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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 19

सर्पविष-हरोपाय (प्राणेश्वर विद्या)

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (garuda.1.19.1)

।।सूत उवाच । प्राणेश्वरं गारुडं च शिवोक्तं प्रवदाम्यहम् । स्थानान्यादौ प्रवक्ष्यामि नागदष्टो न जीवति

sūta uvāca prāṇeśvaraṁ gāruḍaṁ ca śivoktaṁ pravadāmyaham sthānānyādau pravakṣyāmi nāgadaṣṭo na jīvati

सूत जी ने कहा — मैं शिव द्वारा कहा गया 'प्राणेश्वर' नामक गारुड मंत्र-विद्या बताता हूँ। पहले मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ काटे जाने पर सर्प-दंशित व्यक्ति जीवित नहीं रहता।

श्लोक 2 (garuda.1.19.2)

चितावल्मीकशैलादौ कपे च विवरे तरोः । दंशे रेखात्रयं यस्य प्रच्छन्नं स न जीवति

citāvalmīkaśailādau kape ca vivare taroḥ daṁśe rekhātrayaṁ yasya pracchannaṁ sa na jīvati

चिता, बांबी, पर्वत आदि पर, वृक्ष के कोटर या बिल में काटे जाने पर, और जिसके दंश में तीन रेखाएँ छिपी हों, वह जीवित नहीं रहता।

श्लोक 3 (garuda.1.19.3)

षष्ठ्यां च कर्कटे मेषे मूलाश्लेषामघादिषु । कक्षाश्रोणिगले सन्धौ शंखकर्णोदरादिषु

ṣaṣṭhyāṁ ca karkaṭe meṣe mūlāśleṣāmaghādiṣu kakṣāśroṇigale sandhau śaṁkhakarṇodarādiṣu

षष्ठी तिथि को, कर्क या मेष लग्न में, मूल-आश्लेषा-मघा आदि नक्षत्रों में, तथा कांख, कमर, गले की संधि, कनपटी, कान, उदर आदि स्थानों पर काटे जाने पर —

श्लोक 4 (garuda.1.19.4)

दण्डी शस्त्रधरो भिक्षुर्नग्नादिः कालदूतकः । बाहौ च वक्क्रे ग्रीवायां दष्टायां न हि जीवति

daṇḍī śastradharo bhikṣurnagnādiḥ kāladūtakaḥ bāhau ca vakkre grīvāyāṁ daṣṭāyāṁ na hi jīvati

यदि उस समय दंडधारी, शस्त्रधारी, भिक्षुक, नग्न व्यक्ति आदि — काल के दूत के समान — दिखाई दें, और भुजा, मुख अथवा गर्दन पर दंश हो, तो वह व्यक्ति जीवित नहीं रहता।

श्लोक 5 (garuda.1.19.5)

पूर्वं दिनपतिर्भुङ्क्ते अर्द्धयामं ततोऽपरे । शेषा ग्रहाः प्रतिदिनं षट्संख्या परिवर्त्तनैः

pūrvaṁ dinapatirbhuṅkte arddhayāmaṁ tato'pare śeṣā grahāḥ pratidinaṁ ṣaṭsaṁkhyā parivarttanaiḥ

पहले आधे प्रहर तक दिन का स्वामी ग्रह भोग करता है, तत्पश्चात् दूसरा। शेष ग्रह भी प्रतिदिन छह-छह की संख्या में क्रमशः बदलते हुए भोग करते हैं।

श्लोक 6 (garuda.1.19.6)

नागभोगः क्रमाञ्ज्ञेयो रात्रौ बाणविवर्त्तनैः । शेषोऽर्कः फणिपश्चन्द्रस्तक्षको भौम ईरितः

nāgabhogaḥ kramāñjñeyo rātrau bāṇavivarttanaiḥ śeṣo'rkaḥ phaṇipaścandrastakṣako bhauma īritaḥ

नागों का भोग-काल क्रमशः जानना चाहिए, रात्रि में पाँच बाणों के परिवर्तन से। शेष का संबंध सूर्य से है, फणिप (वासुकि) का चंद्र से, तक्षक का मंगल से कहा गया है,

श्लोक 7 (garuda.1.19.7)

कर्कोटो ज्ञो गुरुः पद्मो महापद्मश्च भार्गवः । शङ्खः शनैश्चरो राहुः कुलिकश्चाहयो ग्रहाः

karkoṭo jño guruḥ padmo mahāpadmaśca bhārgavaḥ śaṅkhaḥ śanaiścaro rāhuḥ kulikaścāhayo grahāḥ

