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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 233

मार्कण्डेय-कृत मृत्युअष्टक-स्तोत्र

अध्याय 232अध्याय-सूचीअध्याय 234

श्लोक 1 (garuda.1.233.1)

सूत उवाच । स्तोत्रं तत्सं प्रवक्ष्यामि मार्कण्डेयन भाषितम् । दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति

sūta uvāca stotraṁ tatsaṁ pravakṣyāmi mārkaṇḍeyana bhāṣitam dāmodaraṁ prapanno'smi kinno mṛtyuḥ kariṣyati

सूत ने कहा — अब मैं मार्कण्डेय द्वारा कहा गया वह स्तोत्र कहूँगा — 'मैं दामोदर की शरण में हूँ, मुझे मृत्यु क्या करेगी?'

श्लोक 2 (garuda.1.233.2)

शङ्खचक्रधरं देवं व्यक्तरूपिणमव्ययम् । अधोऽक्षजं प्रपन्नोस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति

śaṅkhacakradharaṁ devaṁ vyaktarūpiṇamavyayam adho'kṣajaṁ prapannosmi kinno mṛtyuḥ kariṣyati

'शंख-चक्र धारण करने वाले, व्यक्त-स्वरूप, अव्यय, अधोक्षज देव की शरण में मैं हूँ — मुझे मृत्यु क्या करेगी?'

श्लोक 3 (garuda.1.233.3)

वराहं वामनं विष्णुं नारसिंहं जनार्दनम् । माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति

varāhaṁ vāmanaṁ viṣṇuṁ nārasiṁhaṁ janārdanam mādhavaṁ ca prapanno'smi kinno mṛtyuḥ kariṣyati

'वराह, वामन, विष्णु, नृसिंह, जनार्दन और माधव की शरण में मैं हूँ — मुझे मृत्यु क्या करेगी?'

श्लोक 4 (garuda.1.233.4)

पुरुषं पुष्करक्षेत्रबीजं पुण्यं जगत्पतिम् । लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति

puruṣaṁ puṣkarakṣetrabījaṁ puṇyaṁ jagatpatim lokanāthaṁ prapanno'smi kinno mṛtyuḥ kariṣyati

'पुरुष, पुष्कर-क्षेत्र के बीज, पुण्यमय जगत्पति, लोकनाथ की शरण में मैं हूँ — मुझे मृत्यु क्या करेगी?'

श्लोक 5 (garuda.1.233.5)

सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् । महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति

sahasraśirasaṁ devaṁ vyaktāvyaktaṁ sanātanam mahāyogaṁ prapanno'smi kinno mṛtyuḥ kariṣyati

'सहस्र-शीर्ष देव, व्यक्त-अव्यक्त, सनातन, महायोग की शरण में मैं हूँ — मुझे मृत्यु क्या करेगी?'

श्लोक 6 (garuda.1.233.6)

भूतात्मानं महात्मानं यज्ञयोनिमयोनिजम् । विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मूत्युः करिष्यति

bhūtātmānaṁ mahātmānaṁ yajñayonimayonijam viśvarūpaṁ prapanno'smi kinno mūtyuḥ kariṣyati

'भूतात्मा, महात्मा, यज्ञ के मूल, बिना योनि से जन्मे, विश्वरूप की शरण में मैं हूँ — मुझे मृत्यु क्या करेगी?'

श्लोक 7 (garuda.1.233.7)

इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनुः । अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैः प्रपीडितः

ityudīritamākarṇya stotraṁ tasya mahātmanuḥ apayātastato mṛtyurviṣṇudūtaiḥ prapīḍitaḥ

इस प्रकार उस महात्मा द्वारा कहा गया स्तोत्र सुनकर, विष्णु के दूतों से पीड़ित होकर मृत्यु वहाँ से भाग गई।

श्लोक 8 (garuda.1.233.8)

इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता । प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्तिदुर्लभम्

iti tena jito mṛtyurmārkaṇḍeyena dhīmatā prasanne puṇḍarīkākṣe nṛsiṁhe nāstidurlabham

इस प्रकार बुद्धिमान मार्कण्डेय ने मृत्यु को जीत लिया; पुण्डरीकाक्ष नृसिंह के प्रसन्न होने पर कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।

श्लोक 9 (garuda.1.233.9)

मृत्य्वष्टकमिदं पुण्यं मृत्युप्रशमनं शुभम् । मार्कण्डेयहितार्थाय स्वयं विष्णुरुवाच ह

mṛtyvaṣṭakamidaṁ puṇyaṁ mṛtyupraśamanaṁ śubham mārkaṇḍeyahitārthāya svayaṁ viṣṇuruvāca ha

मृत्यु को शांत करने वाला यह पुण्यमय, शुभ मृत्युअष्टक स्तोत्र स्वयं विष्णु ने मार्कण्डेय के हित के लिए कहा था।

श्लोक 10 (garuda.1.233.10)

इदं यः पठते भक्त्या त्रिकालं नियतं शुचिः । नाकाले तस्य मृत्युः स्यान्नरस्याच्युतचेतसः

idaṁ yaḥ paṭhate bhaktyā trikālaṁ niyataṁ śuciḥ nākāle tasya mṛtyuḥ syānnarasyācyutacetasaḥ

जो पवित्र और संयमित होकर इसे भक्तिपूर्वक तीनों काल पढ़ता है, अच्युत-चित्त उस मनुष्य की मृत्यु कभी असमय नहीं होती।

श्लोक 11 (garuda.1.233.11)

हृत्पद्ममध्ये पुरुषं पुराणं नारायणं शाश्वतमप्रमेयम् । विचिन्त्य सूर्यादतिराजमानं मृत्युं स योगि जितवांस्तथैव

hṛtpadmamadhye puruṣaṁ purāṇaṁ nārāyaṇaṁ śāśvatamaprameyam vicintya sūryādatirājamānaṁ mṛtyuṁ sa yogi jitavāṁstathaiva

हृदय-कमल के मध्य में स्थित, सूर्य से भी अधिक देदीप्यमान, शाश्वत, अप्रमेय, पुरातन पुरुष नारायण का चिंतन कर, वह योगी उसी प्रकार मृत्यु पर विजय पा गया।

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