Skip to main content

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6

महिषासुर का इन्द्रादि देवों से युद्ध

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.6.1)

व्यास उवाच । ताम्रेऽथ मूर्च्छिते दैत्ये महिषः क्रोधसंयुतः । समुद्यम्य गदां गुर्वीं देवानुपजगाम ह

vyāsa uvāca | tāmre'tha mūrcchite daitye mahiṣaḥ krodhasaṁyutaḥ | samudyamya gadāṁ gurvīṁ devānupajagāma ha

व्यास जी ने कहा — दैत्य ताम्र के मूर्च्छित हो जाने पर, क्रोध से भरा महिष अपनी भारी गदा उठाकर देवताओं की ओर बढ़ा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.6.2)

तिष्ठन्त्वद्य सुराः सर्वे हन्म्यहं गदया किल । सर्वे बलिभुजः कामं बलहीनाः सदैव हि

tiṣṭhantvadya surāḥ sarve hanmyahaṁ gadayā kila | sarve balibhujaḥ kāmaṁ balahīnāḥ sadaiva hi

'आज सभी देवता खड़े रहें — मैं गदा से उन्हें अवश्य मार डालूँगा! तुम सब यज्ञ-भाग भोगने वाले सदा ही बलहीन रहे हो।'

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.6.3)

इत्युक्त्वासौ गजारूढं सम्प्राप्य मदगर्वितः । जघान गदया तूर्णं बाहुमूले महाभुजः

ityuktvāsau gajārūḍhaṁ samprāpya madagarvitaḥ | jaghāna gadayā tūrṇaṁ bāhumūle mahābhujaḥ

ऐसा कहकर वह मदगर्वित, महाबाहु महिष हाथी पर सवार इन्द्र के पास पहुँचा और गदा से शीघ्र उनके बाहुमूल पर प्रहार किया।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.6.4)

सोऽपि वज्रेण घोरेण चिच्छेदाशु गदाञ्च ताम् । प्रहर्तुकामस्त्वरितो जगाम महिषं प्रति

so'pi vajreṇa ghoreṇa cicchedāśu gadāñca tām | prahartukāmastvarito jagāma mahiṣaṁ prati

इन्द्र ने भी अपने भयंकर वज्र से तुरन्त उस गदा को काट दिया, और प्रहार करने की इच्छा से शीघ्र ही महिष की ओर बढ़े।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.6.5)

हयारिरपि कोपेन खड्गमादाय सुप्रभम् । ययाविन्द्रं महावीर्यं प्रहरिष्यन्निवान्तिकम्

hayārirapi kopena khaḍgamādāya suprabham | yayāvindraṁ mahāvīryaṁ prahariṣyannivāntikam

और महिष भी क्रोधवश एक तेजस्वी खड्ग लेकर, महापराक्रमी इन्द्र के समीप, मानो प्रहार करने के लिए ही गया।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.6.6)

बभूव च तयोर्युद्धं सर्वलोकभयावहम् । आयुधैर्विविधैस्तत्र मुनिविस्मयकारकम्

babhūva ca tayoryuddhaṁ sarvalokabhayāvaham | āyudhairvividhaistatra munivismayakārakam

उन दोनों के बीच वह युद्ध हुआ, जो समस्त लोकों को भयभीत करने वाला था, तथा नाना प्रकार के शस्त्रों से मुनियों को भी चकित करने वाला था।

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.6.7)

चकाराशु तदा दैत्यो मायां मोहकरीं किल । शाम्बरीं सर्वलोकघ्नीं मुनीनामपि मोहिनीम्

cakārāśu tadā daityo māyāṁ mohakarīṁ kila | śāmbarīṁ sarvalokaghnīṁ munīnāmapi mohinīm

तब दैत्य ने शीघ्र ही एक मोहकारी माया — शाम्बरी माया — रची, जो समस्त लोकों का विनाश करने वाली और मुनियों को भी मोहित करने वाली थी।

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.6.8)

कोटिशो महिषास्तत्र तद्रूपास्तत्पराक्रमाः । ददृशुः सायुधाः सर्वे निघ्नन्तो देववाहिनीम्

koṭiśo mahiṣāstatra tadrūpāstatparākramāḥ | dadṛśuḥ sāyudhāḥ sarve nighnanto devavāhinīm

