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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 23

शिवार्चन-निरूपण

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (garuda.1.23.1)

।।सूत उवाच । शिवार्चनं प्रवक्ष्यामि धर्म्मकामादिसाधनम् । त्रिभिर्मन्त्रैराचामेत्तु स्वाहान्तैः प्रणवादिकैः

sūta uvāca śivārcanaṁ pravakṣyāmi dharmmakāmādisādhanam tribhirmantrairācāmettu svāhāntaiḥ praṇavādikaiḥ

सूत जी ने कहा — मैं शिव की वह पूजा बताऊँगा, जो धर्म, काम आदि की साधक है। प्रणव आदि से आरंभ और स्वाहा पर समाप्त होने वाले तीन मंत्रों से आचमन करे।

श्लोक 2 (garuda.1.23.2)

ॐ हां आत्मतत्त्वाय विद्यातत्त्वाय हीं तथा । ॐ हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा हृदा स्याश्रोत्रवंदनम्

oṁ hāṁ ātmatattvāya vidyātattvāya hīṁ tathā oṁ hūṁ śivatattvāya svāhā hṛdā syāśrotravaṁdanam

'ॐ हां आत्मतत्त्व को, विद्यातत्त्व को हीं, तथा ॐ हूं शिवतत्त्व को स्वाहा' — हृदय-मंत्र से कानों की वंदना करे।

श्लोक 3 (garuda.1.23.3)

भस्मस्न्नानं तर्पणं च ॐ हां स्वाहा सर्वमन्त्रकाः । सर्वे देवाः सर्वमुनिर्नमोऽन्तो वौषडन्तकः

bhasmasnnānaṁ tarpaṇaṁ ca oṁ hāṁ svāhā sarvamantrakāḥ sarve devāḥ sarvamunirnamo'nto vauṣaḍantakaḥ

भस्म-स्नान और तर्पण करे — 'ॐ हां स्वाहा' यह सभी मंत्रों का सार है। सभी देवताओं और सभी मुनियों का तर्पण 'नमः' के साथ, और फिर 'वौषट्' के साथ अंत में करे।

श्लोक 4 (garuda.1.23.4)

स्वधान्ताः सर्वपितरः स्वधान्ताश्च पितामहाः । ॐ हां प्रपितामहेभ्यस्तथा मातामहादयः

svadhāntāḥ sarvapitaraḥ svadhāntāśca pitāmahāḥ oṁ hāṁ prapitāmahebhyastathā mātāmahādayaḥ

सभी पितरों और पितामहों का तर्पण 'स्वधा' के साथ अंत में करे। 'ॐ हां प्रपितामहों को', तथा मातामह आदि को भी तर्पण करे।

श्लोक 5 (garuda.1.23.5)

हां नमः सर्वमातृभ्यस्ततः स्यात्प्राणसंयमः । आचामं मार्जनं चाथो गायत्रीं च जपेत्ततः

hāṁ namaḥ sarvamātṛbhyastataḥ syātprāṇasaṁyamaḥ ācāmaṁ mārjanaṁ cātho gāyatrīṁ ca japettataḥ

'हां नमः, सभी माताओं को' — तत्पश्चात् प्राणायाम करे। आचमन और मार्जन कर, तत्पश्चात् गायत्री का जप करे।

श्लोक 6 (garuda.1.23.6)

ॐ हां तन्महेशाय विद्महे, वाग्विशुद्धाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्

oṁ hāṁ tanmaheśāya vidmahe, vāgviśuddhāya dhīmahi, tanno rudraḥ pracodayāt

'ॐ हां, हम उस महेश्वर को जानते हैं, वाणी को शुद्ध करने वाले का ध्यान करते हैं, वह रुद्र हमें प्रेरित करें।' — यह शिव-गायत्री है।

श्लोक 7 (garuda.1.23.7)

सूर्य्योपस्थानकं कृत्वा सूर्य्यमन्त्रैः प्रपूजयेत् । ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः शिवसूर्य्याय नमः । ॐ हं खखोल्काय सूर्य्यमूर्त्तये नमः । ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्य्याय नमः

sūryyopasthānakaṁ kṛtvā sūryyamantraiḥ prapūjayet oṁ hāṁ hīṁ hūṁ haiṁ hauṁ haḥ śivasūryyāya namaḥ oṁ haṁ khakholkāya sūryyamūrttaye namaḥ oṁ hrāṁ hrīṁ saḥ sūryyāya namaḥ

सूर्य के समक्ष उपस्थान कर, सूर्य-मंत्रों से पूजा करे। 'ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः, शिव-सूर्य को नमस्कार।' 'ॐ हं खखोल्क को, सूर्य-मूर्ति को नमस्कार।' 'ॐ ह्रां ह्रीं सः, सूर्य को नमस्कार।'

