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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 235

ब्रह्म-विज्ञान का स्वरूप

अध्याय 234अध्याय-सूचीअध्याय 236

श्लोक 1 (garuda.1.235.1)

सूत उवाच वेदान्तसाङ्ख्यसिद्धान्तब्रह्मज्ञानं वदाम्यहम् । अहं ब्रह्म परं ज्योतिर्विष्णुरित्येव चिन्तयन्

sūta uvāca vedāntasāṅkhyasiddhāntabrahmajñānaṁ vadāmyaham ahaṁ brahma paraṁ jyotirviṣṇurityeva cintayan

सूत ने कहा — मैं वेदांत और सांख्य के सिद्धांत के अनुसार ब्रह्म-ज्ञान कहूँगा, यह चिंतन करते हुए — 'मैं ब्रह्म, परम ज्योति, विष्णु ही हूँ।'

श्लोक 2 (garuda.1.235.2)

सूर्ये हृद्व्योम्नि वह्नौ च ज्योतिरेकं त्रिधा स्थितम् । यथा सर्पिः शीरस्थं गवां न कुरुते बलम्

sūrye hṛdvyomni vahnau ca jyotirekaṁ tridhā sthitam yathā sarpiḥ śīrasthaṁ gavāṁ na kurute balam

सूर्य में, हृदयाकाश में और अग्नि में एक ही ज्योति तीन रूपों में स्थित है। जैसे गौओं के सिर में स्थित घी उनके लिए बल नहीं देता,

श्लोक 3 (garuda.1.235.3)

निर्गतं कर्मसंयुक्तं दत्तं तासां महा बलम् । तथा विष्णुः शरीरस्थो न करोति हितं नणाम्

nirgataṁ karmasaṁyuktaṁ dattaṁ tāsāṁ mahā balam tathā viṣṇuḥ śarīrastho na karoti hitaṁ naṇām

— बल्कि उचित कर्म द्वारा निकाला और अर्पित किया गया घी ही उन्हें महाबल देता है, वैसे ही शरीर में स्थित विष्णु भी बिना साधना के मनुष्यों का हित नहीं करते।

श्लोक 4 (garuda.1.235.4)

विनाराधनया देवः सर्वगः परमेश्वरः । आरुरुक्षुमतीनां तु कर्मज्ञानमुदाहृतम्

vinārādhanayā devaḥ sarvagaḥ parameśvaraḥ ārurukṣumatīnāṁ tu karmajñānamudāhṛtam

आराधना के बिना सर्वव्यापी परमेश्वर [सुलभ नहीं होते]। जो योग-मार्ग पर आरूढ़ होना चाहते हैं, उनके लिए ज्ञान-सहित कर्म ही साधन कहा गया है।

श्लोक 5 (garuda.1.235.5)

आरूढयोगवृक्षाणां ज्ञानं त्यागं परं मतम् । ज्ञातुमिच्छति शब्दादीन्रागो द्वेषोऽथ जायते

ārūḍhayogavṛkṣāṇāṁ jñānaṁ tyāgaṁ paraṁ matam jñātumicchati śabdādīnrāgo dveṣo'tha jāyate

योग-वृक्ष पर आरूढ़ हो चुके लोगों के लिए ज्ञान और त्याग ही परम माना गया है। इससे पूर्व मनुष्य शब्द आदि विषयों को जानने की इच्छा करता है, जिससे राग-द्वेष उत्पन्न होता है।

श्लोक 6 (garuda.1.235.6)

लोभो मोहः क्रोध एतैर्युक्तः पापं नरश्चरेत् । हस्तावुपस्थमुदरं वाक्चतुर्थो चतुष्टयम्

lobho mohaḥ krodha etairyuktaḥ pāpaṁ naraścaret hastāvupasthamudaraṁ vākcaturtho catuṣṭayam

लोभ, मोह और क्रोध से युक्त होकर मनुष्य पाप का आचरण करता है। हाथ, उपस्थ (जननेंद्रिय), उदर और चौथी वाणी — ये चार अंग हैं,

