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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1

मत्स्यगन्धा का जन्म

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (devibhagavatam.2.1.1)

ऋषय ऊचुः । आश्चर्यकरमेतत्ते वचनं गर्भहेतुकम् । सन्देहोऽत्र समुत्पन्नः सर्वेषां नस्तपस्विनाम्

ṛṣaya ūcuḥ āścaryakarametatte vacanaṁ garbhahetukam sandeho'tra samutpannaḥ sarveṣāṁ nastapasvinām

ऋषियों ने कहा — आपका यह वचन अत्यन्त आश्चर्यजनक है, जिसका सम्बन्ध (व्यास जी के) गर्भ-हेतु से है। इससे हम सब तपस्वियों के मन में संदेह उत्पन्न हो गया है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.2.1.2)

माता व्यासस्य मेधाविन्नाम्ना सत्यवतीति च । विवाहिता पुरा ज्ञाता राज्ञा शन्तनुना यथा

mātā vyāsasya medhāvinnāmnā satyavatīti ca vivāhitā purā jñātā rājñā śantanunā yathā

व्यास जी की माता का नाम बुद्धिमती सत्यवती था, यह हमें ज्ञात है, और यह भी कि वे पूर्वकाल में राजा शन्तनु द्वारा विवाही गयीं।

श्लोक 3 (devibhagavatam.2.1.3)

तस्याः पुत्रः कथं व्यासः सती स्वभवने स्थिता । ईदृशी सा कथं राज्ञा पुनः शन्तनुना वृता

tasyāḥ putraḥ kathaṁ vyāsaḥ satī svabhavane sthitā īdṛśī sā kathaṁ rājñā punaḥ śantanunā vṛtā

तो फिर सती (पतिव्रता) और अपने ही घर में रहने वाली वह स्त्री व्यास की माता कैसे बनी? और ऐसी वह पुनः राजा शन्तनु द्वारा किस प्रकार वरण की गयी?

श्लोक 4 (devibhagavatam.2.1.4)

तस्यां पुत्रावुभौ जातौ तत्त्वं कथय सुव्रत । विस्तरेण महाभाग कथां परमपावनीम्

tasyāṁ putrāvubhau jātau tattvaṁ kathaya suvrata vistareṇa mahābhāga kathāṁ paramapāvanīm

हे सुव्रत! उनसे दो पुत्र कैसे उत्पन्न हुए, वह सारा तत्त्व हमें विस्तार से कहिए। हे महाभाग! वह परम पवित्र कथा हमें सुनाइए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.2.1.5)

उत्पत्तिं वद व्यासस्य सत्यवत्यास्तथा पुनः । श्रोतुकामाः पुनः सर्वे ऋषयः संशितव्रताः

utpattiṁ vada vyāsasya satyavatyāstathā punaḥ śrotukāmāḥ punaḥ sarve ṛṣayaḥ saṁśitavratāḥ

व्यास जी की उत्पत्ति और उसी प्रकार सत्यवती की उत्पत्ति भी हमें बताइए, क्योंकि हम सभी उत्तम व्रतधारी ऋषि उसे सुनने के इच्छुक हैं।

श्लोक 6 (devibhagavatam.2.1.6)

सूत उवाच । प्रणम्य परमां शक्तिं चतुर्वर्गप्रदायिनीम् । आदिशक्तिं वदिष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्

sūta uvāca praṇamya paramāṁ śaktiṁ caturvargapradāyinīm ādiśaktiṁ vadiṣyāmi kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām

सूत जी ने कहा — चारों पुरुषार्थों को देने वाली परम शक्ति को प्रणाम करके मैं वह शुभ पौराणिक कथा, आदिशक्ति (के विषय में), कहूँगा।

श्लोक 7 (devibhagavatam.2.1.7)

