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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 231

नृसिंह-स्तोत्र

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श्लोक 1 (garuda.1.231.1)

सूत उवाच । नारसिंहस्तुतिं वक्ष्ये शिवोक्तं शौनकाधुना । पूर्वं मातृगणाः सर्वे शङ्करं वाक्यमब्रुवन्

sūta uvāca nārasiṁhastutiṁ vakṣye śivoktaṁ śaunakādhunā pūrvaṁ mātṛgaṇāḥ sarve śaṅkaraṁ vākyamabruvan

सूत ने कहा — अब मैं शिव द्वारा कहा गया नृसिंह-स्तोत्र वर्णन करूँगा, हे शौनक। पूर्वकाल में सभी मातृगणों ने शंकर से यह वचन कहा —

श्लोक 2 (garuda.1.231.2)

भगवन् भक्षयिष्यामः सदेवासुरमानुषम् । त्वत्प्रसादाज्जगत्सर्वं तदनुज्ञातुमर्हसि

bhagavan bhakṣayiṣyāmaḥ sadevāsuramānuṣam tvatprasādājjagatsarvaṁ tadanujñātumarhasi

'हे भगवन्! हम देव-असुर-मनुष्य सहित सम्पूर्ण जगत् का भक्षण करेंगी, आपकी कृपा से; इसके लिए आप हमें अनुमति दें।'

श्लोक 3 (garuda.1.231.3)

शङ्करौवाच । भवतीभिः प्रजाः सर्वा रक्षणीया न संशयः । तस्माड्वोरतरप्रायं मनः शीघ्रं निवर्त्यताम्

śaṅkarauvāca bhavatībhiḥ prajāḥ sarvā rakṣaṇīyā na saṁśayaḥ tasmāḍvorataraprāyaṁ manaḥ śīghraṁ nivartyatām

शंकर ने कहा — 'तुम्हारे द्वारा सभी प्रजाओं की रक्षा की जानी चाहिए, इसमें संशय नहीं; इसलिए इस अत्यधिक कार्य की ओर झुके अपने मन को शीघ्र मोड़ लो।'

श्लोक 4 (garuda.1.231.4)

इत्येवं शङ्करेणोक्तमनादृत्य तु तद्वचः । भक्षयामासुरव्यग्रास्त्रैलोक्यं सचराचरम्

ityevaṁ śaṅkareṇoktamanādṛtya tu tadvacaḥ bhakṣayāmāsuravyagrāstrailokyaṁ sacarācaram

शंकर द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी उनके वचन की अवहेलना कर, वे विचलित हुए बिना चराचर सहित तीनों लोकों का भक्षण करने लगीं।

श्लोक 5 (garuda.1.231.5)

त्रैलोक्ये भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै । नृसिंहरूपिणं देवं प्रदध्यौ भगवाञ्छिवः

trailokye bhakṣyamāṇe tu tadā mātṛgaṇena vai nṛsiṁharūpiṇaṁ devaṁ pradadhyau bhagavāñchivaḥ

तीनों लोकों के इस प्रकार भक्षित होने पर तब भगवान शिव ने नृसिंह-रूपधारी देव का ध्यान किया —

श्लोक 6 (garuda.1.231.6)

अनादिनिधनं देवं सर्वभूतभवोद्भवम् । विद्युज्जिह्वं महादंष्ट्रं स्फुरत्केसरमालिनम्

anādinidhanaṁ devaṁ sarvabhūtabhavodbhavam vidyujjihvaṁ mahādaṁṣṭraṁ sphuratkesaramālinam

— आदि-अंत रहित देव को, जो सब प्राणियों की उत्पत्ति के स्रोत हैं, बिजली जैसी जिह्वा और विशाल दाढ़ों वाले, कंपती हुई अयाल की माला धारण किए हुए,

श्लोक 7 (garuda.1.231.7)

रत्नाङ्गदं समुकुटं हेमकेसरभूषितम् । खोणिसूत्रेण महता काञ्चनेन विराजितम्

ratnāṅgadaṁ samukuṭaṁ hemakesarabhūṣitam khoṇisūtreṇa mahatā kāñcanena virājitam

— रत्न-भूषित बाजूबंद और मुकुट धारण किए, स्वर्ण-अयाल से सुशोभित, विशाल स्वर्णमय करधनी से देदीप्यमान,

श्लोक 8 (garuda.1.231.8)

नीलोत्पलदलश्यामं रत्ननूपुरभूषितम् । तेजसाक्रान्तसकलब्रह्माण्डोदरमण्डपम्

nīlotpaladalaśyāmaṁ ratnanūpurabhūṣitam tejasākrāntasakalabrahmāṇḍodaramaṇḍapam

— नील कमल की पंखुड़ी के समान श्याम, रत्न-नूपुर से सुशोभित, जिनके तेज से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भीतरी मण्डप व्याप्त है,

श्लोक 9 (garuda.1.231.9)

