पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 13
विष्णु-पंजर स्तोत्र
श्लोक 1 (garuda.1.13.1)
।।हरिरुवाच । प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैष्णवं पंजरं शुभम् । नमो नमस्ते गोविदं चक्रं गृह्य सुदर्शनम्
hariruvāca pravakṣyāmyadhunā hyetadvaiṣṇavaṁ paṁjaraṁ śubham namo namaste govidaṁ cakraṁ gṛhya sudarśanam
हरि ने कहा — अब मैं यह शुभ वैष्णव-पंजर (कवच) बताता हूँ। हे गोविंद! आपको बारंबार नमस्कार है। सुदर्शन चक्र को धारण कर,
श्लोक 2 (garuda.1.13.2)
प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो ! त्वामहं शरणं गतः । गदां कौमोदकीं गृह्ण पद्मनाभ नमोऽस्त ते
prācyāṁ rakṣasva māṁ viṣṇo ! tvāmahaṁ śaraṇaṁ gataḥ gadāṁ kaumodakīṁ gṛhṇa padmanābha namo'sta te
हे विष्णु! पूर्व दिशा में मेरी रक्षा कीजिए; मैं आपकी शरण में आया हूँ। कौमोदकी गदा को धारण कीजिए, हे पद्मनाभ! आपको नमस्कार है।
श्लोक 3 (garuda.1.13.3)
याम्यां रक्षस्व मां विष्णो ! त्वामहं शरणं गतः । हलमादाय सौनन्दे नमस्ते पुरुषोत्तम
yāmyāṁ rakṣasva māṁ viṣṇo ! tvāmahaṁ śaraṇaṁ gataḥ halamādāya saunande namaste puruṣottama
हे विष्णु! दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा कीजिए; मैं आपकी शरण में आया हूँ। सौनंद हल को धारण कर, हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।
श्लोक 4 (garuda.1.13.4)
प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो ! त्वामहं शरणं गतः । मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्
pratīcyāṁ rakṣa māṁ viṣṇo ! tvāmahaṁ śaraṇaṁ gataḥ musalaṁ śātanaṁ gṛhya puṇḍarīkākṣa rakṣa mām
हे विष्णु! पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा कीजिए; मैं आपकी शरण में आया हूँ। शातन नामक मूसल को धारण कर, हे पुंडरीकाक्ष! मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 5 (garuda.1.13.5)
उत्तरस्यां जगन्नाथ ! भवन्तं शरणं गतः । खड्गमादाय चर्म्माथ अस्त्रशास्त्रादिकं हरे !
uttarasyāṁ jagannātha ! bhavantaṁ śaraṇaṁ gataḥ khaḍgamādāya carmmātha astraśāstrādikaṁ hare !
हे जगन्नाथ! उत्तर दिशा में आपकी शरण में आया हूँ। खड्ग और ढाल को, तथा अन्य अस्त्र-शस्त्र आदि को धारण कर, हे हरि!
श्लोक 6 (garuda.1.13.6)
नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ! ऐशान्यां शरणं गतः । पांचजन्यं महाशंखमनुघोष्यं च पंकजम्
namaste rakṣa rakṣoghna ! aiśānyāṁ śaraṇaṁ gataḥ pāṁcajanyaṁ mahāśaṁkhamanughoṣyaṁ ca paṁkajam
आपको नमस्कार है — हे राक्षसों का नाश करने वाले! रक्षा कीजिए; ऐशान्य दिशा में मैं आपकी शरण में आया हूँ। महान, गूँजने वाले शंख पांचजन्य को, और कमल को,
श्लोक 7 (garuda.1.13.7)
प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्न्येय्यां रक्ष शूकर । चन्द्रसूर्य्यं समागृह्य खड्गं चान्द्रमसं तथा
pragṛhya rakṣa māṁ viṣṇo āgnyeyyāṁ rakṣa śūkara candrasūryyaṁ samāgṛhya khaḍgaṁ cāndramasaṁ tathā
धारण कर, हे विष्णु! मेरी रक्षा कीजिए। दक्षिण-पूर्व दिशा में, हे वराह! रक्षा कीजिए। चंद्र और सूर्य को धारण कर, तथा चंद्रमा के समान तेजस्वी खड्ग को भी,
श्लोक 8 (garuda.1.13.8)
नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्त्ते नृकेशरिन् । वैजयन्तीं स्मप्रगृह्य श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्
nairṛtyāṁ māṁ ca rakṣasva divyamūrtte nṛkeśarin vaijayantīṁ smapragṛhya śrīvatsaṁ kaṇṭhabhūṣaṇam
दक्षिण-पश्चिम दिशा में, हे दिव्य-मूर्तिधारी नृसिंह! मेरी रक्षा कीजिए। वैजयंती माला को धारण कर, तथा कंठ के आभूषण श्रीवत्स को,
श्लोक 9 (garuda.1.13.9)
वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोऽस्तु ते । वैनतेयं समारुह्य त्वंतरिक्षे जनार्दन !
