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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4

भयभीत इन्द्रादि देवों का बृहस्पति से परामर्श

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.4.1)

व्यास उवाच । गते दूते सुरेन्द्रोऽपि समाहूय सुरानथ । यमवायुधनाध्यक्षवरुणानिदमूचिवान्

vyāsa uvāca | gate dūte surendro'pi samāhūya surānatha | yamavāyudhanādhyakṣavaruṇānidamūcivān

व्यास जी ने कहा — दूत के चले जाने पर, इन्द्र ने भी यम, वायु, धनाध्यक्ष (कुबेर) और वरुण आदि देवताओं को बुलाकर यह कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.4.2)

महिषो नाम दैत्येन्द्रो रम्भपुत्रो महाबलः । वरदर्पमदोन्मत्तो मायाशतविचक्षणः

mahiṣo nāma daityendro rambhaputro mahābalaḥ | varadarpamadonmatto māyāśatavicakṣaṇaḥ

'महिष नामक एक दैत्येन्द्र है, रम्भ का पुत्र, महाबली — वह वरदान के गर्व से उन्मत्त है और सैकड़ों प्रकार की माया में निपुण है।'

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.4.3)

तस्य दूतोऽद्य सम्प्राप्तः प्रेषितस्तेन भोः सुराः । स्वर्गकामेन लुब्धेन मामुवाचेदृशं वचः

tasya dūto'dya samprāptaḥ preṣitastena bhoḥ surāḥ | svargakāmena lubdhena māmuvācedṛśaṁ vacaḥ

'हे देवो! उसका दूत आज मेरे पास आया, जिसे उसने भेजा था — स्वर्ग का लोभी वह मुझसे इस प्रकार बोला —'

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.4.4)

त्यज देवालयं शक्र यथेच्छं व्रज वासव । सेवां वा कुरु दैत्यस्य महिषस्य महात्मनः

tyaja devālayaṁ śakra yathecchaṁ vraja vāsava | sevāṁ vā kuru daityasya mahiṣasya mahātmanaḥ

'"हे शक्र! देवलोक त्याग दो, जहाँ चाहो चले जाओ, हे वासव! अथवा महात्मा दैत्य महिष की सेवा करो।"'

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.4.5)

दयावान्दानवेन्द्रोऽसौ स ते वृत्तिं विधास्यति । नतेषु भृत्यभूतेषु न कुप्यति कदाचन

dayāvāndānavendro'sau sa te vṛttiṁ vidhāsyati | nateṣu bhṛtyabhūteṣu na kupyati kadācana

'"वह दानवेन्द्र दयालु है; वह तुम्हारी वृत्ति की व्यवस्था कर देगा। जो सेवक बनकर नत हो जाते हैं, उन पर वह कभी क्रोध नहीं करता।"'

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.4.6)

नोचेद्युद्धाय देवेश सेनोद्योगं कुरु स्वयम् । गते मयि स दैत्येन्द्रस्त्वरितः समुपेष्यति

nocedyuddhāya deveśa senodyogaṁ kuru svayam | gate mayi sa daityendrastvaritaḥ samupeṣyati

'"अन्यथा, हे देवेश! तुम स्वयं युद्ध के लिए सेना तैयार करो; मेरे लौटते ही वह दैत्येन्द्र शीघ्र आ पहुँचेगा।"'

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.4.7)

इत्युक्त्वा स गतो दूतो दानवस्य दुरात्मनः । किं कर्तव्यमतः कार्यं चिन्तयध्वं सुरोत्तमाः

ityuktvā sa gato dūto dānavasya durātmanaḥ | kiṁ kartavyamataḥ kāryaṁ cintayadhvaṁ surottamāḥ

'ऐसा कहकर उस दुरात्मा दानव का दूत चला गया। अतः हे सुरोत्तमो! अब क्या करना चाहिए, इस पर विचार करो।'

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.4.8)

दुर्बलोऽपि न चोपेक्ष्यः शत्रुर्बलवता सुराः । विशेषेण सदोद्योगी बलवान्बलदर्पितः

durbalo'pi na copekṣyaḥ śatrurbalavatā surāḥ | viśeṣeṇa sadodyogī balavānbaladarpitaḥ

