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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 181

नेत्र, कण्ठ, स्वर और त्वचा सम्बन्धी उपचार

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

श्लोक 1 (garuda.1.181.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १८१ हरिरुवाच । ताम्बूलञ्च घृतं क्षौद्रं लवणं ताम्रभाजने । तथा पयः समायुक्तं चक्षुः शूलहरं परम्

śrīgaruḍamahāpurāṇam 181 hariruvāca tāmbūlañca ghṛtaṁ kṣaudraṁ lavaṇaṁ tāmrabhājane tathā payaḥ samāyuktaṁ cakṣuḥ śūlaharaṁ param

हरि ने कहा — ताम्र-पात्र में रखे ताम्बूल, घी, मधु और नमक को दूध सहित मिलाना चाहिए — यह नेत्र-शूल का उत्तम नाशक है।

श्लोक 2 (garuda.1.181.2)

हरीतकी वचा कुष्ठं व्योषं हिङ्गु मनः शिला । कासे श्वासे च हिक्कायां लिह्यात्क्षौद्रं घृप्लुतम्

harītakī vacā kuṣṭhaṁ vyoṣaṁ hiṅgu manaḥ śilā kāse śvāse ca hikkāyāṁ lihyātkṣaudraṁ ghṛplutam

हरड़, वच, कूठ, त्रिकटु, हींग और मैनसिल को मधु-घी के साथ चाटना चाहिए — यह खाँसी, श्वास और हिचकी में हितकर है।

श्लोक 3 (garuda.1.181.3)

पिप्पलीत्रिफलाचूर्णं मधुना लेहयेन्नरः । नश्यते पीनसः कासः श्वासश्च बलवत्तरः

pippalītriphalācūrṇaṁ madhunā lehayennaraḥ naśyate pīnasaḥ kāsaḥ śvāsaśca balavattaraḥ

पीपल और त्रिफला का चूर्ण मधु के साथ चाटने से मनुष्य का प्रतिश्याय, खाँसी और श्वास-रोग नष्ट हो जाता है, और वह अधिक बलवान हो जाता है।

श्लोक 4 (garuda.1.181.4)

समूलचित्रकं भस्मपिप्पलीचूर्णकं लिहेत् । श्वासं कासञ्च हिक्काञ्च मधुमिश्रं वृषध्वज !

samūlacitrakaṁ bhasmapippalīcūrṇakaṁ lihet śvāsaṁ kāsañca hikkāñca madhumiśraṁ vṛṣadhvaja !

जड़ सहित चित्रक की भस्म और पीपल का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिए — यह श्वास, खाँसी और हिचकी का नाशक है, हे वृषध्वज!

श्लोक 5 (garuda.1.181.5)

नीलोत्पलं शर्करा च मधुकं पद्मकं समम् । तण्डुलोदकसंमिश्रं प्रशमेद्रक्तविक्रियाः

nīlotpalaṁ śarkarā ca madhukaṁ padmakaṁ samam taṇḍulodakasaṁmiśraṁ praśamedraktavikriyāḥ

नील कमल, शक्कर, मुलेठी और पद्मक को समान भाग में चावल के पानी के साथ मिलाकर लेने से रक्त-विकार शान्त होते हैं।

श्लोक 6 (garuda.1.181.6)

शुण्ठी च शर्करा चैव तथा क्षौद्रेण संयुता । कोकिलस्वर एव स्याद्गुटिका भुक्तिमात्रतः

śuṇṭhī ca śarkarā caiva tathā kṣaudreṇa saṁyutā kokilasvara eva syādguṭikā bhuktimātrataḥ

सोंठ और शक्कर को मधु के साथ मिलाकर बनाई गई गोली खाने मात्र से स्वर कोयल के समान मधुर हो जाता है।

श्लोक 7 (garuda.1.181.7)

हरितालं शङ्खचूर्णं कदलीदलभस्मना । एतद्द्रव्येण चोद्वर्त्य लोमशातनमुत्तमम्

haritālaṁ śaṅkhacūrṇaṁ kadalīdalabhasmanā etaddravyeṇa codvartya lomaśātanamuttamam

हरताल और शंख-चूर्ण को केले के पत्ते की भस्म के साथ मिलाकर, इस पदार्थ से उबटन करना शरीर के रोम हटाने के लिए उत्तम है।

श्लोक 8 (garuda.1.181.8)

लवणं हरितालञ्च तुम्बिन्याश्च फलानि च । लाक्षारससमायुक्तं लोमशातनमुत्तम्

lavaṇaṁ haritālañca tumbinyāśca phalāni ca lākṣārasasamāyuktaṁ lomaśātanamuttam

नमक, हरताल और तुम्बी के फल, लाख के रस के साथ मिलाकर भी रोम हटाने के लिए उत्तम है।

श्लोक 9 (garuda.1.181.9)

सुधा च हरितालञ्च शङ्खभस्म मनः शिला । सैन्धवेन सहैकत्र छागमूत्रेण पेषयेत्

sudhā ca haritālañca śaṅkhabhasma manaḥ śilā saindhavena sahaikatra chāgamūtreṇa peṣayet

थूहर का दूध, हरताल, शंख-भस्म और मैनसिल को सेंधा नमक के साथ एक स्थान पर मिलाकर बकरी के मूत्र में पीसना चाहिए।

श्लोक 10 (garuda.1.181.10)

तत्क्षणोद्वर्तनादेव लोमशातनमुत्तमम् । शङ्खमामलकं पत्रं धातक्याः कुसुमानि च

tatkṣaṇodvartanādeva lomaśātanamuttamam śaṅkhamāmalakaṁ patraṁ dhātakyāḥ kusumāni ca

इसे तुरन्त उबटन के रूप में लगाने से यह रोम हटाने के लिए उत्तम सिद्ध होता है। शंख, आँवला, इसका पत्ता और धातकी के फूल —

श्लोक 11 (garuda.1.181.11)

पिष्ट्वा तत्पयसा सार्धं सप्ताहं धारयेन्मुखे । स्निग्धाः श्वेताश्च दन्ताश्च भवन्ति विमलप्रभाः

piṣṭvā tatpayasā sārdhaṁ saptāhaṁ dhārayenmukhe snigdhāḥ śvetāśca dantāśca bhavanti vimalaprabhāḥ

— को दूध के साथ पीसकर सात दिनों तक मुँह में धारण करने से दाँत चिकने, श्वेत और निर्मल कान्ति वाले हो जाते हैं।

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