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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 174

ब्राह्मी घृत आदि का वर्णन

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

श्लोक 1 (garuda.1.174.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १७४ धन्वतरिरुवाच । घृततैलादि वक्ष्यामि शृणु सुश्रुत रोगनुत् । शङ्खपुष्पी वचा सोमा ब्राह्मी ब्रह्मसुवर्चला

śrīgaruḍamahāpurāṇam 174 dhanvatariruvāca ghṛtatailādi vakṣyāmi śṛṇu suśruta roganut śaṅkhapuṣpī vacā somā brāhmī brahmasuvarcalā

धन्वन्तरि ने कहा — हे सुश्रुत! अब मैं रोगनाशक घृत-तेल आदि का वर्णन करूँगा, सुनो। शंखपुष्पी, वच, सोमराजी, ब्राह्मी, ब्रह्मसुवर्चला —

श्लोक 2 (garuda.1.174.2)

अभया च गुडूची च अटरूपकवागुजी । एतैरक्षसमैर्भागैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत्

abhayā ca guḍūcī ca aṭarūpakavāgujī etairakṣasamairbhāgairghṛtaprasthaṁ vipācayet

— हरड़, गुडूची, अड़ूसा और वच — इन्हें एक-एक अक्ष के बराबर भाग में लेकर एक प्रस्थ घी में पकाना चाहिए।

श्लोक 3 (garuda.1.174.3)

कण्टकार्या रसप्रस्थक्षीरप्रस्थममन्वितम् । एतद्ब्राह्मीघृतं नाम श्रुतिमेधाकरं परम्

kaṇṭakāryā rasaprasthakṣīraprasthamamanvitam etadbrāhmīghṛtaṁ nāma śrutimedhākaraṁ param

कटेरी के रस का एक प्रस्थ और दूध का एक प्रस्थ भी मिलाना चाहिए — यही 'ब्राह्मी घृत' कहलाता है, जो श्रवण-शक्ति और बुद्धि को बढ़ाने में सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 4 (garuda.1.174.4)

त्रिफलाचित्रकबलानिर्गुण्डी निम्बवासकाः । पुनर्नवा गुडूची च बृहती च शतावरी

triphalācitrakabalānirguṇḍī nimbavāsakāḥ punarnavā guḍūcī ca bṛhatī ca śatāvarī

त्रिफला, चित्रक, बला, निर्गुण्डी, नीम, वासा, पुनर्नवा, गुडूची, बृहती और शतावरी —

श्लोक 5 (garuda.1.174.5)

एतैर्घृतं यथालाभं सर्वरोगविमर्दनम् । बलाशतकषाये तु तैलस्यार्धाढकं पचेत् । कल्कैर्मधूकमञ्जिष्ठाचन्दनोत्पलपद्मकैः

etairghṛtaṁ yathālābhaṁ sarvarogavimardanam balāśatakaṣāye tu tailasyārdhāḍhakaṁ pacet kalkairmadhūkamañjiṣṭhācandanotpalapadmakaiḥ

— इनसे यथोपलब्ध घी बनाना चाहिए, जो सभी रोगों का नाश करता है। बला के सौ-गुने काढ़े में आधा आढ़क तेल पकाना चाहिए, महुआ, मंजिष्ठा, चन्दन, नील कमल और पद्मक के कल्क के साथ —

श्लोक 6 (garuda.1.174.6)

सूक्ष्मैलापिप्पलीकुष्ठत्वगेलागुरुकेसरैः । गन्धाश्वजीवनीयैश्च क्षीराढकसमाश्रितम्

sūkṣmailāpippalīkuṣṭhatvagelāgurukesaraiḥ gandhāśvajīvanīyaiśca kṣīrāḍhakasamāśritam

— छोटी इलायची, पीपल, कूठ, दालचीनी, अगर और केसर, तथा गन्ध-वर्ग और जीवनीय-वर्ग की औषधियों को, एक आढ़क दूध के साथ मिलाकर —

श्लोक 7 (garuda.1.174.7)

एतन्मृद्वग्निना पक्वं स्थापयेद्राजते शुभे । सर्ववातविकारांस्तु सर्वधात्वन्तराश्रयान्

etanmṛdvagninā pakvaṁ sthāpayedrājate śubhe sarvavātavikārāṁstu sarvadhātvantarāśrayān

— मन्द अग्नि पर पकाकर एक शुभ चाँदी के पात्र में रखना चाहिए। यह सभी धातुओं में स्थित वात-विकारों को —

श्लोक 8 (garuda.1.174.8)

तैलमेतत्प्रशमयेद्वल्याक्यं राजवल्लभम् । शतावरीरसप्रस्थं क्षीरप्रस्थं तथैव च

tailametatpraśamayedvalyākyaṁ rājavallabham śatāvarīrasaprasthaṁ kṣīraprasthaṁ tathaiva ca