यस्योच्चारणमात्रेण सिद्धिर्भवति शाश्वती । व्याजेनापि हि बीजस्य वाग्भवस्य विशेषतः

yasyoccāraṇamātreṇa siddhirbhavati śāśvatī vyājenāpi hi bījasya vāgbhavasya viśeṣataḥ

जिसके केवल उच्चारण मात्र से शाश्वत सिद्धि प्राप्त हो जाती है, विशेषतः वाणी के मूल बीज (मन्त्र) के व्याज से भी।

श्लोक 8 (devibhagavatam.2.1.8)

सम्यक् सर्वात्मना सर्वैः सर्वकामार्थसिद्धये । स्मर्तव्या सर्वथा देवी वाञ्छितार्थप्रदायिनी

samyak sarvātmanā sarvaiḥ sarvakāmārthasiddhaye smartavyā sarvathā devī vāñchitārthapradāyinī

सब कामनाओं और अर्थों की सिद्धि के लिए, सबके द्वारा, पूर्ण रूप से सर्वात्मरूपिणी वांछित-अर्थ-प्रदायिनी देवी का सर्वदा स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 9 (devibhagavatam.2.1.9)

राजोपरिचरो नाम धार्मिकः सत्यसङ्गरः । चेदिदेशपतिः श्रीमान् बभूव द्विजपूजकः

rājoparicaro nāma dhārmikaḥ satyasaṅgaraḥ cedideśapatiḥ śrīmān babhūva dvijapūjakaḥ

राजोपरिचर नामक एक राजा थे, जो धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, चेदि देश के स्वामी, श्रीमान् और ब्राह्मणों के पूजक थे।

श्लोक 10 (devibhagavatam.2.1.10)

तपसा तस्य तुष्टेन विमानं स्फाटिकं शुभम् । दत्तमिन्द्रेण तत्तस्मै सुन्दरं प्रियकाम्यया

tapasā tasya tuṣṭena vimānaṁ sphāṭikaṁ śubham dattamindreṇa tattasmai sundaraṁ priyakāmyayā

उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर इन्द्र ने उन्हें प्रेमवश एक सुंदर, शुभ स्फटिक का विमान भेंट किया।

श्लोक 11 (devibhagavatam.2.1.11)

तेनारूढस्तु सर्वत्र याति दिव्येन भूपतिः । न भूमावुपरिस्थोऽसौ तेनोपरिचरो वसुः

tenārūḍhastu sarvatra yāti divyena bhūpatiḥ na bhūmāvuparistho'sau tenoparicaro vasuḥ

उस दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर वह राजा सर्वत्र विचरण करता था; पृथ्वी पर न रहने के कारण ही वह 'उपरिचर वसु' कहलाया।

श्लोक 12 (devibhagavatam.2.1.12)

विख्यातः सर्वलोकेषु धर्मनित्यः स भूपतिः । तस्य भार्या वरारोहा गिरिका नाम सुन्दरी

vikhyātaḥ sarvalokeṣu dharmanityaḥ sa bhūpatiḥ tasya bhāryā varārohā girikā nāma sundarī

वह राजा सब लोकों में विख्यात और सदा धर्मपरायण था। उसकी सुंदरी पत्नी का नाम गिरिका था, जो अत्यंत सुडौल थी।

श्लोक 13 (devibhagavatam.2.1.13)

पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः । पृथग्देशेषु राजानः स्थापितास्तेन भूभुजा

putrāścāsya mahāvīryāḥ pañcāsannamitaujasaḥ pṛthagdeśeṣu rājānaḥ sthāpitāstena bhūbhujā

उसके अत्यंत पराक्रमी और असीम तेजस्वी पाँच पुत्र थे, जिन्हें उस भूपति ने अलग-अलग देशों में राजा के रूप में स्थापित किया।

श्लोक 14 (devibhagavatam.2.1.14)

वसोस्तु पत्नी गिरिका कामान् काले न्यवेदयत् । ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः

vasostu patnī girikā kāmān kāle nyavedayat ṛtukālamanuprāptā snātā puṁsavane śuciḥ