'हे देवो! शक्तिशाली को भी दुर्बल शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए — विशेष रूप से जब वह सदा उद्योगी, बलवान् और बल से गर्वित हो।'

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.4.9)

उद्यमः किल कर्तव्यो यथाबुद्धि यथाबलम् । दैवाधीनो भवेन्नूनं जयो वाथ पराजयः

udyamaḥ kila kartavyo yathābuddhi yathābalam | daivādhīno bhavennūnaṁ jayo vātha parājayaḥ

'बुद्धि और बल के अनुसार उद्योग तो अवश्य करना चाहिए; परन्तु जय अथवा पराजय निश्चय ही दैव के अधीन है।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.4.10)

सन्धियोगो न चात्रास्ति खले सन्धिर्निरर्थकः । सर्वथा साधुभिः कार्यं विचार्य च पुनः पुनः

sandhiyogo na cātrāsti khale sandhirnirarthakaḥ | sarvathā sādhubhiḥ kāryaṁ vicārya ca punaḥ punaḥ

'यहाँ सन्धि की कोई सम्भावना नहीं है — दुष्ट के साथ सन्धि निरर्थक है। सज्जनों को हर प्रकार से बार-बार विचार करके ही यह कार्य करना चाहिए।'

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.4.11)

यानमप्यधुना नैव कर्तव्यं सहसा पुनः । प्रेक्षकाः प्रेषणीयाश्च शीघ्रगाः सुप्रवेशकाः

yānamapyadhunā naiva kartavyaṁ sahasā punaḥ | prekṣakāḥ preṣaṇīyāśca śīghragāḥ supraveśakāḥ

'अभी शीघ्रता में सैन्य-अभियान भी नहीं करना चाहिए। ऐसे गुप्तचर भेजने चाहिए, जो शीघ्रगामी हों और सरलता से प्रवेश पा सकें —'

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.4.12)

इङ्गितज्ञाश्च निःसङ्गा निःस्पृहाः सत्यवादिनः । सेनाभियोगं प्रस्थानं बलसङ्ख्यां यथार्थतः

iṅgitajñāśca niḥsaṅgā niḥspṛhāḥ satyavādinaḥ | senābhiyogaṁ prasthānaṁ balasaṅkhyāṁ yathārthataḥ

'— जो संकेतों को समझने वाले, निःसंग, निःस्पृह और सत्यवादी हों — जो सेना की तैनाती, प्रस्थान तथा वास्तविक बल-संख्या का यथार्थ ज्ञान दे सकें।'

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.4.13)

वीराणां च परिज्ञानं कृत्वायान्तु त्वरान्विताः । ज्ञात्वा दैत्यपतेस्तस्य सैन्यस्य च बलाबलम्

vīrāṇāṁ ca parijñānaṁ kṛtvāyāntu tvarānvitāḥ | jñātvā daityapatestasya sainyasya ca balābalam

'वे उस दैत्यपति और उसकी सेना के बल-अबल को तथा वीरों की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर शीघ्र लौट आएँ।'

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.4.14)

करिष्यामि ततस्तूर्णं यानं वा दुर्गसङ्ग्रहम् । विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं बुद्धिमता सदा । सहसा विहितं कार्यं दुःखदं सर्वथा भवेत्

kariṣyāmi tatastūrṇaṁ yānaṁ vā durgasaṅgraham | vicārya khalu kartavyaṁ kāryaṁ buddhimatā sadā | sahasā vihitaṁ kāryaṁ duḥkhadaṁ sarvathā bhavet

'तब मैं शीघ्र ही यह निश्चय करूँगा कि सैन्य-प्रस्थान करना है अथवा दुर्ग की सुरक्षा करनी है। बुद्धिमान् को सदा विचारपूर्वक ही कार्य करना चाहिए — शीघ्रता में किया गया कार्य सर्वथा दुःखदायी होता है।'

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.4.15)

