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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 171

नाडीव्रण आदि रोगों की चिकित्सा

अध्याय 170अध्याय-सूचीअध्याय 172

श्लोक 1 (garuda.1.171.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १७१ धन्वन्तरिरुवाच । नाडीव्रणादिरोगाणां चिकित्सां शृणु सुश्रुत । नाडीं शस्त्रेण संपाट्य नाजीनां व्रणवत्क्रिया

śrīgaruḍamahāpurāṇam 171 dhanvantariruvāca nāḍīvraṇādirogāṇāṁ cikitsāṁ śṛṇu suśruta nāḍīṁ śastreṇa saṁpāṭya nājīnāṁ vraṇavatkriyā

धन्वन्तरि ने कहा — हे सुश्रुत! नाडीव्रण (नासूर) आदि रोगों की चिकित्सा सुनो। शस्त्र से नाड़ी को काटकर, फिर सामान्य घाव के समान उपचार करना चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.1.171.2)

गुग्गुलुत्रिफलाव्योपैः समांशैराज्ययोजितैः । नाडीदुष्टव्रणं शूलं भगन्दरमथो जयेत्

guggulutriphalāvyopaiḥ samāṁśairājyayojitaiḥ nāḍīduṣṭavraṇaṁ śūlaṁ bhagandaramatho jayet

गुग्गुल, त्रिफला और त्रिकटु को समान भाग में घी के साथ मिलाकर सेवन करने से नाड़ी के दूषित घाव, शूल और भगन्दर पर विजय प्राप्त होती है।

श्लोक 3 (garuda.1.171.3)

निर्गुण्डीरसतस्तैलं नाडीदुष्टव्रणापहम् । हितं पामामयानां तु पानाभ्यञ्जननावनैः

nirguṇḍīrasatastailaṁ nāḍīduṣṭavraṇāpaham hitaṁ pāmāmayānāṁ tu pānābhyañjananāvanaiḥ

निर्गुण्डी के रस से बना तेल नाड़ी के दूषित घाव का नाशक है; पामा (त्वचा-रोग) में भी यह पान, अभ्यंग और नस्य द्वारा हितकर है।

श्लोक 4 (garuda.1.171.4)

गग्गुत्रिफलाकृष्णात्रिपञ्चैकांशयोजिता । घुटि (गुडि) काशोथगुल्मार्शोभगन्दरवतां हिता

gaggutriphalākṛṣṇātripañcaikāṁśayojitā ghuṭi (guḍi) kāśothagulmārśobhagandaravatāṁ hitā

गुग्गुल, त्रिफला और पीपल को क्रमशः तीन, पाँच और एक भाग में मिलाकर बनाई गई गोलियाँ सूजन, गुल्म, बवासीर और भगन्दर के रोगियों के लिए हितकर हैं।

श्लोक 5 (garuda.1.171.5)

ध्वजमध्ये शिरावेधे विशुद्धिरुपदंशके । पाको रक्ष्यः प्रयत्नेन शिश्रक्षयकरो हि सः

dhvajamadhye śirāvedhe viśuddhirupadaṁśake pāko rakṣyaḥ prayatnena śiśrakṣayakaro hi saḥ

उपदंश (व्रण) में लिंग के मध्य में शिरा वेधन होने पर शुद्धता बनाए रखनी चाहिए; पाक (पकना) का यत्नपूर्वक ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि वह अंग को क्षति पहुँचाने वाला होता है।

श्लोक 6 (garuda.1.171.6)

पटोलनिम्बत्रिफलागुडूचीक्वाथमापिबेत् । सगुग्गुलुं सखदिरमुपदंशो विनश्यति

paṭolanimbatriphalāguḍūcīkvāthamāpibet sagugguluṁ sakhadiramupadaṁśo vinaśyati

परवल, नीम, त्रिफला और गुडूची का काढ़ा, गुग्गुल और खदिर के साथ पीने से उपदंश नष्ट हो जाता है।

श्लोक 7 (garuda.1.171.7)

दहेत्कटाहे त्रिफलां सामसी (षी) मधसंयुताम् । उपदंशे प्रलेपोऽय सद्यो रोपयते व्रणम्

dahetkaṭāhe triphalāṁ sāmasī (ṣī) madhasaṁyutām upadaṁśe pralepo'ya sadyo ropayate vraṇam

त्रिफला को कड़ाही में भूनकर मधु के साथ लेप बनाकर उपदंश पर लगाने से घाव तुरन्त भर जाता है।

श्लोक 8 (garuda.1.171.8)

त्रिफलानिम्बभूनिम्बकरञ्जखदिरादिभिः । कल्कैः क्वाथैर्घृतं पक्वमुपदंशहरं परम्

triphalānimbabhūnimbakarañjakhadirādibhiḥ kalkaiḥ kvāthairghṛtaṁ pakvamupadaṁśaharaṁ param

त्रिफला, नीम, भूनिम्ब, करंज और खदिर आदि के कल्क-काढ़े से पकाया गया घी उपदंश का उत्तम नाशक है।

श्लोक 9 (garuda.1.171.9)

आदौ भग्नं विदित्वा तु सेचयेच्छीतलांबुना । पक्वेनालेपनं कार्यं बन्धनं च कुशान्वितम्

ādau bhagnaṁ viditvā tu secayecchītalāṁbunā pakvenālepanaṁ kāryaṁ bandhanaṁ ca kuśānvitam

पहले हड्डी के टूटने की पहचान कर उसे शीतल जल से सिंचित करना चाहिए; पकने के पश्चात् लेप लगाना चाहिए और कुशा घास से बाँधना चाहिए।

श्लोक 10 (garuda.1.171.10)