श्लोक 8 (garuda.1.23.8)

दण्डिने पिङ्गले त्वातिभूतानि च ततः स्मरेत् । अग्नयादौ विमलेशानमाराध्य परमं सुखम्

daṇḍine piṅgale tvātibhūtāni ca tataḥ smaret agnayādau vimaleśānamārādhya paramaṁ sukham

दंडधारी, पिंगल और अतिभूतों का भी स्मरण करे। आग्नेय आदि दिशाओं में विमलेश (शिव) की आराधना कर परम सुख प्राप्त करे।

श्लोक 9 (garuda.1.23.9)

यजेत्पद्मां च रां दीप्तां रीं सूक्ष्मां रूं जयां च रें । भद्रां च रैं विभूतिं रों विमलां रौममोधि (रोधि) काम्

yajetpadmāṁ ca rāṁ dīptāṁ rīṁ sūkṣmāṁ rūṁ jayāṁ ca reṁ bhadrāṁ ca raiṁ vibhūtiṁ roṁ vimalāṁ raumamodhi (rodhi) kām

'रां' से पद्मा का, 'रीं' से दीप्ता का, 'रूं' से सूक्ष्मा का, 'रें' से जया का यजन करे। 'रैं' से भद्रा का, 'रों' से विभूति का, 'रौं' से विमला और अमोघा का यजन करे।

श्लोक 10 (garuda.1.23.10)

रं विद्युतां च पूर्वादौ रा (रं) मध्ये सर्वतोमुखीम् । अर्कासनं सूर्य्यमूर्त्तिं ह्रां ह्रूं (ह्रीं) सः सूर्य्यमर्च्चयेत्

raṁ vidyutāṁ ca pūrvādau rā (raṁ) madhye sarvatomukhīm arkāsanaṁ sūryyamūrttiṁ hrāṁ hrūṁ (hrīṁ) saḥ sūryyamarccayet

'रं' से विद्युता का यजन पूर्व आदि दिशाओं में करे; मध्य में 'रं' से सर्वतोमुखी का यजन करे। सूर्य के आसन और सूर्य-मूर्ति की, 'ह्रां ह्रीं सः' मंत्र से सूर्य की पूजा करे।

श्लोक 11 (garuda.1.23.11)

ॐ आं हृदयार्काय च शिरः शिखा च भूर्भुवः स्वरोम् । ज्वालिनीं ह्रं कवचस्य चास्त्रं राज्ञां च दीक्षिताम्

oṁ āṁ hṛdayārkāya ca śiraḥ śikhā ca bhūrbhuvaḥ svarom jvālinīṁ hraṁ kavacasya cāstraṁ rājñāṁ ca dīkṣitām

'ॐ आं, हृदय-सूर्य को' — शिर, शिखा को 'भूर्भुवःस्वः ओम्' के मंत्रों से। ज्वालिनी को 'ह्रं' से, कवच को, अस्त्र को, तथा दीक्षित राजाओं को भी यजन करे।

श्लोक 12 (garuda.1.23.12)

यजेत्सूर्य्यहृदा सर्वान्सों सोमं मं च मंगलम् । बं बुधं बृं बृहस्पतिं भं भार्गवं शं शनैश्चरम्

yajetsūryyahṛdā sarvānsoṁ somaṁ maṁ ca maṁgalam baṁ budhaṁ bṛṁ bṛhaspatiṁ bhaṁ bhārgavaṁ śaṁ śanaiścaram

सूर्य-हृदय-मंत्र से इन सबका यजन करे — 'सों' से सोम (चंद्र) का, 'मं' से मंगल का, 'बं' से बुध का, 'बृं' से बृहस्पति का, 'भं' से शुक्र का, 'शं' से शनैश्चर का,

श्लोक 13 (garuda.1.23.13)

रं राहुं कं यजेत्केतुं ॐ तेजश्चण्डमर्च्चयेत् । सूर्य्यमभ्यर्च्य चाचम्य कनिष्ठातोऽङ्गकांन्यसेत्

raṁ rāhuṁ kaṁ yajetketuṁ oṁ tejaścaṇḍamarccayet sūryyamabhyarcya cācamya kaniṣṭhāto'ṅgakāṁnyaset

'रं' से राहु का, 'कं' से केतु का यजन करे। 'ॐ' से तेजश्चंड का पूजन करे। सूर्य की पूजा कर, आचमन कर, कनिष्ठिका से अंगों का न्यास करे।

श्लोक 14 (garuda.1.23.14)