vāyavyāṁ rakṣa māṁ deva hayagrīva namo'stu te vainateyaṁ samāruhya tvaṁtarikṣe janārdana !
उत्तर-पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा कीजिए, हे देव हयग्रीव! आपको नमस्कार हो। वैनतेय (गरुड) पर आरूढ़ होकर, हे जनार्दन! अंतरिक्ष में आप मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 10 (garuda.1.13.10)
मां रक्षस्वाजित सदा नमस्तेऽस्त्वपराजित । विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले
māṁ rakṣasvājita sadā namaste'stvaparājita viśālākṣaṁ samāruhya rakṣa māṁ tvaṁ rasātale
हे अजित! सदा मेरी रक्षा कीजिए; हे अपराजित! आपको नमस्कार हो। विशालाक्ष (कच्छप) पर आरूढ़ होकर, आप पाताल में मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 11 (garuda.1.13.11)
अकूपार नमस्तुभ्यं महामीन नमोऽस्तु ते । करशीर्षाद्यंगुलेषु सत्य त्वं बाहुपंजरम्
akūpāra namastubhyaṁ mahāmīna namo'stu te karaśīrṣādyaṁguleṣu satya tvaṁ bāhupaṁjaram
हे अकूपार! आपको नमस्कार है। हे महामीन! आपको नमस्कार हो। हे सत्यस्वरूप! हाथ, सिर आदि और अंगुलियों में आप ही भुजा-पंजर (कवच) हैं।
श्लोक 12 (garuda.1.13.12)
कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम । एतदुक्तं शंकराय वैष्णवं पंजरं महत्
kṛtvā rakṣasva māṁ viṣṇo namaste puruṣottama etaduktaṁ śaṁkarāya vaiṣṇavaṁ paṁjaraṁ mahat
इस प्रकार यह कवच बनाकर, हे विष्णु! मेरी रक्षा कीजिए; हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। यह महान वैष्णव-पंजर शंकर को कहा गया था,
श्लोक 13 (garuda.1.13.13)
पुरा रक्षार्थमीशान्याः कात्यायन्या वृषध्वज । नाशायामास सा येन चामरान्महिषासुरम्
purā rakṣārthamīśānyāḥ kātyāyanyā vṛṣadhvaja nāśāyāmāsa sā yena cāmarānmahiṣāsuram
पूर्वकाल में, हे वृषध्वज! ईशान-पत्नी कात्यायनी की रक्षा के लिए। उसी की सहायता से उन्होंने अमर देवताओं के साथ महिषासुर को नष्ट किया,
श्लोक 14 (garuda.1.13.14)
दानवं रक्तबीजं च अन्याँश्च सुरकण्टकान् । एतज्जपन्नरो भक्त्या शत्रून्विजयते सदा
dānavaṁ raktabījaṁ ca anyā̃śca surakaṇṭakān etajjapannaro bhaktyā śatrūnvijayate sadā
दानव रक्तबीज को, और देवताओं के अन्य शत्रुओं को भी। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका जप करता है, वह सदा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।