तस्माद्विमृश्य कर्तव्यं सुखदं सर्वथा बुधैः । नात्र भेदविधिर्न्याय्यो दानवेषु च सर्वथा

tasmādvimṛśya kartavyaṁ sukhadaṁ sarvathā budhaiḥ | nātra bhedavidhirnyāyyo dānaveṣu ca sarvathā

'इसलिए विद्वानों को सदा विचारपूर्वक ही सुखदायी कार्य करना चाहिए; और यहाँ दानवों में फूट डालने की नीति भी सर्वथा उचित नहीं है।'

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.4.16)

एकचित्तेषु कार्येऽस्मिंस्तस्माच्चारा व्रजन्तु वै । ज्ञात्वा बलाबलं तेषां पश्चान्नीतिर्विचार्य च

ekacitteṣu kārye'smiṁstasmāccārā vrajantu vai | jñātvā balābalaṁ teṣāṁ paścānnītirvicārya ca

'चूँकि वे इस कार्य में एकचित्त हैं, अतः हमारे गुप्तचर जाएँ; उनके बल-अबल को जानकर, तत्पश्चात् विचारपूर्वक नीति निर्धारित की जाए।'

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.4.17)

विधेया विधिवत्तज्ज्ञैस्तेषु कार्यपरेषु च । अन्यथा विहितं कार्यं विपरीतफलप्रदम्

vidheyā vidhivattajjñaisteṣu kāryapareṣu ca | anyathā vihitaṁ kāryaṁ viparītaphalapradam

'इस विषय के ज्ञाता, कार्यनिष्ठ व्यक्तियों द्वारा ही यह विधिवत् सम्पन्न होना चाहिए — अन्यथा किया गया कार्य विपरीत फल देने वाला होता है।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.4.18)

सर्वथा तद्भवेन्नूनमज्ञातमौषधं यथा । व्यास उवाच । इति सञ्चिन्त्य तैः सर्वैः प्रणिधिं कार्यवेदिनम्

sarvathā tadbhavennūnamajñātamauṣadhaṁ yathā | vyāsa uvāca | iti sañcintya taiḥ sarvaiḥ praṇidhiṁ kāryavedinam

'वह सर्वथा वैसा ही होगा, जैसे किसी अज्ञात औषधि का प्रयोग करना।' व्यास जी ने कहा — इस प्रकार विचार कर उन सबने कार्यकुशल एक गुप्तचर को —

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.4.19)

प्रेषयामास देवेन्द्रः परिज्ञानाय पार्थिव । दूतस्तु त्वरितो गत्वा समागम्य सुराधिपम्

preṣayāmāsa devendraḥ parijñānāya pārthiva | dūtastu tvarito gatvā samāgamya surādhipam

वह दूत शीघ्र जाकर (महिष के शिविर में जानकारी लेकर) लौट आया और सुराधिप इन्द्र के पास उपस्थित हुआ —

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.4.20)

निवेदयामास तदा सर्वसैन्यबलाबलम् । ज्ञात्वा तद्बलमुद्योगं तुराषाडतिविस्मितः

nivedayāmāsa tadā sarvasainyabalābalam | jñātvā tadbalamudyogaṁ turāṣāḍativismitaḥ

— और उसने तब सम्पूर्ण सेना के बल-अबल का विवरण दिया। उस सेना का बल और तैयारी जानकर इन्द्र अत्यंत चकित हुए।

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.4.21)

देवानचोदयत्तूर्णं समाहूय पुरोहितम् । मन्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठं चकार त्रिदशेश्वरः

devānacodayattūrṇaṁ samāhūya purohitam | mantraṁ mantravidāṁ śreṣṭhaṁ cakāra tridaśeśvaraḥ

उन्होंने तुरन्त देवताओं को प्रेरित किया, और अपने पुरोहित — जो मन्त्र-कुशलों में श्रेष्ठ थे — को बुलाकर, उन त्रिदशेश्वर (इन्द्र) ने उनसे परामर्श किया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.4.22)