— शान्त करने वाला यह तेल 'बल्याक्य' कहलाता है, जो राजाओं द्वारा प्रिय माना गया है। शतावरी के रस का एक प्रस्थ तथा दूध का भी एक प्रस्थ,

श्लोक 9 (garuda.1.174.9)

शतपुष्पं देवदारु मांसी शैलेयकं बला । चन्दनं तगरं कुष्टं मनः शिला ज्योतिष्मती

śatapuṣpaṁ devadāru māṁsī śaileyakaṁ balā candanaṁ tagaraṁ kuṣṭaṁ manaḥ śilā jyotiṣmatī

— शतपुष्पा, देवदारु, जटामांसी, शैलेय, बला, चन्दन, तगर, कूठ, मैनसिल और ज्योतिष्मती —

श्लोक 10 (garuda.1.174.10)

एतैः कर्षसमैः कल्कैः घृतप्रस्थं विपाचयेत् । कुव्जवामनपङ्गूनां बधिरव्यङ्गकुष्ठिनाम्

etaiḥ karṣasamaiḥ kalkaiḥ ghṛtaprasthaṁ vipācayet kuvjavāmanapaṅgūnāṁ badhiravyaṅgakuṣṭhinām

— इन सबका एक-एक कर्ष कल्क लेकर एक प्रस्थ घी में पकाना चाहिए। कुबड़े, वमन-प्रवण, लंगड़े, बहरे, विकृत-अंग और कुष्ठ-रोगियों के लिए —

श्लोक 11 (garuda.1.174.11)

वायुना भग्नगात्राणां ये च सीदन्ति मैथुने । जराजर्जरगात्राणां चाध्मानमुख शोषिणाम्

vāyunā bhagnagātrāṇāṁ ye ca sīdanti maithune jarājarjaragātrāṇāṁ cādhmānamukha śoṣiṇām

— वायु से टूटे अंग वाले, मैथुन में असफल रहने वाले, वृद्धावस्था से जर्जर अंग वाले, आफरे और मुख-शोष से पीड़ित —

श्लोक 12 (garuda.1.174.12)

त्वग्गताश्चापि ये वाता शिरास्नायुगताश्च ये । सर्वांस्तान्नाशयत्याशु तैलं रोगकुलान्तकम्

tvaggatāścāpi ye vātā śirāsnāyugatāśca ye sarvāṁstānnāśayatyāśu tailaṁ rogakulāntakam

— त्वचा में स्थित तथा शिराओं-स्नायुओं में स्थित सभी प्रकार की वायु को यह तेल शीघ्र ही नष्ट कर देता है — यह रोगों के समूह का अन्त करने वाला है।

श्लोक 13 (garuda.1.174.13)

नारायणमिदं तैलं विष्णुनोक्तं रुगर्दनम् । पृथक्तैलं घृतं कुर्यात्समस्तैरौषधैः पृथक्

nārāyaṇamidaṁ tailaṁ viṣṇunoktaṁ rugardanam pṛthaktailaṁ ghṛtaṁ kuryātsamastairauṣadhaiḥ pṛthak

यह तेल 'नारायण तेल' कहलाता है, जिसे स्वयं विष्णु ने कहा है, जो पीड़ा का नाश करने वाला है। समान सभी औषधियों से पृथक्-पृथक् तेल और घी भी बनाना चाहिए —

श्लोक 14 (garuda.1.174.14)

शतावर्या गुडूच्या वा चित्रकै गोचनान्वितैः । निर्गुण्ड्या वा प्रसारः स्यात्कण्टकार्या रसादिभिः

śatāvaryā guḍūcyā vā citrakai gocanānvitaiḥ nirguṇḍyā vā prasāraḥ syātkaṇṭakāryā rasādibhiḥ

— शतावरी या गुडूची से, गोमूत्र-युक्त चित्रक से, अथवा निर्गुण्डी से भी प्रसारिणी तेल बनाया जा सकता है; कटेरी के रस आदि से भी,

श्लोक 15 (garuda.1.174.15)

वर्षाभूवालया वापि वासकन फलत्रिकैः । ब्राहया चैग्ण्डकेनापि भृङ्गराजेन कुष्टिना

varṣābhūvālayā vāpi vāsakana phalatrikaiḥ brāhayā caigṇḍakenāpi bhṛṅgarājena kuṣṭinā

— पुनर्नवा, बाला या वासा और त्रिफला से भी; ब्राह्मी, एरण्डक, भृंगराज और कुष्ठिन से भी,

श्लोक 16 (garuda.1.174.16)

मुसल्या दशमूलेन खदिरेण वटादिभिः । वटिका मोदको वापि चूर्ण स्यात्सर्वरोगनुत्

musalyā daśamūlena khadireṇa vaṭādibhiḥ vaṭikā modako vāpi cūrṇa syātsarvaroganut

