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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 232

कुलामृत-स्तोत्र

अध्याय 231अध्याय-सूचीअध्याय 233

श्लोक 1 (garuda.1.232.1)

सूत उवाच । कुलामृतं प्रवक्ष्यामि स्तोत्रं यत्तु हरोऽब्रवीत् । पृष्टः श्रीनारदेनैव नारदाय तथा शृणु

sūta uvāca kulāmṛtaṁ pravakṣyāmi stotraṁ yattu haro'bravīt pṛṣṭaḥ śrīnāradenaiva nāradāya tathā śṛṇu

सूत ने कहा — अब मैं कुलामृत नामक स्तोत्र कहूँगा, जो शिव ने नारद के पूछने पर कहा था; उसी को सुनो, जैसा नारद से कहा गया।

श्लोक 2 (garuda.1.232.2)

नारद उवाच । यः संकारे सदा द्वन्द्वैः कामक्रोधैः शुभाशुभैः । शब्दादिविषयैर्बद्धः पीड्यमानः स दुर्मतिः

nārada uvāca yaḥ saṁkāre sadā dvandvaiḥ kāmakrodhaiḥ śubhāśubhaiḥ śabdādiviṣayairbaddhaḥ pīḍyamānaḥ sa durmatiḥ

नारद ने कहा — जो इस सृष्टि में सदा द्वन्द्वों — काम-क्रोध, शुभ-अशुभ, शब्दादि विषयों — से बंधा हुआ पीड़ित रहता है, वह दुर्बुद्धि है।

श्लोक 3 (garuda.1.232.3)

क्षणं विमुच्यते जन्तुर्मृत्युसंसारसागरात् । भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तो हि त्रिपुरान्तक

kṣaṇaṁ vimucyate janturmṛtyusaṁsārasāgarāt bhagavañchrotumicchāmi tvatto hi tripurāntaka

वह प्राणी क्षणभर के लिए भी मृत्यु-रूपी संसार-सागर से कैसे मुक्त होता है — हे भगवन्, हे त्रिपुरांतक! मैं यह आपसे सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (garuda.1.232.4)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य त्रिलोचनः । उवाच तमृषिं शम्भुः प्रसन्नवदनो हरः

tasya tadvacanaṁ śrutvā nāradasya trilocanaḥ uvāca tamṛṣiṁ śambhuḥ prasannavadano haraḥ

नारद के इस वचन को सुनकर त्रिनेत्रधारी शंभु — प्रसन्न मुख वाले हर — ने उस ऋषि से कहा —

श्लोक 5 (garuda.1.232.5)

महेश्वर उवाच । ज्ञानामृतं परं गुह्यं रहस्यमृषिसत्तम । वक्ष्यामि शृणु दुः खघ्नं भवबन्धभयामहम्

maheśvara uvāca jñānāmṛtaṁ paraṁ guhyaṁ rahasyamṛṣisattama vakṣyāmi śṛṇu duḥ khaghnaṁ bhavabandhabhayāmaham

महेश्वर ने कहा — हे ऋषिश्रेष्ठ! मैं परम गुह्य, दुःखनाशक और भव-बंधन के भय को दूर करने वाला ज्ञानामृत-रहस्य कहूँगा, सुनो।

श्लोक 6 (garuda.1.232.6)

तृणादि चतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् । चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं यस्य मायया

tṛṇādi caturāsyāntaṁ bhūtagrāmaṁ caturvidham carācaraṁ jagatsarvaṁ prasuptaṁ yasya māyayā

घास से लेकर चतुर्मुख ब्रह्मा तक, चारों प्रकार के प्राणी-समूह, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिसकी माया से सुप्त पड़ा है —

श्लोक 7 (garuda.1.232.7)

तस्य विष्णो प्रिसादेन यदि कश्चित्प्रबुध्यते । स निस्तरति संसारं देवानामपि दुस्तरम्

tasya viṣṇo prisādena yadi kaścitprabudhyate sa nistarati saṁsāraṁ devānāmapi dustaram

— उसी विष्णु की कृपा से यदि कोई जाग जाए, तो वह देवताओं के लिए भी दुस्तर संसार को पार कर जाता है।

श्लोक 8 (garuda.1.232.8)

भोगैश्वर्यमदोन्मत्तस्ततत्त्वज्ञानपराङ्मुखः । पुत्रदारकुटुम्बेषु मत्ताः सीदन्तिजन्तवः

bhogaiśvaryamadonmattastatattvajñānaparāṅmukhaḥ putradārakuṭumbeṣu mattāḥ sīdantijantavaḥ