उवाचाङ्गिरसश्रेष्ठं समासीनं वरासने । इन्द्र उवाच । भो भो देवगुरो विद्वन्किं कर्तव्यं वदस्व नः

uvācāṅgirasaśreṣṭhaṁ samāsīnaṁ varāsane | indra uvāca | bho bho devaguro vidvankiṁ kartavyaṁ vadasva naḥ

उन्होंने उत्तम आसन पर विराजमान आंगिरस-श्रेष्ठ बृहस्पति से कहा। इन्द्र ने कहा — 'हे देवगुरो! हे विद्वन्! हमें बताइए कि क्या करना चाहिए।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.4.23)

सर्वज्ञोऽसि समुत्पन्ने कार्ये त्वं गतिरद्य नः । दानवो महिषो नाम महावीर्यो मदान्वितः

sarvajño'si samutpanne kārye tvaṁ gatiradya naḥ | dānavo mahiṣo nāma mahāvīryo madānvitaḥ

'आप सर्वज्ञ हैं; इस उपस्थित संकट में आज आप ही हमारी एकमात्र गति हैं। महिष नामक एक दानव है, जो महापराक्रमी और मद से युक्त है —'

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.4.24)

योद्धुकामः समायाति बहुभिर्दानवैर्वृतः । तत्र प्रतिक्रिया कार्या त्वया मन्त्रविदाधुना

yoddhukāmaḥ samāyāti bahubhirdānavairvṛtaḥ | tatra pratikriyā kāryā tvayā mantravidādhunā

'— वह युद्ध की इच्छा से अनेक दानवों से घिरा हुआ आ रहा है। हे मन्त्रज्ञ! अब आपको ही इसका प्रतिकार करना है।'

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.4.25)

तेषां शुक्रस्तथा त्वं मे विघ्नहर्ता सुसंयतः । व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह तुरासाहं बृहस्पतिः

teṣāṁ śukrastathā tvaṁ me vighnahartā susaṁyataḥ | vyāsa uvāca | tacchrutvā vacanaṁ prāha turāsāhaṁ bṛhaspatiḥ

'जैसे उनके लिए शुक्राचार्य हैं, वैसे ही आप मेरे लिए हैं, हे सुसंयत! मेरे विघ्नों को हरने वाले।' व्यास जी ने कहा — यह सुनकर बृहस्पति ने इन्द्र से कहा —

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.4.26)

विचिन्त्य मनसा कामं कार्यसाधनतत्परः । गुरुरुवाच । स्वस्थो भव सुरेन्द्र त्वं धैर्यमालम्ब्य मारिष

vicintya manasā kāmaṁ kāryasādhanatatparaḥ | gururuvāca | svastho bhava surendra tvaṁ dhairyamālambya māriṣa

— मन में भलीभाँति विचार कर, कार्य-सिद्धि में तत्पर गुरु बृहस्पति ने कहा — 'हे सुरेन्द्र! हे माननीय! धैर्य धारण कर स्वस्थ रहो।'

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.4.27)

व्यसने च समुत्पन्ने न त्याज्यं धैर्यमाशु वै । जयाजयौ सुराध्यक्ष दैवाधीनौ सदैव हि

vyasane ca samutpanne na tyājyaṁ dhairyamāśu vai | jayājayau surādhyakṣa daivādhīnau sadaiva hi

'विपत्ति उत्पन्न होने पर भी धैर्य को शीघ्र नहीं त्यागना चाहिए। हे सुराध्यक्ष! जय और पराजय सदैव दैव के अधीन होते हैं।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.4.28)

स्थातव्यं धैर्यमालम्ब्य तस्माद् बुद्धिमता सदा । भवितव्यं भवत्येव जानन्नेव शतक्रतो

sthātavyaṁ dhairyamālambya tasmād buddhimatā sadā | bhavitavyaṁ bhavatyeva jānanneva śatakrato

'इसलिए बुद्धिमान् को सदा धैर्य धारण कर स्थिर रहना चाहिए। हे शतक्रतो! जो होनहार है, वह होकर ही रहता है, यह जानते हुए भी —'

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.4.29)

