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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 129

दष्टोद्धार-पञ्चमी व्रत: सर्प-दंश से रक्षा

अध्याय 128अध्याय-सूचीअध्याय 130

श्लोक 1 (garuda.1.129.1)

ब्रह्मोवाच । वक्ष्ये प्रतिपदादीनि व्रतानि व्यास शृण्वथ । वैश्वानरपदं याति शिखिव्रतमिदं स्मृतम्

brahmovāca vakṣye pratipadādīni vratāni vyāsa śṛṇvatha vaiśvānarapadaṁ yāti śikhivratamidaṁ smṛtam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे व्यास! मैं प्रतिपदा आदि तिथियों के व्रतों का वर्णन करता हूँ, सुनो। इसे शिखि-व्रत कहा गया है, जिससे मनुष्य वैश्वानर-पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 2 (garuda.1.129.2)

प्रतिपद्येकभक्ताशी समाप्ते कपिलाप्रदः । चैत्रादौ कारयेच्चैव ब्रह्मपूजां यथाविधि । गन्धपुष्पार्चनैर्दानैर्माल्याद्यैश्च मनोरमैः

pratipadyekabhaktāśī samāpte kapilāpradaḥ caitrādau kārayeccaiva brahmapūjāṁ yathāvidhi gandhapuṣpārcanairdānairmālyādyaiśca manoramaiḥ

प्रतिपदा को एक बार भोजन करे, और समाप्ति पर कपिला गाय का दान करे; चैत्र के आरम्भ में विधिपूर्वक ब्रह्मा का पूजन करे — गन्ध-पुष्प-अर्चन, दान तथा मनोहर मालाओं आदि से।

श्लोक 3 (garuda.1.129.3)

सहोमैः पूजयेद्देवं सर्वान्कामानवाप्नुयात् । कार्तिके त सितेऽष्टम्यां पुष्पहारी च वत्सरम्

sahomaiḥ pūjayeddevaṁ sarvānkāmānavāpnuyāt kārtike ta site'ṣṭamyāṁ puṣpahārī ca vatsaram

होम सहित देवता का पूजन करने से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। कार्तिक की शुक्ल अष्टमी को जो वर्षभर पुष्प-माला अर्पित करता है —

श्लोक 4 (garuda.1.129.4)

पुष्पादिदाता रूपेण रूपभागी भवेन्नरः । कृष्णपक्षे तृतीयायां श्रावणे श्रीधरं श्रिया

puṣpādidātā rūpeṇa rūpabhāgī bhavennaraḥ kṛṣṇapakṣe tṛtīyāyāṁ śrāvaṇe śrīdharaṁ śriyā

पुष्पादि देने वाला मनुष्य उनकी सुन्दरता से रूप का भागी बनता है। श्रावण की कृष्ण तृतीया को श्री सहित श्रीधर का पूजन करे।

श्लोक 5 (garuda.1.129.5)

यजेदशून्यशय्यायां फलं दद्याद्द्विजातये । शय्यां दत्त्वा प्रार्थयेच्च श्रीधराय नमः श्रियै

yajedaśūnyaśayyāyāṁ phalaṁ dadyāddvijātaye śayyāṁ dattvā prārthayecca śrīdharāya namaḥ śriyai

'अशून्यशयन' व्रत में पूजन कर ब्राह्मण को फल दे; शय्या देकर प्रार्थना करे — 'श्रीधर को नमस्कार, श्री को नमस्कार'।

श्लोक 6 (garuda.1.129.6)

उमांशिवं हुताशं च तृतीयायां च पूजयेत् । हविष्यमन्न नैवेद्य देय दमनकं तथा

umāṁśivaṁ hutāśaṁ ca tṛtīyāyāṁ ca pūjayet haviṣyamanna naivedya deya damanakaṁ tathā

तृतीया को उमा, शिव और अग्नि का भी पूजन करे; हविष्यान्न नैवेद्य में अर्पित करे तथा दमनक (एक सुगन्धित पौधा) भी अर्पित करे।