माषं मांसं तथा सर्पिः क्षीरं यूषः सतीजलः । बृंहणं चान्नपानं स्यात्प्रदेयं भग्नरोगिणे

māṣaṁ māṁsaṁ tathā sarpiḥ kṣīraṁ yūṣaḥ satījalaḥ bṛṁhaṇaṁ cānnapānaṁ syātpradeyaṁ bhagnarogiṇe

उड़द, मांस, घी, दूध, यूष और चावल का पानी — यही पुष्टिकारक अन्न-पान अस्थिभंग के रोगी को देना चाहिए।

श्लोक 11 (garuda.1.171.11)

रसोनमधुनासाज्यसिताकल्कं समश्नुता । छिन्नभिन्नच्युतास्थीनां सन्धानमचिराद्भवेत्

rasonamadhunāsājyasitākalkaṁ samaśnutā chinnabhinnacyutāsthīnāṁ sandhānamacirādbhavet

लहसुन को मधु, घी और मिश्री के कल्क के साथ नियमित रूप से खाने से कटी-टूटी और खिसकी हुई हड्डियाँ शीघ्र जुड़ जाती हैं।

श्लोक 12 (garuda.1.171.12)

अश्वत्थत्रिफलाव्योषाः सवरभिः समीकृतैः । तुल्यो गुग्गुलुना योज्यो भग्नसन्धिप्रसाध (कृत्) कः

aśvatthatriphalāvyoṣāḥ savarabhiḥ samīkṛtaiḥ tulyo guggulunā yojyo bhagnasandhiprasādha (kṛt) kaḥ

पीपल, त्रिफला और त्रिकटु को समान मात्रा में लेकर गुग्गुल के साथ जोड़ने से टूटी हुई सन्धियों का जुड़ाव होता है।

श्लोक 13 (garuda.1.171.13)

सर्वकुष्ठेषु वमनं रेचनं रक्तमोक्षण । वचावासापटोलानां निम्बस्य कलिनीत्वचः

sarvakuṣṭheṣu vamanaṁ recanaṁ raktamokṣaṇa vacāvāsāpaṭolānāṁ nimbasya kalinītvacaḥ

सभी प्रकार के कुष्ठ में वमन, विरेचन और रक्तमोक्षण करना चाहिए। वच, वासा, परवल, नीम और कलिनी की छाल का —

श्लोक 14 (garuda.1.171.14)

कषायो मधुना पीतो वातहृन्मदनान्वितः । विरेचनं प्रयोक्तव्यं त्रिवृत्कर्णफलत्रिकैः

kaṣāyo madhunā pīto vātahṛnmadanānvitaḥ virecanaṁ prayoktavyaṁ trivṛtkarṇaphalatrikaiḥ

— काढ़ा मधु के साथ पीने से वातनाशक होता है और मदन-फल से युक्त होता है; त्रिवृत, कर्ण-फल और त्रिफला से विरेचन कराना चाहिए।

श्लोक 15 (garuda.1.171.15)

मनः शिलांमरीचैस्तु तैलं कुष्ठविनाशनम् । सर्वकुष्ठे विलेपोऽयं शिवापञ्चगुडौदनम्

manaḥ śilāṁmarīcaistu tailaṁ kuṣṭhavināśanam sarvakuṣṭhe vilepo'yaṁ śivāpañcaguḍaudanam

मैनसिल और मिर्च से बना तेल कुष्ठनाशक है। यह लेप सभी कुष्ठों में लगाया जाता है; इसी प्रकार हरड़ को पंचगव्य, गुड़ और चावल के साथ भी प्रयोग किया जाता है।

श्लोक 16 (garuda.1.171.16)

करञ्जैलगजैः कुष्ठं गोमूत्रेण प्रलेपतः । करवीरोद्वर्तनं च तैलाक्तस्य च कुष्ठहृत्

karañjailagajaiḥ kuṣṭhaṁ gomūtreṇa pralepataḥ karavīrodvartanaṁ ca tailāktasya ca kuṣṭhahṛt

करंज, इलायची और गजपिप्पली से गोमूत्र में लेप बनाकर लगाने से कुष्ठ नष्ट होता है; तेल लगी त्वचा पर कनेर का उबटन भी कुष्ठनाशक है।

श्लोक 17 (garuda.1.171.17)

हरिद्रा मलयं रास्ना गुडूच्येडगजस्तथा । आरग्वधः करञ्जश्च लेपः कुष्ठहरः परः

haridrā malayaṁ rāsnā guḍūcyeḍagajastathā āragvadhaḥ karañjaśca lepaḥ kuṣṭhaharaḥ paraḥ

हल्दी, चन्दन, रास्ना, गुडूची, इलायची, गजपिप्पली, अमलतास और करंज — यह लेप कुष्ठ का उत्तम नाशक है।

श्लोक 18 (garuda.1.171.18)

मनः शिलाविडङ्गानि वागजी सर्षपास्तथा । करञ्जैर्मूत्रपिष्टोऽयं लेपः कुष्टहरोर्ऽकवत्

manaḥ śilāviḍaṅgāni vāgajī sarṣapāstathā karañjairmūtrapiṣṭo'yaṁ lepaḥ kuṣṭaharor'kavat

मैनसिल, विडंग, वच और सरसों को करंज के साथ मूत्र में पीसकर बनाया गया लेप सूर्य के समान कुष्ठ को नष्ट करता है।

श्लोक 19 (garuda.1.171.19)

विडङ्गैडवचा कुष्ठनिशासिन्धूत्थसर्षपैः । मूत्राम्लपिष्टो लेपोऽयं दद्रूकुष्टविनाशनः

viḍaṅgaiḍavacā kuṣṭhaniśāsindhūtthasarṣapaiḥ mūtrāmlapiṣṭo lepo'yaṁ dadrūkuṣṭavināśanaḥ

