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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 20

विषादिहर मंत्र-वृंद निरूपण

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (garuda.1.20.1)

।।सूत उवाच । वक्ष्ये तत्परमं गुह्यं शिवोक्तं मन्त्रवृन्दकम् । पाशं धनुश्च चक्रं च मुद्गरं शूलपट्टिशम्

sūta uvāca vakṣye tatparamaṁ guhyaṁ śivoktaṁ mantravṛndakam pāśaṁ dhanuśca cakraṁ ca mudgaraṁ śūlapaṭṭiśam

सूत जी ने कहा — मैं वह परम गुह्य मंत्र-समूह बताता हूँ, जो शिव द्वारा कहा गया था। पाश, धनुष, चक्र, मुद्गर, शूल और पट्टिश —

श्लोक 2 (garuda.1.20.2)

एतैरेवायुधैर्युद्धे मन्त्रैः शत्रूञ्जयेन्नृपः । मन्त्रोद्धारः पद्मपात्रे आदि पूर्वादिके लिखेत्

etairevāyudhairyuddhe mantraiḥ śatrūñjayennṛpaḥ mantroddhāraḥ padmapātre ādi pūrvādike likhet

इन्हीं आयुधों से युक्त मंत्रों द्वारा राजा युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे। कमल-पत्र में पूर्व आदि दिशाओं में बीज-मंत्र का उद्धार कर लिखे।

श्लोक 3 (garuda.1.20.3)

अष्टवर्गं चाष्टमं च ख्यातमीशानपत्रके । ॐ कारो ब्रह्म बीजं स्याद्ध्रीङ्कारो विष्णुरेव च

aṣṭavargaṁ cāṣṭamaṁ ca khyātamīśānapatrake oṁ kāro brahma bījaṁ syāddhrīṅkāro viṣṇureva ca

आठों वर्ग और आठवें को ईशान-पत्र में विख्यात रूप से लिखे। 'ॐ' कार ब्रह्मा का बीज-मंत्र है, और 'ह्रीं' कार विष्णु का ही बीज-मंत्र है।

श्लोक 4 (garuda.1.20.4)

ह्रींका रश्च शिवः शूले त्रिशाखे तु क्रमान्न्यसेत् । ॐ ह्रीं ह्रीं

hrīṁkā raśca śivaḥ śūle triśākhe tu kramānnyaset oṁ hrīṁ hrīṁ

'ह्रीं' कार शिव का बीज-मंत्र है; त्रिशाखा शूल पर क्रमशः न्यास करे। 'ॐ ह्रीं ह्रीं।'

श्लोक 5 (garuda.1.20.5)

शूलं गृहीत्वा हस्तेना भ्राम्य चाकाशसम्मुखम् । तद्दर्शनान्द्रहा नागा दृष्ट्वा वा नाशमाप्नुयुः

śūlaṁ gṛhītvā hastenā bhrāmya cākāśasammukham taddarśanāndrahā nāgā dṛṣṭvā vā nāśamāpnuyuḥ

शूल को हाथ में लेकर आकाश की ओर मुख करके घुमाए। उसके दर्शन मात्र से क्रूर सर्प, देखते ही नाश को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 6 (garuda.1.20.6)

धूमारक्ते करं मध्ये ध्यात्वा खे चिन्तयेन्नरः । दुष्टा नागा ग्रहा मेघा विनश्यन्ति च राक्षसाः

dhūmārakte karaṁ madhye dhyātvā khe cintayennaraḥ duṣṭā nāgā grahā meghā vinaśyanti ca rākṣasāḥ

धूम्र-रक्त वर्ण के हाथ के मध्य का ध्यान कर, मनुष्य आकाश में उसका चिंतन करे। इससे दुष्ट सर्प, ग्रह, मेघ और राक्षस नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 7 (garuda.1.20.7)

त्रिलोकान्रक्षयेन्मन्त्रो मर्त्यलोकस्य का कथा । ॐ जूं सूं हूं फट्

trilokānrakṣayenmantro martyalokasya kā kathā oṁ jūṁ sūṁ hūṁ phaṭ

यह मंत्र त्रिलोक की भी रक्षा कर सकता है, तो मृत्युलोक की क्या बात! 'ॐ जूं सूं हूं फट्।'

श्लोक 8 (garuda.1.20.8)

खादिरान्कीलकानष्टौ क्षेत्रे संमन्त्र्य विन्यसेत् । न तत्र वज्रपातस्य स्फूर्जथ्वादेरुपद्रवः

khādirānkīlakānaṣṭau kṣetre saṁmantrya vinyaset na tatra vajrapātasya sphūrjathvāderupadravaḥ