श्लोक 7 (garuda.1.129.7)

चैत्रादौ फलमाप्नोति उमया मे प्रभाषितम् । फाल्गुनादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्

caitrādau phalamāpnoti umayā me prabhāṣitam phālgunāditṛtīyāyāṁ lavaṇaṁ yastu varjayet

चैत्र के आरम्भ में इसका फल प्राप्त होता है — ऐसा उमा ने मुझसे कहा है। फाल्गुन की तृतीया से जो लवण का त्याग करता है —

श्लोक 8 (garuda.1.129.8)

समाप्ते शयनं दद्याद्गृहं चोपस्करान्वितम् । संपूज्य विप्रमिथनं भवानी प्रीयतामिति

samāpte śayanaṁ dadyādgṛhaṁ copaskarānvitam saṁpūjya vipramithanaṁ bhavānī prīyatāmiti

और समाप्ति पर शय्या तथा गृहोपकरणों सहित घर का दान करता है, विवाहित ब्राह्मण-दम्पति का पूजन कर 'भवानी प्रसन्न हों' कहता है —

श्लोक 9 (garuda.1.129.9)

गौरीलोके वसेन्नित्यं सौभाग्यकरमुत्तमम् । गौरी काली उमा भद्रा दुर्गा कान्तिः सरस्वती

gaurīloke vasennityaṁ saubhāgyakaramuttamam gaurī kālī umā bhadrā durgā kāntiḥ sarasvatī

वह सदा गौरी के लोक में निवास करता है, जो परम सौभाग्यदायक है। गौरी, काली, उमा, भद्रा, दुर्गा, कान्ति, सरस्वती —

श्लोक 10 (garuda.1.129.10)

मङ्गला वैष्णवी लक्ष्मीः शिवा नारायणी क्रमात् । मार्गेतृतीयामारभ्य अवियोगादिमाप्नुयात्

maṅgalā vaiṣṇavī lakṣmīḥ śivā nārāyaṇī kramāt mārgetṛtīyāmārabhya aviyogādimāpnuyāt

मंगला, वैष्णवी, लक्ष्मी, शिवा, नारायणी — इस क्रम से मार्गशीर्ष में तृतीया-व्रत आरम्भ करने पर वियोग-रहितता आदि प्राप्त होती है।

श्लोक 11 (garuda.1.129.11)

चतुर्थ्यां सितमाघादौ निराहारो व्रतान्वितः । दत्त्वा तिलांस्तु विप्राय स्वयं भुङ्क्ते तिलोदकम्

caturthyāṁ sitamāghādau nirāhāro vratānvitaḥ dattvā tilāṁstu viprāya svayaṁ bhuṅkte tilodakam

माघ के आरम्भ में शुक्ल चतुर्थी को निराहार रहकर व्रत करे; ब्राह्मण को तिल देकर स्वयं तिल-जल ही ग्रहण करे।

श्लोक 12 (garuda.1.129.12)

वर्षद्वये समाप्तिश्च निर्विघ्नादिं समाप्नुयात् । गः स्वाहा मूलमन्त्रोऽयं प्रणवेन समन्वितः

varṣadvaye samāptiśca nirvighnādiṁ samāpnuyāt gaḥ svāhā mūlamantro'yaṁ praṇavena samanvitaḥ

दो वर्षों की समाप्ति पर निर्विघ्नता आदि प्राप्त होती है। 'गं स्वाहा' यह मूल मन्त्र है, जो प्रणव (ॐ) सहित है।

श्लोक 13 (garuda.1.129.13)

ग्लैं ग्लांहृदये गां गीं हूं ह्रीं ह्रीं शिरः शिखा । गूं वर्म गों च गैं नेत्रं गों च आवाहनादिषु

glaiṁ glāṁhṛdaye gāṁ gīṁ hūṁ hrīṁ hrīṁ śiraḥ śikhā gūṁ varma goṁ ca gaiṁ netraṁ goṁ ca āvāhanādiṣu