श्लोक 7 (garuda.1.235.7)

एतत्सुसंयतं यस्य स विप्रः कथ्यते बुधैः (धः) । परवित्तं न गृह्णाति न हिंसां कुरुते तथा

etatsusaṁyataṁ yasya sa vipraḥ kathyate budhaiḥ (dhaḥ) paravittaṁ na gṛhṇāti na hiṁsāṁ kurute tathā

— जिनके ये भलीभाँति संयमित हों, उसे विद्वानों ने ब्राह्मण कहा है; वह दूसरे के धन को नहीं लेता, न ही हिंसा करता है।

श्लोक 8 (garuda.1.235.8)

नाक्षक्रीडारतो यस्तु हस्तौ तस्य सुसंयतौ । परस्त्रीवर्जनरतस्तस्योपस्थं सुसंयतम्

nākṣakrīḍārato yastu hastau tasya susaṁyatau parastrīvarjanaratastasyopasthaṁ susaṁyatam

जो जुए में रत नहीं है, उसके हाथ संयमित हैं; जो परस्त्री-त्याग में रत है, उसकी जननेंद्रिय संयमित है।

श्लोक 9 (garuda.1.235.9)

अलोलुपमिदं भुङ्क्ते जठरं तस्य संयतम् । सत्यं हितं मितं ब्रूते यस्माद्वाक्तस्य संयता

alolupamidaṁ bhuṅkte jaṭharaṁ tasya saṁyatam satyaṁ hitaṁ mitaṁ brūte yasmādvāktasya saṁyatā

जो लोभ-रहित होकर भोजन करता है, उसका उदर संयमित है; जिसकी वाणी सत्य, हितकारी और परिमित है, उसकी वाणी संयमित है।

श्लोक 10 (garuda.1.235.10)

यस्य संयतान्येतानि तस्य किं तपसाध्वरैः । ऐक्यं यद्बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वदा

yasya saṁyatānyetāni tasya kiṁ tapasādhvaraiḥ aikyaṁ yadbuddhimanasorindriyāṇāṁ ca sarvadā

जिसके ये सब संयमित हों, उसे तप और यज्ञों से क्या प्रयोजन? बुद्धि, मन और इन्द्रियों की सदा एकता ही —

श्लोक 11 (garuda.1.235.11)

सबीजं वापि निर्बोजं ध्यानमेतत्प्रकीर्तितम् । भ्रुवोर्मध्ये स्थितां बुद्धिं विषयेषु युनक्ति यः

sabījaṁ vāpi nirbojaṁ dhyānametatprakīrtitam bhruvormadhye sthitāṁ buddhiṁ viṣayeṣu yunakti yaḥ

— बीज-सहित या बीज-रहित ध्यान कहलाता है। जो भ्रूमध्य में स्थित बुद्धि को विषयों में जोड़ देता है,

श्लोक 12 (garuda.1.235.12)

हन्द्रियाणामुपरमे मनसि ह्यव्यवस्थिते

handriyāṇāmuparame manasi hyavyavasthite

— इन्द्रियों के शांत होने पर भी जब मन अभी स्थिर नहीं हुआ हो...

श्लोक 13 (garuda.1.235.13)

स्वप्नान्पश्यत्यसौ जीवो बाह्यानाभ्यन्तरानथ । जीवो जाग्रदवस्थायामेवमाहुर्विपाश्चितः

svapnānpaśyatyasau jīvo bāhyānābhyantarānatha jīvo jāgradavasthāyāmevamāhurvipāścitaḥ

वह जीव स्वप्न में बाह्य और आभ्यंतर दृश्य देखता है; विद्वानों ने इसे जागृति-अवस्था में जीव की स्थिति कहा है।

श्लोक 14 (garuda.1.235.14)

हृदि स्थितः स तमसा मोहितो न स्मरत्यपि । यदा तस्य कुतो वेति सुषुप्तिरिति कथ्यते

hṛdi sthitaḥ sa tamasā mohito na smaratyapi yadā tasya kuto veti suṣuptiriti kathyate

