पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 21
पंचवक्त्र-पूजन
श्लोक 1 (garuda.1.21.1)
।।सूत उवाच । पंचवक्त्रार्च्चनं वक्ष्ये पृथग्यद्भुक्तिमुक्तिदम् । ॐ भूर्विष्णवे आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्त्तये स्वाहा
sūta uvāca paṁcavaktrārccanaṁ vakṣye pṛthagyadbhuktimuktidam oṁ bhūrviṣṇave ādibhūtāya sarvādhārāya mūrttaye svāhā
सूत जी ने कहा — मैं पंचमुख शिव की पूजा अलग से बताऊँगा, जो भोग और मोक्ष दोनों देने वाली है। 'ॐ भूः विष्णु को, आदिभूत को, सर्वाधार को, मूर्तिमान को स्वाहा।'
श्लोक 2 (garuda.1.21.2)
सद्योजातस्य चाह्वानमनेन प्रथमं चरेत् । ॐ हां सद्योजातायैव कला ह्यष्टौ प्रकीर्त्तिताः
sadyojātasya cāhvānamanena prathamaṁ caret oṁ hāṁ sadyojātāyaiva kalā hyaṣṭau prakīrttitāḥ
इस मंत्र से पहले सद्योजात मुख का आह्वान करे। 'ॐ हां सद्योजात को नमस्कार' — इनकी आठ कलाएँ (शक्तियाँ) कही गई हैं,
श्लोक 3 (garuda.1.21.3)
सिद्धिर्ऋद्धिर्धृतिर्लक्ष्मीर्मेधा कान्तिः स्वधा स्थितिः । ॐ हीं वामदेवायैव कलास्तस्य त्रयोदश
siddhirṛddhirdhṛtirlakṣmīrmedhā kāntiḥ svadhā sthitiḥ oṁ hīṁ vāmadevāyaiva kalāstasya trayodaśa
सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कांति, स्वधा और स्थिति। 'ॐ हीं वामदेव को नमस्कार' — इनकी तेरह कलाएँ हैं,
श्लोक 4 (garuda.1.21.4)
रजा रक्षा रतिः पाल्या कान्ति स्तृष्णा मतिः क्रिया । कामा बुद्धिश्च रात्रिश्च त्रासनी मोहिनी तथ
rajā rakṣā ratiḥ pālyā kānti stṛṣṇā matiḥ kriyā kāmā buddhiśca rātriśca trāsanī mohinī tatha
रजा, रक्षा, रति, पाल्या, कांति, तृष्णा, मति, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, त्रासनी, तथा मोहिनी —
श्लोक 5 (garuda.1.21.5)
मनोन्मनी अघोरा च तथा मोहा क्षुधा कलाः । निद्रा मृत्युश्च माया च अष्टसंख्या भयंकरा
manonmanī aghorā ca tathā mohā kṣudhā kalāḥ nidrā mṛtyuśca māyā ca aṣṭasaṁkhyā bhayaṁkarā
(ये तेरह वामदेव की हैं)। अघोर मुख की कलाएँ मनोन्मनी, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, और माया हैं — ये आठ संख्या में भयंकर हैं।
श्लोक 6 (garuda.1.21.6)
ॐ हैं तत्पुरुषायैव (षाय) निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिर्न केवला
oṁ haiṁ tatpuruṣāyaiva (ṣāya) nivṛttiśca pratiṣṭhā ca vidyā śāntirna kevalā
'ॐ हैं तत्पुरुष को नमस्कार' — निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, और शांति — ये तत्पुरुष की कलाएँ हैं, अकेली नहीं।
श्लोक 7 (garuda.1.21.7)
ॐ हौं ईशानाय नमो निश्चला च निरञ्जना । शशिनी चांगना चैव मरीचिर्ज्वालिनी तथा ।।.7
oṁ hauṁ īśānāya namo niścalā ca nirañjanā śaśinī cāṁganā caiva marīcirjvālinī tathā .7
'ॐ हौं ईशान को नमस्कार' — निश्चला, निरंजना, शशिनी, अंगना, मरीचि, तथा ज्वालिनी — ये ईशान की कलाएँ हैं।