एक बार वसु की पत्नी गिरिका ने ऋतुकाल प्राप्त होने पर, स्नान करके पवित्र होकर, अपनी पुत्रोत्पत्ति की कामना उसे निवेदित की।

श्लोक 15 (devibhagavatam.2.1.15)

तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति । तच्छुत्वा चिन्तयामास भार्यामृतुमतीं तथा

tadahaḥ pitaraścainamūcurjahi mṛgāniti tacchutvā cintayāmāsa bhāryāmṛtumatīṁ tathā

उसी दिन पितरों ने उसे स्मरण कराते हुए कहा — 'मृगों का वध करो' (श्राद्ध के लिए मांस चाहिए)। यह सुनकर उसने अपनी ऋतुमती पत्नी का भी विचार किया।

श्लोक 16 (devibhagavatam.2.1.16)

पितृवाक्यं गुरुं मत्वा कर्तव्यमिति निश्चितम् । चचार मृगयां राजा गिरिकां मनसा स्मरन्

pitṛvākyaṁ guruṁ matvā kartavyamiti niścitam cacāra mṛgayāṁ rājā girikāṁ manasā smaran

पितरों की आज्ञा को गुरुतर मानकर उसे कर्तव्य निश्चित समझते हुए, राजा मन में गिरिका का स्मरण करता हुआ मृगया के लिए वन में गया।

श्लोक 17 (devibhagavatam.2.1.17)

वने स्थितः स राजर्षिश्चित्ते सस्मार भामिनीम् । अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम्

vane sthitaḥ sa rājarṣiścitte sasmāra bhāminīm atīva rūpasampannāṁ sākṣācchriyamivāparām

वन में स्थित वह राजर्षि मन ही मन उस सुंदरी का स्मरण करने लगा, जो अत्यंत रूपसंपन्न थी, मानो साक्षात् दूसरी लक्ष्मी हो।

श्लोक 18 (devibhagavatam.2.1.18)

तस्य रेतः प्रचस्कन्द स्मरतस्तां च कामिनीम् । वटपत्रे तु तद्राजा स्कन्नमात्रं समाक्षिपत्

tasya retaḥ pracaskanda smaratastāṁ ca kāminīm vaṭapatre tu tadrājā skannamātraṁ samākṣipat

उसका स्मरण करते हुए और उस कामिनी का ध्यान करते हुए उसका वीर्य स्खलित हो गया; राजा ने उस स्खलित वीर्य को एक वटपत्र में समेट लिया।

श्लोक 19 (devibhagavatam.2.1.19)

इदं वृथा परिस्कन्नं रेतो वै न भवेत्कथम् । ऋतुकालं च विज्ञाय मतिं चक्रे नृपस्तदा

idaṁ vṛthā pariskannaṁ reto vai na bhavetkatham ṛtukālaṁ ca vijñāya matiṁ cakre nṛpastadā

उसने सोचा — 'यह वीर्य व्यर्थ नष्ट कैसे हो सकता है?' और तब ऋतुकाल को जानकर राजा ने एक उपाय सोचा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.2.1.20)

अमोघं सर्वथा वीर्यं मम चैतन्न संशयः । प्रियायै प्रेषयाम्येतदिति बुद्धिमकल्पयत्

amoghaṁ sarvathā vīryaṁ mama caitanna saṁśayaḥ priyāyai preṣayāmyetaditi buddhimakalpayat

'मेरा यह वीर्य सर्वथा अमोघ है, इसमें संदेह नहीं। इसे मैं प्रिया के पास भेजता हूँ' — ऐसा विचार उसने बनाया।

श्लोक 21 (devibhagavatam.2.1.21)

शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य सः । अभिमन्त्र्याथ तद्वीर्यं वटपर्णपुटे कृतम्

śukraprasthāpane kālaṁ mahiṣyāḥ prasamīkṣya saḥ abhimantryātha tadvīryaṁ vaṭaparṇapuṭe kṛtam

