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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 39

सूर्य-अर्चन-प्रकार

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

श्लोक 1 (garuda.1.39.1)

।।रुद्र उवाच । पुनर्देवार्चनं ब्रूहि संक्षेपेण जनार्दन । सूर्य्यस्य विष्णुरूपस्य भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्

rudra uvāca punardevārcanaṁ brūhi saṁkṣepeṇa janārdana sūryyasya viṣṇurūpasya bhuktimuktipradāyakam

रुद्र ने कहा — हे जनार्दन! फिर से संक्षेप में देव-पूजा बताइए — विष्णु-स्वरूप सूर्य की, जो भोग और मोक्ष देने वाली है।

श्लोक 2 (garuda.1.39.2)

।।वासुदेव उवाच । श्रृणु सूर्य्यस्य रुद्र त्वं पुनर्वक्ष्यामि पूजनम् । ॐ उच्चैः श्रवसे नमः ॐ अरुणाय नमः । ॐ दण्डिने नमः । ॐ पिङ्गलाय नमः । एते द्वारे प्रपूज्या वै एपिर्मन्त्रैर्वृषध्वज

vāsudeva uvāca śrṛṇu sūryyasya rudra tvaṁ punarvakṣyāmi pūjanam oṁ uccaiḥ śravase namaḥ oṁ aruṇāya namaḥ oṁ daṇḍine namaḥ oṁ piṅgalāya namaḥ ete dvāre prapūjyā vai epirmantrairvṛṣadhvaja

वासुदेव ने कहा — हे रुद्र! सुनो, मैं तुम्हें फिर से सूर्य की पूजा बताता हूँ। 'ॐ उच्चैःश्रवा को नमस्कार। ॐ अरुण को नमस्कार। ॐ दंडी को नमस्कार। ॐ पिंगल को नमस्कार।' हे वृषध्वज! इन्हीं मंत्रों से द्वार पर इनकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 3 (garuda.1.39.3)

ॐ अं प्रभूताय नमः । इमं तु पूजयेन्मध्ये प्रभूतामलसञ्ज्ञकम् । ॐ अं विमलाय नमः । ॐ अं साराय नमः । ॐ अं आधाराय नमः । ॐ अं परममुखाय नमः । इत्याग्नेयादिकोणएषु पूज्या वै विमलादयः

oṁ aṁ prabhūtāya namaḥ imaṁ tu pūjayenmadhye prabhūtāmalasañjñakam oṁ aṁ vimalāya namaḥ oṁ aṁ sārāya namaḥ oṁ aṁ ādhārāya namaḥ oṁ aṁ paramamukhāya namaḥ ityāgneyādikoṇaeṣu pūjyā vai vimalādayaḥ

'ॐ अं प्रभूत को नमस्कार' — इसकी मध्य में पूजा करे, जो प्रभूत-अमल नाम से जाना जाता है। 'ॐ अं विमला को नमस्कार। ॐ अं सारा को नमस्कार। ॐ अं आधारा को नमस्कार। ॐ अं परममुखी को नमस्कार' — इस प्रकार आग्नेय आदि कोणों में विमला आदि पूज्य हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.39.4)

ॐ पद्माय नमः । ॐ कर्णिकायै नमः । मघ्ये तु पूजयेद्रुद्र पूर्वादिषु तथैव च । दीप्ताद्याः पूजयेन्मध्ये पूजयेत्सर्वतोमुखीः । ॐ वां(रां) दीप्तायै नमः । ॐ वीं (रीं) सूक्ष्मायै नमः । ॐ वूं (रूं भद्रायै नमः । ॐ वैं (रैं) जयायै नमः । ॐ वौं (रौं) विभूत्यै नमः । ॐ वं (रं) अघोरायै नमः । ॐ वं (रं) वैद्युतायै नमः । ॐ वः (रः) विजयायै नमः । ॐ रो सर्वतोमुख्यै नमः