हृदय में स्थित वह अंधकार से मोहित होकर स्मरण भी नहीं करता — जब उसे 'कहाँ' और 'क्या' का बोध भी नहीं रहता, उसे सुषुप्ति (गहन निद्रा) कहा जाता है।

श्लोक 15 (garuda.1.235.15)

जाग्रतो यस्य नो तन्द्रा न मोहो न भ्रमस्तथा । उत्पद्यते न जानाति शब्दार्थविषयान्वशी

jāgrato yasya no tandrā na moho na bhramastathā utpadyate na jānāti śabdārthaviṣayānvaśī

जागृत अवस्था में जिसे न आलस्य हो, न मोह, न भ्रम — फिर भी वह संयमी होकर शब्द-अर्थ के विषयों में नहीं उलझता,

श्लोक 16 (garuda.1.235.16)

इन्द्रियाणि समाहृत्य विषयेभ्यो मनस्तथा । बुद्ध्याहङ्कारमपि च प्रकृत्या बुद्धिमेव च

indriyāṇi samāhṛtya viṣayebhyo manastathā buddhyāhaṅkāramapi ca prakṛtyā buddhimeva ca

— इन्द्रियों को विषयों से समेटकर, तथा मन को भी, बुद्धि और अहंकार को भी प्रकृति के द्वारा, और बुद्धि को भी —

श्लोक 17 (garuda.1.235.17)

संयम्य प्रकृतिं चापि चिच्छक्त्या केवले स्थितः । पश्यत्यात्मानि चात्मानमात्मनात्मप्रकाशकम्

saṁyamya prakṛtiṁ cāpi cicchaktyā kevale sthitaḥ paśyatyātmāni cātmānamātmanātmaprakāśakam

— प्रकृति को भी संयमित कर, चित्-शक्ति से केवल (शुद्ध चैतन्य) में स्थित होकर, वह आत्मा में आत्मा को, आत्मा के द्वारा, आत्म-प्रकाशक रूप में देखता है।

श्लोक 18 (garuda.1.235.18)

चिद्रूपममृतं शुद्धं निष्क्रियं व्यापकं शिवम् । तुरीयायामवस्थायामास्थितोऽसौ न संशयः

cidrūpamamṛtaṁ śuddhaṁ niṣkriyaṁ vyāpakaṁ śivam turīyāyāmavasthāyāmāsthito'sau na saṁśayaḥ

चित्-स्वरूप, अमृत, शुद्ध, निष्क्रिय, व्यापक, कल्याणकारी — इस प्रकार निःसंदेह वह तुरीय अवस्था में स्थित होता है।

श्लोक 19 (garuda.1.235.19)

शब्दादयो गुणाः पञ्च सत्त्वाद्याश्च गुणास्त्रयः । पुर्यष्टकस्य पद्मस्य पत्राण्यष्टौ च तानि हि

śabdādayo guṇāḥ pañca sattvādyāśca guṇāstrayaḥ puryaṣṭakasya padmasya patrāṇyaṣṭau ca tāni hi

शब्द आदि पाँच गुण और सत्त्व आदि तीन गुण — ये सब मिलकर पुर्यष्टक (सूक्ष्म शरीर) के कमल के आठ पत्ते हैं।

श्लोक 20 (garuda.1.235.20)

साम्यावस्था गुणकृता प्रकृतिस्तत्र कर्णिका । कर्णिकायां स्थितो देवो देही चिद्रूप एव हि

sāmyāvasthā guṇakṛtā prakṛtistatra karṇikā karṇikāyāṁ sthito devo dehī cidrūpa eva hi

गुणों से बनी साम्यावस्था प्रकृति है, जो उसकी कर्णिका (कमल-कोश) है; उस कर्णिका में देह-धारी देव, चित्-स्वरूप ही, स्थित है।

श्लोक 21 (garuda.1.235.21)

पुर्यष्टकं परित्यज्य प्रकृतिञ्च गुणात्मिकाम् । यदा याति तदा जीवो याति मुक्तिं न संशयः

puryaṣṭakaṁ parityajya prakṛtiñca guṇātmikām yadā yāti tadā jīvo yāti muktiṁ na saṁśayaḥ