विडंग, इलायची, वच, कूठ, हल्दी, सेंधा नमक और सरसों को मूत्र-अम्ल में पीसकर बनाया गया लेप दद्रु (दाद) और कुष्ठ का नाशक है।

श्लोक 20 (garuda.1.171.20)

प्रपुन्नाटसुबीजानि धात्री सर्जरसः स्नुही । सौवीरपिष्टं दद्रूणामेतदुद्वर्तनं परम्

prapunnāṭasubījāni dhātrī sarjarasaḥ snuhī sauvīrapiṣṭaṁ dadrūṇāmetadudvartanaṁ param

पुनर्नवा के बीज, आँवला, गोंद और थूहर को सौवीर (खट्टे पेय) में पीसकर बनाया गया उबटन दाद के लिए उत्तम है।

श्लोक 21 (garuda.1.171.21)

आरग्वधस्य पत्राणि आरनालेन पेषयेत् । दद्रूकिट्टिम (भ) कुष्ठानि हन्ति सिध्मानमेव च

āragvadhasya patrāṇi āranālena peṣayet dadrūkiṭṭima (bha) kuṣṭhāni hanti sidhmānameva ca

अमलतास के पत्तों को खट्टे चावल-जल में पीसकर लगाने से दाद, किटिभ, कुष्ठ और सिध्म नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 22 (garuda.1.171.22)

उष्णो पीता वागुजी च कुष्ठजित्क्षीरभोजनः । तिलाज्यत्रिफलाक्षौद्रव्योषभल्लातशर्कराः । वृष्याः सप्त समा मेध्याः कष्ठहाः कामचारिणः

uṣṇo pītā vāgujī ca kuṣṭhajitkṣīrabhojanaḥ tilājyatriphalākṣaudravyoṣabhallātaśarkarāḥ vṛṣyāḥ sapta samā medhyāḥ kaṣṭhahāḥ kāmacāriṇaḥ

गर्म वच को दूध-भोजन के साथ पीने से कुष्ठ नष्ट होता है। तिल, घी, त्रिफला, मधु, त्रिकटु, भिलावा और शक्कर — ये सात समान मात्रा में लेने पर वीर्यवर्धक, बुद्धिवर्धक, कुष्ठनाशक तथा स्वतंत्र गति देने वाले होते हैं।

श्लोक 23 (garuda.1.171.23)

विडङ्गत्रिफलाकृष्णाचूर्णं लीढं समाक्षिकम् । हन्ति कुष्ठक्रिमिमेहनाडीव्रणभगन्दरान्

viḍaṅgatriphalākṛṣṇācūrṇaṁ līḍhaṁ samākṣikam hanti kuṣṭhakrimimehanāḍīvraṇabhagandarān

विडंग, त्रिफला और पीपल का चूर्ण मधु के साथ चाटने से कुष्ठ, कृमि, प्रमेह, नाड़ीव्रण और भगन्दर नष्ट होते हैं।

श्लोक 24 (garuda.1.171.24)

यः खादेदभयारिष्टमरिष्टामलकानिशाः । स जयेत्सर्वकुष्ठानिमासादूर्ध्वं न संशयः

yaḥ khādedabhayāriṣṭamariṣṭāmalakāniśāḥ sa jayetsarvakuṣṭhānimāsādūrdhvaṁ na saṁśayaḥ

जो हरड़, नीम, आँवला और हल्दी का सेवन करता है, वह एक माह में ही निःसन्देह सभी कुष्ठों पर विजय प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 25 (garuda.1.171.25)

दह्यमानायुतः कुम्भे मूलगे खदिराङ्कुरः । साक्षधात्रीरसः क्षौद्रो हन्यात्कुष्ठं रसायनम्

dahyamānāyutaḥ kumbhe mūlage khadirāṅkuraḥ sākṣadhātrīrasaḥ kṣaudro hanyātkuṣṭhaṁ rasāyanam

जड़ सहित घड़े में जलाए गए खदिर के अंकुर को आँवले के रस और मधु के साथ लेने से कुष्ठ रसायन-विधि से नष्ट होता है।

श्लोक 26 (garuda.1.171.26)

धात्री खदिरयोः क्काथं पीत्वा वागजिसंयुतम् । शङ्खेन्दुधवलं श्वित्रं हन्ति तूर्णं न संशयः

dhātrī khadirayoḥ kkāthaṁ pītvā vāgajisaṁyutam śaṅkhendudhavalaṁ śvitraṁ hanti tūrṇaṁ na saṁśayaḥ

आँवला और खदिर का काढ़ा वच के साथ पीने से शंख और चन्द्रमा के समान श्वेत श्वित्र (सफेद दाग) शीघ्र नष्ट हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 27 (garuda.1.171.27)

पीत्वा भल्लातकं तैलं मासाद्व्याधिं जयेन्नरः । सेवितं खादिरं वारि पानाद्यैः कुष्ठजिद्भवेत्

pītvā bhallātakaṁ tailaṁ māsādvyādhiṁ jayennaraḥ sevitaṁ khādiraṁ vāri pānādyaiḥ kuṣṭhajidbhavet

भिलावे का तेल पीने से मनुष्य एक माह में रोग पर विजय पाता है। खदिर-जल का पान आदि द्वारा सेवन करने पर वह कुष्ठनाशक होता है।

श्लोक 28 (garuda.1.171.28)