खैर की लकड़ी से बने आठ खूँटों को मंत्रित कर खेत में गाड़ दे। वहाँ वज्रपात और गर्जन आदि का उपद्रव नहीं होता।

श्लोक 9 (garuda.1.20.9)

गरुडोक्तैर्महामन्त्रैः कीलकानष्ट मन्त्रयेत् । एकविंशतिवाराणि क्षेत्रे तु निखनेन्निशि

garuḍoktairmahāmantraiḥ kīlakānaṣṭa mantrayet ekaviṁśativārāṇi kṣetre tu nikhanenniśi

गरुड द्वारा कहे गए महामंत्रों से आठों खूँटों को इक्कीस बार मंत्रित करे, और रात्रि में खेत में गाड़ दे।

श्लोक 10 (garuda.1.20.10)

विद्युन्मूषकवज्रादिसमुपद्रव एव च । हरक्षमलवरयड बिंदुयुक्तः सदाशिवः

vidyunmūṣakavajrādisamupadrava eva ca harakṣamalavarayaḍa biṁduyuktaḥ sadāśivaḥ

बिजली, चूहे, वज्र आदि का उपद्रव भी नहीं होता। 'ह र क्ष म ल व र य ड' अक्षरों को बिंदु-युक्त करने पर सदाशिव का मंत्र बनता है।

श्लोक 11 (garuda.1.20.11)

ॐ ह्रां सदाशिवाय नमः । तर्जन्या विन्यसेत्पिण्डं (ण्डे) दाडिमीकुसुमप्रभम्

oṁ hrāṁ sadāśivāya namaḥ tarjanyā vinyasetpiṇḍaṁ (ṇḍe) dāḍimīkusumaprabham

'ॐ ह्रां सदाशिव को नमस्कार।' तर्जनी अंगुली से अनार के फूल के समान लाल पिंड का न्यास करे।

श्लोक 12 (garuda.1.20.12)

तस्यैव दर्शनाद्दुष्टा मेघविद्युद्दिपादयः । राक्षसा भूतडाकिन्यः प्रद्रवंति दिशो दश

tasyaiva darśanādduṣṭā meghavidyuddipādayaḥ rākṣasā bhūtaḍākinyaḥ pradravaṁti diśo daśa

उसके दर्शन मात्र से दुष्ट मेघ, बिजली, हाथी आदि, तथा राक्षस, भूत और डाकिनियाँ दसों दिशाओं में भाग जाते हैं।

श्लोक 13 (garuda.1.20.13)

ॐ ह्रीं गणेशाय नमः । (ॐ ह्रीं) स्तम्भनादिचक्राय नमः । ॐ ऐं ब्रहयैंत्रै लोक्यडामराय नमः

oṁ hrīṁ gaṇeśāya namaḥ (oṁ hrīṁ) stambhanādicakrāya namaḥ oṁ aiṁ brahayaiṁtrai lokyaḍāmarāya namaḥ

'ॐ ह्रीं, गणेश को नमस्कार।' 'ॐ ह्रीं, स्तंभन आदि चक्र को नमस्कार।' 'ॐ ऐं, त्रैलोक्य को डमकाने वाले ब्रह्मयंत्र को नमस्कार।'

श्लोक 14 (garuda.1.20.14)

भैरवं पिंडमाख्यातं विषपापग्रहापहम् । क्षेत्रस्य रक्षणं भूतराक्षसादेः प्रमर्दनम्

bhairavaṁ piṁḍamākhyātaṁ viṣapāpagrahāpaham kṣetrasya rakṣaṇaṁ bhūtarākṣasādeḥ pramardanam

यह भैरव-पिंड मंत्र कहा गया है, जो विष, पाप और ग्रहों को दूर करने वाला है। यह खेत की रक्षा करने वाला और भूत-राक्षस आदि को कुचलने वाला है।

श्लोक 15 (garuda.1.20.15)

ॐ नमः । इंद्रवज्रं करे ध्यात्वा दुष्टमेघादिवारणम् । विषशत्रुगणाभूता नश्यन्ते वज्रमुद्रया

oṁ namaḥ iṁdravajraṁ kare dhyātvā duṣṭameghādivāraṇam viṣaśatrugaṇābhūtā naśyante vajramudrayā

'ॐ नमः।' हाथ में इंद्र के वज्र का ध्यान करना दुष्ट मेघ आदि का निवारण करने वाला है। विष, शत्रु-समूह और भूत, वज्र-मुद्रा से नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 16 (garuda.1.20.16)