जब जीव पुर्यष्टक और गुण-रूप प्रकृति को त्यागकर चला जाता है, तब वह निःसंदेह मुक्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (garuda.1.235.22)

प्राणायामो जपश्चैव प्रत्याहारोऽथ धारणा । ध्यानं समाधिरित्येते षड्योगस्य प्रसाधकाः

prāṇāyāmo japaścaiva pratyāhāro'tha dhāraṇā dhyānaṁ samādhirityete ṣaḍyogasya prasādhakāḥ

प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — ये छह योग को सिद्ध करने वाले हैं।

श्लोक 23 (garuda.1.235.23)

पापक्षये देवतानां प्रीतिरिन्द्रियसंयमः । जपध्यानयुतो गर्भो विपरीतस्त्वगर्भकः

pāpakṣaye devatānāṁ prītirindriyasaṁyamaḥ japadhyānayuto garbho viparītastvagarbhakaḥ

पाप का नाश होने पर देवताओं की प्रसन्नता और इन्द्रिय-संयम प्राप्त होता है। जप-ध्यान सहित किया गया प्राणायाम 'गर्भ' है, विपरीत 'अगर्भक' है।

श्लोक 24 (garuda.1.235.24)

षट्त्रिंशन्मात्रकः श्रेष्ठश्चतुर्विंशतिमात्रकः । मध्यो द्वादशमात्रस्तु ओङ्कारं सततं जपेत्

ṣaṭtriṁśanmātrakaḥ śreṣṭhaścaturviṁśatimātrakaḥ madhyo dvādaśamātrastu oṅkāraṁ satataṁ japet

छत्तीस मात्रा वाला श्रेष्ठ है, चौबीस मात्रा वाला मध्यम है, बारह मात्रा वाला [निकृष्ट है]। ॐकार का निरंतर जप करना चाहिए।

श्लोक 25 (garuda.1.235.25)

वाचके प्रणवे ज्ञाते वाच्यं ब्रह्म प्रसीदति । (ओंनमो विष्णवे).षष्ठाक्षरश्च जप्तव्यो गायत्त्री द्वादशाक्षरी

vācake praṇave jñāte vācyaṁ brahma prasīdati (oṁnamo viṣṇave).ṣaṣṭhākṣaraśca japtavyo gāyattrī dvādaśākṣarī

वाचक प्रणव को जानने पर वाच्य ब्रह्म प्रसन्न होते हैं। छह-अक्षर वाला ('ॐ नमो विष्णवे') और द्वादश-अक्षरी गायत्री भी जपनी चाहिए।

श्लोक 26 (garuda.1.235.26)

सर्वेषामिन्द्रियाणां तु प्रवृतिर्विषयेषु च । निवृत्तिर्मनसस्तस्याः प्रत्याहारः प्रकीर्तितः

sarveṣāmindriyāṇāṁ tu pravṛtirviṣayeṣu ca nivṛttirmanasastasyāḥ pratyāhāraḥ prakīrtitaḥ

सभी इन्द्रियों की विषयों में जो प्रवृत्ति है, उससे मन की निवृत्ति ही प्रत्याहार कहलाती है।

श्लोक 27 (garuda.1.235.27)

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः समाहृत्य हितो हि सः । सहसा सह बुद्ध्या च प्रत्याहारेषु संस्थितः

indriyāṇīndriyārthebhyaḥ samāhṛtya hito hi saḥ sahasā saha buddhyā ca pratyāhāreṣu saṁsthitaḥ

इन्द्रियों को विषयों से समेटकर, मन और बुद्धि सहित, जो दृढ़तापूर्वक प्रत्याहार में स्थित रहता है, वह हितकारी होता है।

श्लोक 28 (garuda.1.235.28)

प्राणायामैर्द्वादशभिर्यावत्कालःकृतो भवेत् । यस्तावत्कालपर्यन्तं मनो ब्रह्मणि धारयेत्

prāṇāyāmairdvādaśabhiryāvatkālaḥkṛto bhavet yastāvatkālaparyantaṁ mano brahmaṇi dhārayet