'ग्लैं ग्लां' हृदय के लिए, 'गां गीं हूं ह्रीं ह्रीः' मस्तक और शिखा के लिए, 'गूं' कवच के लिए, 'गों' और 'गैं' नेत्रों के लिए, तथा 'गों' आवाहन आदि के लिए है।

श्लोक 14 (garuda.1.129.14)

आगच्छोल्काय गनन्धोल्कः पुष्पोल्को धूपकोल्ककः । दीपोल्काय महोल्काय बलिश्चाथ विस (मार्) जनम्

āgaccholkāya ganandholkaḥ puṣpolko dhūpakolkakaḥ dīpolkāya maholkāya baliścātha visa (mār) janam

'आगच्छ उल्काय' — आनन्द-उल्क, पुष्प-उल्क, धूप-उल्क, दीप-उल्क तथा महा-उल्क द्वारा आवाहन करे; फिर बलि और विसर्जन करे।

श्लोक 15 (garuda.1.129.15)

सिदेधोल्काय च गायत्त्री (त्र) न्यासोंगुष्ठादिरीरितः । ओं महाकर्णाय विद्महेवक्रतुण्डाय धीमहितन्नो दन्तिः प्रचोदयात्

sidedholkāya ca gāyattrī (tra) nyāsoṁguṣṭhādirīritaḥ oṁ mahākarṇāya vidmahevakratuṇḍāya dhīmahitanno dantiḥ pracodayāt

सिद्धि-उल्क द्वारा भी; गायत्री-न्यास अंगुष्ठ आदि से किया जाता है — 'ॐ महाकर्णाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्'।

श्लोक 16 (garuda.1.129.16)

पूजयोत्तिलहोमैश्च एते पूज्या गणास्तथा । गणाय गणपतये स्वाहा कूष्माण्डकाय च

pūjayottilahomaiśca ete pūjyā gaṇāstathā gaṇāya gaṇapataye svāhā kūṣmāṇḍakāya ca

तिल के हवन से पूजन करे; ये गण भी पूज्य हैं — 'गणाय गणपतये स्वाहा', 'कूष्माण्डकाय' —

श्लोक 17 (garuda.1.129.17)

अमोघोल्कायैकदन्ताय त्रिपुरान्तकरूपिणे । ओं श्याम (व) दन्तविकरालास्याहवेपाय वै नमः

amogholkāyaikadantāya tripurāntakarūpiṇe oṁ śyāma (va) dantavikarālāsyāhavepāya vai namaḥ

'अमोघ-उल्काय एकदन्ताय त्रिपुरान्तकरूपिणे' — 'ॐ श्यामवदन विकरालास्याय आहवेपाय नमः'।

श्लोक 18 (garuda.1.129.18)

पद्मदंष्टाय स्वाहान्ते मुद्रा वै नर्तनं गणे । हस्ततालश्च हसनं सौभाग्यादिफलं भवेत्

padmadaṁṣṭāya svāhānte mudrā vai nartanaṁ gaṇe hastatālaśca hasanaṁ saubhāgyādiphalaṁ bhavet

'पद्मदंष्ट्राय' स्वाहा से समाप्त होकर, गण की मुद्रा-नृत्य करे; हस्त-ताल और हास्य से सौभाग्य आदि फल प्राप्त होते हैं।

श्लोक 19 (garuda.1.129.19)

मार्गशीर्षे तथा शुक्लचतुर्थ्यां पूजयेद्गण । अब्दं प्राप्नोति विद्याश्रीकीर्त्यायुः पुत्रसन्ततिम्

mārgaśīrṣe tathā śuklacaturthyāṁ pūjayedgaṇa abdaṁ prāpnoti vidyāśrīkīrtyāyuḥ putrasantatim