कर्कोटक का संबंध बुध से, पद्म का बृहस्पति से, महापद्म का शुक्र से, शंख का शनि से, तथा कुलिक का राहु से — इस प्रकार सर्प ग्रहों के साथ संबंधित हैं।

श्लोक 8 (garuda.1.19.8)

रात्रौ दिवा सुरगुरोर्भागे स्यादमरान्तकः । पंगोः काले दिवा राहुः कुलिकेन सह स्थितः

rātrau divā suragurorbhāge syādamarāntakaḥ paṁgoḥ kāle divā rāhuḥ kulikena saha sthitaḥ

रात्रि में और दिन में बृहस्पति के भाग में देवताओं का अंतक (काल-सर्प) होता है। पंगु (शनि) के काल में दिन में राहु कुलिक के साथ स्थित होता है।

श्लोक 9 (garuda.1.19.9)

यामार्द्धसन्धिसंस्थां च वेलां कालवतीं चरेत् । बाणद्विषड्वह्निवाजियुगभूरेकभागतः ?

yāmārddhasandhisaṁsthāṁ ca velāṁ kālavatīṁ caret bāṇadviṣaḍvahnivājiyugabhūrekabhāgataḥ ?

प्रहर के आधे भाग की संधि में स्थित उस काल-युक्त वेला का विचार करे — पाँच, बारह, तीन, दो, एक — इन भागों के अनुसार।

श्लोक 10 (garuda.1.19.10)

दिवा षड्वेदनेत्राद्रिपञ्चत्रिमानुषांशकैः । पादांगुष्ठे पादपृष्ठे पादपृष्ठे गुल्फे जानुनि लिंगके

divā ṣaḍvedanetrādripañcatrimānuṣāṁśakaiḥ pādāṁguṣṭhe pādapṛṣṭhe pādapṛṣṭhe gulphe jānuni liṁgake

दिन में छह, वेद (चार), नेत्र (दो), पर्वत (सात), पाँच, तीन, मनुष्य (चौदह) — इन अंशों से गणना करे। पैर के अंगूठे में, पैर के पृष्ठ भाग में, टखने में, घुटने में, लिंग-स्थान में —

श्लोक 11 (garuda.1.19.11)

नाभौ हृदि स्तनतटे कण्ठे नासापुटेऽक्षिणि । कर्णयोश्च भ्रुवोः शंखे मस्तके प्रतिपत्क्रमात्

nābhau hṛdi stanataṭe kaṇṭhe nāsāpuṭe'kṣiṇi karṇayośca bhruvoḥ śaṁkhe mastake pratipatkramāt

नाभि में, हृदय में, स्तन के पास, कंठ में, नासिका के छिद्र में, नेत्र में, दोनों कानों में, भौंहों में, कनपटी में, और मस्तक में — प्रतिपदा से क्रमशः सर्प का वास होता है।

श्लोक 12 (garuda.1.19.12)

तिष्ठच्चन्द्रश्च जीवेच्च पुंसो दक्षिणभागके । कायस्य वामभागे तु स्त्रिया वायुवहात्करात्

tiṣṭhaccandraśca jīvecca puṁso dakṣiṇabhāgake kāyasya vāmabhāge tu striyā vāyuvahātkarāt

पुरुष के दाहिने भाग में चंद्रमा स्थित रहने पर जीवन बचता है, और स्त्री के शरीर के बाएँ भाग में — प्राण-वायु बहाने वाले हाथ से जीवन बचता है।

श्लोक 13 (garuda.1.19.13)

अमृतस्तत्कृतो मोहो निवर्त्तेत च मर्दनात् । आत्मनः परमं बीजं हंसाख्यं स्फटिकामलम्

amṛtastatkṛto moho nivartteta ca mardanāt ātmanaḥ paramaṁ bījaṁ haṁsākhyaṁ sphaṭikāmalam

अमृतमय होने से उससे उत्पन्न मोह मर्दन (मालिश) से दूर हो जाता है। आत्मा का परम बीज-मंत्र 'हंस' नामक है, जो स्फटिक के समान निर्मल है।

श्लोक 14 (garuda.1.19.14)

ज्ञातव्यं विषपापघ्नं बीजं तस्य चतुर्विधम् । विन्दुपंचस्वरयुतमाद्यमुक्तं द्वितीयकम् । षष्ठारूढं तृतीयं स्यात्सविसर्गं चतुर्थकम् । ॐ कुरु कुन्दे स्वाहा

jñātavyaṁ viṣapāpaghnaṁ bījaṁ tasya caturvidham vindupaṁcasvarayutamādyamuktaṁ dvitīyakam ṣaṣṭhārūḍhaṁ tṛtīyaṁ syātsavisargaṁ caturthakam oṁ kuru kunde svāhā