बारह प्राणायामों में जितना समय लगता है, उतने ही समय तक जो मन को ब्रह्म में धारण करता है —

श्लोक 29 (garuda.1.235.29)

तस्यैव ब्रह्मणा प्रोक्तं ध्यानं द्वादश धारणाः । तुष्येत नियतो युक्तः समाधिः सोऽभीधीयते

tasyaiva brahmaṇā proktaṁ dhyānaṁ dvādaśa dhāraṇāḥ tuṣyeta niyato yuktaḥ samādhiḥ so'bhīdhīyate

— उसी के लिए ब्रह्म-ज्ञानियों ने ध्यान को बारह धारणाओं के रूप में कहा है; नियमित और युक्त होकर संतुष्ट रहना ही समाधि कहलाती है।

श्लोक 30 (garuda.1.235.30)

ध्यायन्न चलते यस्य मनोभिध्यायतो भृशम्

dhyāyanna calate yasya manobhidhyāyato bhṛśam

जिसका मन गहराई से ध्यान करते हुए भी विचलित नहीं होता...

श्लोक 31 (garuda.1.235.31)

प्राप्यावधिकृतं कालं यावत्सा धारणा स्मृता । ध्येये सक्तं मनो यस्य ध्येयमेवानुपश्यति

prāpyāvadhikṛtaṁ kālaṁ yāvatsā dhāraṇā smṛtā dhyeye saktaṁ mano yasya dhyeyamevānupaśyati

— निर्धारित समय-सीमा तक पहुँचने तक वही धारणा स्मृत है। जिसका मन ध्येय में आसक्त होकर केवल ध्येय को ही देखता रहे,

श्लोक 32 (garuda.1.235.32)

नान्यं पदार्थं जानाति ध्यानमेतत्प्रकीर्तितम् । ध्येये मनो निश्चलतां याति ध्येयं विचिन्तयन्

nānyaṁ padārthaṁ jānāti dhyānametatprakīrtitam dhyeye mano niścalatāṁ yāti dhyeyaṁ vicintayan

— और अन्य किसी वस्तु को नहीं जानता, वही ध्यान कहलाता है। जब ध्येय का चिंतन करते हुए मन ध्येय में स्थिरता प्राप्त कर लेता है,

श्लोक 33 (garuda.1.235.33)

यत्तद्ध्यानं परं प्रोक्तं मुनिभिर्ध्यानचिन्तकैः । ध्येयमेव हि सर्वत्र ध्याता तन्मयतां गतः

yattaddhyānaṁ paraṁ proktaṁ munibhirdhyānacintakaiḥ dhyeyameva hi sarvatra dhyātā tanmayatāṁ gataḥ

— वही ध्यान-चिंतक मुनियों द्वारा परम ध्यान कहा गया है। ध्याता सर्वत्र ध्येय में ही तन्मय हो जाता है,

श्लोक 34 (garuda.1.235.34)

पश्यति द्वैतरहितं समाधिः सोऽभिधीयते । मनः सङ्कल्परहितमिन्द्रियार्थान्न चिन्तयेत्

paśyati dvaitarahitaṁ samādhiḥ so'bhidhīyate manaḥ saṅkalparahitamindriyārthānna cintayet

— और उसे द्वैत-रहित होकर देखता है — यही समाधि कहलाती है। मन संकल्प-रहित होकर इन्द्रिय-विषयों का चिंतन न करे।

श्लोक 35 (garuda.1.235.35)

यस्य ब्रह्मणि संलीनं समाधिस्थं तदोच्यते । ध्यायतः परमात्मानमात्मस्थं यस्य योगिनः

yasya brahmaṇi saṁlīnaṁ samādhisthaṁ tadocyate dhyāyataḥ paramātmānamātmasthaṁ yasya yoginaḥ

जिसका मन ब्रह्म में लीन होकर समाधिस्थ हो जाता है, ऐसा कहा जाता है। परमात्मा का ध्यान करने वाले, आत्म-स्थित योगी का —