इसी प्रकार मार्गशीर्ष की शुक्ल चतुर्थी को गण का पूजन करे; एक वर्ष में विद्या, श्री, कीर्ति, आयु और सन्तति प्राप्त होती है।

श्लोक 20 (garuda.1.129.20)

सोमवारे चतुर्थ्यां च समुपोष्यार्चयेद्गणम् । जपञ्जुह्वत्स्मरन्विद्या स्वर्गं निर्वाणतां व्रजेत्

somavāre caturthyāṁ ca samupoṣyārcayedgaṇam japañjuhvatsmaranvidyā svargaṁ nirvāṇatāṁ vrajet

सोमवार को पड़ने वाली चतुर्थी को उपवास कर गण का पूजन करे; जप, हवन और स्मरण करते हुए विद्या, स्वर्ग और निर्वाण को प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (garuda.1.129.21)

यजेच्छुक्लचतुर्थ्यां यः खण्डलड्डुकमोद (मण्ड) कैः । विघ्नाचनेन सर्वान्स कामान्सौभाग्यमाप्नुयात्

yajecchuklacaturthyāṁ yaḥ khaṇḍalaḍḍukamoda (maṇḍa) kaiḥ vighnācanena sarvānsa kāmānsaubhāgyamāpnuyāt

जो शुक्ल चतुर्थी को खण्ड-लड्डू और मोदकों से पूजन करता है, वह विघ्नहर्ता के इस पूजन से सभी कामनाओं और सौभाग्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (garuda.1.129.22)

पुत्रादिकं दमनकैर्दमनाख्या चतुर्थ्यपि । आं गणपतये नमः चतुर्थ्यन्तं यजेद्गणम्

putrādikaṁ damanakairdamanākhyā caturthyapi āṁ gaṇapataye namaḥ caturthyantaṁ yajedgaṇam

दमनक से पुत्रादि की प्राप्ति दमनक-नामक चतुर्थी से भी होती है; 'ऐं गणपतये नमः' — इस चतुर्थ्यन्त मन्त्र से गण का पूजन करे।

श्लोक 23 (garuda.1.129.23)

मासे तु यस्मिन्कस्मिंश्चिज्जुहुयाद्वा जपेत्स्मरेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वविघ्नविनाशनम्

māse tu yasminkasmiṁścijjuhuyādvā japetsmaret sarvānkāmānavāpnoti sarvavighnavināśanam

जिस किसी भी मास में इसका हवन, जप अथवा स्मरण किया जाए, वह सभी कामनाओं को देने वाला तथा सभी विघ्नों का नाश करने वाला है।

श्लोक 24 (garuda.1.129.24)

विनायकं मूर्तिकाद्यं यजेदेभिश्च नामभिः । सोऽपि सद्गतिमाप्नोति स्वर्गमोक्षसुखानि च

vināyakaṁ mūrtikādyaṁ yajedebhiśca nāmabhiḥ so'pi sadgatimāpnoti svargamokṣasukhāni ca

विनायक की मूर्ति आदि का इन नामों से पूजन करे; वह भी सद्गति, स्वर्ग, मोक्ष और सुख को प्राप्त करता है।

श्लोक 25 (garuda.1.129.25)

गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बकः । नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्नराजकः

gaṇapūjyo vakratuṇḍa ekadaṁṣṭrī triyambakaḥ nīlagrīvo lambodaro vikaṭo vighnarājakaḥ

गणों द्वारा पूज्य नाम हैं — वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्री, त्र्यम्बक, नीलग्रीव, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज —

श्लोक 26 (garuda.1.129.26)

धूम्रवर्णो भालचन्द्रो दशमस्त विनायकः । गणपतिर्हस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्

dhūmravarṇo bhālacandro daśamasta vināyakaḥ gaṇapatirhastimukho dvādaśāre yajedgaṇam

धूम्रवर्ण, भालचन्द्र — दसवें विनायक, तथा गणपति और हस्तिमुख (बारहवाँ) — इन बारह नामों से गण का पूजन करे।