भोग-ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त, तत्त्व-ज्ञान से विमुख, पुत्र-पत्नी-कुटुंब में आसक्त प्राणी पीड़ित होते रहते हैं।

श्लोक 9 (garuda.1.232.9)

सर्व एकार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव । यस्त्वाननं निबध्नाति दुर्मतिः कोशकारवत्

sarva ekārṇave magnā jīrṇā vanagajā iva yastvānanaṁ nibadhnāti durmatiḥ kośakāravat

सभी एक ही महासागर में डूबे हुए हैं, जीर्ण वन-गजों के समान; दुर्बुद्धि मनुष्य रेशम के कीड़े की भाँति अपने ही मुख को बाँध लेता है।

श्लोक 10 (garuda.1.232.10)

तस्य मुक्तिं न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि । तस्मान्नारद सर्वेषां देवानां देवमव्ययम् । आराधयेत्सदा सम्यगध्यायेद्विष्णुं मुदान्वितः

tasya muktiṁ na paśyāmi janmakoṭiśatairapi tasmānnārada sarveṣāṁ devānāṁ devamavyayam ārādhayetsadā samyagadhyāyedviṣṇuṁ mudānvitaḥ

उसकी मुक्ति सैकड़ों करोड़ जन्मों में भी मुझे दिखाई नहीं देती। इसलिए, हे नारद! सभी देवताओं के अव्यय देव विष्णु की सदा भलीभाँति आराधना करनी चाहिए, और प्रसन्नतापूर्वक उनका ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 11 (garuda.1.232.11)

यस्तु विश्वमनाद्यन्तमजमात्मनि संस्थितम् । सर्वज्ञमचलं विष्णुं सदा ध्यायेत्समुच्यते

yastu viśvamanādyantamajamātmani saṁsthitam sarvajñamacalaṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyetsamucyate

जो सम्पूर्ण विश्व जिनमें स्थित है — आदि-अंत रहित, अजन्मा, सर्वज्ञ, अचल विष्णु — का सदा ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 12 (garuda.1.232.12)

देवं गर्भोचितं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते । अशिरीरं विधातारं सर्वज्ञानमनोरतिम् । अचलं सर्वगं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते

devaṁ garbhocitaṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate aśirīraṁ vidhātāraṁ sarvajñānamanoratim acalaṁ sarvagaṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate

गर्भ के योग्य देव विष्णु का सदा ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है; शरीर-रहित, विधाता, सर्वज्ञान के आनंद-स्वरूप, अचल और सर्वव्यापी विष्णु का सदा ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है।

श्लोक 13 (garuda.1.232.13)

निर्विकल्पं निराभासं निष्प्रपञ्चं निरामयम् । वासुदेवं गुरुं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते

nirvikalpaṁ nirābhāsaṁ niṣprapañcaṁ nirāmayam vāsudevaṁ guruṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate

निर्विकल्प, निराभास, निष्प्रपंच, निरामय, गुरु-स्वरूप वासुदेव विष्णु का सदा ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है।

श्लोक 14 (garuda.1.232.14)

सर्वात्मकञ्च वै यावदात्मचैतन्यरूपकम् । शुभमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते

sarvātmakañca vai yāvadātmacaitanyarūpakam śubhamekākṣaraṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate

सर्वात्मक, आत्म-चैतन्य-स्वरूप, शुभ, एकाक्षर विष्णु का सदा ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है।

श्लोक 15 (garuda.1.232.15)

वाक्यातीतं त्रिकालज्ञं विश्वेशं लोकसाक्षिणम् । सर्वस्मादुत्तमं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते

vākyātītaṁ trikālajñaṁ viśveśaṁ lokasākṣiṇam sarvasmāduttamaṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate

वाणी से परे, त्रिकालज्ञ, विश्वेश्वर, लोक-साक्षी, सबसे उत्तम विष्णु का सदा ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है।

श्लोक 16 (garuda.1.232.16)

ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः । योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते

brahmādidevagandharvairmunibhiḥ siddhacāraṇaiḥ yogibhiḥ sevitaṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate

ब्रह्मा आदि देवताओं, गन्धर्वों, मुनियों, सिद्धों, चारणों और योगियों द्वारा सेवित विष्णु का सदा ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है।

श्लोक 17 (garuda.1.232.17)