वहाँ करोड़ों की संख्या में, उसी रूप और पराक्रम वाले, शस्त्रधारी महिष दिखाई देने लगे, जो देव-सेना का संहार कर रहे थे।

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.6.9)

मघवा विस्मितस्तत्र दृष्ट्वा तां दैत्यनिर्मिताम् । बभूवातिभयोद्विग्नो मायां मोहकरीं किल

maghavā vismitastatra dṛṣṭvā tāṁ daityanirmitām | babhūvātibhayodvigno māyāṁ mohakarīṁ kila

उस दैत्य द्वारा रची गई उस मोहकारी माया को देखकर, इन्द्र आश्चर्यचकित होकर अत्यंत भय से व्याकुल हो उठे।

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.6.10)

वरुणोऽपि सुसन्त्रस्तस्तथैव धननायकः । यमो हुताशनः सूर्यः शीतरश्मिर्भयातुरः

varuṇo'pi susantrastastathaiva dhananāyakaḥ | yamo hutāśanaḥ sūryaḥ śītaraśmirbhayāturaḥ

वरुण भी अत्यंत भयभीत हो गए, वैसे ही कुबेर भी; यम, अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा भी भय से व्याकुल हो गए।

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.6.11)

पलायनपरा सर्वे बभूवुर्मोहिताः सुराः । ब्रह्मविष्णमहेशानां स्मरणं चक्रुरुद्यताः

palāyanaparā sarve babhūvurmohitāḥ surāḥ | brahmaviṣṇamaheśānāṁ smaraṇaṁ cakrurudyatāḥ

सभी देवता मोहित होकर भागने के लिए तत्पर हो गए; उन्होंने तुरन्त ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्मरण किया।

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.6.12)

तत्राजग्मुश्च काजेशाः स्मृतमात्राः सुरोत्तमाः । हंसतार्क्ष्यवृषारूढास्त्रातुकामा वरायुधाः

tatrājagmuśca kājeśāḥ smṛtamātrāḥ surottamāḥ | haṁsatārkṣyavṛṣārūḍhāstrātukāmā varāyudhāḥ

और स्मरण करते ही, हंस, गरुड़ और वृषभ पर आरूढ़, उत्तम आयुधों से युक्त वे श्रेष्ठ देवगण वहाँ आ पहुँचे, जो सबकी रक्षा करना चाहते थे।

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.6.13)

शौरिस्तां मोहिनीं दृष्ट्वा सुदर्शनमथोज्ज्वलम् । मुमोच तत्तेजसैव माया सा विलयं गता

śauristāṁ mohinīṁ dṛṣṭvā sudarśanamathojjvalam | mumoca tattejasaiva māyā sā vilayaṁ gatā

उस मोहिनी माया को देखकर शौरि (कृष्ण) ने तेजस्वी सुदर्शन चक्र छोड़ा; उसके तेज मात्र से ही वह माया विलीन हो गई।

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.6.14)

वीक्ष्य तान्महिषस्तत्र सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः । योद्धुकामः समादाय परिघं समुपाद्रवत्

vīkṣya tānmahiṣastatra sṛṣṭisthityantakāriṇaḥ | yoddhukāmaḥ samādāya parighaṁ samupādravat

सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाले उन तीनों को वहाँ देखकर, महिष युद्ध की इच्छा से परिघ लेकर आगे बढ़ा।

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.6.15)

महिषाख्यो महावीरः सेनानीश्चिक्षुरस्तथा । उग्रास्यश्चोग्रवीर्यश्च दुद्रुवुर्युद्धकामुकाः

mahiṣākhyo mahāvīraḥ senānīścikṣurastathā | ugrāsyaścogravīryaśca dudruvuryuddhakāmukāḥ

महिष नामक महावीर, सेनापति चिक्षुर, उग्रास्य तथा उग्रवीर्य — ये सभी युद्ध की इच्छा से दौड़ पड़े।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.6.16)

असिलोमात्रिनेत्रश्च बाष्कलोऽन्धक एव च । एते चान्ये च बहवो युद्धकामा विनिर्ययुः

asilomātrinetraśca bāṣkalo'ndhaka eva ca | ete cānye ca bahavo yuddhakāmā viniryayuḥ