श्लोक 36 (garuda.1.235.36)

मनस्तन्मयतां याति समाधिस्थः स कीर्तितः । चित्तस्य स्थिरता भ्रान्तिर्दैर्मनस्यं प्रमादता

manastanmayatāṁ yāti samādhisthaḥ sa kīrtitaḥ cittasya sthiratā bhrāntirdairmanasyaṁ pramādatā

— मन जब उसी में तन्मय हो जाता है, तब उसे समाधिस्थ कहा गया है। चित्त की स्थिरता को भ्रम मान लेना, मानसिक विक्षोभ और प्रमाद —

श्लोक 37 (garuda.1.235.37)

योगिनां कथिता दोषा योगविघ्नप्रवर्तकाः । स्थित्यर्थं मनसः सर्वं स्थूलरूपं विचिन्तयेत्

yogināṁ kathitā doṣā yogavighnapravartakāḥ sthityarthaṁ manasaḥ sarvaṁ sthūlarūpaṁ vicintayet

— ये योगियों के कहे गए दोष हैं, जो योग में विघ्न उत्पन्न करते हैं। मन की स्थिरता के लिए पहले सब कुछ स्थूल रूप में चिंतन करना चाहिए।

श्लोक 38 (garuda.1.235.38)

तद्व्रतं निश्चलीभूतं सूय्यस्थं स्थिरतां व्रजेत् । न विना परमात्मानं किञ्चिज्जगति विद्यते

tadvrataṁ niścalībhūtaṁ sūyyasthaṁ sthiratāṁ vrajet na vinā paramātmānaṁ kiñcijjagati vidyate

वह व्रत स्थिर होकर सूर्य के समान अडिग होकर स्थिरता को प्राप्त होता है। परमात्मा के बिना संसार में कुछ भी विद्यमान नहीं है।

श्लोक 39 (garuda.1.235.39)

विश्वरूपं तमेवैकमिति ज्ञात्वा विमुञ्चति । ओङ्कारं परमं ब्रह्म ध्यायेदब्जस्थितं विभुम्

viśvarūpaṁ tamevaikamiti jñātvā vimuñcati oṅkāraṁ paramaṁ brahma dhyāyedabjasthitaṁ vibhum

उन्हीं को एकमात्र विश्वरूप जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। ॐकार को परम ब्रह्म, कमल पर स्थित व्यापक रूप में ध्यान करना चाहिए,

श्लोक 40 (garuda.1.235.40)

क्षेत्रक्षेत्रज्ञरहितं जपेन्मात्रात्रयान्वितम् । हृदि सञ्चिन्तयेत्पूर्वं प्रधानं तस्य चोपरि

kṣetrakṣetrajñarahitaṁ japenmātrātrayānvitam hṛdi sañcintayetpūrvaṁ pradhānaṁ tasya copari

— क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के भेद से रहित, तीनों मात्राओं सहित जपते हुए। पहले हृदय में प्रधान (मूल प्रकृति) का चिंतन करना चाहिए, और उसके ऊपर —

श्लोक 41 (garuda.1.235.41)

तमो रजस्तथा सत्त्वं मण्डलत्रितयं क्रमात् । कृष्णरक्तसितं तस्मिन्पुरुषं जीवसंज्ञितम्

tamo rajastathā sattvaṁ maṇḍalatritayaṁ kramāt kṛṣṇaraktasitaṁ tasminpuruṣaṁ jīvasaṁjñitam

— तमस्, रजस् और सत्त्व के तीन मंडल क्रमशः, काले, लाल और सफ़ेद; उनमें जीव नामक पुरुष —

श्लोक 42 (garuda.1.235.42)

तस्योपरि गुणैश्वर्यमष्टपत्रं सरोरुहम् । ज्ञानं तु कर्णिका तत्र विज्ञानं केसराः स्मृताः

tasyopari guṇaiśvaryamaṣṭapatraṁ saroruham jñānaṁ tu karṇikā tatra vijñānaṁ kesarāḥ smṛtāḥ