हां हृच्छिरो हूं शिखा हैं वर्म्म हौं चैव नेत्रकम् । होऽस्त्रं शक्तिस्थितिं कृत्वा भूतशुद्धिं पुनर्न्यसेत्

hāṁ hṛcchiro hūṁ śikhā haiṁ varmma hauṁ caiva netrakam ho'straṁ śaktisthitiṁ kṛtvā bhūtaśuddhiṁ punarnyaset

'हां' हृदय-शिर को, 'हूं' शिखा को, 'हैं' कवच को, 'हौं' नेत्र को, 'हः' अस्त्र को न्यास करे। शक्ति की स्थिति कर, पुनः भूत-शुद्धि का न्यास करे।

श्लोक 15 (garuda.1.23.15)

अर्घ्यपात्रं ततः कृत्वा तदद्भिः प्रोक्षयेद्यजेत्

arghyapātraṁ tataḥ kṛtvā tadadbhiḥ prokṣayedyajet

तत्पश्चात् अर्घ्य-पात्र बनाकर, उसके जल से सब वस्तुओं का प्रोक्षण कर पूजा करे।

श्लोक 16 (garuda.1.23.16)

आत्मानं पद्मसंस्थं च हौं शिवाय ततो बहिः । द्वारे नन्दिमहाकालौ गंगा च यमुनाथ गौः

ātmānaṁ padmasaṁsthaṁ ca hauṁ śivāya tato bahiḥ dvāre nandimahākālau gaṁgā ca yamunātha gauḥ

कमल पर स्थित अपनी आत्मा का 'हौं' से शिव के प्रति ध्यान कर, तत्पश्चात् बाहर द्वार पर नंदी और महाकाल का, गंगा, यमुना और गौ का पूजन करे।

श्लोक 17 (garuda.1.23.17)

श्रीवत्सं वास्त्वधिपतिं ब्रह्माणं च गणं गुरुम् । शक्त्यनन्तौ यजेन्मध्ये पूर्वादौ धर्म्मकादिकम्

śrīvatsaṁ vāstvadhipatiṁ brahmāṇaṁ ca gaṇaṁ gurum śaktyanantau yajenmadhye pūrvādau dharmmakādikam

श्रीवत्स, वास्तु के अधिपति, ब्रह्मा, गणपति और गुरु का पूजन करे। मध्य में शक्ति और अनंत का यजन करे, पूर्व आदि दिशाओं में धर्म आदि का।

श्लोक 18 (garuda.1.23.18)

अधर्म्माद्यं च वह्न्यादौ मध्ये पद्मस्य कर्णिके । वामाज्येष्ठा च पूर्वादौ रौद्री काली च पूर्षदः

adharmmādyaṁ ca vahnyādau madhye padmasya karṇike vāmājyeṣṭhā ca pūrvādau raudrī kālī ca pūrṣadaḥ

अधर्म आदि का आग्नेय आदि दिशाओं में, कमल की कर्णिका के मध्य में यजन करे। पूर्व आदि दिशाओं में वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली आदि शक्तियों का पूजन करे।

श्लोक 19 (garuda.1.23.19)

ॐ हौं कलविकरिण्यै बलविकरिणी ततः । बलप्रमथिनी सर्वभूतानां दमनी ततः

oṁ hauṁ kalavikariṇyai balavikariṇī tataḥ balapramathinī sarvabhūtānāṁ damanī tataḥ

'ॐ हौं कलविकरिणी को' — तत्पश्चात् बलविकरिणी को। बलप्रमथिनी को, तत्पश्चात् सर्वभूतदमनी को पूजन करे।

श्लोक 20 (garuda.1.23.20)

मनोन्मनी यजेदेताः पठिमध्ये शिवाग्रतः । शिवासनं महामूर्त्ति मूर्त्तिमध्ये शिवाय च

manonmanī yajedetāḥ paṭhimadhye śivāgrataḥ śivāsanaṁ mahāmūrtti mūrttimadhye śivāya ca

मनोन्मनी का यजन करे — इन सबका शिव के समक्ष स्थान में। शिव के आसन, महामूर्ति और मूर्ति के मध्य में शिव का पूजन करे।

श्लोक 21 (garuda.1.23.21)

आवाहनं स्थापनं च सन्निधानं निरोधनम् । सकलीकरणं मुद्रादर्शनं चार्घ्यपाद्यकम्

āvāhanaṁ sthāpanaṁ ca sannidhānaṁ nirodhanam sakalīkaraṇaṁ mudrādarśanaṁ cārghyapādyakam

आवाहन, स्थापन, सन्निधान, निरोधन, सकलीकरण, मुद्रा-दर्शन, तथा अर्घ्य-पाद्य —

श्लोक 22 (garuda.1.23.22)