भावितं मलपूक्वाथैः सोमराजीफलं बहु । कर्षं भक्षेदलवणो ह्यक्षफल्गुशृतं पिबेत्

bhāvitaṁ malapūkvāthaiḥ somarājīphalaṁ bahu karṣaṁ bhakṣedalavaṇo hyakṣaphalguśṛtaṁ pibet

मल-शुद्धिकारक काढ़ों से भावित बकुची फल को बिना नमक के एक कर्ष मात्रा में खाना चाहिए, तथा अक्ष और फल्गु से उबाला हुआ [काढ़ा] पीना चाहिए।

श्लोक 29 (garuda.1.171.29)

हन्ति श्वित्रमसाध्यं च लेपे योज्यापराजिता । वासा शुद्धा च त्रिफला पटोलं च करञ्जकम्

hanti śvitramasādhyaṁ ca lepe yojyāparājitā vāsā śuddhā ca triphalā paṭolaṁ ca karañjakam

यह असाध्य श्वित्र को भी नष्ट कर देता है। लेप में अपराजिता, शुद्ध वासा, त्रिफला, परवल और करंज भी मिलानी चाहिए —

श्लोक 30 (garuda.1.171.30)

निम्बाशनं कृष्णवेत्रं क्वाथकल्केन यद्धृतम् । वज्रकं तद्भवेत्कुष्ठं शतवर्षाणि जीवति

nimbāśanaṁ kṛṣṇavetraṁ kvāthakalkena yaddhṛtam vajrakaṁ tadbhavetkuṣṭhaṁ śatavarṣāṇi jīvati

— नीम, आशन और काला बेंत — इनके काढ़े-कल्क से बनाया गया घी 'वज्रक' कहलाता है; इसका सेवन करने वाला सौ वर्ष तक जीवित रहता है।

श्लोक 31 (garuda.1.171.31)

स्वरसेन च दूर्वायाः पचेत्तैलं चतुर्गुणम् । कच्छूर्विचर्चिका पामा अभ्यङ्गादेव नश्यति

svarasena ca dūrvāyāḥ pacettailaṁ caturguṇam kacchūrvicarcikā pāmā abhyaṅgādeva naśyati

दूब के रस के साथ चौगुना तेल पकाने से खुजली, विचर्चिका और पामा केवल मालिश से ही नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 32 (garuda.1.171.32)

द्रुमत्वगर्ककुष्ठानि लवणानि च मूत्रकम् । गम्भारिकाचित्रकैस्तैस्तैलं कुष्ठव्रणादिनुत्

drumatvagarkakuṣṭhāni lavaṇāni ca mūtrakam gambhārikācitrakaistaistailaṁ kuṣṭhavraṇādinut

वृक्ष की छाल, आक, कूठ, लवण और मूत्र को गम्भारी और चित्रक के साथ मिलाकर बनाया गया तेल कुष्ठ, घाव आदि का नाशक है।

श्लोक 33 (garuda.1.171.33)

(अथाम्लपित्तचिकित्सा) धात्रीनिम्बफलं तद्वद्गोमूत्रेण च चित्रकम् । वासामृतापर्पटिकानिम्बभूनिम्बमार्करैः (वैः) । त्रिफलाकुलत्थैः क्वाथः सक्षौद्रश्चाम्लपित्तहा

(athāmlapittacikitsā) dhātrīnimbaphalaṁ tadvadgomūtreṇa ca citrakam vāsāmṛtāparpaṭikānimbabhūnimbamārkaraiḥ (vaiḥ) triphalākulatthaiḥ kvāthaḥ sakṣaudraścāmlapittahā

(अब अम्लपित्त की चिकित्सा) आँवला और नीम का फल, तथा गोमूत्र के साथ चित्रक; वासा, गुडूची, पर्पटी, नीम, भूनिम्ब और आक — त्रिफला और कुलत्थ के साथ इनका काढ़ा, मधु सहित, अम्लपित्त का नाशक है।

श्लोक 34 (garuda.1.171.34)

फलत्रिकं पटोलं च तिक्तक्वाथः सितायुतः । पीतो यष्टीमधुयुतो ज्वरच्छर्द्यम्लपित्तजित्

phalatrikaṁ paṭolaṁ ca tiktakvāthaḥ sitāyutaḥ pīto yaṣṭīmadhuyuto jvaracchardyamlapittajit

त्रिफला और परवल का कड़वा काढ़ा शक्कर के साथ, यष्टिमधु सहित पीने से ज्वर, वमन और अम्लपित्त नष्ट होते हैं।

श्लोक 35 (garuda.1.171.35)

वासाघृतं तिक्तघृतं पिप्पलीघृतमेव च । अम्लपित्ते प्रयोक्तव्यं गुडकूष्माण्डकं तथा

vāsāghṛtaṁ tiktaghṛtaṁ pippalīghṛtameva ca amlapitte prayoktavyaṁ guḍakūṣmāṇḍakaṁ tathā

अम्लपित्त में वासा-घृत, कड़वे द्रव्यों का घृत तथा पीपल-घृत का प्रयोग करना चाहिए; इसी प्रकार गुड़ में पका कूष्माण्ड भी।

श्लोक 36 (garuda.1.171.36)

पिप्पली मधुसंयुक्ता अम्लपित्तविनाशिनी । श्लेष्माग्निमान्द्यनुत्पथ्यापिप्पलीगुडमोदकः

pippalī madhusaṁyuktā amlapittavināśinī śleṣmāgnimāndyanutpathyāpippalīguḍamodakaḥ

पीपल मधु के साथ लेने पर अम्लपित्त का नाशक है। पीपल-गुड़ का मोदक कफ, अग्निमांद्य और अरुचि का नाशक है।

श्लोक 37 (garuda.1.171.37)