विष और पाप का नाश करने वाला वह जानने योग्य है; उसके बीज चार प्रकार के हैं — पहला बिंदु और पाँचवें स्वर से युक्त, दूसरा जैसा कहा गया, तीसरा छठे स्वर पर आरूढ़, और चौथा विसर्ग-सहित। 'ॐ कुरु कुन्दे स्वाहा।'

श्लोक 15 (garuda.1.19.15)

विद्या त्रैलोक्यरक्षार्थं गरुडेन धृता पुरा । वधेप्सुर्नागनागानां मुखेऽथ प्रणवं न्यसेत्

vidyā trailokyarakṣārthaṁ garuḍena dhṛtā purā vadhepsurnāganāgānāṁ mukhe'tha praṇavaṁ nyaset

यह विद्या त्रैलोक्य की रक्षा के लिए गरुड द्वारा पूर्वकाल में धारण की गई थी। नागों के वध की इच्छा रखने वाला साधक पहले मुख में प्रणव (ॐ) का न्यास करे।

श्लोक 16 (garuda.1.19.16)

गले कुरु न्यसेद्धीमान्कुले च गुल्फयोः स्मृतः । स्वाहा पादयुगे चैव युगहा न्यास ईरितः

gale kuru nyaseddhīmānkule ca gulphayoḥ smṛtaḥ svāhā pādayuge caiva yugahā nyāsa īritaḥ

बुद्धिमान साधक कंठ में 'कुरु' का न्यास करे, तथा टखनों में 'कुले' न्यास माना गया है। दोनों पैरों में 'स्वाहा' का न्यास कहा गया है — यह युग-हंता न्यास कहा गया है।

श्लोक 17 (garuda.1.19.17)

गृहे विलिखिता यत्र तन्नागाः संत्यजन्ति च । सहस्त्रमन्त्रं जप्त्वा तु कर्णे सूत्रं धृतं तथा

gṛhe vilikhitā yatra tannāgāḥ saṁtyajanti ca sahastramantraṁ japtvā tu karṇe sūtraṁ dhṛtaṁ tathā

जिस घर में यह मंत्र लिखा हो, वहाँ से सर्प भाग जाते हैं। एक हज़ार बार मंत्र का जप कर, उसी प्रकार धारण किया गया सूत्र कान में बांधना चाहिए।

श्लोक 18 (garuda.1.19.18)

यद्गृहे शर्करा जप्ता क्षिप्ता नागास्त्यजन्ति तत् । सप्तलक्षस्य जप्याद्धि सिद्धिः प्राप्ता सुरासुरैः

yadgṛhe śarkarā japtā kṣiptā nāgāstyajanti tat saptalakṣasya japyāddhi siddhiḥ prāptā surāsuraiḥ

जिस घर में मंत्र-जपित शक्कर बिखेर दी जाए, वहाँ से भी सर्प भाग जाते हैं। सात लाख बार जप करने से देवताओं और असुरों द्वारा भी सिद्धि प्राप्त की गई है।

श्लोक 19 (garuda.1.19.19)

ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा । एवञ्चाष्टदले पद्म दले वर्णयुगं लिखेत्

oṁ suvarṇarekhe kukkuṭavigraharūpiṇi svāhā evañcāṣṭadale padma dale varṇayugaṁ likhet

'ॐ सुवर्णरेखे, मुर्गे के रूप में स्थित देवी! स्वाहा।' इसी प्रकार आठ दलों वाले कमल के प्रत्येक दल में दो-दो अक्षर लिखने चाहिए।

श्लोक 20 (garuda.1.19.20)

नामैतद्वारिधाराभिः स्न्नातो दष्टो विषं त्यजेत् । ॐ पक्षि स्वाहा

nāmaitadvāridhārābhiḥ snnāto daṣṭo viṣaṁ tyajet oṁ pakṣi svāhā

इस नाम के मंत्र से अभिमंत्रित जलधारा से स्नान कर दंशित व्यक्ति विष त्याग देता है। 'ॐ पक्षि स्वाहा।'

श्लोक 21 (garuda.1.19.21)

