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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 230

विष्णु-स्मरण का माहात्म्य

अध्याय 229अध्याय-सूचीअध्याय 231

श्लोक 1 (garuda.1.230.1)

सूत उवाच । आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा

sūta uvāca ālokya sarvaśāstrāṇi vicārya ca punaḥ punaḥ idamekaṁ suniṣpannaṁ dhyeyo nārāyaṇaḥ sadā

सूत ने कहा — सभी शास्त्रों को देखकर और बार-बार विचार करके यही एक निष्कर्ष निकला है — नारायण का ही सदा ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.1.230.2)

किं तस्य दानैः किन्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः । यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः

kiṁ tasya dānaiḥ kintīrthaiḥ kiṁ tapobhiḥ kimadhvaraiḥ yo nityaṁ dhyāyate devaṁ nārāyaṇamananyadhīḥ

जो अनन्य बुद्धि से नित्य नारायण देव का ध्यान करता है, उसे दान से क्या, तीर्थों से क्या, तप से क्या, यज्ञों से क्या प्रयोजन?

श्लोक 3 (garuda.1.230.3)

षष्टिस्तीर्थसहस्राणि षष्टिस्तीर्थशतानि च । नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्

ṣaṣṭistīrthasahasrāṇi ṣaṣṭistīrthaśatāni ca nārāyaṇapraṇāmasya kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm

साठ हज़ार तीर्थ और साठ सौ तीर्थ भी नारायण को किए गए एक प्रणाम की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.230.4)

प्रयश्चित्तान्यशेषाणि तपः कर्माणि यानि वै । विद्धि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्

prayaścittānyaśeṣāṇi tapaḥ karmāṇi yāni vai viddhi teṣāmaśeṣāṇāṁ kṛṣṇānusmaraṇaṁ param

समस्त प्रायश्चित्त, तप और कर्म — जान लो कि इन सबसे बढ़कर कृष्ण का अनुस्मरण है।

श्लोक 5 (garuda.1.230.5)

कृतपापेऽनुरक्तिश्च यस्य पुंसः प्रजायते । प्रायश्चित्तन्तु तस्यैकं हरेः संस्मरणं परम्

kṛtapāpe'nuraktiśca yasya puṁsaḥ prajāyate prāyaścittantu tasyaikaṁ hareḥ saṁsmaraṇaṁ param

यदि किसी मनुष्य को किए गए पाप में आसक्ति उत्पन्न हो जाए, तो उसके लिए एकमात्र और परम प्रायश्चित्त हरि का स्मरण ही है।

श्लोक 6 (garuda.1.230.6)

मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः । सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः

muhūrtamapi yo dhyāyennārāyaṇamatandritaḥ so'pi svargatimāpnoti kiṁ punastatparāyaṇaḥ

जो आलस्यरहित होकर एक मुहूर्त भी नारायण का ध्यान करता है, वह भी स्वर्ग-गति प्राप्त करता है — फिर जो उन्हीं में परायण हो, उसकी तो बात ही क्या!

श्लोक 7 (garuda.1.230.7)

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु योगस्थस्य च योगिनः । या काचिन्मनसो वृत्तिः सा भवत्यच्युताश्रयात्

jāgratsvapnasuṣupteṣu yogasthasya ca yoginaḥ yā kācinmanaso vṛttiḥ sā bhavatyacyutāśrayāt

जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति में योगस्थ योगी की मन की जो भी वृत्ति होती है, वह अच्युत के आश्रय में ही स्थित रहती है।

श्लोक 8 (garuda.1.230.8)

उत्तिष्ठन्निपतन्विष्णुं प्रलपन्विविशंस्तथा । भुञ्जञ्जाग्रच्च गोविन्दं माधवं यश्च संस्मरेत्

uttiṣṭhannipatanviṣṇuṁ pralapanviviśaṁstathā bhuñjañjāgracca govindaṁ mādhavaṁ yaśca saṁsmaret

उठते, गिरते, बोलते, प्रवेश करते, भोजन करते, जागते हुए भी जो विष्णु — गोविंद, माधव — का स्मरण करता है,

श्लोक 9 (garuda.1.230.9)

स्वेस्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने । एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः

svesve karmaṇyabhirataḥ kuryāccittaṁ janārdane eṣā śāstrānusāroktiḥ kimanyairbahubhāṣitaiḥ

— अपने-अपने कर्म में रत रहते हुए भी उसे जनार्दन में चित्त लगाना चाहिए। यह शास्त्रानुसार कथन है — अधिक कहने से क्या लाभ?

