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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 24

त्रिपुरादि-पूजा-निरूपण

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (garuda.1.24.1)

।।सूत उवाच । वक्ष्ये गणादिकाः पूजाः सर्वदा स्वर्गदाः पराः । गणासनं गणमूर्त्तिं गणाधिपतिमर्च्चयेत्

sūta uvāca vakṣye gaṇādikāḥ pūjāḥ sarvadā svargadāḥ parāḥ gaṇāsanaṁ gaṇamūrttiṁ gaṇādhipatimarccayet

सूत जी ने कहा — मैं गणपति आदि की पूजा बताऊँगा, जो सदा स्वर्ग देने वाली और श्रेष्ठ है। गण के आसन, गण की मूर्ति, और गणाधिपति गणेश का पूजन करे।

श्लोक 2 (garuda.1.24.2)

गामादिहृदयाद्यंगं दुर्गाया गुरुपादुकाः । दुर्गासनं च तन्मूर्त्तिं ह्रीं दुर्गे रक्षणीति च

gāmādihṛdayādyaṁgaṁ durgāyā gurupādukāḥ durgāsanaṁ ca tanmūrttiṁ hrīṁ durge rakṣaṇīti ca

'गां' आदि से हृदय आदि अंगों का न्यास करे, और गुरु की पादुकाओं का, दुर्गा के आसन और उनकी मूर्ति का पूजन करे — 'ह्रीं दुर्गे! रक्षा कीजिए' मंत्र से।

श्लोक 3 (garuda.1.24.3)

ह्रृदादिकं नव शक्त्यो रुद्रचण्डा प्रचण्डया । चण्डोग्रा चण्डनायिका चण्डा चण्डवती क्रमात्

hrṛdādikaṁ nava śaktyo rudracaṇḍā pracaṇḍayā caṇḍogrā caṇḍanāyikā caṇḍā caṇḍavatī kramāt

हृदय आदि से नौ शक्तियों का न्यास करे — रुद्रचंडा, प्रचंडा, चंडोग्रा, चंडनायिका, चंडा, चंडवती — क्रमशः,

श्लोक 4 (garuda.1.24.4)

चण्रूपा चण्डिकाख्या दुर्गेदुर्गेऽथ रक्षिणि । वज्रखड्गादिका मुद्राः शिवाद्या वह्निदेशतः

caṇrūpā caṇḍikākhyā durgedurge'tha rakṣiṇi vajrakhaḍgādikā mudrāḥ śivādyā vahnideśataḥ

चंडरूपा, चंडिका — 'हे दुर्गे! हे दुर्गे! रक्षा करने वाली!' वज्र, खड्ग आदि मुद्राओं को, तथा शिव आदि देवताओं को आग्नेय दिशा से स्थापित करे।

श्लोक 5 (garuda.1.24.5)

सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनमथापि वा । ऐं क्लीं (ह्रीं) सौस्त्रिपुरायै नमः । ॐ ह्रां ह्रीं क्षें क्षैं स्त्रीं स्कीं रों स्फें स्फीं शां पद्मासनं च मूर्त्तिं च त्रिपुराह्रृदयादिकम्

sadāśivamahāpretapadmāsanamathāpi vā aiṁ klīṁ (hrīṁ) saustripurāyai namaḥ oṁ hrāṁ hrīṁ kṣeṁ kṣaiṁ strīṁ skīṁ roṁ spheṁ sphīṁ śāṁ padmāsanaṁ ca mūrttiṁ ca tripurāhrṛdayādikam

सदाशिव-महाप्रेत के पद्मासन पर भी त्रिपुरा का ध्यान करे। 'ऐं क्लीं सौः, त्रिपुरा को नमस्कार।' 'ॐ ह्रां ह्रीं क्षें क्षैं स्त्रीं स्कीं रों स्फें स्फीं शां' — त्रिपुरा के पद्मासन, मूर्ति, तथा हृदय आदि अंगों का न्यास करे।

श्लोक 6 (garuda.1.24.6)

पीठाम्बुजे तु ब्राहयादीर्ब्रह्माणी च महेश्वरी । कौमारी वैष्णवी पूज्या वाराही चेन्द्रदेवता

pīṭhāmbuje tu brāhayādīrbrahmāṇī ca maheśvarī kaumārī vaiṣṇavī pūjyā vārāhī cendradevatā

आसन-कमल में ब्राह्मी आदि — ब्रह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी — पूज्य हैं; वाराही और इंद्र-शक्ति भी।

श्लोक 7 (garuda.1.24.7)

चामुण्डा चण्डिका पूज्या भैरवाख्यांस्ततो यजेत् । असितांगोरुरुश्चण्डः क्रोध उन्मत्तभैरवः

cāmuṇḍā caṇḍikā pūjyā bhairavākhyāṁstato yajet asitāṁgoruruścaṇḍaḥ krodha unmattabhairavaḥ

चामुंडा और चंडिका पूज्य हैं; तत्पश्चात् भैरव नामक देवताओं का यजन करे — असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, उन्मत्त-भैरव,

श्लोक 8 (garuda.1.24.8)

कपाली भीषणश्चैव संहारश्चाष्ट भैरवाः । रतिः प्रीतिः कामदेवः पञ्च बाणाश्च योगिनी

kapālī bhīṣaṇaścaiva saṁhāraścāṣṭa bhairavāḥ ratiḥ prītiḥ kāmadevaḥ pañca bāṇāśca yoginī

कपाली, भीषण, तथा संहार — ये आठ भैरव हैं। रति, प्रीति, कामदेव, पाँच बाण, तथा योगिनी का भी पूजन करे।

श्लोक 9 (garuda.1.24.9)

वटुकं दुर्गया विघ्नराजो गुरुश्च क्षेत्रपः । पद्मगर्भे मण्डले च त्रिकोणे चिन्तयेद्धृदि

vaṭukaṁ durgayā vighnarājo guruśca kṣetrapaḥ padmagarbhe maṇḍale ca trikoṇe cintayeddhṛdi

वटुक-भैरव को दुर्गा के साथ, विघ्नराज गणेश, गुरु और क्षेत्रपाल को पूजन करे। कमल-गर्भ में, मंडल में और त्रिकोण में हृदय-स्थान का चिंतन करे।

श्लोक 10 (garuda.1.24.10)

शुक्लां वरदाक्षसूत्रपुस्ताभयसमन्विताम् । लक्षजप्याच्च होमाच्च त्रिपुरा सिद्धिदा भवेत्

śuklāṁ varadākṣasūtrapustābhayasamanvitām lakṣajapyācca homācca tripurā siddhidā bhavet

श्वेत वर्ण, वरद-मुद्रा, अक्षमाला, पुस्तक और अभय-मुद्रा से युक्त त्रिपुरा का ध्यान करे। एक लाख जप और होम से त्रिपुरा सिद्धि देने वाली होती हैं।

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