oṁ padmāya namaḥ oṁ karṇikāyai namaḥ maghye tu pūjayedrudra pūrvādiṣu tathaiva ca dīptādyāḥ pūjayenmadhye pūjayetsarvatomukhīḥ oṁ vāṁ(rāṁ) dīptāyai namaḥ oṁ vīṁ (rīṁ) sūkṣmāyai namaḥ oṁ vūṁ (rūṁ bhadrāyai namaḥ oṁ vaiṁ (raiṁ) jayāyai namaḥ oṁ vauṁ (rauṁ) vibhūtyai namaḥ oṁ vaṁ (raṁ) aghorāyai namaḥ oṁ vaṁ (raṁ) vaidyutāyai namaḥ oṁ vaḥ (raḥ) vijayāyai namaḥ oṁ ro sarvatomukhyai namaḥ

'ॐ पद्म को नमस्कार। ॐ कर्णिका को नमस्कार।' हे रुद्र! मध्य में, तथा पूर्व आदि दिशाओं में भी इसी प्रकार पूजा करे। दीप्ता आदि की मध्य में पूजा करे, सर्वतोमुखी की पूजा करे। 'ॐ रां दीप्ता को नमस्कार। ॐ रीं सूक्ष्मा को नमस्कार। ॐ रूं भद्रा को नमस्कार। ॐ रैं जया को नमस्कार। ॐ रौं विभूति को नमस्कार। ॐ रं अघोरा को नमस्कार। ॐ रं वैद्युता को नमस्कार। ॐ रः विजया को नमस्कार। ॐ रो सर्वतोमुखी को नमस्कार।'

श्लोक 5 (garuda.1.39.5)

ॐ अर्कासनाय नमः । ॐ ह्रां सूर्य्यमूर्तये नमः । एतास्तु पूजयेन्मध्ये ह्रन्मंत्राञ्छृणु शङ्कर । ॐ हं सं खं खखोल्काय क्रां क्रीं सः स्वाहा सूर्य्यमूर्त्तये नमः । अनेनावाहनं कुर्य्यात्स्थापनं सन्निधापनम् । सन्निरोपनमन्त्रेण सकलीकरणं तथा

oṁ arkāsanāya namaḥ oṁ hrāṁ sūryyamūrtaye namaḥ etāstu pūjayenmadhye hranmaṁtrāñchṛṇu śaṅkara oṁ haṁ saṁ khaṁ khakholkāya krāṁ krīṁ saḥ svāhā sūryyamūrttaye namaḥ anenāvāhanaṁ kuryyātsthāpanaṁ sannidhāpanam sanniropanamantreṇa sakalīkaraṇaṁ tathā

'ॐ अर्क-आसन को नमस्कार। ॐ ह्रां सूर्य-मूर्ति को नमस्कार।' मध्य में इनकी पूजा करे; हे शंकर! हृदय-मंत्र सुनो — 'ॐ हं सं खं खखोल्क को, क्रां क्रीं सः स्वाहा, सूर्य-मूर्ति को नमस्कार।' इसी से आवाहन, स्थापन, सन्निधापन, तथा सन्निरोधन-मंत्र से सकलीकरण भी करे।

श्लोक 6 (garuda.1.39.6)

मुद्राया दर्शनं रुद्र मूलमन्त्रेण वा हर । तेजोरूपं रक्तवर्णं सितपद्मोपरि स्थितम् । एकचक्ररथारूढं द्विबाहुं धृतपङ्कजम्

mudrāyā darśanaṁ rudra mūlamantreṇa vā hara tejorūpaṁ raktavarṇaṁ sitapadmopari sthitam ekacakrarathārūḍhaṁ dvibāhuṁ dhṛtapaṅkajam

हे रुद्र! हे हर! मूल-मंत्र से मुद्रा दिखाए। तेज-स्वरूप, रक्त-वर्ण, श्वेत कमल पर स्थित, एक-चक्र वाले रथ पर आरूढ़, दो भुजाओं वाले, कमल धारण किए हुए सूर्य का ध्यान करे।