असिलोमा, त्रिनेत्र, बाष्कल तथा अन्धक भी — ये सब और अन्य अनेक योद्धा युद्ध की इच्छा से निकल पड़े।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.6.17)

सन्नद्धा धृतचापास्ते रथारूढा मदोद्धताः । परिवव्रुः सुरान्सर्वान्वृका इव सुवत्सकान्

sannaddhā dhṛtacāpāste rathārūḍhā madoddhatāḥ | parivavruḥ surānsarvānvṛkā iva suvatsakān

कवच पहने, धनुष धारण किए, रथों पर सवार, मद से उद्धत वे सभी देवताओं को इस प्रकार घेरने लगे, जैसे भेड़िये सुन्दर बछड़ों को घेर लेते हैं।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.6.18)

बाणवृष्टिं ततश्चक्रुर्दानवा मदगर्विताः । सुराश्चापि तथा चक्रुः परस्परजिघांसवः

bāṇavṛṣṭiṁ tataścakrurdānavā madagarvitāḥ | surāścāpi tathā cakruḥ parasparajighāṁsavaḥ

मद से गर्वित दानवों ने तब बाणों की वर्षा की; देवताओं ने भी परस्पर वध की इच्छा से वैसा ही किया।

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.6.19)

अन्धको हरिमासाद्य पञ्चबाणाञ्छिलाशितान् । मुमोच विषसन्दिग्धान्कर्णाकृष्टान्महाबलान्

andhako harimāsādya pañcabāṇāñchilāśitān | mumoca viṣasandigdhānkarṇākṛṣṭānmahābalān

अन्धक ने हरि (विष्णु) के समीप पहुँचकर, कान तक खींचकर, शिला पर तीक्ष्ण किए हुए, विष में बुझाए हुए पाँच महाबली बाण छोड़े।

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.6.20)

वासुदेवोऽप्यसम्प्राप्तान्विशिखानाशुगैस्तदा । चिच्छेद तान्पुनः पञ्च मुमोच रिपुनाशनः

vāsudevo'pyasamprāptānviśikhānāśugaistadā | ciccheda tānpunaḥ pañca mumoca ripunāśanaḥ

वासुदेव ने भी उन तीव्रगामी बाणों के पहुँचने से पहले ही उन्हें काट दिया; और फिर उस शत्रुनाशक ने पाँच बाण छोड़े।

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.6.21)

तयोः परस्परं युद्धं बभूव हरिदैत्ययोः । बाणासिचक्रमुसलैर्गदाशक्तिपरश्वधैः

tayoḥ parasparaṁ yuddhaṁ babhūva haridaityayoḥ | bāṇāsicakramusalairgadāśaktiparaśvadhaiḥ

हरि और उस दैत्य के बीच बाणों, तलवारों, चक्रों, मुद्गरों, गदाओं, शक्तियों तथा फरसों से युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.6.22)

महेशान्धकयोर्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । पञ्चाशद्दिनपर्यन्तं बभूव च परस्परम्

maheśāndhakayoryuddhaṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam | pañcāśaddinaparyantaṁ babhūva ca parasparam

महेश और अन्धक के बीच का वह युद्ध अत्यंत भयंकर और रोमांचकारी था, और यह परस्पर पूरे पचास दिनों तक चलता रहा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.6.23)

इन्द्रबाष्कलयोस्तद्वन्महिषासुररुद्रयोः । यमत्रिनेत्रयोस्तद्वन्महाहनुधनेशयोः

indrabāṣkalayostadvanmahiṣāsurarudrayoḥ | yamatrinetrayostadvanmahāhanudhaneśayoḥ

इसी प्रकार इन्द्र-बाष्कल के बीच, महिषासुर-रुद्र के बीच, यम-त्रिनेत्र के बीच, तथा महाहनु-कुबेर के बीच भी युद्ध हुआ।

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.6.24)

असिलोमवरुणयोर्युद्धं परमदारुणम् । गरुडं गदया दैत्यो जघान हरिवाहनम्

asilomavaruṇayoryuddhaṁ paramadāruṇam | garuḍaṁ gadayā daityo jaghāna harivāhanam

असिलोमा और वरुण के बीच अत्यंत भयंकर युद्ध हुआ; उस दैत्य ने हरि के वाहन गरुड़ पर गदा से प्रहार किया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.6.25)