अंगुष्ठादि कनिष्ठान्तं करे न्यस्याथ देहके । के (कै) वक्क्रे हृदि लिंगे च पादयोर्गरुडस्य हि

aṁguṣṭhādi kaniṣṭhāntaṁ kare nyasyātha dehake ke (kai) vakkre hṛdi liṁge ca pādayorgaruḍasya hi

अंगूठे से लेकर कनिष्ठिका तक हाथ में न्यास कर, तत्पश्चात् शरीर पर भी — मुख में, हृदय में, लिंग-स्थान में, और गरुड के दोनों चरणों में न्यास करे।

श्लोक 22 (garuda.1.19.22)

नाक्रामन्ति च तच्छायां स्वप्नेऽपि विषपन्नगाः । यस्तु लक्षं जपेच्चास्याः स दृष्ट्वा(ष्ट्या) नाशयेद्विषम्

nākrāmanti ca tacchāyāṁ svapne'pi viṣapannagāḥ yastu lakṣaṁ japeccāsyāḥ sa dṛṣṭvā(ṣṭyā) nāśayedviṣam

उसकी छाया पर विषैले सर्प स्वप्न में भी आक्रमण नहीं करते। जो इस मंत्र का एक लाख जप करता है, वह दृष्टि मात्र से विष का नाश कर देता है।

श्लोक 23 (garuda.1.19.23)

ॐ ह्री ह्रौ ह्रीं भि(भी) रुण्डायै स्वाहा । कर्णे जप्ता त्वियं विद्या दष्टकस्य विषं हरेत्

oṁ hrī hrau hrīṁ bhi(bhī) ruṇḍāyai svāhā karṇe japtā tviyaṁ vidyā daṣṭakasya viṣaṁ haret

'ॐ ह्री ह्रौ ह्रीं, भीरुंडा को स्वाहा।' कान में जपी गई यह विद्या दंशित व्यक्ति के विष को हर लेती है।

श्लोक 24 (garuda.1.19.24)

अ आ न्यसेत्तु पादाग्रे इ ई गुलफेऽथ जानुनि । उ ऊ ए ऐ कटितटे ओ नाभौ हृदि औ न्यसेत्

a ā nyasettu pādāgre i ī gulaphe'tha jānuni u ū e ai kaṭitaṭe o nābhau hṛdi au nyaset

'अ आ' का न्यास पैर के अग्रभाग में करे, 'इ ई' का टखने में और घुटने में, 'उ ऊ' और 'ए ऐ' का कटि-प्रदेश में, 'ओ' का नाभि में और 'औ' का हृदय में न्यास करे।

श्लोक 25 (garuda.1.19.25)

वक्क्रे अमुत्तमांगे अः न्यसेद्वै हंससंयुताः । हंसो विषादि च हरेज्जप्तो ध्यातोऽथ पूजितः

vakkre amuttamāṁge aḥ nyasedvai haṁsasaṁyutāḥ haṁso viṣādi ca harejjapto dhyāto'tha pūjitaḥ

'अं' मुख में और 'अः' सिर में, हंस-मंत्र से युक्त कर न्यास करे। हंस-मंत्र, जप, ध्यान और पूजा किए जाने पर विष आदि का हरण करता है।

श्लोक 26 (garuda.1.19.26)

गरुडोऽहमिति ध्यात्वा कुर्य्याद्विषहरां (रीं) क्रियाम् । हंमन्त्रं गात्रविन्यस्तं विषादिहरमीरितम्

garuḍo'hamiti dhyātvā kuryyādviṣaharāṁ (rīṁ) kriyām haṁmantraṁ gātravinyastaṁ viṣādiharamīritam

'मैं ही गरुड हूँ' — ऐसा ध्यान कर विष हरण करने वाली क्रिया करे। शरीर पर स्थापित 'हं' मंत्र विष आदि का हरण करने वाला कहा गया है।

श्लोक 27 (garuda.1.19.27)

न्यस्य हंसं वामकरे नासामुखनिरोधकृत् । मंत्रो हरेद्दष्टकस्य त्वङ्मांसादिगतं विषम्

nyasya haṁsaṁ vāmakare nāsāmukhanirodhakṛt maṁtro hareddaṣṭakasya tvaṅmāṁsādigataṁ viṣam

बाएँ हाथ में 'हंस' का न्यास कर, नासिका और मुख को रोककर प्राणायाम करते हुए, यह मंत्र दंशित व्यक्ति की त्वचा, मांस आदि में फैले विष का हरण करता है।

श्लोक 28 (garuda.1.19.28)