आचामाभ्यङ्गमुद्वर्त्तं स्नानं निर्म्मथनं चरेत् । वस्त्रं विलेपनं पुष्पं धूपं दीपं चरुं ददेत्

ācāmābhyaṅgamudvarttaṁ snānaṁ nirmmathanaṁ caret vastraṁ vilepanaṁ puṣpaṁ dhūpaṁ dīpaṁ caruṁ dadet

आचमन, अभ्यंग, उद्वर्तन, स्नान, निर्मथन — यह सब करे। वस्त्र, विलेपन, पुष्प, धूप, दीप और चरु अर्पित करे।

श्लोक 23 (garuda.1.23.23)

आचामं मुखवासं च ताम्बूलं हस्तशोधनम् । छत्रचामरपावित्रं परमीकरणं चरेत्

ācāmaṁ mukhavāsaṁ ca tāmbūlaṁ hastaśodhanam chatracāmarapāvitraṁ paramīkaraṇaṁ caret

आचमन, मुखवास, ताम्बूल, हाथ की शुद्धि, छत्र-चामर, पवित्रक और परमीकरण (अंतिम पूजा-संस्कार) करे।

श्लोक 24 (garuda.1.23.24)

रूपकल्पके चैकाहजपो जाप्यसमर्पणम् । स्तुतिर्नतिर्हृदाद्यैश्च ज्ञेयं नामाङ्ग पूजनम्

rūpakalpake caikāhajapo jāpyasamarpaṇam stutirnatirhṛdādyaiśca jñeyaṁ nāmāṅga pūjanam

रूप-कल्पन में एक दिन के जप का समर्पण करे। हृदय आदि मंत्रों से स्तुति और नमन करे — यह नाम और अंग की पूजा जाननी चाहिए।

श्लोक 25 (garuda.1.23.25)

अग्नीशरक्षो वायव्ये मध्ये पूर्वादितन्त्रकम् । इन्द्राद्यांश्च यजेच्चण्डं तस्मै निर्माल्यमर्पयेत्

agnīśarakṣo vāyavye madhye pūrvāditantrakam indrādyāṁśca yajeccaṇḍaṁ tasmai nirmālyamarpayet

आग्नेय, ईशान्य, नैऋत्य, वायव्य कोणों में, मध्य में, और पूर्व आदि दिशाओं में विधिपूर्वक पूजा करे। इंद्र आदि का, और चंड का भी यजन करे, तथा उसे निर्माल्य अर्पित करे।

श्लोक 26 (garuda.1.23.26)

गुहायातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देव तत्प्रसादात्त्वयि स्थितिः

guhāyātiguhyagoptā tvaṁ gṛhāṇāsmatkṛtaṁ japam siddhirbhavatu me deva tatprasādāttvayi sthitiḥ

'हे अत्यंत गुह्य के रक्षक! आप हमारे किए हुए जप को ग्रहण कीजिए। हे देव! मुझे सिद्धि प्राप्त हो, उसी कृपा से मेरी स्थिति आप में हो।'

श्लोक 27 (garuda.1.23.27)

यत्किञ्चित्क्रियते कर्म सदा सुकृतदुष्कृतम् । तन्मे शिवपदस्थस्य रुद्र क्षपय शङ्कर

yatkiñcitkriyate karma sadā sukṛtaduṣkṛtam tanme śivapadasthasya rudra kṣapaya śaṅkara

'जो कुछ भी कर्म किया जाता है, सदा शुभ या अशुभ, हे रुद्र! हे शंकर! शिवपद में स्थित मेरे उस कर्म को नष्ट कीजिए।'

श्लोक 28 (garuda.1.23.28)

शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत् । शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च

śivo dātā śivo bhoktā śivaḥ sarvamidaṁ jagat śivo jayati sarvatra yaḥ śivaḥ so'hameva ca

'शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं, शिव ही यह संपूर्ण जगत हैं। शिव सर्वत्र विजयी हों — जो शिव हैं, वह मैं ही हूँ।'

श्लोक 29 (garuda.1.23.29)

यत्कृतं यत्करिष्यामि तत्सर्वं सुकृतं तव(तस्तवम्) । त्वं त्राता विश्वनेता च नान्योनाथोऽस्तिमेशिव

yatkṛtaṁ yatkariṣyāmi tatsarvaṁ sukṛtaṁ tava(tastavam) tvaṁ trātā viśvanetā ca nānyonātho'stimeśiva