स गदापातखिन्नाङ्गो निःश्वसन्नवतिष्ठत । शौरिस्तं दक्षिणेनाशु हस्तेन परिसान्त्वयन्

sa gadāpātakhinnāṅgo niḥśvasannavatiṣṭhata | śauristaṁ dakṣiṇenāśu hastena parisāntvayan

गदा के प्रहार से थके हुए अंगों वाला गरुड़ गहरी साँस लेते हुए स्थिर हो गया; शौरि ने अपने दाहिने हाथ से उसे तुरन्त सान्त्वना दी।

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.6.26)

स्थिरं चकार देवेशो वैनतेयं महाबलम् । समाकृष्य धनुः शार्ङ्गं मुमोच विशिखान्बहून्

sthiraṁ cakāra deveśo vainateyaṁ mahābalam | samākṛṣya dhanuḥ śārṅgaṁ mumoca viśikhānbahūn

देवेश ने महाबली वैनतेय (गरुड़) को स्थिर किया; फिर अपने शार्ङ्ग धनुष को खींचकर अनेक बाण छोड़े।

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.6.27)

अन्धकोपरि कोपेन हन्तुकामो जनार्दनः । दानवोऽपि च तान्वाणांश्चिच्छेद स्वशरैः शितैः

andhakopari kopena hantukāmo janārdanaḥ | dānavo'pi ca tānvāṇāṁściccheda svaśaraiḥ śitaiḥ

जनार्दन क्रोधवश अन्धक का वध करना चाहते थे; परन्तु उस दानव ने भी अपने तीक्ष्ण बाणों से उन बाणों को काट दिया।

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.6.28)

पञ्चाशद्भिर्हरिं कोपाज्जघान च शिलाशितैः । वासुदेवोऽपि तांस्तूर्णं वञ्चयित्वा शरोत्तमान्

pañcāśadbhirhariṁ kopājjaghāna ca śilāśitaiḥ | vāsudevo'pi tāṁstūrṇaṁ vañcayitvā śarottamān

उसने क्रोधवश शिला पर तीक्ष्ण किए हुए पचास बाणों से हरि पर प्रहार किया; परन्तु वासुदेव ने उन उत्तम बाणों को शीघ्र चकमा देकर टाल दिया —

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.6.29)

चक्रं मुमोच वेगेन सहस्रारं सुदर्शनम् । त्यक्तं सुदर्शनं दूरात्स्वचक्रेण न्यवारयत्

cakraṁ mumoca vegena sahasrāraṁ sudarśanam | tyaktaṁ sudarśanaṁ dūrātsvacakreṇa nyavārayat

— अपना सहस्रार सुदर्शन चक्र वेगपूर्वक छोड़ा; परन्तु छोड़े गए उस सुदर्शन चक्र को उसने दूर से ही अपने चक्र द्वारा रोक दिया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.6.30)

ननाद च महाराज देवान्सम्मोहयन्निव । दृष्ट्वा तु विफलं जातं चक्रं देवस्य शार्ङ्गिणः

nanāda ca mahārāja devānsammohayanniva | dṛṣṭvā tu viphalaṁ jātaṁ cakraṁ devasya śārṅgiṇaḥ

हे महाराज! शार्ङ्गधारी देव के चक्र को निष्फल हुआ देखकर वह देवताओं को मानो मोहित करता हुआ जोर से गरजने लगा।

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.6.31)

जग्मुः शोकं सुराः सर्वे जहर्षुर्दानवास्तथा । वासुदेवोऽपि तरसा दृष्ट्वा देवाञ्छुचावृतान्

jagmuḥ śokaṁ surāḥ sarve jaharṣurdānavāstathā | vāsudevo'pi tarasā dṛṣṭvā devāñchucāvṛtān

सभी देवता शोकाकुल हो गए, और दानव हर्षित हो उठे; वासुदेव ने भी देवताओं को शोक में डूबा देखकर तुरन्त —

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.6.32)

गदां कौमोदकीं धृत्वा दानवं समुपाद्रवत् । तं जघानातिवेगेन मूर्ध्नि मायाविनं हरिः

gadāṁ kaumodakīṁ dhṛtvā dānavaṁ samupādravat | taṁ jaghānātivegena mūrdhni māyāvinaṁ hariḥ

