदेष सर्वपापप्रणाशनः ॥

ṣaṭkṛtvastvabhyasedūrdhvaṁ prāṇāpānau samāhitaḥ prāṇāyāmo bhavedeṣa sarvapāpapraṇāśanaḥ

प्राण और अपान को सावधानी से छह बार लगातार अभ्यास करना चाहिए; यह प्राणायाम समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 87 (devibhagavatam.11.24.87)

सहस्रमभ्यसेन्मासं क्षितिपः शुचितामियात् । द्वादशाहं त्रिसाहस्रं जपेद्धि गोवधे द्विजः ॥

sahasramabhyasenmāsaṁ kṣitipaḥ śucitāmiyāt dvādaśāhaṁ trisāhasraṁ japeddhi govadhe dvijaḥ

एक महीने एक हज़ार बार अभ्यास करने से राजा पवित्रता प्राप्त करता है। गोवध होने पर द्विज को बारह दिनों में तीन हज़ार बार जप करना चाहिए;

श्लोक 88 (devibhagavatam.11.24.88)

अगम्यागमनस्तेयहननाभक्ष्यभक्षणे । दशसाहस्रमभ्यस्ता गायत्री शोधयेद् द्विजम् ॥

agamyāgamanasteyahananābhakṣyabhakṣaṇe daśasāhasramabhyastā gāyatrī śodhayed dvijam

अगम्यागमन, चोरी, हत्या तथा अभक्ष्य-भक्षण के लिए दस हज़ार बार अभ्यासित गायत्री द्विज को शुद्ध करती है।

श्लोक 89 (devibhagavatam.11.24.89)

प्राणायामशतं कृत्वा मुच्यते सर्वकिल्विषात् । सर्वेषामेव पापानां सङ्करे सति शुद्धये ॥

prāṇāyāmaśataṁ kṛtvā mucyate sarvakilviṣāt sarveṣāmeva pāpānāṁ saṅkare sati śuddhaye

सौ प्राणायाम करने से समस्त अपराधों से मुक्ति मिलती है। समस्त पापों के मिश्रित होने पर उनकी शुद्धि के लिए,

श्लोक 90 (devibhagavatam.11.24.90)

सहस्रमभ्यसेन्मासं नित्यजापी वने वसन् । उपवाससमं जप्यं त्रिसहस्रं तदित्यृचम् ॥

sahasramabhyasenmāsaṁ nityajāpī vane vasan upavāsasamaṁ japyaṁ trisahasraṁ tadityṛcam

वन में रहते हुए नित्य जप करते हुए एक महीने एक हज़ार बार अभ्यास करना चाहिए; उपवास के समान है 'तत्' ऋचा का तीन हज़ार बार जप।

श्लोक 91 (devibhagavatam.11.24.91)

चतुर्विंशतिसाहस्रमभ्यस्तात्कृच्छ्रसंज्ञिता । चतुःषष्टिसहस्राणि चान्द्रायणसमानि तु ॥

caturviṁśatisāhasramabhyastātkṛcchrasaṁjñitā catuḥṣaṣṭisahasrāṇi cāndrāyaṇasamāni tu

चौबीस हज़ार बार अभ्यासित जप कृच्छ्र-व्रत के समान माना गया है; चौंसठ हज़ार बार का अभ्यास चान्द्रायण के समान है।

श्लोक 92 (devibhagavatam.11.24.92)

शतकृत्वोऽभ्यसेन्नित्यं प्राणानायम्य सन्ध्ययोः । तदित्यृचमवाप्नोति सर्वपापक्षयं परम् ॥

śatakṛtvo'bhyasennityaṁ prāṇānāyamya sandhyayoḥ tadityṛcamavāpnoti sarvapāpakṣayaṁ param

दोनों संध्याओं में श्वास को संयमित करके नित्य सौ बार अभ्यास करने से 'तत्' ऋचा से समस्त पापों का परम क्षय प्राप्त होता है।

श्लोक 93 (devibhagavatam.11.24.93)

निमज्ज्याप्सु जपेन्नित्यं शतकृत्वस्तदित्यृचम् । ध्यायन्देवीं सूर्यरूपां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

nimajjyāpsu japennityaṁ śatakṛtvastadityṛcam dhyāyandevīṁ sūryarūpāṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