'जो मैंने किया और जो मैं करूँगा, वह सब आपके लिए शुभ कर्म हो। आप ही रक्षक और विश्व के नेता हैं; हे शिव! मेरा कोई अन्य स्वामी नहीं है।'

श्लोक 30 (garuda.1.23.30)

अथान्येन प्रकारेण शिवपूजां वदाम्यहम् । गणः सरस्वती नंदी महाकालोऽथगंगया

athānyena prakāreṇa śivapūjāṁ vadāmyaham gaṇaḥ sarasvatī naṁdī mahākālo'thagaṁgayā

अब मैं दूसरे प्रकार से शिव-पूजा बताता हूँ। गणपति, सरस्वती, नंदी, महाकाल, और गंगा के साथ,

श्लोक 31 (garuda.1.23.31)

पवनास्त्रं वास्त्वधिपो द्वारि पूर्वादितस्त्विमे । इंद्राद्याः पूजनीयाश्च तत्त्वानि पृथिवी जलम्

pavanāstraṁ vāstvadhipo dvāri pūrvāditastvime iṁdrādyāḥ pūjanīyāśca tattvāni pṛthivī jalam

वायु-अस्त्र और वास्तु के अधिपति का द्वार पर, पूर्व आदि दिशाओं से पूजन करे। इंद्र आदि भी पूज्य हैं, तथा तत्त्व — पृथ्वी, जल,

श्लोक 32 (garuda.1.23.32)

तेजो वायुर्व्योम गंधो रसरूपे च शब्दकः । स्पर्शो वाक् पाणि पादं च पायूपस्थं श्रुतित्वचम्

tejo vāyurvyoma gaṁdho rasarūpe ca śabdakaḥ sparśo vāk pāṇi pādaṁ ca pāyūpasthaṁ śrutitvacam

तेज, वायु, आकाश, गंध, रस, रूप और शब्द; स्पर्श, वाणी, हाथ, पैर, मलद्वार, उपस्थ, श्रोत्र, त्वचा,

श्लोक 33 (garuda.1.23.33)

चक्षुर्जिह्वा घ्राणमनो बुद्धिश्चाहं प्रकृत्यपि । पुमान्नागो बुद्धिविद्ये कला कालो नियत्यपि

cakṣurjihvā ghrāṇamano buddhiścāhaṁ prakṛtyapi pumānnāgo buddhividye kalā kālo niyatyapi

नेत्र, जिह्वा, घ्राण, मन, बुद्धि, अहंकार, तथा प्रकृति भी; पुरुष, राग, बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति भी,

श्लोक 34 (garuda.1.23.34)

माया च शुद्ध विद्या च ईश्वरश्च सदाशिवः । शक्तिः शिवश्च तान्ज्ञात्वा मुक्तो ज्ञानी शिवो भवेत्

māyā ca śuddha vidyā ca īśvaraśca sadāśivaḥ śaktiḥ śivaśca tānjñātvā mukto jñānī śivo bhavet

माया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिव — इन सबको जानकर ज्ञानी मुक्त होकर शिव बन जाता है।

श्लोक 35 (garuda.1.23.35)

यः शिवः स हरिर्ब्रह्मा सोऽहं ब्रह्मास्मि शङ्कर

yaḥ śivaḥ sa harirbrahmā so'haṁ brahmāsmi śaṅkara

'जो शिव हैं, वे ही हरि हैं, वे ही ब्रह्मा हैं — वही मैं हूँ, मैं ब्रह्म ही हूँ, हे शंकर!'

श्लोक 36 (garuda.1.23.36)

भूतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि यया शुद्धः शिवो भवेत् । हृत्पद्मे सद्योमंत्रः स्यान्निवृत्तिश्च कला इडा

bhūtaśuddhiṁ pravakṣyāmi yayā śuddhaḥ śivo bhavet hṛtpadme sadyomaṁtraḥ syānnivṛttiśca kalā iḍā

अब मैं भूत-शुद्धि बताऊँगा, जिससे शुद्ध होकर व्यक्ति शिव बन जाता है। हृदय-कमल में सद्यो-मंत्र और निवृत्ति-कला स्थित है, इडा नाड़ी,

श्लोक 37 (garuda.1.23.37)

पिंगला द्वे च नाड्यौ तु प्राणोऽपानश्च मारुतौ । इन्द्रो देहो ब्रह्महेतुश्चतुरस्त्रं च मण्डलम्

piṁgalā dve ca nāḍyau tu prāṇo'pānaśca mārutau indro deho brahmahetuścaturastraṁ ca maṇḍalam

और पिंगला — ये दो नाड़ियाँ हैं; प्राण और अपान दो वायु हैं। इंद्र, देह, ब्रह्म-हेतु और चतुष्कोण मंडल —