— कौमोदकी गदा उठाकर उस दानव पर धावा बोला; हरि ने उस मायावी के सिर पर अत्यंत वेग से प्रहार किया।

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.6.33)

स गदाभिहतो भूमौ निपपातातिमूर्च्छितः । तं तथा पतितं वीक्ष्य हयारिरतिकोपनः

sa gadābhihato bhūmau nipapātātimūrcchitaḥ | taṁ tathā patitaṁ vīkṣya hayāriratikopanaḥ

गदा से आहत होकर वह अत्यंत मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। उसे इस प्रकार गिरा देखकर, अत्यंत क्रुद्ध महिष —

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.6.34)

आजगाम रमानाथं त्रासयन्नतिगर्जितैः । वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा समायान्तं क्रुधान्वितम्

ājagāma ramānāthaṁ trāsayannatigarjitaiḥ | vāsudevo'pi taṁ dṛṣṭvā samāyāntaṁ krudhānvitam

— रमानाथ (विष्णु) की ओर अत्यंत गर्जना करते हुए, उन्हें भयभीत करने के उद्देश्य से बढ़ा। वासुदेव ने भी उसे क्रोधपूर्वक आते देखकर —

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.6.35)

चापज्यानिनदं चोग्रं चकार नन्दयन्सुरान् । शरवृष्टिं चकाराशु भगवान्महिषोपरि

cāpajyāninadaṁ cograṁ cakāra nandayansurān | śaravṛṣṭiṁ cakārāśu bhagavānmahiṣopari

— अपने धनुष की प्रत्यंचा का भीषण टंकार किया, जिससे देवता प्रसन्न हो उठे; भगवान् ने महिष पर शीघ्र ही बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.6.36)

सोऽपि चिच्छेद बाणौघैस्ताञ्छरान्गगनेरितान् । तयोर्युद्धमभूद्राजन् परस्परभयावहम्

so'pi ciccheda bāṇaughaistāñcharāngaganeritān | tayoryuddhamabhūdrājan parasparabhayāvaham

उसने भी आकाश में छोड़े गए उन बाणों को अपने बाणों की झड़ी से काट दिया; और हे राजन्! उन दोनों के बीच वह युद्ध हुआ, जो परस्पर भयोत्पादक था।

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.6.37)

गदया ताडयामास केशवो मस्तकोपरि । स गदाभिहतो मूर्ध्नि पपातोर्व्यां सुमूर्च्छितः

gadayā tāḍayāmāsa keśavo mastakopari | sa gadābhihato mūrdhni papātorvyāṁ sumūrcchitaḥ

केशव ने गदा से उसके सिर पर प्रहार किया; सिर पर गदा का आघात लगने से वह अत्यंत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.6.38)

हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य सुदारुणः । स विहाय व्यथां दैत्यो मुहूर्तादुत्थितः पुनः

hāhākāro mahānāsītsainye tasya sudāruṇaḥ | sa vihāya vyathāṁ daityo muhūrtādutthitaḥ punaḥ

उसकी सेना में अत्यंत भयंकर हाहाकार मच गया; परन्तु वह दैत्य पीड़ा त्यागकर एक ही क्षण में पुनः उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.6.39)

गृहीत्वा परिघं शीर्षे जघान मधुसूदनम् । परिघेणाहतस्तेन मूर्च्छामाप जनार्दनः

gṛhītvā parighaṁ śīrṣe jaghāna madhusūdanam | parigheṇāhatastena mūrcchāmāpa janārdanaḥ

परिघ (लौह-दण्ड) उठाकर उसने मधुसूदन के सिर पर प्रहार किया; उस परिघ के आघात से जनार्दन मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.6.40)

मूर्च्छितं तमुवाहाशु जगाम गरुडो रणात् । परावृत्ते जगन्नाथे देवा इन्द्रपुरोगमाः

mūrcchitaṁ tamuvāhāśu jagāma garuḍo raṇāt | parāvṛtte jagannāthe devā indrapurogamāḥ

गरुड़ उन्हें मूर्च्छित अवस्था में लेकर शीघ्र ही युद्धभूमि से चला गया। जगन्नाथ के इस प्रकार लौट जाने पर, इन्द्र आदि देवगण —

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.6.41)