ॐ क्षुं(क्ष) नमः । स्मरेत्पाशं वामहस्ते विषभूतादि नश्यति । ॐ ह्रां (ह्रो) नमः । हरेदुच्चारणान्मंत्रो विषमेघग्रहादिकान्

oṁ kṣuṁ(kṣa) namaḥ smaretpāśaṁ vāmahaste viṣabhūtādi naśyati oṁ hrāṁ (hro) namaḥ hareduccāraṇānmaṁtro viṣameghagrahādikān

'ॐ क्षुं नमः।' बाएँ हाथ में पाश का स्मरण करने से विष, भूत आदि नष्ट हो जाते हैं। 'ॐ ह्रां नमः।' इस मंत्र के उच्चारण से विष, मेघ, ग्रह आदि का हरण होता है।

श्लोक 17 (garuda.1.20.17)

ध्यात्वा कृतांतं च दहेच्छेदकास्त्रेण वै जगत् । ॐ क्ष्णँ (क्ष्म) नमः । ध्यात्वा तु भैरवं कुर्य्यान्द्ग्रहभूतविषापहम्

dhyātvā kṛtāṁtaṁ ca dahecchedakāstreṇa vai jagat oṁ kṣṇã (kṣma) namaḥ dhyātvā tu bhairavaṁ kuryyāndgrahabhūtaviṣāpaham

कृतांत (यम) का ध्यान कर, छेदन करने वाले अस्त्र से समस्त जगत को शत्रुओं से मुक्त कर सकता है। 'ॐ क्ष्णं नमः।' भैरव का ध्यान करके यह ग्रह, भूत और विष का नाशक हो जाता है।

श्लोक 18 (garuda.1.20.18)

ॐ लसद्दिजिह्वाक्ष स्वाहा । क्षेत्रादौ ग्रहभूतादिविषपक्षिनिवारणम्

oṁ lasaddijihvākṣa svāhā kṣetrādau grahabhūtādiviṣapakṣinivāraṇam

'ॐ चमकती हुई दो जिह्वाओं वाले! स्वाहा।' यह खेत आदि में ग्रह, भूत, विष और हानिकारक पक्षियों का निवारण करता है।

श्लोक 19 (garuda.1.20.19)

ॐ क्ष्व (क्ष्णं) नमः । रक्तेन पटहे लिख्य शब्दास्तेषुसुर्ग्रहादयः । ॐ मर मर मारयमारय स्वाहा । ॐ हुं फट् स्वाहा

oṁ kṣva (kṣṇaṁ) namaḥ raktena paṭahe likhya śabdāsteṣusurgrahādayaḥ oṁ mara mara mārayamāraya svāhā oṁ huṁ phaṭ svāhā

'ॐ क्ष्वं नमः।' रक्त (लाल स्याही) से ढोल पर लिखकर, उसकी ध्वनि से ग्रह आदि भाग जाते हैं। 'ॐ मर मर, मारय मारय, स्वाहा।' 'ॐ हुं फट् स्वाहा।'

श्लोक 20 (garuda.1.20.20)

शूलं चाष्टशतैर्मन्त्र्य भ्रामणाच्छत्रुवृंदहृत् । ऊर्द्धशक्तिनिपातेन अधः शक्तिं निकुञ्चेयेत्

śūlaṁ cāṣṭaśatairmantrya bhrāmaṇācchatruvṛṁdahṛt ūrddhaśaktinipātena adhaḥ śaktiṁ nikuñceyet

शूल को आठ सौ बार मंत्रित कर घुमाने से यह शत्रुओं के समूह का नाश करने वाला होता है। ऊपर से शक्ति के गिरने पर, नीचे की शक्ति को संकुचित करे।

श्लोक 21 (garuda.1.20.21)

पूरके पूरिता मंत्राः कुम्भकेन सुमन्त्रिताः । प्रणवेनाप्यायितास्ते मनवस्तदुदीरिताः । एवमाप्यायिता मंत्रा भृत्यवत्फलदायकाः

pūrake pūritā maṁtrāḥ kumbhakena sumantritāḥ praṇavenāpyāyitāste manavastadudīritāḥ evamāpyāyitā maṁtrā bhṛtyavatphaladāyakāḥ

पूरक (श्वास भरने) से भरे गए, कुंभक (श्वास रोकने) से सुसंस्कृत किए गए, और प्रणव से पुष्ट किए गए वे मंत्र — इस प्रकार कहे गए हैं। इस प्रकार पुष्ट किए गए मंत्र सेवक के समान फल देने वाले होते हैं।

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