उद्यमः सर्वथा कार्यो यथापौरुषमात्मनः । मुनयोऽपि हि मुक्त्यर्थमुद्यमैकरताः सदा

udyamaḥ sarvathā kāryo yathāpauruṣamātmanaḥ | munayo'pi hi muktyarthamudyamaikaratāḥ sadā

'— फिर भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सदा प्रयत्न करना चाहिए। मुनि लोग भी मुक्ति के लिए सदैव उद्यम में ही रत रहते हैं —'

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.4.30)

दैवाधीनं च जानन्तो योगध्यानपरायणाः । तस्मात्सदैव कर्तव्यो व्यवहारोदितोद्यमः

daivādhīnaṁ ca jānanto yogadhyānaparāyaṇāḥ | tasmātsadaiva kartavyo vyavahāroditodyamaḥ

'— भले ही यह जानते हुए कि सब कुछ दैव के अधीन है, वे योग-ध्यान में तत्पर रहते हैं। इसलिए व्यवहार के अनुसार निर्धारित उद्यम सदैव करना चाहिए।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.4.31)

सुखं भवतु वा मा वा दैवे का परिदेवना । विना पुरुषकारेण कदाचित्सिद्धिमाप्नुयात्

sukhaṁ bhavatu vā mā vā daive kā paridevanā | vinā puruṣakāreṇa kadācitsiddhimāpnuyāt

'सुख मिले या न मिले, दैव पर विलाप करने से क्या लाभ? पुरुषार्थ के बिना कभी भी सिद्धि नहीं मिल सकती।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.4.32)

अन्धवत्पङ्गुवत्कामं न तथा मुदमावहेत् । कृते पुरुषकारेऽपि यदि सिद्धिर्न जायते

andhavatpaṅguvatkāmaṁ na tathā mudamāvahet | kṛte puruṣakāre'pi yadi siddhirna jāyate

'अंधे या लंगड़े व्यक्ति की भाँति (बिना प्रयत्न के) सुख की कामना नहीं करनी चाहिए। यदि पुरुषार्थ करने पर भी सिद्धि न मिले —'

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.4.33)

न तत्र दूषणं तस्य दैवाधीने शरीरिणि । कार्यसिद्धिर्न सैन्येऽस्ति न मन्त्रे न च मन्त्रणे

na tatra dūṣaṇaṁ tasya daivādhīne śarīriṇi | kāryasiddhirna sainye'sti na mantre na ca mantraṇe

'— तो उस देहधारी का, जो दैव के अधीन है, उसमें कोई दोष नहीं है। कार्य की सिद्धि न तो केवल सेना में है, न मन्त्र में, न मन्त्रणा में ही —'

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.4.34)

न रथे नायुधे नूनं दैवाधीना सुराधिप । बलवाङ्क्लेशमाप्नोति निर्बलः सुखमश्नुते

na rathe nāyudhe nūnaṁ daivādhīnā surādhipa | balavāṅkleśamāpnoti nirbalaḥ sukhamaśnute

'— और न रथ अथवा शस्त्र में ही, हे सुराधिप! क्योंकि यह सब दैवाधीन है। बलवान् भी कष्ट पाता है, और निर्बल भी सुख भोगता है।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.4.35)

बुद्धिमान्क्षुधितः शेते निर्बुद्धिर्भोगवान्भवेत् । कातरो जयमाप्नोति शूरो याति पराजयम्

buddhimānkṣudhitaḥ śete nirbuddhirbhogavānbhavet | kātaro jayamāpnoti śūro yāti parājayam

'बुद्धिमान् भूखा सोता है, और मूर्ख भोग-विलास पाता है; कायर विजय पाता है, और शूरवीर पराजित हो जाता है।'

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.4.36)

दैवाधीने तु संसारे कामं का परिदेवना । उद्यमे योजयेन्नूनं भवितव्यं सुराधिप

daivādhīne tu saṁsāre kāmaṁ kā paridevanā | udyame yojayennūnaṁ bhavitavyaṁ surādhipa