श्लोक 27 (garuda.1.129.27)

पृथक्समस्तं मेधावी सर्वान्कामानवाप्नुयात् । श्रावणे चाश्विने भाद्रे पञ्चम्यां कात्तिक शुभे

pṛthaksamastaṁ medhāvī sarvānkāmānavāpnuyāt śrāvaṇe cāśvine bhādre pañcamyāṁ kāttika śubhe

बुद्धिमान् पुरुष इन्हें अलग-अलग अथवा सम्पूर्ण रूप से पूजकर सभी कामनाओं को प्राप्त करता है। श्रावण, आश्विन, भाद्रपद तथा शुभ कार्तिक की पंचमी को —

श्लोक 28 (garuda.1.129.28)

वासुकिस्तक्षकश्चैव कालीयो मणिभद्रकः । ऐरावतो धृतराष्टः कर्कोटकधनञ्जयौ

vāsukistakṣakaścaiva kālīyo maṇibhadrakaḥ airāvato dhṛtarāṣṭaḥ karkoṭakadhanañjayau

वासुकि, तक्षक, कालीय, मणिभद्रक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक और धनंजय — इन नागों का पूजन करे।

श्लोक 29 (garuda.1.129.29)

घृताद्यैः स्नापिता ह्येते आयुरारोग्यसम्पदः । अनन्तं वासुकिं शङ्खं पद्मं कम्बलमेव च

ghṛtādyaiḥ snāpitā hyete āyurārogyasampadaḥ anantaṁ vāsukiṁ śaṅkhaṁ padmaṁ kambalameva ca

इन्हें घृत आदि से स्नान कराने पर आयु, आरोग्य और सम्पत्ति प्राप्त होती है। अनन्त, वासुकि, शंख, पद्म, कम्बल —

श्लोक 30 (garuda.1.129.30)

तथा कर्काटकं नागं धृतराष्ट्रं च शङ्खकम् । कालीयं तक्षकं चैव पिङ्गलं मासिमासि च

tathā karkāṭakaṁ nāgaṁ dhṛtarāṣṭraṁ ca śaṅkhakam kālīyaṁ takṣakaṁ caiva piṅgalaṁ māsimāsi ca

तथा कर्काटक नाग, धृतराष्ट्र, शंखक, कालीय, तक्षक और पिंगल — इन्हें प्रतिमास पूजना चाहिए,

श्लोक 31 (garuda.1.129.31)

यजेद्भाद्रसिते नागानष्टौ मुक्तिं दिवं व्रजेत् । द्वारस्योभयतो लेख्याः श्रावणे तु सिते यजेत्

yajedbhādrasite nāgānaṣṭau muktiṁ divaṁ vrajet dvārasyobhayato lekhyāḥ śrāvaṇe tu site yajet

और भाद्रपद की कृष्ण पंचमी को इन आठ नागों का पूजन करने से मोक्ष और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। द्वार के दोनों ओर इनके चित्र बनाए जाएँ; श्रावण की शुक्ल पंचमी को भी पूजन करे।

श्लोक 32 (garuda.1.129.32)

पञ्चम्यां पूजयेन्नागाननन्तान्द्यान्महोरगान् । क्षीरं सर्पिश्च नैवेद्यं देयं सर्वविषापहम् । नागा अभयहस्ताश्च दष्टोद्धारातु पञ्चमी

pañcamyāṁ pūjayennāgānanantāndyānmahoragān kṣīraṁ sarpiśca naivedyaṁ deyaṁ sarvaviṣāpaham nāgā abhayahastāśca daṣṭoddhārātu pañcamī

पंचमी को अनन्त आदि महानागों का पूजन करे; दूध और घी नैवेद्य में अर्पित करें, जो समस्त विष का नाशक है। अभय-मुद्रा में हाथ धारण किए नाग — यही दष्टोद्धार-पंचमी है, अर्थात् सर्प-दंश से रक्षा की पंचमी।

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