— उसके ऊपर गुणों के ऐश्वर्य से युक्त आठ पंखुड़ी वाला कमल; उसमें ज्ञान कर्णिका है, विज्ञान को केसर कहा गया है,

श्लोक 43 (garuda.1.235.43)

वैराग्यनालं तत्कन्दो वैष्णवो धर्म उत्तमः । कर्णिकायां स्थितं तत्र जीववन्निश्चलं विभु

vairāgyanālaṁ tatkando vaiṣṇavo dharma uttamaḥ karṇikāyāṁ sthitaṁ tatra jīvavanniścalaṁ vibhu

— वैराग्य उसकी नाल है, उत्तम वैष्णव धर्म उसका कंद है; उस कर्णिका में जीव के समान अचल, व्यापक विराजते हैं।

श्लोक 44 (garuda.1.235.44)

ध्यायेदुरसि संयुक्तमोङ्कारं मुक्तिसाधकम् । ध्यायन्यदि त्यजेत्प्राणान्याति ब्रह्म स्वसन्निधिम्

dhyāyedurasi saṁyuktamoṅkāraṁ muktisādhakam dhyāyanyadi tyajetprāṇānyāti brahma svasannidhim

वक्षस्थल में स्थित मुक्तिदायक ॐकार का ध्यान करना चाहिए; यदि ध्यान करते हुए प्राण त्याग दे, तो वह ब्रह्म की सन्निधि को प्राप्त होता है।

श्लोक 45 (garuda.1.235.45)

हरिं संस्थाप्य देहाब्जे ध्यायन्यो गी च भक्तिभाक् । आत्मानमात्मना केचित्पश्यन्ति ध्यानचक्षुषः

hariṁ saṁsthāpya dehābje dhyāyanyo gī ca bhaktibhāk ātmānamātmanā kecitpaśyanti dhyānacakṣuṣaḥ

शरीर-रूपी कमल में हरि की स्थापना कर ध्यान करने वाला भक्त योगी, और कुछ लोग ध्यान-नेत्र से आत्मा को आत्मा द्वारा देखते हैं —

श्लोक 46 (garuda.1.235.46)

सांख्यबुद्ध्या तथैवान्ये योगेनान्ये तु योगिनः । ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं भवबन्धविभेदनम्

sāṁkhyabuddhyā tathaivānye yogenānye tu yoginaḥ brahmaprakāśakaṁ jñānaṁ bhavabandhavibhedanam

— कुछ सांख्य-बुद्धि से, कुछ अन्य योग से — योगीजन ब्रह्म को प्रकाशित करने वाले, भव-बंधन को नष्ट करने वाले ज्ञान को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 47 (garuda.1.235.47)

तत्रैकचित्ततायोगो मुक्तिदो नात्र संशयः । जितेन्द्रियात्मकरणो ज्ञानदृप्तो हि यो भवेत्

tatraikacittatāyogo muktido nātra saṁśayaḥ jitendriyātmakaraṇo jñānadṛpto hi yo bhavet

वहाँ एकाग्रचित्त-योग ही मुक्तिदायक है, इसमें संशय नहीं। जिसने इन्द्रियों, मन और अन्य साधनों को जीत लिया है और ज्ञान से परिपूर्ण है,

श्लोक 48 (garuda.1.235.48)

स मुक्तः कथ्यते योगी परमात्मन्यवस्थितः । आसनस्थानविधयो न योगस्य प्रसाधकाः

sa muktaḥ kathyate yogī paramātmanyavasthitaḥ āsanasthānavidhayo na yogasya prasādhakāḥ

— वही योगी परमात्मा में स्थित होकर मुक्त कहलाता है। आसन और स्थान के विधान योग को सिद्ध नहीं करते;

श्लोक 49 (garuda.1.235.49)

विलम्बजनकाः सर्वे विस्तराः परिकीर्तिताः । शिशुपालः सिद्धिमाप स्मरणाभ्यासगौरवात्

vilambajanakāḥ sarve vistarāḥ parikīrtitāḥ śiśupālaḥ siddhimāpa smaraṇābhyāsagauravāt