जल में डूबकर नित्य सौ बार 'तत्' ऋचा का जप करते हुए, सूर्य-रूपिणी देवी का ध्यान करते हुए, व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 94 (devibhagavatam.11.24.94)

इति ते सम्यगाख्याताः शान्तिशुद्।ह्ध्यादिकल्पनाः । रहस्यातिरहस्याश्च गोपनीयास्त्वया सदा ॥

iti te samyagākhyātāḥ śāntiśud hdhyādikalpanāḥ rahasyātirahasyāśca gopanīyāstvayā sadā

इस प्रकार तुम्हें शान्ति, शुद्धि आदि की ये विधियाँ पूर्ण रूप से बताई गईं; ये अत्यंत गोपनीय हैं और तुम्हें सदा इन्हें छिपाकर रखना चाहिए।

श्लोक 95 (devibhagavatam.11.24.95)

इति सङ्क्षेपतः प्रोक्तः सदाचारस्य सङ्ग्रहः । विधिनाऽऽचरणादस्य माया दुर्गा प्रसीदति ॥

iti saṅkṣepataḥ proktaḥ sadācārasya saṅgrahaḥ vidhinā''caraṇādasya māyā durgā prasīdati

इस प्रकार संक्षेप में सदाचार का यह संग्रह बताया गया। इसके विधिपूर्वक आचरण से माया दुर्गा प्रसन्न होती हैं।

श्लोक 96 (devibhagavatam.11.24.96)

नैमित्तिकं च नित्यं च काम्यं कर्म यथाविधि । आचरेन्मनुजः सोऽयं भुक्तिमुक्तिफलाप्तिभाक् ॥

naimittikaṁ ca nityaṁ ca kāmyaṁ karma yathāvidhi ācarenmanujaḥ so'yaṁ bhuktimuktiphalāptibhāk

जो मनुष्य नैमित्तिक, नित्य तथा काम्य कर्मों का विधिपूर्वक आचरण करता है, वह भोग और मोक्ष दोनों फलों का भागी बनता है।

श्लोक 97 (devibhagavatam.11.24.97)

आचारः प्रथमो धर्मो धर्मस्य प्रभुरीश्वरी । इत्युक्तं सर्वशास्त्रेषु सदाचारफलं महत् ॥

ācāraḥ prathamo dharmo dharmasya prabhurīśvarī ityuktaṁ sarvaśāstreṣu sadācāraphalaṁ mahat

आचार ही प्रथम धर्म है, और ईश्वरी (देवी) ही धर्म की स्वामिनी हैं — यह समस्त शास्त्रों में कहा गया है; सदाचार का फल महान है।

श्लोक 98 (devibhagavatam.11.24.98)

आचारवान्सदा पूतः सदैवाचारवान्मसुखी । आचारवान्सदा धन्यः सत्यं सत्यं च नारद ॥

ācāravānsadā pūtaḥ sadaivācāravānmasukhī ācāravānsadā dhanyaḥ satyaṁ satyaṁ ca nārada

आचारवान सदा पवित्र होता है, आचारवान सदा सुखी होता है, आचारवान सदा धन्य होता है — हे नारद! यह सत्य है, अत्यंत सत्य है।

श्लोक 99 (devibhagavatam.11.24.99)

देवीप्रसादजनकं सदाचारविधानकम् । यदपि शृणुयान्मर्त्यो महासम्पत्तिसौख्यभाक् ॥

devīprasādajanakaṁ sadācāravidhānakam yadapi śṛṇuyānmartyo mahāsampattisaukhyabhāk

देवी की कृपा को उत्पन्न करने वाला यह सदाचार-विधान, जिसे मनुष्य सुनता भी है, वह महासम्पत्ति और सुख का भागी बन जाता है।

श्लोक 100 (devibhagavatam.11.24.100)

सदाचारेण सिद्धेच्च ऐहिकामुष्मिकं सुखम् । तदेव ते मया प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥

sadācāreṇa siddhecca aihikāmuṣmikaṁ sukham tadeva te mayā proktaṁ kimanyacchrotumicchasi

सदाचार से इस लोक और परलोक दोनों का सुख सिद्ध होता है। यही मैंने तुम्हें बताया है — अब और क्या सुनना चाहते हो?

अध्याय 23अध्याय-सूची