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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 182

बल-वर्धक, अग्निस्तम्भन और विषनाशक योगों का वर्णन

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183

श्लोक 1 (garuda.1.182.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १८२ हरिरुवाच । शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् । हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते

śrīgaruḍamahāpurāṇam 182 hariruvāca śaradgrīṣmavasanteṣu prāyaśo dadhi garhitam hemante śiśire caiva varṣāsu dadhi śasyate

हरि ने कहा — शरद्, ग्रीष्म और वसन्त ऋतुओं में प्रायः दही निन्दित है; हेमन्त, शिशिर और वर्षा ऋतु में दही की सिफारिश की जाती है।

श्लोक 2 (garuda.1.182.2)

भुक्ते तु शर्करा पीता नवनीतेन बुद्धिकृत् । गुडस्य तु पुराणस्य पलमेकन्तु भक्षयेत् । स्त्रीसहस्रञ्च संगच्छेत्पुमान्बलयुतो हर !

bhukte tu śarkarā pītā navanītena buddhikṛt guḍasya tu purāṇasya palamekantu bhakṣayet strīsahasrañca saṁgacchetpumānbalayuto hara !

भोजन के बाद मक्खन के साथ शक्कर पीना बुद्धिवर्धक है। पुराने गुड़ का एक पल खाना चाहिए — इससे बलवान पुरुष सहस्र स्त्रियों के साथ भी समागम कर सकता है, हे हर!

श्लोक 3 (garuda.1.182.3)

कुष्ठं संचूर्णितं कृत्वा घृतमाक्षिकसंयुतम् । भक्षयेत्स्वप्नवेलायां बलीपलितनाशनम्

kuṣṭhaṁ saṁcūrṇitaṁ kṛtvā ghṛtamākṣikasaṁyutam bhakṣayetsvapnavelāyāṁ balīpalitanāśanam

कूठ को चूर्ण बनाकर घी-मधु के साथ मिलाकर सोते समय खाने से झुर्रियाँ और सफेद बाल नष्ट होते हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.182.4)

अतसीमाषगोधूमचूर्णं कृत्वा तु पिप्पली । घृतेन लेपयेद्गत्रमोभिः सार्धं विचक्षणः । कन्दर्पसदृशो मर्त्यो नित्यं भवति शङ्कर !

atasīmāṣagodhūmacūrṇaṁ kṛtvā tu pippalī ghṛtena lepayedgatramobhiḥ sārdhaṁ vicakṣaṇaḥ kandarpasadṛśo martyo nityaṁ bhavati śaṅkara !

अलसी, उड़द और गेहूँ का चूर्ण पीपल के साथ बनाकर, विवेकी पुरुष को घी के साथ अंगों पर लेप करना चाहिए — इससे मनुष्य नित्य कामदेव के समान हो जाता है, हे शंकर!

श्लोक 5 (garuda.1.182.5)

यवास्तिलाश्वगन्धा च मुशली सरला गुडम् । एभिश्च रचितां जग्ध्वा तरुणो बलवान्भवेत्

yavāstilāśvagandhā ca muśalī saralā guḍam ebhiśca racitāṁ jagdhvā taruṇo balavānbhavet

जौ, तिल, अश्वगन्धा, मूसली, सरल-गोंद और गुड़ — इनसे बना पदार्थ खाने से युवा पुरुष बलवान होता है।

श्लोक 6 (garuda.1.182.6)

हिङ्गु सौवर्चलं शुण्ठीं पीत्वा तु क्वथितोदकैः । परिणामाख्यशूलञ्च अजीर्णञ्चैव नश्यति

hiṅgu sauvarcalaṁ śuṇṭhīṁ pītvā tu kvathitodakaiḥ pariṇāmākhyaśūlañca ajīrṇañcaiva naśyati

हींग, सौवर्चल नमक और सोंठ को उबले जल के साथ पीने से परिणाम-शूल (पचने के बाद की पीड़ा) और अजीर्ण दोनों नष्ट होते हैं।

श्लोक 7 (garuda.1.182.7)

धातकीं सोमराजीञ्च क्षीरेण सह पेषयेत् । दुर्बलश्च भवेत्स्थूलो नात्र कार्या विचारणा

dhātakīṁ somarājīñca kṣīreṇa saha peṣayet durbalaśca bhavetsthūlo nātra kāryā vicāraṇā