भयं प्रापुः सुदुःखार्ताश्चुक्रुशुश्च रणाजिरे । क्रन्दमानान्सुरान्वीक्ष्य शङ्करः शूलभृत्तदा

bhayaṁ prāpuḥ suduḥkhārtāścukruśuśca raṇājire | krandamānānsurānvīkṣya śaṅkaraḥ śūlabhṛttadā

— अत्यंत दुःखी होकर भयभीत हो गए और युद्धभूमि में विलाप करने लगे। विलाप करते हुए देवताओं को देखकर, त्रिशूलधारी शंकर ने —

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.6.42)

महिषं तरसाभ्येत्य प्राहरद्रोषसंयुतः । सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ शङ्करस्योरसि स्फुटम्

mahiṣaṁ tarasābhyetya prāharadroṣasaṁyutaḥ | so'pi śaktiṁ mumocātha śaṅkarasyorasi sphuṭam

— तुरन्त महिष के पास पहुँचकर क्रोधपूर्वक उस पर प्रहार किया। उसने भी शंकर की छाती पर सीधे अपनी शक्ति (अस्त्र) छोड़ी।

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.6.43)

जगर्ज स च दुष्टात्मा वञ्चयित्वा त्रिशूलकम् । शङ्करोऽपि तदा पीडां न प्रापोरसि ताडितः

jagarja sa ca duṣṭātmā vañcayitvā triśūlakam | śaṅkaro'pi tadā pīḍāṁ na prāporasi tāḍitaḥ

वह दुष्टात्मा त्रिशूल को चकमा देकर गरजने लगा; परन्तु शंकर को छाती पर आघात लगने पर भी कोई पीड़ा नहीं हुई।

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.6.44)

तं जघान त्रिशूलेन कोपादरुणलोचनः । संलग्नं शङ्करं दृष्ट्वा महिषेण दुरात्मना

taṁ jaghāna triśūlena kopādaruṇalocanaḥ | saṁlagnaṁ śaṅkaraṁ dṛṣṭvā mahiṣeṇa durātmanā

शंकर को उस दुरात्मा महिष से जूझते देख, क्रोध से लाल नेत्रों वाले शंकर ने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.6.45)

आजगाम हरिस्तावत्त्यक्त्वा मूर्च्छां प्रहारजाम् । महिषस्तु तदा वीक्ष्य सम्प्राप्तौ हरिशङ्करौ

ājagāma haristāvattyaktvā mūrcchāṁ prahārajām | mahiṣastu tadā vīkṣya samprāptau hariśaṅkarau

इसी बीच हरि, प्रहार से हुई मूर्च्छा त्यागकर, वहाँ आ पहुँचे; और महिष ने हरि और शंकर दोनों को वहाँ उपस्थित देखकर —

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.6.46)

युद्धकामौ महावीर्यो चक्रशूलधरौ वरौ । कोपयुक्तो बभूवासौ दृष्ट्वा तौ समुपागतौ

yuddhakāmau mahāvīryo cakraśūladharau varau | kopayukto babhūvāsau dṛṣṭvā tau samupāgatau

— चक्र और त्रिशूल धारण करने वाले, युद्ध के इच्छुक, महापराक्रमी उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं को समीप आया देखकर, वह अत्यंत क्रोधित हो उठा।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.6.47)

जगाम सम्मुखस्तावत्सङ्ग्रामार्थं महाभुजः । माहिषं वपुरास्थाय धुन्वन्पुच्छं समुत्कटम्

jagāma sammukhastāvatsaṅgrāmārthaṁ mahābhujaḥ | māhiṣaṁ vapurāsthāya dhunvanpucchaṁ samutkaṭam

वह महाबाहु महिष अपना भैंसे का रूप धारण कर, अपनी पूँछ को उग्रता से हिलाते हुए, युद्ध के लिए उनके सम्मुख आगे बढ़ा।

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.6.48)

चकार भैरवं नादं त्रासयन्नमरानपि । धुन्वञ्छृङ्गे महाकायो दारुणो जलदो यथा

cakāra bhairavaṁ nādaṁ trāsayannamarānapi | dhunvañchṛṅge mahākāyo dāruṇo jalado yathā

उसने भयंकर गर्जना की, जिससे देवता भी भयभीत हो गए; अपने विशाल शरीर तथा सींगों को हिलाता हुआ वह भयंकर बादल के समान प्रतीत हो रहा था।

