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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 33

सुदर्शन-पूजा-विधि

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (garuda.1.33.1)

।।रुद्र उवाच । सुदर्शनस्य पूजां मे वद शङ्खगदाधर । ग्रहरोगादिकं सर्वं यत्कृत्वा नाशमेति वै

rudra uvāca sudarśanasya pūjāṁ me vada śaṅkhagadādhara graharogādikaṁ sarvaṁ yatkṛtvā nāśameti vai

रुद्र ने कहा — हे शंख-गदाधारी! मुझे सुदर्शन-चक्र की पूजा बताइए, जिसे करने से समस्त ग्रह-बाधा और रोग नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 2 (garuda.1.33.2)

हरिरुवाच । सुदर्शनस्य चक्रस्य श्रृणु पूजां वृषध्वज । स्नानमादौ प्रकुर्वीत पूजयेच्च हरिं तत

hariruvāca sudarśanasya cakrasya śrṛṇu pūjāṁ vṛṣadhvaja snānamādau prakurvīta pūjayecca hariṁ tata

हरि ने कहा — हे वृषध्वज! सुदर्शन-चक्र की पूजा सुनो। पहले स्नान करे, तत्पश्चात् हरि की पूजा करे।

श्लोक 3 (garuda.1.33.3)

मूलमन्त्रेण वै न्यासं मूलमन्त्रं श्रृणुष्व च । सहस्रारं हुं फट् नमो मन्त्रः प्रणवपूर्वकः

mūlamantreṇa vai nyāsaṁ mūlamantraṁ śrṛṇuṣva ca sahasrāraṁ huṁ phaṭ namo mantraḥ praṇavapūrvakaḥ

मूल-मंत्र से न्यास करे; मूल-मंत्र भी सुनो — 'सहस्रार हुं फट् नमः' — यह मंत्र प्रणव-पूर्वक है।

श्लोक 4 (garuda.1.33.4)

कथितः सर्वदुष्टानां नाशको मन्त्रभेदकः । ध्यायेत्सुदर्शनं देवं हृदि पद्मेऽमले शुभे

kathitaḥ sarvaduṣṭānāṁ nāśako mantrabhedakaḥ dhyāyetsudarśanaṁ devaṁ hṛdi padme'male śubhe

यह समस्त दुष्टों का नाशक और मंत्रों को भेदने वाला कहा गया है। हृदय के निर्मल, शुभ कमल में सुदर्शन देव का ध्यान करे।

श्लोक 5 (garuda.1.33.5)

शङ्कचक्रगदापद्मधरं सौम्यं किरीटिनम् । आवाह्य मण्डले देवं पूर्वोक्तविधिना हर

śaṅkacakragadāpadmadharaṁ saumyaṁ kirīṭinam āvāhya maṇḍale devaṁ pūrvoktavidhinā hara

शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए, सौम्य, मुकुटधारी देव का ध्यान करे। हे हर! पूर्वोक्त विधि से मंडल में देवता का आवाहन करे।

श्लोक 6 (garuda.1.33.6)

पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैरुपचारैर्महेश्वर । पूजयित्वा जपेन्मन्त्रं शतमष्टोत्तरं नरः

pūjayedgandhapuṣpādyairupacārairmaheśvara pūjayitvā japenmantraṁ śatamaṣṭottaraṁ naraḥ

हे महेश्वर! गंध, पुष्प आदि उपचारों से पूजा करे। पूजा कर, मनुष्य एक सौ आठ बार मंत्र का जप करे।

श्लोक 7 (garuda.1.33.7)

एवं यः कुरुते रुद्र ! चक्रस्यार्चनमुत्तमम् । सर्वरोगविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं समाप्नुयात्

evaṁ yaḥ kurute rudra ! cakrasyārcanamuttamam sarvarogavinirmukto viṣṇulokaṁ samāpnuyāt

हे रुद्र! जो इस प्रकार चक्र की उत्तम पूजा करता है, वह समस्त रोगों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (garuda.1.33.8)

एतत्स्तोत्रं जपेत्पश्चात्सर्वव्याधिविनाशनम् । नमः सुदर्शनायैव सहस्रादित्यवर्चसे

etatstotraṁ japetpaścātsarvavyādhivināśanam namaḥ sudarśanāyaiva sahasrādityavarcase

तत्पश्चात् यह स्तोत्र जपे, जो समस्त व्याधियों का नाशक है — 'सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी सुदर्शन को नमस्कार।'

श्लोक 9 (garuda.1.33.9)