धातकी और सोमराजी को दूध के साथ पीसकर लेने से दुर्बल व्यक्ति भी स्थूल हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 8 (garuda.1.182.8)

शर्करामधुसंयुक्तं नवनीतं बली लिहेत् । क्षीराशी च क्षयी पुष्टिं मेधाञ्चैवातुलां व्रजेत्

śarkarāmadhusaṁyuktaṁ navanītaṁ balī lihet kṣīrāśī ca kṣayī puṣṭiṁ medhāñcaivātulāṁ vrajet

शक्कर-मधु से युक्त मक्खन बलवान व्यक्ति को चाटना चाहिए; दूध पीने वाला क्षीण व्यक्ति भी पुष्टि और अतुल बुद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (garuda.1.182.9)

कुलीरचूर्णं सक्षीरं पीतञ्च क्षयरेगनुत् । भल्लातकं विडङ्गञ्च यवक्षारञ्च सैन्धवम्

kulīracūrṇaṁ sakṣīraṁ pītañca kṣayareganut bhallātakaṁ viḍaṅgañca yavakṣārañca saindhavam

केकड़े का चूर्ण दूध के साथ पीने से क्षय-रोग नष्ट होता है। भिलावा, विडंग, यव-क्षार और सेंधा नमक,

श्लोक 10 (garuda.1.182.10)

मनः शिला शङ्खचूर्णं तैलपक्वं तथैव च । लोमानि शातयत्येव नात्र कार्या विचारणा

manaḥ śilā śaṅkhacūrṇaṁ tailapakvaṁ tathaiva ca lomāni śātayatyeva nātra kāryā vicāraṇā

मैनसिल और शंख-चूर्ण को तेल में पकाकर लगाने से भी शरीर के रोम हट जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 11 (garuda.1.182.11)

मालूरस्य रसं गृह्य जलौकां तत्र पेषयेत् । हस्तौ संलेपयेत्तेन त्वग्निस्तम्भनमुत्तमम्

mālūrasya rasaṁ gṛhya jalaukāṁ tatra peṣayet hastau saṁlepayettena tvagnistambhanamuttamam

बेल का रस लेकर उसमें जोंक को पीसना चाहिए; उससे दोनों हाथों पर लेप करने से अग्नि से बचाव का उत्तम उपाय होता है।

श्लोक 12 (garuda.1.182.12)

शाल्मलीरसमादाय खरमूत्रे निधाय तम् । अग्नयादौ विक्षिपेत्तेन ह्यग्निस्तम्भनमुत्तमम्

śālmalīrasamādāya kharamūtre nidhāya tam agnayādau vikṣipettena hyagnistambhanamuttamam

शाल्मली का रस लेकर उसे गधे के मूत्र में रखना चाहिए; इसे अग्नि के आरम्भ में डालने से अग्नि से बचाव का उत्तम उपाय बनता है।

श्लोक 13 (garuda.1.182.13)

वायस्या उदरं गृह्य मण्डूकवसया सह । गुटिकां कारयेत्तेन ततोऽग्नौ संक्षैपेत्सुधीः । एवमेतत्प्रयोगेण ह्यग्निस्तम्भनमुत्तमम्

vāyasyā udaraṁ gṛhya maṇḍūkavasayā saha guṭikāṁ kārayettena tato'gnau saṁkṣaipetsudhīḥ evametatprayogeṇa hyagnistambhanamuttamam

कौवे के उदर को मेंढक की चर्बी के साथ लेकर उसकी गोली बनानी चाहिए, फिर बुद्धिमान व्यक्ति को उसे अग्नि में डालना चाहिए — इस प्रयोग से अग्नि से बचाव का उत्तम उपाय सिद्ध होता है।

श्लोक 14 (garuda.1.182.14)

मुण्डीत्वक्च वचा मुस्तं मरिचं तगरं तथा । चर्वित्वा च त्विमं सद्यो जिह्वया ज्वलनं लिहेत्

muṇḍītvakca vacā mustaṁ maricaṁ tagaraṁ tathā carvitvā ca tvimaṁ sadyo jihvayā jvalanaṁ lihet

मुण्डी की छाल, वच, मुस्तक, मिर्च और तगर को चबाकर तुरन्त जीभ से जलती हुई अग्नि को चाट सकता है।

श्लोक 15 (garuda.1.182.15)