श्लोक 10 (garuda.1.230.10)

ध्यानमेव परो धर्मो ध्यानमेव परं तपः । ध्यानमेव परं शौचं तस्माद्ध्यानपरो भवेत्

dhyānameva paro dharmo dhyānameva paraṁ tapaḥ dhyānameva paraṁ śaucaṁ tasmāddhyānaparo bhavet

ध्यान ही परम धर्म है, ध्यान ही परम तप है, ध्यान ही परम शौच है — इसलिए मनुष्य को ध्यान-परायण होना चाहिए।

श्लोक 11 (garuda.1.230.11)

नास्ति विष्णोः परं ध्थेयं तपो नानशनात्परम् । तस्मात्प्रधानमत्रोक्तं वासुदेवस्य चिन्तनम्

nāsti viṣṇoḥ paraṁ dhtheyaṁ tapo nānaśanātparam tasmātpradhānamatroktaṁ vāsudevasya cintanam

विष्णु से बढ़कर कोई ध्येय नहीं है, उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है; इसलिए यहाँ वासुदेव का चिंतन ही प्रधान कहा गया है।

श्लोक 12 (garuda.1.230.12)

यद्दुर्लभं परं प्राप्यं मनसो यन्न गोचरम् । तदप्यप्रार्थितं ध्यातो ददाति मधुसूदनः

yaddurlabhaṁ paraṁ prāpyaṁ manaso yanna gocaram tadapyaprārthitaṁ dhyāto dadāti madhusūdanaḥ

जो दुर्लभ, परम प्राप्तव्य और मन की पहुँच से भी परे है, वह भी मधुसूदन बिना माँगे ही उसे दे देते हैं जो उनका ध्यान करता है।

श्लोक 13 (garuda.1.230.13)

प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्णं स्यादिति श्रुतिः

pramādātkurvatāṁ karma pracyavetādhvareṣu yat smaraṇādeva tadviṣṇoḥ saṁpūrṇaṁ syāditi śrutiḥ

असावधानी से यज्ञ करने वालों के कर्म में जो त्रुटि रह जाती है, वह विष्णु के स्मरण मात्र से पूर्ण हो जाती है — ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 14 (garuda.1.230.14)

ध्यानेन सदृशो नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् । आगामिदेहहेतूनां दाहको योगपावकः

dhyānena sadṛśo nāsti śodhanaṁ pāpakarmaṇām āgāmidehahetūnāṁ dāhako yogapāvakaḥ

पापकर्मों की शुद्धि के लिए ध्यान के समान कुछ भी नहीं है; योग-रूपी अग्नि आगामी जन्म के कारणों को जला देती है।

श्लोक 15 (garuda.1.230.15)

विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिमत्रैव जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मा च योऽचिरात्

viniṣpannasamādhistu muktimatraiva janmani prāpnoti yogī yogāgnidagdhakarmā ca yo'cirāt

समाधि सिद्ध कर लेने वाला योगी इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त कर लेता है, और जिसके कर्म योगाग्नि से जल चुके हों, वह शीघ्र ही उसे पाता है।

श्लोक 16 (garuda.1.230.16)

यथाग्निरुद्यतशिखः कक्षं दहति वानिलः । तथा चित्तस्थिते विष्णौ योगिना सर्वकिल्बिषम्

yathāgnirudyataśikhaḥ kakṣaṁ dahati vānilaḥ tathā cittasthite viṣṇau yoginā sarvakilbiṣam

जैसे उठती हुई लपटों वाली अग्नि वायु से प्रज्वलित होकर सूखी घास को जला देती है, वैसे ही विष्णु के मन में स्थित होने पर योगी के सभी पाप जल जाते हैं।

श्लोक 17 (garuda.1.230.17)

यथाग्नियोगात्कनकममलं संप्रजायते । संप्लुष्टो वासुदेवेन मनुष्याणां सदा मलः

yathāgniyogātkanakamamalaṁ saṁprajāyate saṁpluṣṭo vāsudevena manuṣyāṇāṁ sadā malaḥ