ज्वालामालाप्रदीप्ताय सहस्राराय चक्षुषे । सर्वदुष्टविनाशाय सर्वपातकमर्दिने

jvālāmālāpradīptāya sahasrārāya cakṣuṣe sarvaduṣṭavināśāya sarvapātakamardine

'ज्वाला-माला से प्रदीप्त, सहस्र-आरे वाले, नेत्र-स्वरूप, समस्त दुष्टों का नाश करने वाले, समस्त पापों को कुचलने वाले को नमस्कार।'

श्लोक 10 (garuda.1.33.10)

सुचक्राय विचक्राय सर्वमन्त्रविभेदिने । प्रसवित्रे जगद्धात्रे जगद्विध्वंसिने नमः

sucakrāya vicakrāya sarvamantravibhedine prasavitre jagaddhātre jagadvidhvaṁsine namaḥ

'सुचक्र, विचक्र, समस्त मंत्रों को भेदने वाले को नमस्कार। जगत को उत्पन्न करने वाले, जगत को धारण करने वाले, जगत का विध्वंस करने वाले को नमस्कार।'

श्लोक 11 (garuda.1.33.11)

पालनार्थाय लोकानां दुष्टासुरविनाशिने । उग्राय चैव सौम्याय चण्डाय च नमोनमः

pālanārthāya lokānāṁ duṣṭāsuravināśine ugrāya caiva saumyāya caṇḍāya ca namonamaḥ

'लोकों की रक्षा के लिए, दुष्ट असुरों का नाश करने वाले को नमस्कार। उग्र, सौम्य, तथा चंड को बारंबार नमस्कार।'

श्लोक 12 (garuda.1.33.12)

नमश्चक्षुः स्वरूपाय संसारभयभेदिने । मायापञ्जरभेत्रे च शिवाय च नमोनमः

namaścakṣuḥ svarūpāya saṁsārabhayabhedine māyāpañjarabhetre ca śivāya ca namonamaḥ

'नेत्र-स्वरूप को नमस्कार, संसार के भय का नाश करने वाले को नमस्कार। माया-पिंजर को भेदने वाले, शिव-स्वरूप को बारंबार नमस्कार।'

श्लोक 13 (garuda.1.33.13)

ग्रहातिग्रहरूपाय ग्रहाणां पतये नमः । कालाय मृत्यवे चैव भीमाय च नमोनमः

grahātigraharūpāya grahāṇāṁ pataye namaḥ kālāya mṛtyave caiva bhīmāya ca namonamaḥ

'ग्रहों से भी अधिक ग्रह-स्वरूप को, ग्रहों के स्वामी को नमस्कार। काल को, मृत्यु को, भीम को बारंबार नमस्कार।'

श्लोक 14 (garuda.1.33.14)

भक्तानुग्रहदात्रे च भक्तगोप्त्रे नमोनमः । विष्णुरूपाय शान्ताय चायुधानां धराय च

bhaktānugrahadātre ca bhaktagoptre namonamaḥ viṣṇurūpāya śāntāya cāyudhānāṁ dharāya ca

'भक्तों पर अनुग्रह करने वाले, भक्तों के रक्षक को बारंबार नमस्कार। विष्णु-स्वरूप, शांत, आयुधों को धारण करने वाले को नमस्कार।'

श्लोक 15 (garuda.1.33.15)

विष्णुशस्त्राय चक्राय नमो भूयो नमोनमः । इति स्तोत्रं महापुण्यं चक्रस्य तव कीर्त्तितम्

viṣṇuśastrāya cakrāya namo bhūyo namonamaḥ iti stotraṁ mahāpuṇyaṁ cakrasya tava kīrttitam

'विष्णु के अस्त्र, चक्र को बारंबार नमस्कार, नमस्कार।' इस प्रकार चक्र का यह महापुण्य स्तोत्र तुम्हें बताया गया।

श्लोक 16 (garuda.1.33.16)

यः पठेत्परया भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति । चक्रपूजाविधिं यश्च पठेद्रुद्र जितेन्द्रियः । स पापं भस्मसात्कृत्वा विष्णुलोकाय कल्पते

yaḥ paṭhetparayā bhaktyā viṣṇulokaṁ sa gacchati cakrapūjāvidhiṁ yaśca paṭhedrudra jitendriyaḥ sa pāpaṁ bhasmasātkṛtvā viṣṇulokāya kalpate

जो परम भक्ति से इसे पढ़ता है, वह विष्णुलोक को जाता है। हे रुद्र! जो जितेंद्रिय व्यक्ति चक्र-पूजा-विधि को पढ़ता है, वह अपने पापों को भस्म कर विष्णुलोक के योग्य हो जाता है।

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