'चूँकि यह संसार दैवाधीन है, तो विलाप करने से क्या लाभ? हे सुराधिप! प्रयत्न में तो अवश्य लगना चाहिए, शेष जो होनहार है, वह होगा ही।'

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.4.37)

दुःखदे सुखदे वापि तत्र तौ न विचिन्तयेत् । दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्

duḥkhade sukhade vāpi tatra tau na vicintayet | duḥkhe duḥkhādhikānpaśyetsukhe paśyetsukhādhikam

'दुःखदायी अथवा सुखदायी परिणाम पर अधिक विचार नहीं करना चाहिए। दुःख में स्वयं से अधिक दुःखी लोगों को देखना चाहिए, और सुख में स्वयं से अधिक सुखी लोगों को देखना चाहिए।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.4.38)

आत्मानं हर्षशोकाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत् । धैर्यमेवावगन्तव्यं हर्षशोकोद्भवे बुधैः

ātmānaṁ harṣaśokābhyāṁ śatrubhyāmiva nārpayet | dhairyamevāvagantavyaṁ harṣaśokodbhave budhaiḥ

'हर्ष और शोक को शत्रु के समान समझकर स्वयं को उनके हाथों नहीं सौंपना चाहिए। हर्ष-शोक के उत्पन्न होने पर विद्वानों को केवल धैर्य का ही आश्रय लेना चाहिए।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.4.39)

अधैर्याद्यादृशं दुःखं न तु धैर्येऽस्ति तादृशम् । दुर्लभं सहनत्वं वै समये सुखदुःखयोः

adhairyādyādṛśaṁ duḥkhaṁ na tu dhairye'sti tādṛśam | durlabhaṁ sahanatvaṁ vai samaye sukhaduḥkhayoḥ

'अधैर्य से जैसा दुःख उत्पन्न होता है, वैसा धैर्य में नहीं होता। सुख और दुःख दोनों समयों में समभाव से सहन करने की क्षमता दुर्लभ है।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.4.40)

हर्षशोकोद्भवो यत्र न भवेद् बुद्धिनिश्चयात् । किं दुःखं कस्य वा दुःखं निर्गुणोऽहं सदाव्ययः

harṣaśokodbhavo yatra na bhaved buddhiniścayāt | kiṁ duḥkhaṁ kasya vā duḥkhaṁ nirguṇo'haṁ sadāvyayaḥ

'जहाँ बुद्धि के दृढ़ निश्चय से हर्ष-शोक की उत्पत्ति ही न हो — वहाँ दुःख क्या है, और वह किसका दुःख है? "मैं गुणरहित और सदा अविनाशी हूँ" —'

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.4.41)

चतुर्विंशातिरिक्तोऽस्मि किं मे दुःखं सुखं च किम् । प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमूर्छने

caturviṁśātirikto'smi kiṁ me duḥkhaṁ sukhaṁ ca kim | prāṇasya kṣutpipāse dve manasaḥ śokamūrchane

'"मैं चौबीस तत्त्वों से परे हूँ — मेरे लिए दुःख क्या और सुख क्या? भूख-प्यास प्राण के धर्म हैं, शोक-मोह मन के धर्म हैं।"'

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.4.42)

जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्मिरहितः शिवः । शोकमोहौ शरीरस्य गणौ किं मेऽत्र चिन्तने

jarāmṛtyū śarīrasya ṣaḍūrmirahitaḥ śivaḥ | śokamohau śarīrasya gaṇau kiṁ me'tra cintane

'"जरा-मृत्यु शरीर के धर्म हैं; कल्याणस्वरूप आत्मा षडूर्मियों से रहित है। शोक-मोह भी शरीर के ही गुण हैं — इस चिन्तन में मुझे उनसे क्या लेना-देना?"'