रानी के ऋतुकाल के समय को भली-भाँति देखकर, उस वीर्य को मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके, उसने उसे वटपत्र की पुटी में रख दिया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.2.1.22)

पार्श्वस्थं श्येनमाभाष्य राजोवाच द्विजं प्रति । गृहाणेदं महाभाग गच्छ शीघ्रं गृहं मम

pārśvasthaṁ śyenamābhāṣya rājovāca dvijaṁ prati gṛhāṇedaṁ mahābhāga gaccha śīghraṁ gṛhaṁ mama

पास ही खड़े एक बाज़ को बुलाकर राजा ने उस पक्षी से कहा — 'हे महाभाग! इसे ग्रहण करो और शीघ्र मेरे घर जाओ।

श्लोक 23 (devibhagavatam.2.1.23)

मत्प्रियार्थमिदं सौम्य गृहीत्वा त्वं गृहं नय । गिरिकायै प्रयच्छाशु तस्यास्त्वार्तवमद्य वै

matpriyārthamidaṁ saumya gṛhītvā tvaṁ gṛhaṁ naya girikāyai prayacchāśu tasyāstvārtavamadya vai

हे सौम्य! मेरी प्रिया के लिए इसे लेकर तुम घर ले जाओ, और शीघ्र ही गिरिका को दे देना, क्योंकि आज ही उसका ऋतुकाल है।'

श्लोक 24 (devibhagavatam.2.1.24)

सूत उवाच । इत्युक्त्वा प्रददौ पर्णं श्येनाय नृपसत्तमः । स गृहीत्वोत्पपाताशु गगनं गतिवित्तमः

sūta uvāca ityuktvā pradadau parṇaṁ śyenāya nṛpasattamaḥ sa gṛhītvotpapātāśu gaganaṁ gativittamaḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ राजा ने वह पत्ता बाज़ को सौंप दिया। उसे लेकर वह तीव्रगामी पक्षी तुरंत आकाश में उड़ गया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.2.1.25)

गच्छन्तं गगनं श्येनं धृत्वा चञ्चुपुटे पुटम् । तमपश्यदथायान्तं खगं श्येनस्तथापरः

gacchantaṁ gaganaṁ śyenaṁ dhṛtvā cañcupuṭe puṭam tamapaśyadathāyāntaṁ khagaṁ śyenastathāparaḥ

आकाश में जाते हुए उस बाज़ को, जिसने उस पुटी को अपनी चोंच में पकड़ रखा था, दूसरे एक बाज़ ने आते हुए देख लिया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.2.1.26)

आमिषं स तु विज्ञाय शीघ्रमभ्यद्रवत्खगम् । तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः

āmiṣaṁ sa tu vijñāya śīghramabhyadravatkhagam tuṇḍayuddhamathākāśe tāvubhau sampracakratuḥ

वह उसे मांस समझकर तुरंत उस पक्षी पर झपटा; तब आकाश में दोनों में चोंचों से युद्ध होने लगा।

श्लोक 27 (devibhagavatam.2.1.27)

युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तज्जापि यमुनाम्भसि । खगौ तौ निर्गतौ कामं पुटके पतिते तदा

yuddhyatorapatadretastajjāpi yamunāmbhasi khagau tau nirgatau kāmaṁ puṭake patite tadā

लड़ते हुए उनका वह वीर्य (गिरा) यमुना के जल में जा गिरा; तभी वह पुटी टूट गई और दोनों पक्षी अपनी-अपनी इच्छा से चले गए।

श्लोक 28 (devibhagavatam.2.1.28)

एतस्मिन्समये काचिद्अद्रिका नाम चाप्सराः । ब्राह्मणं समनुप्राप्तं सन्ध्यावन्दनतत्परम्

etasminsamaye kācidadrikā nāma cāpsarāḥ brāhmaṇaṁ samanuprāptaṁ sandhyāvandanatatparam