स वायुना समाकृष्य दष्टानां गरलं हरेत् । तनौ न्यसेद्दष्टकस्य नीलकण्ठादि संस्मरेत्

sa vāyunā samākṛṣya daṣṭānāṁ garalaṁ haret tanau nyaseddaṣṭakasya nīlakaṇṭhādi saṁsmaret

वह वायु के द्वारा खींचकर दंशित व्यक्तियों के विष का हरण करता है। दंशित व्यक्ति के शरीर पर न्यास कर, नीलकंठ (शिव) आदि का स्मरण करे।

श्लोक 29 (garuda.1.19.29)

पीतं प्रत्यंगिरामूलं तण्डुलद्भिर्विषापहम् । पुनर्नवाफलिनीनां मूलं वक्क्रजमीदृशम्

pītaṁ pratyaṁgirāmūlaṁ taṇḍuladbhirviṣāpaham punarnavāphalinīnāṁ mūlaṁ vakkrajamīdṛśam

प्रत्यंगिरा की जड़ को चावल के जल के साथ पीना विष का नाशक है। पुनर्नवा और फलिनी की जड़ को मुँह में रखना भी इसी प्रकार विषनाशक है।

श्लोक 30 (garuda.1.19.30)

मूलं शुक्लबृहत्यास्तु कर्कोट्यागैरिकर्णिकम् । अद्भिर्घृष्टघृतोपेतलेपोऽयं विषमर्दनः

mūlaṁ śuklabṛhatyāstu karkoṭyāgairikarṇikam adbhirghṛṣṭaghṛtopetalepo'yaṁ viṣamardanaḥ

श्वेत बृहती की जड़, कर्कोटी और गैरिक-कर्णिका को जल से घिसकर, घी मिलाकर लेप करना विष का मर्दन करने वाला है।

श्लोक 31 (garuda.1.19.31)

विषमृद्धिं न व्रजेच्च उष्णं पिबति यो घृतम् । पंचांगं तु शिरीषस्य मूलं गृंजनजं तथा

viṣamṛddhiṁ na vrajecca uṣṇaṁ pibati yo ghṛtam paṁcāṁgaṁ tu śirīṣasya mūlaṁ gṛṁjanajaṁ tathā

जो उष्ण घी पीता है, उसमें विष प्रबल नहीं होता। शिरीष के पाँचों अंग, और गृंजन (प्याज़) की जड़ भी,

श्लोक 32 (garuda.1.19.32)

सर्वांगलेपतशचापि पानाद्वा विषहृद्भवेत् । ह्रीं गोनसादिविषहृत्

sarvāṁgalepataśacāpi pānādvā viṣahṛdbhavet hrīṁ gonasādiviṣahṛt

संपूर्ण शरीर पर लेप करने से या पीने से भी विष का नाशक होता है। 'ह्रीं' गोनस आदि सर्पों के विष का नाशक है।

श्लोक 33 (garuda.1.19.33)

हृल्ललाटविसर्गान्तं ध्यातं वश्या दिकृद्भवेत् । न्यस्तं योनौ वशेत्कन्यां कुर्य्यान्मदजलाविलम्

hṛllalāṭavisargāntaṁ dhyātaṁ vaśyā dikṛdbhavet nyastaṁ yonau vaśetkanyāṁ kuryyānmadajalāvilam

'ह्रीं' से आरंभकर ललाट पर विसर्ग तक ध्यान करने से वशीकरण आदि सिद्ध होता है। योनि-स्थान में न्यास करने पर कन्या को वश में कर मद-जल से आर्द्र कर सकता है।

श्लोक 34 (garuda.1.19.34)

जप्त्वा सप्ताष्टसाहस्त्रं गरुत्मानिव सर्वगः । कविः स्याच्छ्रुतिधरी च वश्याः स्त्रीश्चायुराप्नुयात् । विषहृत्स्यात्कथा तद्वन्मणिर्व्यासः स्मृतो ध्रुवम्

japtvā saptāṣṭasāhastraṁ garutmāniva sarvagaḥ kaviḥ syācchrutidharī ca vaśyāḥ strīścāyurāpnuyāt viṣahṛtsyātkathā tadvanmaṇirvyāsaḥ smṛto dhruvam

सात या आठ हज़ार बार जप कर, गरुड के समान सर्वव्यापी होकर मनुष्य कवि और श्रुतिधर (स्मरणशक्ति वाला) बन जाता है, स्त्रियों को वश में करता है और दीर्घ आयु प्राप्त करता है। यह विष का नाशक है — यह कथा, मणि के समान और व्यास द्वारा कही गई निश्चित रूप से स्मरणीय है।

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