जैसे अग्नि के संयोग से सोना निर्मल हो जाता है, वैसे ही वासुदेव द्वारा जलाया जाकर मनुष्यों का मल सदा दूर हो जाता है।

श्लोक 18 (garuda.1.230.18)

गङ्गास्नानसहस्रेषु पुष्करस्नानकोटिषु । यत्पापं निलययाति स्मृते नश्यति तद्धरौ

gaṅgāsnānasahasreṣu puṣkarasnānakoṭiṣu yatpāpaṁ nilayayāti smṛte naśyati taddharau

हज़ार गंगा-स्नानों में और करोड़ों पुष्कर-स्नानों में जो पाप विलीन होता है, वह हरि के स्मरण मात्र से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 19 (garuda.1.230.19)

प्राणायामसहस्नैस्तु यत्पापं नश्यति ध्रुवम् । क्षणमात्रेण तत्पापं हरेर्ध्यानात्प्रणश्यति

prāṇāyāmasahasnaistu yatpāpaṁ naśyati dhruvam kṣaṇamātreṇa tatpāpaṁ harerdhyānātpraṇaśyati

हज़ार प्राणायामों से जो पाप निश्चय ही नष्ट होता है, वह हरि के ध्यान से एक ही क्षण में नष्ट हो जाता है।

श्लोक 20 (garuda.1.230.20)

कलिप्रभावाद्दुष्टोक्तिः पाषण्डानां तथोक्तयः । न क्रामेन्मानसं तस्य यस्य चेतसि केशवः

kaliprabhāvādduṣṭoktiḥ pāṣaṇḍānāṁ tathoktayaḥ na krāmenmānasaṁ tasya yasya cetasi keśavaḥ

कलियुग के प्रभाव से पाखंडियों की दुष्ट वाणी और शिक्षाएँ उसके मन में प्रवेश नहीं कर सकतीं जिसके चित्त में केशव विराजमान हों।

श्लोक 21 (garuda.1.230.21)

सा तिथिस्तदहोरात्रं स योगः स च चन्द्रमाः । लग्नं तदेव विख्यातं यत्र संस्मर्यते हरिः

sā tithistadahorātraṁ sa yogaḥ sa ca candramāḥ lagnaṁ tadeva vikhyātaṁ yatra saṁsmaryate hariḥ

वही तिथि है, वही दिन-रात है, वही योग है और वही चन्द्रमा है, वही लग्न प्रसिद्ध है, जिसमें हरि का स्मरण किया जाता है।

श्लोक 22 (garuda.1.230.22)

सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चार्थजडमूकता । चन्मुहूर्तं क्षणो वापि वासुदेवो न चिन्त्यते

sā hānistanmahacchidraṁ sā cārthajaḍamūkatā canmuhūrtaṁ kṣaṇo vāpi vāsudevo na cintyate

वही हानि है, वही महान अभाव है, वही अर्थहीन जड़ता और मूकता है — जिस मुहूर्त या क्षण में वासुदेव का चिंतन नहीं होता।

श्लोक 23 (garuda.1.230.23)

कलौ कृत युगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे । हृदि नो यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः

kalau kṛta yugaṁ tasya kalistasya kṛte yuge hṛdi no yasya govindo yasya cetasi nācyutaḥ

जिसके हृदय में गोविंद हैं और जिसके चित्त में अच्युत हैं, उसके लिए कलियुग भी कृतयुग है; और जिसके हृदय में वे नहीं, उसके लिए कृतयुग भी कलियुग है।

श्लोक 24 (garuda.1.230.24)

यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतोऽपि वा । गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः

yasyāgratastathā pṛṣṭhe gacchatastiṣṭhato'pi vā govinde niyataṁ cetaḥ kṛtakṛtyaḥ sadaiva saḥ

जिसका मन गोविंद में सदा स्थिर रहता है, चाहे वे आगे हों या पीछे, चाहे वह चलता हो या खड़ा हो — वह सदा कृतकृत्य ही है।

श्लोक 25 (garuda.1.230.25)

वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु । तस्यान्तरायो मैत्रेय वेवेन्द्रत्वादिकं फलम्

vāsudeve mano yasya japahomārcanādiṣu tasyāntarāyo maitreya vevendratvādikaṁ phalam