गोरोचनां भृङ्गराजं चूर्णोकृत्यघृतं समम् । दिव्याम्भसः स्तम्भनं स्यान्मन्त्रेणानेन वै तथा । ओं अग्निस्तम्भनं कुरु कुरु

gorocanāṁ bhṛṅgarājaṁ cūrṇokṛtyaghṛtaṁ samam divyāmbhasaḥ stambhanaṁ syānmantreṇānena vai tathā oṁ agnistambhanaṁ kuru kuru

गोरोचन और भृंगराज को चूर्ण बनाकर समान घी के साथ मिलाने से दिव्य जल को स्तम्भित किया जा सकता है, तथा इस मन्त्र से भी: 'ॐ अग्निस्तम्भनं कुरु कुरु।'

श्लोक 16 (garuda.1.182.16)

ओं नमो भगवते जलं स्तम्भय सं सं सं केक केकः चरचर । जलस्तम्भनमन्त्रोऽयं जलं स्तम्भयते शिव !

oṁ namo bhagavate jalaṁ stambhaya saṁ saṁ saṁ keka kekaḥ caracara jalastambhanamantro'yaṁ jalaṁ stambhayate śiva !

'ॐ नमो भगवते जलं स्तम्भय सं सं सं केक केकः चरचर।' — यह जल-स्तम्भन मन्त्र है, जो जल को रोक देता है, हे शिव!

श्लोक 17 (garuda.1.182.17)

गृध्रास्थिञ्च गवास्थिञ्च तथा निर्माल्यमेव च । अरेर्यो निखनेद्द्वारे पञ्चत्वमु पयाति सः

gṛdhrāsthiñca gavāsthiñca tathā nirmālyameva ca areryo nikhaneddvāre pañcatvamu payāti saḥ

जो व्यक्ति गिद्ध की हड्डी, गाय की हड्डी और पूजा का निर्माल्य शत्रु के द्वार पर गाड़ देता है, वह शत्रु मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 18 (garuda.1.182.18)

पञ्चरक्तानि पुष्पाणि पृथग्जात्या समालभेत् । कुङ्कुमेन समायुक्तमात्मरक्तसमन्वितम्

pañcaraktāni puṣpāṇi pṛthagjātyā samālabhet kuṅkumena samāyuktamātmaraktasamanvitam

पाँच लाल फूलों को, प्रत्येक भिन्न जाति के, केसर के साथ मिलाकर, अपने रक्त सहित एक-एक करके लगाना चाहिए।

श्लोक 19 (garuda.1.182.19)

पुष्पेण तु समं पिष्ट्वा रोचनायाः पलैकतः । स्त्रिया पुंसा कृतो रुद्र ! तिलकोऽयं वशीकरः

puṣpeṇa tu samaṁ piṣṭvā rocanāyāḥ palaikataḥ striyā puṁsā kṛto rudra ! tilako'yaṁ vaśīkaraḥ

फूल के साथ, एक पल गोरोचन को समान रूप से पीसकर, स्त्री या पुरुष द्वारा लगाया गया यह तिलक, हे रुद्र, वशीकरण करने वाला है।

श्लोक 20 (garuda.1.182.20)

ब्रह्मदण्डी तु पुष्येण भक्ष्ये पाने वशीकरः । यष्टि मधु पलैकेन पक्वमुष्णोदकं पिबेत्

brahmadaṇḍī tu puṣyeṇa bhakṣye pāne vaśīkaraḥ yaṣṭi madhu palaikena pakvamuṣṇodakaṁ pibet

पुष्य नक्षत्र में लिया गया ब्रह्मदण्डी भोजन या पान में वशीकरण करने वाला है। एक पल यष्टिमधु को पकाकर उष्ण जल के साथ पीना चाहिए।

श्लोक 21 (garuda.1.182.21)

विष्टम्भिकाञ्च हृच्छूलं हरत्येव महेश्वर ! । ओं ह्रूं जः । मन्त्रोऽयं हरते रुद्र ! सर्ववृश्चिकजं विषम्

viṣṭambhikāñca hṛcchūlaṁ haratyeva maheśvara ! oṁ hrūṁ jaḥ mantro'yaṁ harate rudra ! sarvavṛścikajaṁ viṣam

यह मल-अवरोध और हृदय-शूल को नष्ट कर देता है, हे महेश्वर! 'ॐ ह्रूं जः' — यह मन्त्र, हे रुद्र, बिच्छू के डंक से उत्पन्न सभी विष को दूर करता है।