पिष्ट्वाजाजीं सधन्याकां घृप्रस्थं विपाचयेत् । कफपित्तारुचिहरं मन्दानलवमिं हरेत्

piṣṭvājājīṁ sadhanyākāṁ ghṛprasthaṁ vipācayet kaphapittāruciharaṁ mandānalavamiṁ haret

जीरे को धनिया के साथ पीसकर एक प्रस्थ घी में पकाना चाहिए; यह कफ-पित्त-अरुचि का नाशक तथा मन्दाग्नि और वमन को दूर करने वाला है।

श्लोक 38 (garuda.1.171.38)

(इत्यम्लपित्तचिकित्सा) पिप्पल्यमृतभूनिम्बवासकारिष्टपर्पटैः । खदिरारिष्टकैः क्वाथो विस्फोटार्तिज्वरापहः

(ityamlapittacikitsā) pippalyamṛtabhūnimbavāsakāriṣṭaparpaṭaiḥ khadirāriṣṭakaiḥ kvātho visphoṭārtijvarāpahaḥ

पीपल, गुडूची, भूनिम्ब, वासा, अरिष्ट, पर्पट, खदिर और अरिष्टक का काढ़ा विस्फोट (फफोले) की पीड़ा और ज्वर का नाशक है।

श्लोक 39 (garuda.1.171.39)

त्रिफलारससंयुक्तं सर्पिस्त्रिवृतयासह । प्रयोक्तव्यं विरेकार्थं वीसर्पज्वरशान्तये

triphalārasasaṁyuktaṁ sarpistrivṛtayāsaha prayoktavyaṁ virekārthaṁ vīsarpajvaraśāntaye

त्रिफला के रस से युक्त घी को त्रिवृत के साथ विरेचन (रेचन) के लिए प्रयोग करना चाहिए, ताकि विसर्प का ज्वर शान्त हो।

श्लोक 40 (garuda.1.171.40)

खादिरात्रिफलारिष्टपटोलामृतवासकैः । क्वाथोऽष्टकाख्यो जयति रोमान्तिकमसूरिकाम्

khādirātriphalāriṣṭapaṭolāmṛtavāsakaiḥ kvātho'ṣṭakākhyo jayati romāntikamasūrikām

खदिर, त्रिफला, अरिष्ट, परवल, गुडूची और वासा से बना 'अष्टक' नामक काढ़ा रोमान्तिका (छोटी माता) और मसूरिका (चेचक) पर विजय दिलाता है।

श्लोक 41 (garuda.1.171.41)

कुष्ठवीसर्पविस्फोटकण्ड्वादीनां विघातकः । लशुनानां तु चृर्णस्य घर्षो मशकनाशनः

kuṣṭhavīsarpavisphoṭakaṇḍvādīnāṁ vighātakaḥ laśunānāṁ tu cṛrṇasya gharṣo maśakanāśanaḥ

यह कुष्ठ, विसर्प, विस्फोट और खुजली आदि का नाशक है। लहसुन के चूर्ण को रगड़ने से मशक (दंश करने वाले कीट) नष्ट होते हैं।

श्लोक 42 (garuda.1.171.42)

चर्मकीलं जरुमणिं मशकांस्तिलकालकान् । उत्कृत्य शस्त्रेण दहेत्क्षागग्निभ्यामशेषतः

carmakīlaṁ jarumaṇiṁ maśakāṁstilakālakān utkṛtya śastreṇa dahetkṣāgagnibhyāmaśeṣataḥ

चर्मकील (मस्से), जरुमणि, तिल के दानों जैसे काले चिह्न शस्त्र से काटकर क्षार और अग्नि दोनों से पूर्णतः दाग़ देने चाहिए।

श्लोक 43 (garuda.1.171.43)

पटोलनीलीलेपः स्याज्जाल (ज्वाला) गर्दभरोगनुत् । गुञ्जाफलैः शृतं तलं भृङ्गराजरसेन तु । कण्ठ (ण्डु) दारुणकृत्कुष्ठवातव्याधिविनाशनम्

paṭolanīlīlepaḥ syājjāla (jvālā) gardabharoganut guñjāphalaiḥ śṛtaṁ talaṁ bhṛṅgarājarasena tu kaṇṭha (ṇḍu) dāruṇakṛtkuṣṭhavātavyādhivināśanam

परवल और नील का लेप ज्वालायुक्त गर्दभ-रोग (एक प्रकार का विसर्प) का नाशक है। गुंजा के फलों में उबाला हुआ तेल, भृंगराज के रस के साथ, गम्भीर खुजली को शान्त करने वाला तथा कुष्ठ-वातव्याधि का नाशक है।

श्लोक 44 (garuda.1.171.44)

अर्कास्थिमज्जात्रिफलानालीछा भृङ्गराजकम् । जीर्णे पक्वे लौहचूर्णं काञ्जिकं कृष्णकेशकृत्

arkāsthimajjātriphalānālīchā bhṛṅgarājakam jīrṇe pakve lauhacūrṇaṁ kāñjikaṁ kṛṣṇakeśakṛt

आक की गुठली की मींगी, त्रिफला, नालीछा और भृंगराज को अच्छी तरह पकाकर, लौह-चूर्ण और काँजी के साथ मिलाने से बाल काले हो जाते हैं।

श्लोक 45 (garuda.1.171.45)

क्षीरात्सशर्करसाद्द्विप्रस्थो मधुकात्पले । तैलम्य कुडवं पक्वं तन्नस्यं पलितापहम्

kṣīrātsaśarkarasāddviprastho madhukātpale tailamya kuḍavaṁ pakvaṁ tannasyaṁ palitāpaham