हे मैत्रेय! जप, होम और पूजा आदि में जिसका मन वासुदेव पर लगा हो, उसके लिए इन्द्रत्व जैसे फल भी बाधा-मात्र हैं।

श्लोक 26 (garuda.1.230.26)

असंत्यज्य च गार्हस्थयं स तप्त्वा च महत्तपः । छिनत्ति पौरुषीं मायां केशवार्पितमानसः

asaṁtyajya ca gārhasthayaṁ sa taptvā ca mahattapaḥ chinatti pauruṣīṁ māyāṁ keśavārpitamānasaḥ

गृहस्थाश्रम छोड़े बिना और बड़ा तप किए बिना भी, जिसका मन केशव को अर्पित है, वह पौरुषी माया को काट देता है।

श्लोक 27 (garuda.1.230.27)

क्षमां कुर्वन्ति क्रुद्धेषु दयां मूर्खेषु मानवाः । मुदञ्च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते

kṣamāṁ kurvanti kruddheṣu dayāṁ mūrkheṣu mānavāḥ mudañca dharmaśīleṣu govinde hṛdayasthite

जब गोविंद हृदय में स्थित होते हैं, तब मनुष्य क्रोधितों के प्रति क्षमा, मूर्खों के प्रति दया और धर्मशीलों के प्रति हर्ष प्रकट करते हैं।

श्लोक 28 (garuda.1.230.28)

ध्यायेन्नारायणं देवं स्नानदानादिकर्मसु । प्रायश्चितेतेषु सर्वेषु दुष्कृतेषु विशेषतः

dhyāyennārāyaṇaṁ devaṁ snānadānādikarmasu prāyaściteteṣu sarveṣu duṣkṛteṣu viśeṣataḥ

स्नान-दान आदि कर्मों में, और विशेषतः इन सभी दुष्कर्मों के प्रायश्चित्तों में, नारायण देव का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 29 (garuda.1.230.29)

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः । येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः

lābhasteṣāṁ jayasteṣāṁ kutasteṣāṁ parābhavaḥ yeṣāmindīvaraśyāmo hṛdayastho janārdanaḥ

जिनके हृदय में नील कमल के समान श्याम जनार्दन विराजते हैं, उनका लाभ ही लाभ है, विजय ही विजय है — उनकी पराजय कहाँ हो सकती है?

श्लोक 30 (garuda.1.230.30)

कीटपक्षिगणानाञ्च हरौ संन्यस्तचेतसाम् । ऊर्ध्वा ह्येव गतिश्चास्ति किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम्

kīṭapakṣigaṇānāñca harau saṁnyastacetasām ūrdhvā hyeva gatiścāsti kiṁ punarjñānināṁ nṛṇām

हरि में मन अर्पित करने वाले कीट-पक्षियों के लिए भी उर्ध्व गति होती है — फिर ज्ञानी मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 31 (garuda.1.230.31)

वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा । नरकद्वारशमनी सा किमर्थं न सेव्यते

vāsudevatarucchāyā nātiśītātitāpadā narakadvāraśamanī sā kimarthaṁ na sevyate

वासुदेव-वृक्ष की छाया न अत्यंत शीतल है, न अत्यंत तप्त; वह नरक-द्वार को बंद करने वाली है — फिर उसका सेवन क्यों नहीं किया जाता?

श्लोक 32 (garuda.1.230.32)

न च दुर्वाससः शापो राज्यञ्चापि शचीपतेः । हन्तुं समर्थं हि सखे हृत्कृते मधुसूदने

na ca durvāsasaḥ śāpo rājyañcāpi śacīpateḥ hantuṁ samarthaṁ hi sakhe hṛtkṛte madhusūdane

हे सखे! जिसने मधुसूदन को हृदय में स्थापित कर लिया है, उसे न दुर्वासा का शाप और न इन्द्र का राज्य भी हानि पहुँचा सकता है।

श्लोक 33 (garuda.1.230.33)

वदतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । नापयाति यदा चिन्ता सिद्धां मन्येत धारणाम्

vadatastiṣṭhato'nyadvā svecchayā karma kurvataḥ nāpayāti yadā cintā siddhāṁ manyeta dhāraṇām