श्लोक 22 (garuda.1.182.22)

पिप्पली नवनीतञ्च शृङ्गवेरं च सैन्धवम् । मरिचं दधि कुष्ठञ्च नस्ये पाने विषं हरेत्

pippalī navanītañca śṛṅgaveraṁ ca saindhavam maricaṁ dadhi kuṣṭhañca nasye pāne viṣaṁ haret

पीपल, ताज़ा मक्खन, अदरक और सेंधा नमक, मिर्च, दही और कूठ — नस्य या पान के रूप में विष को दूर करते हैं।

श्लोक 23 (garuda.1.182.23)

त्रिफलार्द्रककुष्ठं च चन्दनं घृतसंयुतम् । एतत्पानाच्च लेपाच्च विषनाशो भवेच्छिव !

triphalārdrakakuṣṭhaṁ ca candanaṁ ghṛtasaṁyutam etatpānācca lepācca viṣanāśo bhavecchiva !

त्रिफला, अदरक, कूठ और चन्दन को घी के साथ मिलाकर — इसे पीने और लगाने से विष नष्ट हो जाता है, हे शिव!

श्लोक 24 (garuda.1.182.24)

पारावतस्य चाक्षीणि हरितालं मनः शिला । एतद्योगाद्विषं हन्ति वैनतेय इवोरगान्

pārāvatasya cākṣīṇi haritālaṁ manaḥ śilā etadyogādviṣaṁ hanti vainateya ivoragān

कबूतर की आँखें, हरताल और मैनसिल — इस योग से विष उसी प्रकार नष्ट होता है जैसे वैनतेय (गरुड़) सर्पों का नाश करते हैं।

श्लोक 25 (garuda.1.182.25)

सैन्धवं त्र्यूषणं चैव दधिमध्वाज्यसंयुतम् । वृश्चिकस्य विषं हन्ति लेपोऽयं वृषभध्वज !

saindhavaṁ tryūṣaṇaṁ caiva dadhimadhvājyasaṁyutam vṛścikasya viṣaṁ hanti lepo'yaṁ vṛṣabhadhvaja !

सेंधा नमक और त्रिकटु को दही, मधु और घी के साथ मिलाकर — यह लेप बिच्छू के विष को नष्ट करता है, हे वृषभध्वज!

श्लोक 26 (garuda.1.182.26)

ब्रह्मदण्डीतिलान्क्वाथ्य चूर्णं त्रिकटुकं पिबेत् । नाशयेद्रुद्र ! गुल्मानि निरुद्धं रक्तमेव च

brahmadaṇḍītilānkvāthya cūrṇaṁ trikaṭukaṁ pibet nāśayedrudra ! gulmāni niruddhaṁ raktameva ca

ब्रह्मदण्डी और तिल को उबालकर त्रिकटु का चूर्ण पीना चाहिए — यह गुल्म (उदर की गाँठ) और अवरुद्ध रक्त को नष्ट कर देता है, हे रुद्र!

श्लोक 27 (garuda.1.182.27)

पीत्वा क्षीरं क्षौद्रयुतं नाशयेदसृजः स्त्रुतिम् । आटरूपकमूलेन भगं नाभिं च लेपयेत् । सुखं प्रसूयते नारी नात्र कार्या विचारणा

pītvā kṣīraṁ kṣaudrayutaṁ nāśayedasṛjaḥ strutim āṭarūpakamūlena bhagaṁ nābhiṁ ca lepayet sukhaṁ prasūyate nārī nātra kāryā vicāraṇā

मधु सहित दूध पीने से रक्त-स्राव नष्ट होता है। अड़ूसे की जड़ का लेप गुह्य अंग और नाभि पर करना चाहिए — इससे स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 28 (garuda.1.182.28)

शर्करां मधुसंयुक्तां पीत्वा तण्डुलवारिणा । रक्तातिसारशमनं भवतीति वृषध्वज !

śarkarāṁ madhusaṁyuktāṁ pītvā taṇḍulavāriṇā raktātisāraśamanaṁ bhavatīti vṛṣadhvaja !

शक्कर को मधु के साथ मिलाकर चावल के पानी से पीने से रक्तातिसार (रक्तयुक्त पेचिश) शान्त होता है, हे वृषध्वज!

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