— मूसली, दशमूल, खदिर और बरगद आदि से भी — इनसे गोली, मोदक या चूर्ण बनाया जा सकता है, जो सभी रोगों का नाशक होता है।

श्लोक 17 (garuda.1.174.17)

घृतेन मधुना वापि अद्भिः खण्डगुडादिभिः । लवणैः कटुकैर्युक्तं यथालाभं च गेगनुत्

ghṛtena madhunā vāpi adbhiḥ khaṇḍaguḍādibhiḥ lavaṇaiḥ kaṭukairyuktaṁ yathālābhaṁ ca geganut

घी या मधु के साथ, अथवा जल, मिश्री-गुड़ आदि के साथ, नमक और तीखे द्रव्यों से युक्त होकर, यथोपलब्ध यह रोगनाशक बनता है।

श्लोक 18 (garuda.1.174.18)

चित्रकार्कत्रिवृद्वापि यवानीहयमारकम् । सुधां च बालां गणिकां सप्तपर्णसुवर्चिकाम्

citrakārkatrivṛdvāpi yavānīhayamārakam sudhāṁ ca bālāṁ gaṇikāṁ saptaparṇasuvarcikām

चित्रक, आक या त्रिवृत; अजवायन, हयमारक; थूहर, बाला, गणिका, सप्तपर्ण और सुवर्चिका —

श्लोक 19 (garuda.1.174.19)

ज्योतिष्मतीञ्च संभृत्य तैलं धीरो विपाचयेत् । एतन्निष्यन्दनं तैलं भृशं दद्याद्भगन्दरे

jyotiṣmatīñca saṁbhṛtya tailaṁ dhīro vipācayet etanniṣyandanaṁ tailaṁ bhṛśaṁ dadyādbhagandare

— तथा ज्योतिष्मती — इन्हें एकत्रित कर धीर वैद्य को तेल पकाना चाहिए। यह टपकता हुआ तेल भगन्दर रोग में प्रचुर मात्रा में देना चाहिए।

श्लोक 20 (garuda.1.174.20)

शोधनं गेपणं चैव सर्ववर्णकरं परम् । चित्रकाद्यं महातैलं सर्वरोगप्रभञ्जनम्

śodhanaṁ gepaṇaṁ caiva sarvavarṇakaraṁ param citrakādyaṁ mahātailaṁ sarvarogaprabhañjanam

यह शोधक, घाव भरने वाला तथा सर्वश्रेष्ठ वर्ण-वर्धक है। 'चित्रकाद्य महातैल' सभी रोगों का नाश करने वाला है।

श्लोक 21 (garuda.1.174.21)

अजमोदं ससिन्दूरं हरितालं निशाद्वयम् । क्षारद्वयं फेनयुतमार्द्रक सर (शवः लोद्भवम्

ajamodaṁ sasindūraṁ haritālaṁ niśādvayam kṣāradvayaṁ phenayutamārdraka sara (śavaḥ lodbhavam

अजमोदा, सिन्दूर, हरताल, दोनों हल्दी, दो प्रकार के क्षार, समुद्री झाग सहित, अदरक और शव-उद्भव (?) —

श्लोक 22 (garuda.1.174.22)

इन्द्रवारुण्यपामार्गकदलैः स्यन्दनैः समम् । एभिः सर्षपजं तैलमजामूत्रैश्चयोजितम्

indravāruṇyapāmārgakadalaiḥ syandanaiḥ samam ebhiḥ sarṣapajaṁ tailamajāmūtraiścayojitam

— इन्द्रायण, अपामार्ग, केले के तने और स्यन्दन की लकड़ी के साथ समान मात्रा में — इनसे बना सरसों का तेल, बकरी के मूत्र के साथ मिलाकर,

श्लोक 23 (garuda.1.174.23)

मृद्वग्निना पचेदेत्गव्यक्षीरेण संयुतम् । अजमोदादिकं तैलं गण्डमालां व्यपोहति

mṛdvagninā pacedetgavyakṣīreṇa saṁyutam ajamodādikaṁ tailaṁ gaṇḍamālāṁ vyapohati

— मन्द अग्नि पर गाय के दूध के साथ पकाना चाहिए। यह 'अजमोदादि तेल' गलगण्ड (गिल्टी) को दूर करता है।

श्लोक 24 (garuda.1.174.24)

विदग्धस्तु पचेत्पक्वं चैव विशोधयेत् । रोपणं मृदुभावं च तैलेनानेन कारयेत्

vidagdhastu pacetpakvaṁ caiva viśodhayet ropaṇaṁ mṛdubhāvaṁ ca tailenānena kārayet

यदि यह अधिक पक जाए तो इसे पुनः पकाकर भलीभाँति शुद्ध कर लेना चाहिए। इसी तेल से घाव भरने और कोमलता लाने का कार्य करना चाहिए।

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