आवर्तसदृशाकारैः संयुक्तं देहरोमभिः । सर्वपुष्पैर्योजिताञ्च धारयंश्च महास्त्रजम्

āvartasadṛśākāraiḥ saṁyuktaṁ deharomabhiḥ sarvapuṣpairyojitāñca dhārayaṁśca mahāstrajam

— भँवर के समान आकार वाले शरीर के रोमों से युक्त, सभी फूलों से बनी विशाल माला धारण किए हुए।

श्लोक 10 (garuda.1.231.10)

स ध्यातमात्रो भगवान्प्रददौ तस्य दर्शनम् । यादृशेन रूपेण ध्यातो रुद्रैस्तु भक्तितः

sa dhyātamātro bhagavānpradadau tasya darśanam yādṛśena rūpeṇa dhyāto rudraistu bhaktitaḥ

ध्यान करते ही उन भगवान ने उन्हें दर्शन दिए, जिस रूप में रुद्रों द्वारा भक्तिपूर्वक उनका ध्यान किया गया था,

श्लोक 11 (garuda.1.231.11)

तादृशेनैव रूपेण दुर्निरीक्ष्येण दैवतैः । प्रणिपत्य तु देवेशं तदा तुष्टाव शङ्करः

tādṛśenaiva rūpeṇa durnirīkṣyeṇa daivataiḥ praṇipatya tu deveśaṁ tadā tuṣṭāva śaṅkaraḥ

— उसी रूप में, जिसे देवताओं के लिए भी देखना कठिन था। तब देवेश को प्रणाम कर शंकर ने उनकी स्तुति की —

श्लोक 12 (garuda.1.231.12)

शङ्कर उवाच । नमस्तेऽस्त जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर । दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित

śaṅkara uvāca namaste'sta jagannātha narasiṁhavapurdhara daityeśvarendrasaṁhārinakhaśuktivirājita

शंकर ने कहा — 'हे जगन्नाथ! नृसिंह-शरीर धारण करने वाले, दैत्यराज हिरण्यकशिपु का संहार करने वाले शंख-सदृश नखों से सुशोभित — आपको नमस्कार!

श्लोक 13 (garuda.1.231.13)

नखमण्डलसभिन्नहेमपिङ्गलविग्रह । नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो । कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ

nakhamaṇḍalasabhinnahemapiṅgalavigraha namo'stu padmanābhāya śobhanāya jagadguro kalpāntāmbhodanirghoṣa sūryakoṭisamaprabha

— नखों के मण्डल से विदीर्ण, स्वर्ण-पिंगल शरीर वाले! कमल-नाभि, सुंदर जगद्गुरु को नमस्कार हो! कल्पान्त के मेघ-गर्जन के समान गर्जने वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी —

श्लोक 14 (garuda.1.231.14)

सहस्रयमसंत्रास सहस्रेन्द्रपराक्रम । हसस्त्रधनदस्फीत सहस्रचरणात्मक

sahasrayamasaṁtrāsa sahasrendraparākrama hasastradhanadasphīta sahasracaraṇātmaka

— सहस्र यमों को भी भयभीत करने वाले, सहस्र इन्द्रों के पराक्रम वाले, सहस्र कुबेरों के धन-सम फैले हुए, सहस्र चरणों वाले,

श्लोक 15 (garuda.1.231.15)

सहस्रचन्दप्रतिम ! सहस्रांशुहरिक्रम । सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत

sahasracandapratima ! sahasrāṁśuharikrama sahasrarudratejaska sahasrabrahmasaṁstuta

— सहस्र भयंकरों के समान, सहस्र किरणों वाले सूर्य के समान गति वाले, सहस्र रुद्रों के तेज वाले, सहस्र ब्रह्माओं द्वारा स्तुत,

श्लोक 16 (garuda.1.231.16)

सहस्ररुद्रसंजप्त सहस्राक्षनिरीक्षण । सहस्रजन्ममथन सहस्रबन्धनमोचन

sahasrarudrasaṁjapta sahasrākṣanirīkṣaṇa sahasrajanmamathana sahasrabandhanamocana

— सहस्र रुद्रों द्वारा जपे गए, सहस्र नेत्रों से देखे गए, सहस्र जन्मों का मंथन करने वाले, सहस्र बंधनों से मुक्त करने वाले,

श्लोक 17 (garuda.1.231.17)

सहस्रवायुवेगाक्ष सहस्राज्ञकृपाकर । स्तुत्वैवं देवदेवेशं नृसिंहवपुषं हरिम् । विज्ञापयामास पुनर्विनयावनतः शिवः

sahasravāyuvegākṣa sahasrājñakṛpākara stutvaivaṁ devadeveśaṁ nṛsiṁhavapuṣaṁ harim vijñāpayāmāsa punarvinayāvanataḥ śivaḥ

— सहस्र वायुओं के वेग-सम नेत्रों वाले, सहस्र अज्ञानियों पर कृपा करने वाले' — इस प्रकार देवाधिदेव नृसिंह-रूपधारी हरि की स्तुति कर, विनयपूर्वक झुके शिव ने पुनः निवेदन किया —

श्लोक 18 (garuda.1.231.18)