बोलते, खड़े रहते या स्वेच्छा से कोई अन्य कर्म करते हुए भी जब वह चिंतन (हरि का स्मरण) कभी नहीं छूटता, तब धारणा को सिद्ध मानना चाहिए।

श्लोक 34 (garuda.1.230.34)

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तो नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । केयूरवान्मकरकुण्डलवान्किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः

dhyeyaḥ sadā savitṛmaṇḍalamadhyavarto nārāyaṇaḥ sarasijāsanasanniviṣṭaḥ keyūravānmakarakuṇḍalavānkirīṭī hārī hiraṇmayavapurdhṛtaśaṅkhacakraḥ

सूर्य-मंडल के मध्य में स्थित, कमलासन पर बैठे, केयूर धारण किए, मकर-कुंडल पहने, मुकुट और माला से सुशोभित, स्वर्ण-वर्ण देह वाले, शंख-चक्र धारण करने वाले नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 35 (garuda.1.230.35)

न हि ध्यानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । श्वपचान्नानि भुञ्जानो पापी नैवात्र लिप्यते

na hi dhyānena sadṛśaṁ pavitramiha vidyate śvapacānnāni bhuñjāno pāpī naivātra lipyate

ध्यान के समान इस लोक में कोई पवित्र वस्तु नहीं है; श्वपच का अन्न खाता हुआ भी पापी इससे लिप्त नहीं होता।

श्लोक 36 (garuda.1.230.36)

सदा चित्तं समासक्तं जन्तोर्विषयगोचरे । यदि नारायणेऽप्येवं को न मुच्येत बन्धनात्

sadā cittaṁ samāsaktaṁ jantorviṣayagocare yadi nārāyaṇe'pyevaṁ ko na mucyeta bandhanāt

प्राणी का चित्त तो सदा विषयों में आसक्त रहता है — यदि वैसा ही चित्त नारायण में लग जाए, तो कौन बंधन से मुक्त न हो?

श्लोक 37 (garuda.1.230.37)

सूत उवाच । विष्णुभक्तिर्यस्य चित्ते कं वा जीवो नमेत्सदा । स तारयति चात्मानं तदैव दुरितार्णवात्

sūta uvāca viṣṇubhaktiryasya citte kaṁ vā jīvo nametsadā sa tārayati cātmānaṁ tadaiva duritārṇavāt

सूत ने कहा — जिसके चित्त में विष्णु-भक्ति हो, अथवा जो कोई भी जीव सदा उन्हें नमन करे, वह उसी क्षण अपने आपको पाप-सागर से पार कर लेता है।

श्लोक 38 (garuda.1.230.38)

तञ्ज्ञानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र काशवः । तत्कर्म यत्तदर्थाय किमन्यैर्बहुभाषितैः

tañjñānaṁ yatra govindaḥ sā kathā yatra kāśavaḥ tatkarma yattadarthāya kimanyairbahubhāṣitaiḥ

वही ज्ञान है जहाँ गोविंद हैं, वही कथा है जहाँ केशव हैं, वही कर्म है जो उन्हीं के लिए हो — अधिक कहने से क्या लाभ?

श्लोक 39 (garuda.1.230.39)

सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पितम् । तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ

sā jihvā yā hariṁ stauti taccittaṁ yattadarpitam tāveva kevalau ślāghyau yau tatpūjākarau karau

वही जिह्वा है जो हरि की स्तुति करे, वही चित्त है जो उन्हें अर्पित हो; केवल वे ही दोनों हाथ प्रशंसनीय हैं जो उनकी पूजा करते हैं।

श्लोक 40 (garuda.1.230.40)

प्रणाममीशस्य शिरः फलं विदुस्तदर्चनं पाणिफलं दिवौकसः । मनः फलं तद्गुणकर्मचिन्तनं वचस्तु गोविन्दगुणस्तुतिः फलम्

praṇāmamīśasya śiraḥ phalaṁ vidustadarcanaṁ pāṇiphalaṁ divaukasaḥ manaḥ phalaṁ tadguṇakarmacintanaṁ vacastu govindaguṇastutiḥ phalam

स्वर्गवासी कहते हैं — सिर का फल ईश्वर को प्रणाम करना है, हाथों का फल उनकी पूजा करना है, मन का फल उनके गुण-कर्मों का चिंतन है, और वाणी का फल गोविंद के गुणों की स्तुति है।