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.6.49)

शृङ्गाभ्यां पर्वताज्छृङ्गांश्चिक्षेप भृशमुत्कटान् । दृष्ट्वा तौ तु महावीर्यौ दानवं देवसत्तमौ

śṛṅgābhyāṁ parvatājchṛṅgāṁścikṣepa bhṛśamutkaṭān | dṛṣṭvā tau tu mahāvīryau dānavaṁ devasattamau

उसने अपने सींगों से पर्वत की अत्यंत विकराल चोटियों को उखाड़कर फेंक दिया। उस दानव को इस प्रकार करते देखकर, महापराक्रमी वे दोनों देवश्रेष्ठ —

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.6.50)

चक्रतुर्बाणवृष्टिं च दानवोपरि दारुणाम् । कुर्वाणौ बाणवृष्टिं तौ दृष्ट्वा हरिहरौ हरिः

cakraturbāṇavṛṣṭiṁ ca dānavopari dāruṇām | kurvāṇau bāṇavṛṣṭiṁ tau dṛṣṭvā hariharau hariḥ

— उस दानव पर बाणों की भयंकर वर्षा करने लगे। बाणों की वह वर्षा करते हुए हरि और हर को देखकर —

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.6.51)

चिक्षेप गिरिशृङ्गं तु पुच्छेनावृत्य दारुणम् । आपतन्तं गिरिं वीक्ष्य भगवान्सात्वतां पतिः

cikṣepa giriśṛṅgaṁ tu pucchenāvṛtya dāruṇam | āpatantaṁ giriṁ vīkṣya bhagavānsātvatāṁ patiḥ

— महिष ने अपनी पूँछ से घुमाकर एक भयंकर पर्वत-शिखर फेंका। उस आते हुए पर्वत को देखकर सात्वतपति भगवान् (कृष्ण) ने —

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.6.52)

विशिखैः शतधा चक्रे चक्रेणाशु जघान तम् । हरिचक्राहतः सङ्ख्ये मूर्च्छामाप स दैत्यराट्

viśikhaiḥ śatadhā cakre cakreṇāśu jaghāna tam | haricakrāhataḥ saṅkhye mūrcchāmāpa sa daityarāṭ

— उसे अपने बाणों से सौ टुकड़ों में विदीर्ण कर दिया, और फिर शीघ्र ही चक्र से उस पर प्रहार किया। हरि के चक्र के आघात से वह दैत्यराज युद्धभूमि में मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.6.53)

उत्तस्थौ च क्षणान्नूनं मानुषं वपुरास्थितः । गदापाणिर्महाघोरो दानवः पर्वतोपमः

uttasthau ca kṣaṇānnūnaṁ mānuṣaṁ vapurāsthitaḥ | gadāpāṇirmahāghoro dānavaḥ parvatopamaḥ

परन्तु एक ही क्षण में वह मानव-रूप धारण कर पुनः उठ खड़ा हुआ — वह अत्यंत भयंकर, पर्वत के समान विशाल दानव, हाथ में गदा लिए हुए।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.6.54)

मेघनादं ननादोच्चैर्भीषयन्नमरानपि । तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः पाञ्चजन्यं समुज्ज्वलम्

meghanādaṁ nanādoccairbhīṣayannamarānapi | tacchrutvā bhagavānviṣṇuḥ pāñcajanyaṁ samujjvalam

उसने बादलों की गर्जना के समान ऊँचे स्वर में गर्जना की, जिससे देवता भी भयभीत हो गए। यह सुनकर भगवान् विष्णु ने अपना तेजस्वी पाञ्चजन्य शंख —

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.6.55)

पूरयामास तरसा शब्दं कर्तुं खरस्वरम् । तेन शब्देन शङ्खस्य भयत्रस्ताश्च दानवाः । बभूवुर्मुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः

pūrayāmāsa tarasā śabdaṁ kartuṁ kharasvaram | tena śabdena śaṅkhasya bhayatrastāśca dānavāḥ | babhūvurmuditā devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ

— तुरन्त फूँककर एक तीक्ष्ण, कर्कश ध्वनि उत्पन्न की। उस शंख-ध्वनि से दानव भय से त्रस्त हो गए, जबकि देवता तथा तपोधन ऋषि हर्षित हो उठे।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7