अन्धकस्य विनाशाय या सृष्टा मातरो मया । अनादृत्य तु मद्वाक्यं भक्ष्यन्त्वद्भुताः प्रजाः

andhakasya vināśāya yā sṛṣṭā mātaro mayā anādṛtya tu madvākyaṁ bhakṣyantvadbhutāḥ prajāḥ

'अंधक-दैत्य के विनाश के लिए मैंने जो मातृगण उत्पन्न किए थे, वे मेरे ही वचन की अवहेलना कर इन अद्भुत प्रजाओं को खा रही हैं।

श्लोक 19 (garuda.1.231.19)

सृष्ट्वा ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजितः । पूर्वं कृत्वा कथं तासां विनाशमभिरोचये

sṛṣṭvā tāśca na śakto'haṁ saṁhartumaparājitaḥ pūrvaṁ kṛtvā kathaṁ tāsāṁ vināśamabhirocaye

उन्हें उत्पन्न कर मैं, अपराजित होते हुए भी, उनका संहार करने में असमर्थ हूँ; पहले उत्पन्न कर अब उनके विनाश की इच्छा मैं कैसे करूँ?'

श्लोक 20 (garuda.1.231.20)

एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिहवपुर्हरिः । सहस्रहेवीर्जिह्वाग्रात्तदा वागीश्वरो हरिः

evamuktaḥ sa rudreṇa narasihavapurhariḥ sahasrahevīrjihvāgrāttadā vāgīśvaro hariḥ

रुद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर नृसिंह-रूपधारी हरि, वाणी के स्वामी, अपनी सहस्र जिह्वाओं के अग्रभाग से —

श्लोक 21 (garuda.1.231.21)

तथा सुरगणान्सर्वान्रौद्रान्मातृगणान्विभुः । संहृत्य जगतः शर्म कृत्वा चान्तर्दधे हरिः

tathā suragaṇānsarvānraudrānmātṛgaṇānvibhuḥ saṁhṛtya jagataḥ śarma kṛtvā cāntardadhe hariḥ

— सम्पूर्ण देवगणों और उग्र मातृगणों को समेटकर, जगत् को शांति प्रदान कर, व्यापक हरि अंतर्धान हो गए।

श्लोक 22 (garuda.1.231.22)

नारसिंहमिदं स्तोत्रं यः पठेन्नियतेन्द्रियः । मनोरथप्रदस्तस्य रुद्रस्येव न संशयः

nārasiṁhamidaṁ stotraṁ yaḥ paṭhenniyatendriyaḥ manorathapradastasya rudrasyeva na saṁśayaḥ

इस नृसिंह-स्तोत्र को जो संयमित इन्द्रियों वाला मनुष्य पढ़ता है, उसकी मनोकामनाएँ उसी प्रकार पूर्ण होती हैं जैसे रुद्र की हुई थीं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 23 (garuda.1.231.23)

ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं सिदाम्बुजातं ज्वलिताग्निवत्क्रम् । अनादिमध्यान्तमज पुराणं परापरेशं जगतां निधानम्

dhyāyennṛsiṁhaṁ taruṇārkanetraṁ sidāmbujātaṁ jvalitāgnivatkram anādimadhyāntamaja purāṇaṁ parāpareśaṁ jagatāṁ nidhānam

नृसिंह का ध्यान करना चाहिए — जिनके नेत्र उगते सूर्य के समान हैं, जो सिद्धि-कमल पर विराजमान हैं, जिनकी गति प्रज्वलित अग्नि के समान है; जो आदि-मध्य-अंत रहित, अजन्मा, पुरातन, उच्च-निम्न सबके ईश्वर और जगतों के निधान हैं।

श्लोक 24 (garuda.1.231.24)

जपेदिदं सन्ततदुः खजालं जहाति नीहारमिवांशुमाली । समातृवर्गस्य करोति मूर्तिं यदा तदा तिष्ठति तत्समीपे

japedidaṁ santataduḥ khajālaṁ jahāti nīhāramivāṁśumālī samātṛvargasya karoti mūrtiṁ yadā tadā tiṣṭhati tatsamīpe

इसका जप करने वाला निरंतर दुःख-जाल को उसी प्रकार त्याग देता है जैसे सूर्य कोहरे को दूर करता है; जब कोई मातृगण-सहित उनकी मूर्ति बनाता है, तब वे उसके समीप ही निवास करते हैं।

श्लोक 25 (garuda.1.231.25)

देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः पूजां विधातुं त्रिपुरान्तकारी । प्रसाद्य तं देववरं स लब्ध्वा अव्याज्जगन्मातृगणेभ्य एव च

deveśvarasyāpi nṛsiṁhamūrteḥ pūjāṁ vidhātuṁ tripurāntakārī prasādya taṁ devavaraṁ sa labdhvā avyājjaganmātṛgaṇebhya eva ca

देवेश्वर की इस नृसिंह-मूर्ति की पूजा-विधि स्थापित करने के लिए त्रिपुरांतक शिव ने उन श्रेष्ठ देव को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त किया, और इससे जगत् को मातृगणों से रक्षा प्रदान की।

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