श्लोक 38 (garuda.1.23.38)

।।महाभूत । वक्त्रेण लाञ्छितं वायुमेकोद्धातगुणाः शराः । हृत्स्थानसादृश्यरुतं शतकोटिप्रविस्तरम्

mahābhūta vaktreṇa lāñchitaṁ vāyumekoddhātaguṇāḥ śarāḥ hṛtsthānasādṛśyarutaṁ śatakoṭipravistaram

[महाभूत — वायु-तत्त्व:] मुख से चिह्नित, जिसके गुण एक बीज-मंत्र से युक्त पाँच बाणों के समान हैं, हृदय-स्थान के समान ध्वनि वाला, सौ करोड़ योजन विस्तार वाला — इस वायु-मंडल का ध्यान करे।

श्लोक 39 (garuda.1.23.39)

ॐ ह्रीं प्रतिष्ठायै ह्रूं ह्रः फट् । ॐ ह्रीं ह्रूं विद्यायै ह्रं ह्रः फट् । चतुरशीतिकोटीनामुच्छ्रयं भूमितन्त्रकम्

oṁ hrīṁ pratiṣṭhāyai hrūṁ hraḥ phaṭ oṁ hrīṁ hrūṁ vidyāyai hraṁ hraḥ phaṭ caturaśītikoṭīnāmucchrayaṁ bhūmitantrakam

'ॐ ह्रीं प्रतिष्ठा को, ह्रूं ह्रः फट्।' 'ॐ ह्रीं ह्रूं विद्या को, ह्रं ह्रः फट्।' चौरासी करोड़ योजन की ऊँचाई वाला भूमि-मंडल है।

श्लोक 40 (garuda.1.23.40)

तन्मध्ये भववृक्षं च आत्मानं च विचिन्तयेत् । अधोमुखीं ततः पृथ्वीं तत्तच्छुध्दं भवेद्ध्रुवम्

tanmadhye bhavavṛkṣaṁ ca ātmānaṁ ca vicintayet adhomukhīṁ tataḥ pṛthvīṁ tattacchudhdaṁ bhaveddhruvam

उसके मध्य में संसार-वृक्ष का, और अपनी आत्मा का चिंतन करे। तत्पश्चात् अधोमुखी पृथ्वी का विलय करे — इससे वह तत्त्व निश्चित रूप से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 41 (garuda.1.23.41)

वामादेवी प्रतिष्ठा च सुषुम्ना धारिका तथा । समानोदानवरुणौ देवता विष्णु कारणम्

vāmādevī pratiṣṭhā ca suṣumnā dhārikā tathā samānodānavaruṇau devatā viṣṇu kāraṇam

वामदेवी, प्रतिष्ठा, तथा सुषुम्ना और धारिका नाड़ी, समान और उदान वायु, वरुण देवता, तथा विष्णु इसका कारण हैं।

श्लोक 42 (garuda.1.23.42)

उद्धाताश्च गुणा वेदाः श्वेतं ध्यानं तथैव च । एवं कुर्य्यात्कण्ठपद्ममर्द्धचन्द्राख्यमण्डलम्

uddhātāśca guṇā vedāḥ śvetaṁ dhyānaṁ tathaiva ca evaṁ kuryyātkaṇṭhapadmamarddhacandrākhyamaṇḍalam

उद्धार-बीज, गुण, वेद, और श्वेत ध्यान — इस प्रकार करे। कंठ-कमल में अर्धचंद्र नामक जल-मंडल का ध्यान करे।

श्लोक 43 (garuda.1.23.43)

पद्मांकितं द्विविंशतिककोटिविस्तीर्णमौ स्मरेत् । चतुर्नवत्युच्छ्रयं च आत्मानं च अधोमुखम्

padmāṁkitaṁ dviviṁśatikakoṭivistīrṇamau smaret caturnavatyucchrayaṁ ca ātmānaṁ ca adhomukham

कमल से अंकित, बाईस करोड़ योजन विस्तार वाले, चौरानवे करोड़ योजन ऊँचाई वाले, और अधोमुख आत्मा का स्मरण करे।

श्लोक 44 (garuda.1.23.44)

तालुस्थानं च पद्मं च अघोरो विद्ययान्वितः । नाभ्यो(ड्यो) ष्ठयोर्हस्तिजिह्वाध्यानो नागोग्निदेवता

tālusthānaṁ ca padmaṁ ca aghoro vidyayānvitaḥ nābhyo(ḍyo) ṣṭhayorhastijihvādhyāno nāgognidevatā

तालु-स्थान में कमल, और अघोर-विद्या से युक्त मंडल का ध्यान करे। दोनों होंठों में हस्ति-जिह्वा का ध्यान करे; नाग और अग्नि इसके देवता हैं।