उसी समय अद्रिका नामक एक अप्सरा वहाँ थी, जो संध्या-वन्दन में तत्पर एक ब्राह्मण के निकट आ पहुँची थी।

श्लोक 29 (devibhagavatam.2.1.29)

कुर्वन्ती जलकेलिं सा जले मग्ना चचार सा । जग्राह चरणं नारी द्विजस्य वरवर्णिनी

kurvantī jalakeliṁ sā jale magnā cacāra sā jagrāha caraṇaṁ nārī dvijasya varavarṇinī

जल में क्रीड़ा करती हुई वह स्त्री जल में डूबी हुई विचरण कर रही थी; उस सुंदर वर्ण वाली स्त्री ने उस द्विज का पैर पकड़ लिया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.2.1.30)

प्राणायामपरः सोऽथ दृष्ट्वा तां कामचारिणीम् । शशाप भव मत्स्यी त्वं ध्यानविघ्नकरी यतः

prāṇāyāmaparaḥ so'tha dṛṣṭvā tāṁ kāmacāriṇīm śaśāpa bhava matsyī tvaṁ dhyānavighnakarī yataḥ

प्राणायाम में तत्पर उस ब्राह्मण ने स्वेच्छाचारिणी उस अप्सरा को देखकर शाप दिया — 'चूँकि तूने मेरे ध्यान में विघ्न डाला है, इसलिए तू मछली हो जा!'

श्लोक 31 (devibhagavatam.2.1.31)

सा शप्ता विप्रमुख्येन बभूव यमुनाचरी । शफरी रूपसम्पन्ना ह्यद्रिका च वराप्सराः

sā śaptā vipramukhyena babhūva yamunācarī śapharī rūpasampannā hyadrikā ca varāpsarāḥ

उस श्रेष्ठ विप्र द्वारा शापित होकर वह श्रेष्ठ अप्सरा अद्रिका यमुना में विचरने वाली सुंदर रूप वाली शफरी (मछली) बन गई।

श्लोक 32 (devibhagavatam.2.1.32)

श्येनपादपरिभ्रष्टं तच्छुक्रमथ वासवी । जग्राह तरसाभ्येत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी

śyenapādaparibhraṣṭaṁ tacchukramatha vāsavī jagrāha tarasābhyetya sādrikā matsyarūpiṇī

बाज़ के पंजे से गिरे हुए उस वीर्य को उस मत्स्यरूपिणी अद्रिका, जो वासव-कुल की थी, ने तुरंत आगे बढ़कर वेगपूर्वक ग्रहण कर लिया।

श्लोक 33 (devibhagavatam.2.1.33)

अथ कालेन कियता मत्स्यीं तां मत्स्यजीवनः । सम्प्राप्ते दशमे मासि बबन्ध तां मनोरमाम्

atha kālena kiyatā matsyīṁ tāṁ matsyajīvanaḥ samprāpte daśame māsi babandha tāṁ manoramām

फिर कुछ समय के पश्चात्, दसवें महीने में, एक मछुए ने उस मनोहर मत्स्यरूपा (मछली) को पकड़ लिया।

श्लोक 34 (devibhagavatam.2.1.34)

उदरं विददाराशु स तस्या मत्स्यजीवनः । युग्मं विनिःसृतं तस्मादुदरान्मानुषाकृति

udaraṁ vidadārāśu sa tasyā matsyajīvanaḥ yugmaṁ viniḥsṛtaṁ tasmādudarānmānuṣākṛti

उस मछुए ने तुरंत उसका पेट चीर डाला, और उसके पेट से मानव-आकृति वाले दो जुड़वाँ शिशु निकले।

श्लोक 35 (devibhagavatam.2.1.35)

बालः कुमारः सुभगस्तथा कन्या शुभानना । दृष्ट्वाश्चर्यमिदं सोऽथ विस्मयं परमं गतः

bālaḥ kumāraḥ subhagastathā kanyā śubhānanā dṛṣṭvāścaryamidaṁ so'tha vismayaṁ paramaṁ gataḥ