— ये सब विस्तार विलंब उत्पन्न करने वाले ही कहे गए हैं। शिशुपाल ने स्मरण के अभ्यास की गहनता से ही सिद्धि प्राप्त की।

श्लोक 50 (garuda.1.235.50)

योगाभ्यासं प्रकुर्वन्तः पस्यन्त्यात्मानमात्मना । सर्वभूतेषु कारुण्यं विद्वेषं विषयेषु च

yogābhyāsaṁ prakurvantaḥ pasyantyātmānamātmanā sarvabhūteṣu kāruṇyaṁ vidveṣaṁ viṣayeṣu ca

योगाभ्यास करने वाले आत्मा को आत्मा से देखते हैं; सभी प्राणियों में करुणा और विषयों में विरक्ति रखकर,

श्लोक 51 (garuda.1.235.51)

गुप्तशिश्रोदरादिश्च कुर्वन्योगी विमुच्यते । इन्द्रियैरिन्द्रियार्थांस्तु न जानाति नरो यदा

guptaśiśrodarādiśca kurvanyogī vimucyate indriyairindriyārthāṁstu na jānāti naro yadā

— गुप्त रूप से जननेंद्रिय-उदर आदि को संयमित करने वाला योगी मुक्त हो जाता है। जब मनुष्य इन्द्रियों से इन्द्रिय-विषयों को नहीं जानता,

श्लोक 52 (garuda.1.235.52)

काष्ठवद्ब्रह्मसंलीनो योगी मुक्तस्तदा भवेत् । सर्ववर्णाः श्रियः सर्वाः कृत्वा पापानि भस्मसात्

kāṣṭhavadbrahmasaṁlīno yogī muktastadā bhavet sarvavarṇāḥ śriyaḥ sarvāḥ kṛtvā pāpāni bhasmasāt

— तब वह लकड़ी के समान ब्रह्म में लीन योगी मुक्त हो जाता है। सभी पापों को भस्म कर, सभी वर्णों की सम्पदाएँ और श्री प्राप्त कर —

श्लोक 53 (garuda.1.235.53)

ध्यानाग्निना च मेधावी लभते परमां गतिम् । मन्थनाद्दृश्यते ह्यग्निस्तद्वद्ध्यानेन वै हरिः

dhyānāgninā ca medhāvī labhate paramāṁ gatim manthanāddṛśyate hyagnistadvaddhyānena vai hariḥ

— ध्यान-रूपी अग्नि से बुद्धिमान परम गति प्राप्त करता है। जैसे मंथन से अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही ध्यान से हरि प्रकट होते हैं।

श्लोक 54 (garuda.1.235.54)

ब्रह्मात्मनोर्यदैकत्वं स योगश्चोत्तमोत्तमः । बाह्यरूपैर्न मुक्तिस्तु चान्तस्थैः स्याद्यमादिभिः

brahmātmanoryadaikatvaṁ sa yogaścottamottamaḥ bāhyarūpairna muktistu cāntasthaiḥ syādyamādibhiḥ

जब ब्रह्म और आत्मा में एकत्व होता है, वही सर्वोत्तम योग है। बाह्य रूपों से मुक्ति नहीं होती, बल्कि यम आदि आंतरिक साधनों से होती है।

श्लोक 55 (garuda.1.235.55)

साङ्ख्यज्ञानेन योगेन वेदान्तश्रवणेन च । प्रत्यक्षतात्मनो या हि सा मुक्तिरभिधीयते । अनात्मन्यात्मरूपत्वमसतः सत्स्वरूपता

sāṅkhyajñānena yogena vedāntaśravaṇena ca pratyakṣatātmano yā hi sā muktirabhidhīyate anātmanyātmarūpatvamasataḥ satsvarūpatā

सांख्य-ज्ञान से, योग से और वेदांत-श्रवण से जो आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वही मुक्ति कही जाती है। अनात्मा में आत्म-भाव और असत् में सत्-स्वरूप का बोध ही [बंधन का कारण] है।

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