शक्कर-युक्त दो प्रस्थ दूध और एक पल यष्टिमधु के साथ एक कुडव तेल पकाकर उसे नस्य के रूप में लेने से बालों का पकना (सफेद होना) दूर होता है।

श्लोक 46 (garuda.1.171.46)

मुखरोगे तु त्रिफलागण्डूषपरिधारणम् । गृहधूम यवक्षारपाठाव्योपरसाञ्जनम्

mukharoge tu triphalāgaṇḍūṣaparidhāraṇam gṛhadhūma yavakṣārapāṭhāvyoparasāñjanam

मुख के रोगों में त्रिफला के काढ़े का कुल्ला करके रोके रखना चाहिए। घर की कालिख, यव-क्षार, पाठा, त्रिकटु और रसाञ्जन —

श्लोक 47 (garuda.1.171.47)

तेजोदं त्रिफलालोध्रं चित्रकं चेति चूर्णितम् । सक्षौद्रं धारयेद्वक्त्रे ग्रीवादन्तास्यरोगनुत्

tejodaṁ triphalālodhraṁ citrakaṁ ceti cūrṇitam sakṣaudraṁ dhārayedvaktre grīvādantāsyaroganut

— तेजोवती, त्रिफला, लोध्र और चित्रक को चूर्ण बनाकर मधु के साथ मुख में धारण करने से गले, दाँत और मुख के रोग नष्ट होते हैं।

श्लोक 48 (garuda.1.171.48)

पटोल निम्बजम्व्वाग्रमालतीनवपल्लवाः । पञ्चपल्लवकः श्रेष्ठः कषयो मुखधावने

paṭola nimbajamvvāgramālatīnavapallavāḥ pañcapallavakaḥ śreṣṭhaḥ kaṣayo mukhadhāvane

परवल, नीम, जामुन, आम और मालती के नए पल्लव — यह 'पंचपल्लव' काढ़ा मुख धोने के लिए श्रेष्ठ है।

श्लोक 49 (garuda.1.171.49)

लशुनार्द्रकशिग्रूणां पारुल्या मूलकस्य च । रुदन्त्याश्च रसः श्रेष्ठः कदुष्णः कर्णपूरणे

laśunārdrakaśigrūṇāṁ pārulyā mūlakasya ca rudantyāśca rasaḥ śreṣṭhaḥ kaduṣṇaḥ karṇapūraṇe

लहसुन, अदरक, सहजन, पारुल और मूली, तथा रुदन्ती का रस, कुछ उष्ण करके, कान भरने के लिए श्रेष्ठ है।

श्लोक 50 (garuda.1.171.50)

तीव्रशूलोत्तरे कर्णे सशब्दे क्लेदवाहिनि । बस्तमूत्रं क्षिपेत्कोष्णं सैन्धवेनावचूर्णितम्

tīvraśūlottare karṇe saśabde kledavāhini bastamūtraṁ kṣipetkoṣṇaṁ saindhavenāvacūrṇitam

तीव्र पीड़ा, शब्द और स्राव से युक्त कान में सेंधा नमक से युक्त गुनगुना बकरी का मूत्र डालना चाहिए।

श्लोक 51 (garuda.1.171.51)

जातीपत्ररसे तैलं पक्वं पूतिककर्णजित् । शुण्ठीतैलं सार्षपं च क्रोष्णं स्यात्कर्णशूलनुत्

jātīpatrarase tailaṁ pakvaṁ pūtikakarṇajit śuṇṭhītailaṁ sārṣapaṁ ca kroṣṇaṁ syātkarṇaśūlanut

जाती के पत्तों के रस में पकाया गया तेल कान की दुर्गन्धयुक्त पीड़ा (पूतिकर्ण) का नाशक है। सोंठ का तेल या हल्का गर्म सरसों का तेल कर्णशूल का नाशक है।

श्लोक 52 (garuda.1.171.52)

पञ्चमूलिशृतं क्षीरं स्याच्चित्रकहरीतकी । सर्पिर्गुडः षडङ्गश्चयूषः पीनसशान्तये

pañcamūliśṛtaṁ kṣīraṁ syāccitrakaharītakī sarpirguḍaḥ ṣaḍaṅgaścayūṣaḥ pīnasaśāntaye

पंचमूल में उबाला गया दूध, चित्रक और हरड़, घी, गुड़ — यह छह अंगों वाला यूष प्रतिश्याय (जुकाम) की शान्ति के लिए है।

श्लोक 53 (garuda.1.171.53)

अक्षिकुक्षिभवा रोगाः प्रतिश्यायव्रणज्वराः । पञ्चैते पञ्चरात्रेण प्रशमं यान्ति लङ्घनात्

akṣikukṣibhavā rogāḥ pratiśyāyavraṇajvarāḥ pañcaite pañcarātreṇa praśamaṁ yānti laṅghanāt

नेत्र और उदर में उत्पन्न रोग, प्रतिश्याय, घाव और ज्वर — ये पाँचों उपवास (लंघन) से पाँच रात्रियों में शान्त हो जाते हैं।

श्लोक 54 (garuda.1.171.54)

धात्रीरसानाञ्च दृशः कोपं हरति पूरणात् । सक्षौद्रः सैन्धवो वापि शिग्रुदार्विरसाञ्जनम्

dhātrīrasānāñca dṛśaḥ kopaṁ harati pūraṇāt sakṣaudraḥ saindhavo vāpi śigrudārvirasāñjanam

आँवले के रस से आँखों को भरने पर उनका विकार दूर होता है। मधु-सहित सेंधा नमक, या सहजन-दारुहल्दी का रसाञ्जन —

श्लोक 55 (garuda.1.171.55)

