पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 120
रम्भा-तृतीया-व्रत
श्लोक 1 (garuda.1.120.1)
ब्रह्मोवाच । रम्भातृतीयां वक्ष्ये च सौभाग्यश्रीसुतादिदाम् । मार्गशीर्षेसिते पक्षे तृतीयायामुपोषितः
brahmovāca rambhātṛtīyāṁ vakṣye ca saubhāgyaśrīsutādidām mārgaśīrṣesite pakṣe tṛtīyāyāmupoṣitaḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — मैं रम्भा-तृतीया व्रत का वर्णन करूँगा, जो सौभाग्य, श्री, संतान आदि देने वाला है। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की तृतीया को उपवास करके —
श्लोक 2 (garuda.1.120.2)
गौरीं यजेद्बिल्वपत्रैः कुशोदककरस्ततः । कदम्बादौ गिरिसुतां पौषे मरुबकैर्यजेत्
gaurīṁ yajedbilvapatraiḥ kuśodakakarastataḥ kadambādau girisutāṁ pauṣe marubakairyajet
बिल्वपत्र से, हाथ में कुश और जल लेकर गौरी की पूजा करे। पौष में कदम्ब आदि की लकड़ी से, मरुआ के फूलों से गिरिजा (पार्वती) की पूजा करे।
श्लोक 3 (garuda.1.120.3)
कर्पूरादः कृसरदो मल्लिकादन्तकाष्ठकृत् । माघेसुभद्रां कल्हारैर्घृताशो मण्डकप्रदः
karpūrādaḥ kṛsarado mallikādantakāṣṭhakṛt māghesubhadrāṁ kalhārairghṛtāśo maṇḍakapradaḥ
कर्पूर अर्पित करके, कृसर का भोग लगाकर, मल्लिका की लकड़ी से दातौन करे। माघ में कमल के फूलों से सुभद्रा की पूजा करे, घी का भोग और मंडक अर्पित करे।
श्लोक 4 (garuda.1.120.4)
गीतीमयं तन्तकाष्ठं फाल्गुने गोमतीं यजेत् । कुन्दैः कृत्वा दन्तकाष्ठं जीवाशः शष्कुलीप्रदः
gītīmayaṁ tantakāṣṭhaṁ phālgune gomatīṁ yajet kundaiḥ kṛtvā dantakāṣṭhaṁ jīvāśaḥ śaṣkulīpradaḥ
गीत के साथ दातौन-विधि करके, फाल्गुन में गोमती की पूजा करे, कुंद के फूलों से दातौन बनाकर; जीव-वनस्पति का भोग और शष्कुली अर्पित करे।
श्लोक 5 (garuda.1.120.5)
विशालाक्षीं दमनकैश्चैत्रे च कृसरप्रदः । दधिप्राशो दन्तकाष्ठं तगरं श्रीमुखीं यजेत्
viśālākṣīṁ damanakaiścaitre ca kṛsarapradaḥ dadhiprāśo dantakāṣṭhaṁ tagaraṁ śrīmukhīṁ yajet
चैत्र में दमनक के फूलों से विशालाक्षी की पूजा करे, कृसर अर्पित करे; दही का सेवन करके, तगर की लकड़ी से दातौन करके श्रीमुखी की पूजा करे।
श्लोक 6 (garuda.1.120.6)
वैशाखे कर्णिकारैश्च अशोकाशो वटप्रदः । ज्येष्ठे नारायणीमर्चेच्छतपत्रैश्च खण्डदः । लवङ्गाशो भवेदेव आषाढे माधवीं यजेत्
vaiśākhe karṇikāraiśca aśokāśo vaṭapradaḥ jyeṣṭhe nārāyaṇīmarcecchatapatraiśca khaṇḍadaḥ lavaṅgāśo bhavedeva āṣāḍhe mādhavīṁ yajet
वैशाख में कर्णिकार के फूलों से, अशोक की लकड़ी से, वट का भोग अर्पित करे। ज्येष्ठ में कमल के फूलों से नारायणी की पूजा करे, शक्कर अर्पित करे; लौंग का भोग लगाकर आषाढ़ में माधवी की पूजा करे।
श्लोक 7 (garuda.1.120.7)
तिलाशो बिल्वपत्रैश्च क्षीरान्नवटकप्रदः । औदुम्बरं दन्तकाष्ठं तगर्याः श्रावणे श्रियम्
tilāśo bilvapatraiśca kṣīrānnavaṭakapradaḥ audumbaraṁ dantakāṣṭhaṁ tagaryāḥ śrāvaṇe śriyam
तिल का भोग लगाकर, बिल्वपत्र से, दूध-चावल के पुए अर्पित करके, औदुम्बर की लकड़ी से दातौन करके श्रावण में तगरवाली श्री की पूजा करे।
श्लोक 8 (garuda.1.120.8)
दन्तकाष्ठं मल्लिकाया क्षीरदो ह्युत्तमां यजेत् । पद्मैर्यजेद्भाद्रपदे शृङ्गदाशो गृडादिदः
dantakāṣṭhaṁ mallikāyā kṣīrado hyuttamāṁ yajet padmairyajedbhādrapade śṛṅgadāśo gṛḍādidaḥ
मल्लिका की लकड़ी से दातौन करके, दूध अर्पित करके उत्तमा की पूजा करे। भाद्रपद में कमलों से पूजा करे, सींग-आकार की वस्तुएँ और गुड़ आदि अर्पित करे।
श्लोक 9 (garuda.1.120.9)
राजपुत्रीं चाश्वयुजे जपापुष्पैश्च जीरकम् । प्राशयेन्निशि नैवेद्यैः कृसरैः कार्तिके यजेत्
rājaputrīṁ cāśvayuje japāpuṣpaiśca jīrakam prāśayenniśi naivedyaiḥ kṛsaraiḥ kārtike yajet
आश्विन में जपा (गुड़हल) के फूलों और जीरे से राजपुत्री की पूजा करे; रात्रि में भोजन करके, कार्तिक में कृसर के नैवेद्य से पूजा करे।
श्लोक 10 (garuda.1.120.10)
जातीपुष्पैः पद्मजां च पञ्चगव्याशनो यजेत् । घृतोदनं च वर्षान्ते सपत्नीकान्द्विजान्यजेत्
jātīpuṣpaiḥ padmajāṁ ca pañcagavyāśano yajet ghṛtodanaṁ ca varṣānte sapatnīkāndvijānyajet
चमेली के फूलों से पद्मजा (लक्ष्मी) की, पंचगव्य का भोग लगाकर पूजा करे। वर्ष के अंत में घी-चावल से, ब्राह्मणों को उनकी पत्नियों सहित सम्मानित करे।
श्लोक 11 (garuda.1.120.11)
उमामहेश्वरं पूज्य प्रदद्याच्च गुडादिकम् । वस्त्रच्छत्रसुवर्णाद्यैः रात्रौ च कृतजागरः । गीतवाद्यैर्ददत्प्रतर्गवाद्यं सर्वमान्पुयात्
umāmaheśvaraṁ pūjya pradadyācca guḍādikam vastracchatrasuvarṇādyaiḥ rātrau ca kṛtajāgaraḥ gītavādyairdadatpratargavādyaṁ sarvamānpuyāt
उमा-महेश्वर की पूजा करके गुड़ आदि अर्पित करे, वस्त्र, छत्र, स्वर्ण आदि भी दे। रात्रि में गीत-वाद्य सहित जागरण करके, प्रातःकाल वाद्य-संगीत के साथ दान देकर सब कुछ प्राप्त करे।