श्लोक 41 (garuda.1.230.41)

मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः । केशवस्मरणादेव तस्य सर्वं विनश्यति

merumandaramātro'pi rāśiḥ pāpasya karmaṇaḥ keśavasmaraṇādeva tasya sarvaṁ vinaśyati

मेरु-मन्दराचल के बराबर भी पाप-कर्मों की राशि हो, तो भी केवल केशव के स्मरण से ही वह सम्पूर्ण नष्ट हो जाती है।

श्लोक 42 (garuda.1.230.42)

यत्किञ्चित्कुरुते कर्म पुरुषः साध्वसाधु वा । सर्वं नारायणे न्यस्य कुर्वन्नपि न लिम्पति

yatkiñcitkurute karma puruṣaḥ sādhvasādhu vā sarvaṁ nārāyaṇe nyasya kurvannapi na limpati

मनुष्य जो भी कर्म करे, अच्छा हो या बुरा, यदि वह सब कुछ नारायण को अर्पित करके करे, तो कर्म करते हुए भी वह लिप्त नहीं होता।

श्लोक 43 (garuda.1.230.43)

तृणादिचतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् । चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं मायया तव

tṛṇādicaturāsyāntaṁ bhūtagrāmaṁ caturvidham carācaraṁ jagatsarvaṁ prasuptaṁ māyayā tava

घास से लेकर चतुर्मुख ब्रह्मा तक, चारों प्रकार के प्राणी-समूह, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारी माया से सुप्त पड़ा है।

श्लोक 44 (garuda.1.230.44)

यस्मिन्न्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र नवा विशेत्कथमपि ब्राह्मोऽपिलोकोऽल्पकः । मुक्तिञ्चेतसि संस्थितो जडधियां पुंसां ददात्यव्ययः किञ्चित्रं यदयं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते

yasminnyastamatirna yāti narakaṁ svargo'pi yaccintane vighno yatra navā viśetkathamapi brāhmo'piloko'lpakaḥ muktiñcetasi saṁsthito jaḍadhiyāṁ puṁsāṁ dadātyavyayaḥ kiñcitraṁ yadayaṁ prayāti vilayaṁ tatrācyute kīrtite

जिस पर मन टिका हुआ नरक को नहीं जाता, जिसके चिंतन में स्वर्ग भी बाधा-सा प्रतीत होता है, जिसमें ब्रह्मलोक भी तुच्छ लगता है — वह अव्यय, चित्त में स्थित होकर जड़बुद्धि मनुष्यों को भी मुक्ति दे देता है; फिर क्या आश्चर्य कि अच्युत का कीर्तन होते ही सब कुछ वहीं विलीन हो जाए।

श्लोक 45 (garuda.1.230.45)

अग्निकार्यं जपः स्नानं विष्णोर्ध्यानञ्च पूजनम् । गन्तुं दुः खोदधेः कुर्युर्ये च तत्र नरन्ति ते

agnikāryaṁ japaḥ snānaṁ viṣṇordhyānañca pūjanam gantuṁ duḥ khodadheḥ kuryurye ca tatra naranti te

अग्नि-कार्य, जप, स्नान, विष्णु-ध्यान और पूजन — जो दुःख-सागर को पार करने के लिए इन्हें करते हैं और उसमें उतरते हैं, वे ही उसे तैरकर पार करते हैं।

श्लोक 46 (garuda.1.230.46)

राष्ट्रस्य शरणं राजा पितरो बालकस्य च । धर्मश्च सर्वमर्त्यानां सर्वस्य शरणं हरिः

rāṣṭrasya śaraṇaṁ rājā pitaro bālakasya ca dharmaśca sarvamartyānāṁ sarvasya śaraṇaṁ hariḥ

राष्ट्र का आश्रय राजा है, बालक का आश्रय माता-पिता हैं, सब मनुष्यों का आश्रय धर्म है — परन्तु सबका आश्रय हरि ही हैं।

श्लोक 47 (garuda.1.230.47)

ये नमन्ति जगद्योनिं वासुदेवं सनातनम् । न येभ्यो विद्यते तीर्थमधिकं मुनिसत्तम्

ye namanti jagadyoniṁ vāsudevaṁ sanātanam na yebhyo vidyate tīrthamadhikaṁ munisattam