हरिद्रादारुसिन्धूत्थपथ्याजनवगौरिकैः । पिष्टैर्दत्तो बहिर्लपो नेत्रव्याधिनिवारकः

haridrādārusindhūtthapathyājanavagaurikaiḥ piṣṭairdatto bahirlapo netravyādhinivārakaḥ

— हल्दी, दारुहल्दी, सेंधा नमक, हरड़, अंजन और गौरिका को पीसकर बाहरी लेप के रूप में लगाने से नेत्र-रोग दूर होता है।

श्लोक 56 (garuda.1.171.56)

मृतभ्रष्टाभयालेपात्त्रिफला क्षीरसंयुता । शुण्ठीनिम्बदलैः पिष्टैः सुखोष्णैः स्वल्पसैन्धवैः । धार्यश्चक्षुषि संक्षेपाच्छोथकण्डूरुजापहः

mṛtabhraṣṭābhayālepāttriphalā kṣīrasaṁyutā śuṇṭhīnimbadalaiḥ piṣṭaiḥ sukhoṣṇaiḥ svalpasaindhavaiḥ dhāryaścakṣuṣi saṁkṣepācchothakaṇḍūrujāpahaḥ

भुनी और संस्कारित हरड़ का लेप, त्रिफला-दूध के साथ, अथवा सोंठ-नीम पत्तों को हल्का गर्म कर थोड़े सेंधा नमक के साथ पीसकर संक्षेप में आँख पर लगाने से सूजन, खुजली और पीड़ा दूर होती है।

श्लोक 57 (garuda.1.171.57)

अभयाक्षामृतं चैकद्विचतुर्भागिकं युतम् । मध्वाज्यलीढं क्वाथो वा सर्वनेत्ररुगर्दनम्

abhayākṣāmṛtaṁ caikadvicaturbhāgikaṁ yutam madhvājyalīḍhaṁ kvātho vā sarvanetrarugardanam

हरड़, बहेड़ा और गुडूची को क्रमशः एक, दो और चार भाग में लेकर मधु-घी के साथ चाटने से, अथवा उनके काढ़े से सभी नेत्र-रोग नष्ट होते हैं।

श्लोक 58 (garuda.1.171.58)

चन्दनत्रिफलापूगपलाशतरुमूलकैः । जलपिष्टैरियं विर्तिरशेषतिमिरापहा

candanatriphalāpūgapalāśatarumūlakaiḥ jalapiṣṭairiyaṁ virtiraśeṣatimirāpahā

चन्दन, त्रिफला, सुपारी, पलाश और वृक्षों की जड़ों को जल में पीसकर बनाई गई वर्ती (अंजन-शलाका) सम्पूर्ण तिमिर (मोतियाबिंद) को नष्ट कर देती है।

श्लोक 59 (garuda.1.171.59)

दध्नातिघृष्टं मरिचं रात्र्यान्ध्यापहमञ्जनम् । त्रिफलाक्वाथकल्काभ्यां सपयस्कं शृतं घृतम्

dadhnātighṛṣṭaṁ maricaṁ rātryāndhyāpahamañjanam triphalākvāthakalkābhyāṁ sapayaskaṁ śṛtaṁ ghṛtam

दही में खूब घिसी हुई काली मिर्च रात्रि-अन्धता को दूर करने वाला अंजन है। त्रिफला के काढ़े-कल्क के साथ दूध सहित पकाया गया घी —

श्लोक 60 (garuda.1.171.60)

तिमिराण्यचिराद्धन्यात्पीतमेतन्निशामुखे । पिप्पलीत्रिफला द्राक्षालोहचूर्णं ससैन्धवम्

timirāṇyacirāddhanyātpītametanniśāmukhe pippalītriphalā drākṣālohacūrṇaṁ sasaindhavam

— रात के आरम्भ में पीने से तिमिर (मोतियाबिंद) शीघ्र नष्ट हो जाता है। पीपल, त्रिफला, अंगूर और लौह-चूर्ण सेंधा नमक के साथ —

श्लोक 61 (garuda.1.171.61)

भृङ्गराजरसैर्घृष्टं घुटिकाञ्जनमिष्यते । आन्ध्यं सतिमिरं काचं हन्त्यन्यान्नेत्ररोगकान्

bhṛṅgarājarasairghṛṣṭaṁ ghuṭikāñjanamiṣyate āndhyaṁ satimiraṁ kācaṁ hantyanyānnetrarogakān

— भृंगराज के रस के साथ घिसकर बनाया गया 'घुटिका-अंजन' प्रयोग किया जाता है। यह अंधापन, तिमिर, काच (ग्लूकोमा) तथा अन्य नेत्र-रोगों का नाशक है।

श्लोक 62 (garuda.1.171.62)

त्रिकटु त्रिफला नक्त सैन्धवं च मनः शिला । रुचकं शङ्खनाभिश्च जातीपुष्पाणि निम्बकम्

trikaṭu triphalā nakta saindhavaṁ ca manaḥ śilā rucakaṁ śaṅkhanābhiśca jātīpuṣpāṇi nimbakam

त्रिकटु, त्रिफला, नक्तमाल, सेंधा नमक, मैनसिल, रुचक, शंखनाभि, जाती के फूल और नीम —

श्लोक 63 (garuda.1.171.63)

रसाञ्जनं भृङ्गराजं घृतं मधु पयस्तथा । एतत्पिष्ट्वा च वटिका सर्वनेत्ररुगर्दिनी

rasāñjanaṁ bhṛṅgarājaṁ ghṛtaṁ madhu payastathā etatpiṣṭvā ca vaṭikā sarvanetrarugardinī

— रसाञ्जन, भृंगराज, घी, मधु और दूध — इन सबको पीसकर गोली बनाने पर यह सभी नेत्र-रोगों का नाशक अंजन बनता है।