एक सुंदर बालक कुमार था और दूसरी शुभमुखी कन्या थी। यह आश्चर्य देखकर वह मछुआ अत्यंत विस्मय को प्राप्त हुआ।

श्लोक 36 (devibhagavatam.2.1.36)

राज्ञे निवेदयामास पुत्रौ द्वौ तु झषोद्भवौ । राजापि विस्मयाविष्टः सुतं जग्राह तं शुभम्

rājñe nivedayāmāsa putrau dvau tu jhaṣodbhavau rājāpi vismayāviṣṭaḥ sutaṁ jagrāha taṁ śubham

उसने राजा को मछली से उत्पन्न उन दोनों पुत्रों की सूचना दी। राजा भी विस्मय से भरकर उस सुंदर पुत्र को अपने पास ले आया।

श्लोक 37 (devibhagavatam.2.1.37)

स मत्स्यो नाम राजासौ धार्मिकः सत्यसङ्गरः । वसुपुत्रो महातेजाः पित्रा तुल्यपराक्रमः

sa matsyo nāma rājāsau dhārmikaḥ satyasaṅgaraḥ vasuputro mahātejāḥ pitrā tulyaparākramaḥ

वह मत्स्य नामक राजा धार्मिक, सत्यप्रतिज्ञ, वसु का पुत्र, महातेजस्वी और अपने पिता के समान पराक्रमी हुआ।

श्लोक 38 (devibhagavatam.2.1.38)

कालिका वसुना दत्ता तरसा जलजीविने । नाम्ना कालीति विख्याता तथा मत्स्योदरीति च

kālikā vasunā dattā tarasā jalajīvine nāmnā kālīti vikhyātā tathā matsyodarīti ca

उस कन्या को वसु ने तुरंत उस मछुए को दे दिया; वह नाम से 'काली' और 'मत्स्योदरी' के नाम से विख्यात हुई।

श्लोक 39 (devibhagavatam.2.1.39)

मत्स्यगन्धेति नाम्ना वै गणेन समजायत । विवर्धमाना दाशस्य गृहे सा वासवी शुभा

matsyagandheti nāmnā vai gaṇena samajāyata vivardhamānā dāśasya gṛhe sā vāsavī śubhā

वह वासव-कुल की शुभा कन्या मत्स्यगन्धा नाम से भी प्रसिद्ध हुई, और मछुए के समुदाय में ही बढ़ती गई।

श्लोक 40 (devibhagavatam.2.1.40)

ऋषय ऊचुः । अद्रिका मुनिना शप्ता मत्स्यी जाता वराप्सराः । विदारिता च दाशेन मृता च भक्षिता पुनः

ṛṣaya ūcuḥ adrikā muninā śaptā matsyī jātā varāpsarāḥ vidāritā ca dāśena mṛtā ca bhakṣitā punaḥ

ऋषियों ने कहा — मुनि के शाप से अद्रिका मछली बनी, वह उत्तम अप्सरा; फिर मछुए द्वारा चीरी गई और मर कर पुनः खाई गई।

श्लोक 41 (devibhagavatam.2.1.41)

किं बभूव पुनस्तस्या अप्सराया वदस्व तत् । शापस्यान्तं कथं सूत कथं स्वर्गमवाप सा

kiṁ babhūva punastasyā apsarāyā vadasva tat śāpasyāntaṁ kathaṁ sūta kathaṁ svargamavāpa sā

उस अप्सरा का इसके बाद क्या हुआ, वह हमें बताइए। हे सूत! उसके शाप का अंत किस प्रकार हुआ, और वह स्वर्ग को कैसे प्राप्त हुई?