हे मुनिश्रेष्ठ! जो लोग जगत् के मूल कारण सनातन वासुदेव को नमन करते हैं, उनसे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है।

श्लोक 48 (garuda.1.230.48)

अनर्घरत्नपूजाञ्च कुर्यात्स्वाध्यायमेव च । तमेवोद्दिश्य गोविन्दं ध्यायन्नित्यमतन्द्रितः

anargharatnapūjāñca kuryātsvādhyāyameva ca tamevoddiśya govindaṁ dhyāyannityamatandritaḥ

अमूल्य रत्नों से पूजा और स्वाध्याय भी उन्हीं गोविंद को उद्देश्य बनाकर, आलस्यरहित होकर नित्य उनका ध्यान करते हुए करना चाहिए।

श्लोक 49 (garuda.1.230.49)

शूद्रं वा भगवद्भक्तं निषादं श्वपचं तथा । द्विजजाति समंमन्यो न याति नरकं नरः

śūdraṁ vā bhagavadbhaktaṁ niṣādaṁ śvapacaṁ tathā dvijajāti samaṁmanyo na yāti narakaṁ naraḥ

जो शूद्र, निषाद या श्वपच भगवद्भक्त को भी द्विज-जाति के समान मानता है, वह मनुष्य नरक को नहीं जाता।

श्लोक 50 (garuda.1.230.50)

आदरेण सदा स्तौति धनवन्तं धनेच्छया । तथा विश्वस्य कर्तारं को न मुच्येत बन्धनात्

ādareṇa sadā stauti dhanavantaṁ dhanecchayā tathā viśvasya kartāraṁ ko na mucyeta bandhanāt

धन की इच्छा से मनुष्य धनवान की सदा आदरपूर्वक स्तुति करता है — तो विश्व के रचयिता की स्तुति करने वाला बंधन से मुक्त क्यों न हो?

श्लोक 51 (garuda.1.230.51)

यथा प्राप्तवनो वह्निर्दहत्यार्द्रमपीन्धनम् । तथाविधः स्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्विषम्

yathā prāptavano vahnirdahatyārdramapīndhanam tathāvidhaḥ sthito viṣṇuryogināṁ sarvakilviṣam

जैसे लकड़ी पर पहुँचकर अग्नि गीली लकड़ी को भी जला देती है, वैसे ही हृदय में स्थित विष्णु योगी के सम्पूर्ण पापों को जला देते हैं।

श्लोक 52 (garuda.1.230.52)

आदीप्तं पर्वतं यद्वन्नाश्रयन्ति मृगादयः । तद्वत्पापनि सर्वाणि योगाभ्यासरतं नरम्

ādīptaṁ parvataṁ yadvannāśrayanti mṛgādayaḥ tadvatpāpani sarvāṇi yogābhyāsarataṁ naram

जैसे जलते हुए पर्वत का आश्रय हिरण आदि नहीं लेते, वैसे ही योग-अभ्यास में रत मनुष्य के पास सभी पाप नहीं आते।

श्लोक 53 (garuda.1.230.53)

यस्य यावांश्च विश्वासस्तस्य सिद्धिस्तु तावती । एतवानेव कृष्णस्य प्रभावः परिमीयते

yasya yāvāṁśca viśvāsastasya siddhistu tāvatī etavāneva kṛṣṇasya prabhāvaḥ parimīyate

जिसका जितना विश्वास होता है, उसे उतनी ही सिद्धि प्राप्त होती है — कृष्ण का प्रभाव इतना ही मापा जाता है।

श्लोक 54 (garuda.1.230.54)

विद्वेषादपि गोविन्दं दमघोषात्मजः स्मरन् । शिशुपालो गतस्तत्त्वं किं पुनस्तत्परायणः

vidveṣādapi govindaṁ damaghoṣātmajaḥ smaran śiśupālo gatastattvaṁ kiṁ punastatparāyaṇaḥ

द्वेषवश ही सही, गोविंद का स्मरण करते हुए दमघोष-पुत्र शिशुपाल भी परम तत्त्व को प्राप्त हो गया — फिर उन्हीं में परायण भक्त की तो बात ही क्या!

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