श्लोक 64 (garuda.1.171.64)

दग्धमेरण्डकं मूलं लेपात्काकिकपेषितम् । शिरोऽर्तिं नाशयत्याशु पुष्पं वा मुचुकुन्दक (ज) म्

dagdhameraṇḍakaṁ mūlaṁ lepātkākikapeṣitam śiro'rtiṁ nāśayatyāśu puṣpaṁ vā mucukundaka (ja) m

जली हुई अरंडी की जड़ को घोल में पीसकर लेप करने से, अथवा मुचुकुन्द के फूल से, सिर की पीड़ा शीघ्र नष्ट हो जाती है।

श्लोक 65 (garuda.1.171.65)

शतमूल्यैरण्डमूलचक्राव्याघ्रीपलैः शृतम् । तैलं नस्यमरुश्लेष्मतिमिरोर्ध्वर्(द्ध) गदापहम्

śatamūlyairaṇḍamūlacakrāvyāghrīpalaiḥ śṛtam tailaṁ nasyamaruśleṣmatimirordhvar(ddha) gadāpaham

शतावरी, अरंडी की जड़, चक्र और कटेरी के पल-मात्रा में उबाला गया तेल, नस्य के रूप में प्रयोग करने पर, रूखी वायु, कफ, तिमिर और शरीर के ऊपरी भाग के रोगों का नाशक है।

श्लोक 66 (garuda.1.171.66)

नाचनं (लनणं) सगुडं विश्वं पिप्पली वा ससैन्धवा । भुजस्तम्भादिरोगेषु सर्वेषूर्ध्वगदेषु च

nācanaṁ (lanaṇaṁ) saguḍaṁ viśvaṁ pippalī vā sasaindhavā bhujastambhādirogeṣu sarveṣūrdhvagadeṣu ca

नमक को गुड़ के साथ, अथवा सोंठ या पीपल को सेंधा नमक के साथ लेना चाहिए — यह भुजा-जकड़न आदि सभी ऊर्ध्व-शरीर रोगों में हितकर है।

श्लोक 67 (garuda.1.171.67)

सूर्यावर्ते विधातव्यं नस्यकर्मादिभेषजम् । दशमूलीकषायं तु सर्पिः सैन्धवसंयुतम् । नस्यमङ्गविभेदघ्नं सूर्यावर्तशिरोऽर्तिनुत्

sūryāvarte vidhātavyaṁ nasyakarmādibheṣajam daśamūlīkaṣāyaṁ tu sarpiḥ saindhavasaṁyutam nasyamaṅgavibhedaghnaṁ sūryāvartaśiro'rtinut

सूर्यावर्त (एक प्रकार का सिरदर्द) में नस्य-कर्म और अन्य औषधियाँ करनी चाहिए। दशमूल का काढ़ा घी और सेंधा नमक के साथ नस्य के रूप में लेने से अंग-विच्छेद और सूर्यावर्त की सिर-पीड़ा नष्ट होती है।

श्लोक 68 (garuda.1.171.68)

दध्ना सौवर्चलाजाजीमधूकं नीलमुत्पलम् । पिबेत्क्षौद्रयुतं नारी वातासृग्दरपीडिता

dadhnā sauvarcalājājīmadhūkaṁ nīlamutpalam pibetkṣaudrayutaṁ nārī vātāsṛgdarapīḍitā

वातासृक् (रक्त-वात विकार) अथवा प्रदर से पीड़ित स्त्री को दही, सौवर्चल, जीरा, महुआ और नील कमल को मधु के साथ मिलाकर पीना चाहिए।

श्लोक 69 (garuda.1.171.69)

वासकस्वरसं पैत्ते गुडूच्या रसमेव वा । जलेनामलकीबीजं कल्कं वाससितामधु

vāsakasvarasaṁ paitte guḍūcyā rasameva vā jalenāmalakībījaṁ kalkaṁ vāsasitāmadhu

पित्त-प्रधान प्रदार में वासा का ताज़ा रस, अथवा गुडूची का रस; अथवा आँवले के बीज का जल-कल्क; अथवा वासा, मिश्री और मधु लेना चाहिए।

श्लोक 70 (garuda.1.171.70)

आमलक्या मधुरसं मूलं कार्पासमेव वा । पाण्डुप्रदरशान्त्यर्थं पिबेत्तण्डुलवारिणा

āmalakyā madhurasaṁ mūlaṁ kārpāsameva vā pāṇḍupradaraśāntyarthaṁ pibettaṇḍulavāriṇā

पाण्डु और प्रदर की शान्ति के लिए आँवले का मधुर रस, अथवा कपास की जड़, चावल के पानी के साथ पीनी चाहिए।

श्लोक 71 (garuda.1.171.71)

तण्डुलीयकमूलं तु सक्षौद्रे सरसाञ्जनम् । तण्डुलोदकसंपीतं सर्वांश्चासृक्दराञ्जयेत् । कुशमूलं तण्डुलाद्भिः पीतं चासृक्दरं जयेत्

taṇḍulīyakamūlaṁ tu sakṣaudre sarasāñjanam taṇḍulodakasaṁpītaṁ sarvāṁścāsṛkdarāñjayet kuśamūlaṁ taṇḍulādbhiḥ pītaṁ cāsṛkdaraṁ jayet

तण्डुलीयक की जड़ को मधु और रसाञ्जन के साथ, चावल के पानी में मिलाकर पीने से सभी प्रकार के असृग्दर (रक्त-प्रदर) पर विजय मिलती है। कुशा की जड़ चावल के पानी के साथ पीने से भी असृग्दर पर विजय मिलती है।

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