श्लोक 45 (garuda.1.23.45)

रुद्रहेतुस्त्रिरुद्धातास्त्रिगुणा रक्तवर्णकम् । ज्वालाकृते त्रिकोणं च चतुः कोटिशतानि च

rudrahetustriruddhātāstriguṇā raktavarṇakam jvālākṛte trikoṇaṁ ca catuḥ koṭiśatāni ca

रुद्र इसका कारण है, तीन उद्धार-बीज, तीन गुण, रक्त-वर्ण, ज्वाला के आकार वाला त्रिकोण, तथा चार सौ करोड़ योजन,

श्लोक 46 (garuda.1.23.46)

विस्तीर्णं च समुत्सेधं रुद्रतत्त्वं विचिन्तयेत् । ललाटे वै तत्पुरुषः शान्तिर्यः शाद्वलं बुधाः (वृषा)

vistīrṇaṁ ca samutsedhaṁ rudratattvaṁ vicintayet lalāṭe vai tatpuruṣaḥ śāntiryaḥ śādvalaṁ budhāḥ (vṛṣā)

विस्तार और ऊँचाई वाले उस अग्नि-तत्त्व का चिंतन करे। ललाट में तत्पुरुष मंडल है, जो शांति-स्वरूप, हरितवर्ण है — ऐसा विद्वान जानें।

श्लोक 47 (garuda.1.23.47)

कूर्मश्च कृकरो वायुर्देव ईश्वरकारणम् । द्विरुद्धातो गुणौ द्वौ च धूम्रषट्कोणमण्डलम्

kūrmaśca kṛkaro vāyurdeva īśvarakāraṇam dviruddhāto guṇau dvau ca dhūmraṣaṭkoṇamaṇḍalam

कूर्म और कृकर वायु के अवांतर रूप हैं, ईश्वर इसका देवता-कारण है। दो उद्धार-बीज, दो गुण, तथा धूम्र-वर्ण षट्कोण मंडल है।

श्लोक 48 (garuda.1.23.48)

बिंद्वङ्कितं चाष्टकोटिविस्तीर्णं चोच्छ्रयस्तथा । चतुर्दशाधिकं कोटिवायुतत्त्वं विचिन्तयेत्

biṁdvaṅkitaṁ cāṣṭakoṭivistīrṇaṁ cocchrayastathā caturdaśādhikaṁ koṭivāyutattvaṁ vicintayet

बिंदु से अंकित, आठ करोड़ योजन विस्तार वाला, और चौदह करोड़ ऊँचाई वाला — इस वायु-तत्त्व का चिंतन करे।

श्लोक 49 (garuda.1.23.49)

द्वादशति सरसिजे शान्त्यतीतास्तथेश्वराः । कुहूश्च शङखिनी नाड्यो देवदत्तो धनञ्जयः

dvādaśati sarasije śāntyatītāstatheśvarāḥ kuhūśca śaṅakhinī nāḍyo devadatto dhanañjayaḥ

बारह पंखुड़ियों वाले कमल में शांत्यतीत कला और ईश्वर देवता हैं। कुहू और शंखिनी नाड़ियाँ, देवदत्त और धनंजय वायु —

श्लोक 50 (garuda.1.23.50)

शिखेशानकारणं च सदाशिव इति स्मृतः । गुण एकस्तथोद्धातः शुद्धस्फटिकवत्स्मरेत्

śikheśānakāraṇaṁ ca sadāśiva iti smṛtaḥ guṇa ekastathoddhātaḥ śuddhasphaṭikavatsmaret

शिखा में ईशान मंडल है, जिसका कारण सदाशिव कहा गया है। एक गुण, एक उद्धार-बीज — शुद्ध स्फटिक के समान उसका ध्यान करे।

श्लोक 51 (garuda.1.23.51)

षोडशकोटिविस्तीर्णं पञ्चविंशतिकोच्छ्रयम् । वर्त्तुलं चिंतयेव्द्योम भूतशुद्धिरुदाहृता

ṣoḍaśakoṭivistīrṇaṁ pañcaviṁśatikocchrayam varttulaṁ ciṁtayevdyoma bhūtaśuddhirudāhṛtā

सोलह करोड़ विस्तार वाले, पच्चीस करोड़ ऊँचाई वाले, गोल आकाश-मंडल का ध्यान करे — इस प्रकार भूत-शुद्धि कही गई है।

श्लोक 52 (garuda.1.23.52)