श्लोक 42 (devibhagavatam.2.1.42)

सूत उवाच । शप्ता यदा सा मुनिना विस्मिता सम्बभूव ह । स्तुतिं चकार विप्रस्य दीनेव रुदती तदा

sūta uvāca śaptā yadā sā muninā vismitā sambabhūva ha stutiṁ cakāra viprasya dīneva rudatī tadā

सूत जी ने कहा — जब वह उस मुनि के द्वारा शापित हुई, तब वह अत्यंत विस्मित हो गई और रोती हुई दीन भाव से उस विप्र की स्तुति करने लगी।

श्लोक 43 (devibhagavatam.2.1.43)

दयावान्ब्राह्मणः प्राह तां तदा रुदतीं स्त्रियम् । मा शोकं कुरु कल्याणि शापान्तं ते वदाम्यहम्

dayāvānbrāhmaṇaḥ prāha tāṁ tadā rudatīṁ striyam mā śokaṁ kuru kalyāṇi śāpāntaṁ te vadāmyaham

दयालु उस ब्राह्मण ने रोती हुई उस स्त्री से कहा — 'हे कल्याणी! शोक मत करो, मैं तुझे तेरे शाप का अंत बताता हूँ।

श्लोक 44 (devibhagavatam.2.1.44)

मत्कोधशापयोगेन मत्स्ययोनिं गता शुभे । मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि

matkodhaśāpayogena matsyayoniṁ gatā śubhe mānuṣau janayitvā tvaṁ śāpamokṣamavāpsyasi

मेरे क्रोधवश दिए गए इस शाप के प्रभाव से हे शुभे! तू मत्स्य-योनि को प्राप्त हुई है। दो मनुष्यों को जन्म देकर तुझे शाप से मुक्ति मिलेगी।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.2.1.45)

इत्युक्ता तेन सा प्राप मत्स्यदेहं नदीजले । बालकौ जनयित्वा सा मृता मुक्ता च शापतः

ityuktā tena sā prāpa matsyadehaṁ nadījale bālakau janayitvā sā mṛtā muktā ca śāpataḥ

ऐसा कहे जाने पर वह नदी के जल में मत्स्य-देह को प्राप्त हुई; दो बालकों को जन्म देकर वह शाप से मुक्त हुई और मर गई (अपने मत्स्य-रूप से)।

श्लोक 46 (devibhagavatam.2.1.46)

सन्त्यज्य रूपं मत्स्यस्य दिव्यरूपमवाप्य च । जगामामरमार्गं च शापान्ते वरवर्णिनी

santyajya rūpaṁ matsyasya divyarūpamavāpya ca jagāmāmaramārgaṁ ca śāpānte varavarṇinī

मत्स्य के रूप को त्यागकर और दिव्य रूप प्राप्त करके, शाप की समाप्ति पर वह सुंदर वर्ण वाली अप्सरा देवताओं के मार्ग को चली गई।

श्लोक 47 (devibhagavatam.2.1.47)

एवं जाता वरा पुत्री मत्स्यगन्धा वरानना । पुत्रीव पाल्यमाना सा दाशगेहे व्यवर्धत

evaṁ jātā varā putrī matsyagandhā varānanā putrīva pālyamānā sā dāśagehe vyavardhata

इस प्रकार उत्पन्न हुई वह श्रेष्ठ सुंदरमुखी पुत्री मत्स्यगन्धा, पुत्री की भाँति पाली जाती हुई, मछुए के घर में ही बड़ी हुई।

श्लोक 48 (devibhagavatam.2.1.48)

मत्स्यगन्धा तदा जाता किशोरी चातिसुप्रभा । तस्य कार्याणि कुर्वाणा वासवी चातिसुप्रभा

matsyagandhā tadā jātā kiśorī cātisuprabhā tasya kāryāṇi kurvāṇā vāsavī cātisuprabhā

उस समय अत्यंत तेजस्विनी और किशोरावस्था को प्राप्त हुई मत्स्यगन्धा, वासव-कुल की वह कन्या, अपने (पिता तुल्य मछुए के) कार्यों में हाथ बँटाती रहती थी।

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