संसारबन्धनामुक्तिमिच्छंल्लोको ह्यशेषतः । स्तुत्वैवं वरदं विष्णुं सदा ध्यायन्विमुच्यते

saṁsārabandhanāmuktimicchaṁlloko hyaśeṣataḥ stutvaivaṁ varadaṁ viṣṇuṁ sadā dhyāyanvimucyate

संसार-बंधन से पूर्ण मुक्ति चाहने वाला सम्पूर्ण जगत् इस वरदायक विष्णु की स्तुति कर, सदा उनका ध्यान करते हुए मुक्त हो जाता है।

श्लोक 18 (garuda.1.232.18)

संसारबन्धनात्कोऽपि मुक्तिमिच्छन्समाहितः । अनन्तमव्ययं देवं विष्णं विश्वप्रतिष्ठितम् । विश्वेश्वरमजं विष्णुं संदा ध्यायन्विमुच्यते

saṁsārabandhanātko'pi muktimicchansamāhitaḥ anantamavyayaṁ devaṁ viṣṇaṁ viśvapratiṣṭhitam viśveśvaramajaṁ viṣṇuṁ saṁdā dhyāyanvimucyate

संसार-बंधन से मुक्ति चाहने वाला जो भी एकाग्रचित्त होकर अनंत, अव्यय, विश्व में प्रतिष्ठित, विश्वेश्वर, अजन्मा विष्णु का सदा ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 19 (garuda.1.232.19)

सूत उवाच । नारदेन पुरा पृष्ट एवं स वृषभध्वजः । येत्तेन तस्मै व्याख्यातं तन्मया कथितं तव

sūta uvāca nāradena purā pṛṣṭa evaṁ sa vṛṣabhadhvajaḥ yettena tasmai vyākhyātaṁ tanmayā kathitaṁ tava

सूत ने कहा — पूर्वकाल में नारद द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उन वृषभध्वज (शिव) ने जो उन्हें बताया, वही मैंने तुम्हें कहा है।

श्लोक 20 (garuda.1.232.20)

तमेव सततन्ध्यायन्निर्व्ययं ब्रह्म निष्कलम् । अवाप्स्यसि ध्रुवं तात ! शाश्वतं पदमव्ययम्

tameva satatandhyāyannirvyayaṁ brahma niṣkalam avāpsyasi dhruvaṁ tāta ! śāśvataṁ padamavyayam

उसी अव्यय, निष्कल ब्रह्म का निरंतर ध्यान करते हुए, हे तात्! तुम निश्चय ही उस शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त करोगे।

श्लोक 21 (garuda.1.232.21)

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । क्षणमेकाग्रचित्तस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्

aśvamedhasahasrāṇi vājapeyaśatāni ca kṣaṇamekāgracittasya kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm

हज़ारों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ भी एकाग्रचित्त होकर एक क्षण [विष्णु का ध्यान करने] की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 22 (garuda.1.232.22)

श्रुत्वा सुरऋषिर्विष्णोः प्राधान्यमिदमीश्वरात् । स विष्णुं सम्यगाराध्य सिद्धः पदमवाप्तवान्

śrutvā suraṛṣirviṣṇoḥ prādhānyamidamīśvarāt sa viṣṇuṁ samyagārādhya siddhaḥ padamavāptavān

ईश्वर से विष्णु की यह प्रधानता सुनकर, देवर्षि नारद ने विष्णु की भलीभाँति आराधना कर सिद्धि-पद प्राप्त किया।

श्लोक 23 (garuda.1.232.23)

यः पठेच्छृणुयाद्वा पि नित्यमेव स्तवोत्तमम् । कोटिजन्मकृतं पापमपि तस्य प्रणश्यति

yaḥ paṭhecchṛṇuyādvā pi nityameva stavottamam koṭijanmakṛtaṁ pāpamapi tasya praṇaśyati

जो इस उत्तम स्तोत्र को नित्य पढ़ता या सुनता है, उसके करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 24 (garuda.1.232.24)

विष्णोः स्तवमिदं दिव्यं महादेवेन कीर्तितम् । प्रयत्नाद्यः पठेन्नित्य ममृतत्वं स गच्छति

viṣṇoḥ stavamidaṁ divyaṁ mahādevena kīrtitam prayatnādyaḥ paṭhennitya mamṛtatvaṁ sa gacchati

महादेव द्वारा कीर्तित विष्णु का यह दिव्य स्तोत्र जो भी प्रयत्नपूर्वक नित्य पढ़ता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

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