गुणयो गुरुर्बीजगुरुः शक्तयनंतौ च धर्म्मकः । ज्ञानवैराग्यमैश्वर्य्यैस्ततः पूर्वादिपत्रके

guṇayo gururbījaguruḥ śaktayanaṁtau ca dharmmakaḥ jñānavairāgyamaiśvaryyaistataḥ pūrvādipatrake

गुरु और बीज-गुरु दोनों गुण हैं, शक्ति और अनंत, तथा धर्म — ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य सहित, पूर्व आदि दलों में स्थापित करे।

श्लोक 53 (garuda.1.23.53)

अधोर्द्ध्ववदने द्वे च पद्मकर्णिककेसरम् । वामाद्या आत्मविद्या च सदा ध्यायेच्छिवाख्यकम्

adhorddhvavadane dve ca padmakarṇikakesaram vāmādyā ātmavidyā ca sadā dhyāyecchivākhyakam

नीचे और ऊपर मुख वाले दो मंडल, कमल की कर्णिका और केसर में, वामा आदि आत्म-विद्या के साथ, सदा शिव-नामक तत्त्व का ध्यान करे।

श्लोक 54 (garuda.1.23.54)

तत्त्वं शिवासने मूर्त्तिर्ही हौं विद्यादेहाय नमः । बद्धपद्मासनासीनः सितः षोडशवार्षिकः

tattvaṁ śivāsane mūrttirhī hauṁ vidyādehāya namaḥ baddhapadmāsanāsīnaḥ sitaḥ ṣoḍaśavārṣikaḥ

शिव के आसन पर वह तत्त्व-मूर्ति है — 'ह्रीं हौं, विद्या-देह को नमस्कार।' पद्मासन में बैठे हुए, श्वेत वर्ण, सोलह वर्ष की आयु के समान शिव का ध्यान करे।

श्लोक 55 (garuda.1.23.55)

पञ्चवक्त्रः कराग्रैः स्वैर्दशभिश्चैव धारयन् । अभयं प्रसादं शक्तिं शूलं खट्वाङ्गमीश्वरः

pañcavaktraḥ karāgraiḥ svairdaśabhiścaiva dhārayan abhayaṁ prasādaṁ śaktiṁ śūlaṁ khaṭvāṅgamīśvaraḥ

पाँच मुख वाले, अपने दस हाथों के अग्रभाग से धारण किए हुए ईश्वर — अभय-मुद्रा, वरद-मुद्रा, शक्ति, शूल, खट्वांग,

श्लोक 56 (garuda.1.23.56)

दक्षैः करैर्वामकैश्च भुजंगं चाक्षसूत्रकम् । डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुत्तमम्

dakṣaiḥ karairvāmakaiśca bhujaṁgaṁ cākṣasūtrakam ḍamarukaṁ nīlotpalaṁ bījapūrakamuttamam

दाहिने और बाएँ हाथों में सर्प, अक्षमाला, डमरू, नीलकमल, तथा उत्तम बीजपूरक फल — इन्हें धारण किए हुए,

श्लोक 57 (garuda.1.23.57)

इच्छाज्ञानक्रियाशक्तिस्त्रिनेत्रो हि सदाशिवः । एवं शिवार्च्चनध्यानी सर्वदा कालवर्जितः

icchājñānakriyāśaktistrinetro hi sadāśivaḥ evaṁ śivārccanadhyānī sarvadā kālavarjitaḥ

इच्छा, ज्ञान और क्रिया-शक्ति से युक्त, त्रिनेत्रधारी सदाशिव — इस प्रकार शिव-पूजा और ध्यान करने वाला सदा काल से रहित हो जाता है।

श्लोक 58 (garuda.1.23.58)

इहाहोरा वचारेण त्रीणि वर्षाणि जीवति । दिनद्वयस्य चारेण जीवेद्वर्षद्वयं नरः

ihāhorā vacāreṇa trīṇi varṣāṇi jīvati dinadvayasya cāreṇa jīvedvarṣadvayaṁ naraḥ

इस लोक में एक दिन-रात की गति से मनुष्य तीन वर्ष जीवित रहता है। दो दिनों की गति से मनुष्य दो वर्ष जीवित रहता है।

श्लोक 59 (garuda.1.23.59)

दिनत्रयस्य चारेण वर्षमेकं स जीवति । नाकाले शीतले मृत्युरुष्णे चैव तु कारके

dinatrayasya cāreṇa varṣamekaṁ sa jīvati nākāle śītale mṛtyuruṣṇe caiva tu kārake

तीन दिनों की गति से वह एक वर्ष जीवित रहता है। समय से पहले मृत्यु नहीं होती — शीतल तथा उष्ण, दोनों दशाओं में यही निर्णायक चिह्न है।

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