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.4.43)

शरीरं नाहमथवा तत्सम्बन्धी न चाप्यहम् । सप्तैकषोडशादिभ्यो विभिन्नोऽहं सदा सुखी

śarīraṁ nāhamathavā tatsambandhī na cāpyaham | saptaikaṣoḍaśādibhyo vibhinno'haṁ sadā sukhī

'"मैं शरीर नहीं हूँ, और न ही उससे सम्बद्ध हूँ। मैं सप्त, एक, षोडश आदि तत्त्वों से भिन्न हूँ — सदा सुखस्वरूप हूँ।"'

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.4.44)

प्रकृतिर्विकृतिर्नाहं किं मे दुःखं सदा पुनः । इति मत्वा सुरेश त्वं मनसा भव निर्ममः

prakṛtirvikṛtirnāhaṁ kiṁ me duḥkhaṁ sadā punaḥ | iti matvā sureśa tvaṁ manasā bhava nirmamaḥ

'"मैं न प्रकृति हूँ, न उसका विकार — तो मुझे सदा दुःख कैसे हो सकता है?" हे सुरेश! ऐसा जानकर आप मन से ममता-रहित हो जाइए।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.4.45)

उपायः प्रथमोऽयं ते दुःखनाशे शतक्रतो । ममता परमं दुःखं निर्ममत्वं परं सुखम्

upāyaḥ prathamo'yaṁ te duḥkhanāśe śatakrato | mamatā paramaṁ duḥkhaṁ nirmamatvaṁ paraṁ sukham

'हे शतक्रतो! दुःख के नाश का यह प्रथम उपाय है — ममता ही परम दुःख है, और निर्ममता ही परम सुख है।'

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.4.46)

सन्तोषादपरं नास्ति सुखस्थानं शचीपते । अथवा यदि न ज्ञानं ममत्वनाशने किल

santoṣādaparaṁ nāsti sukhasthānaṁ śacīpate | athavā yadi na jñānaṁ mamatvanāśane kila

'हे शचीपते! संतोष से बढ़कर सुख का कोई स्थान नहीं है। अथवा यदि ममत्व-नाश का यह ज्ञान प्राप्त न हो —'

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.4.47)

ततो विवेकः कर्तव्यो भवितव्ये सुराधिप । प्रारब्धकर्मणां नाशो नाभोगाल्लक्ष्यते किल

tato vivekaḥ kartavyo bhavitavye surādhipa | prārabdhakarmaṇāṁ nāśo nābhogāllakṣyate kila

'— तो हे सुराधिप! जो होनहार है, उसके विषय में विवेक अपनाना चाहिए। प्रारब्ध कर्मों का क्षय तो केवल उनके भोग से ही होता देखा जाता है।'

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.4.48)

यद्भावि तद्भवत्येव का चिन्ता सुखदुःखयोः । सुरैः सर्वैः सहायैर्वा बुद्ध्या वा तव सत्तम

yadbhāvi tadbhavatyeva kā cintā sukhaduḥkhayoḥ | suraiḥ sarvaiḥ sahāyairvā buddhyā vā tava sattama

'जो होनहार है, वह होकर ही रहता है — फिर सुख-दुःख की क्या चिन्ता? हे सत्तम! न तो समस्त देवताओं की सहायता से, न बुद्धि से ही यह टाला जा सकता है —'

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.4.49)

सुखं क्षयाय पुण्यस्य दुःखं पापस्य मारिष । तस्मात्सुखक्षये हर्षः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः

sukhaṁ kṣayāya puṇyasya duḥkhaṁ pāpasya māriṣa | tasmātsukhakṣaye harṣaḥ kartavyaḥ sarvathā budhaiḥ

'हे माननीय! सुख पुण्य के क्षय से आता है, और दुःख पाप के क्षय से। इसलिए सुख का क्षय होने पर विद्वानों को सर्वथा प्रसन्न ही होना चाहिए।'

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.4.50)

अथवा मन्त्रयित्वाद्य कुरु यत्नं यथाविधि । कृते यत्ने महाराज भवितव्यं भविष्यति

athavā mantrayitvādya kuru yatnaṁ yathāvidhi | kṛte yatne mahārāja bhavitavyaṁ bhaviṣyati

'अथवा आज मन्त्रणा करके विधिपूर्वक प्रयत्न कीजिए। हे महाराज! प्रयत्न कर लेने पर जो होनहार है, वह हो ही जाएगा।'

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5