श्लोक 7 (garuda.1.39.7)

एवं ध्यायेत्सदा सूर्य्यं मूलमन्त्रं श्रृणुष्व च । ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्य्याय नमः

evaṁ dhyāyetsadā sūryyaṁ mūlamantraṁ śrṛṇuṣva ca oṁ hrāṁ hrīṁ saḥ sūryyāya namaḥ

इस प्रकार सदा सूर्य का ध्यान करे। मूल-मंत्र सुनो — 'ॐ ह्रां ह्रीं सः, सूर्य को नमस्कार।'

श्लोक 8 (garuda.1.39.8)

वारत्रयं पद्ममुद्रां बिम्बमुद्रां च दर्शयेत् । ॐ आं हृदयाय नमः । ॐ अर्काय शिरसे स्वाहा । ॐ अः भूर्भुवः स्वः ज्वालिनि शिखायै वषट् । ॐ हुं कवचाय हुं । ॐ भां नेत्राभ्यां वौषट् । ॐ वः अस्त्राय फडिति

vāratrayaṁ padmamudrāṁ bimbamudrāṁ ca darśayet oṁ āṁ hṛdayāya namaḥ oṁ arkāya śirase svāhā oṁ aḥ bhūrbhuvaḥ svaḥ jvālini śikhāyai vaṣaṭ oṁ huṁ kavacāya huṁ oṁ bhāṁ netrābhyāṁ vauṣaṭ oṁ vaḥ astrāya phaḍiti

तीन बार पद्म-मुद्रा और बिंब-मुद्रा दिखाए। 'ॐ आं हृदय को नमस्कार। ॐ अर्क को, शिर को स्वाहा। ॐ अः भूर्भुवःस्वः, ज्वालिनी को, शिखा को वषट्। ॐ हुं कवच को हुं। ॐ भां दोनों नेत्रों को वौषट्। ॐ वः अस्त्र को फट्' — इस प्रकार।

श्लोक 9 (garuda.1.39.9)

आग्नेय्यामथवैशान्यां नैर्ऋत्यामर्चयेद्धर । ह्रृद्यादि हि वायव्यां नेत्रं चान्तः प्रपूजयेत्

āgneyyāmathavaiśānyāṁ nairṛtyāmarcayeddhara hrṛdyādi hi vāyavyāṁ netraṁ cāntaḥ prapūjayet

हे हर! आग्नेय में, अथवा ईशान्य में, नैऋत्य में पूजन करे। हृदय आदि का वायव्य में, तथा नेत्र का अंदर भलीभाँति पूजन करे।

श्लोक 10 (garuda.1.39.10)

दिस्वस्त्रं पूजयेद्रुद्र सोमं तु श्वेतवर्णकम् । दले पूर्वेऽर्चयेद्रुद्र बुधं चामीकरप्रभम्

disvastraṁ pūjayedrudra somaṁ tu śvetavarṇakam dale pūrve'rcayedrudra budhaṁ cāmīkaraprabham

हे रुद्र! दिशाओं में अस्त्र की पूजा करे। श्वेत-वर्ण सोम की, हे रुद्र! पूर्व दल में, तथा स्वर्ण के समान प्रभा वाले बुध की पूजा करे।

श्लोक 11 (garuda.1.39.11)

दक्षिणे पूजयेद्रुद्र पतिवर्णं गुरुं यजेत् । पश्चिमे चैव भूतेशं उत्तरे भार्गवं सितम्

dakṣiṇe pūjayedrudra pativarṇaṁ guruṁ yajet paścime caiva bhūteśaṁ uttare bhārgavaṁ sitam

हे रुद्र! दक्षिण में पीत-वर्ण बृहस्पति का यजन करे। पश्चिम में भूतेश (सर्वप्राणियों के स्वामी) का, उत्तर में श्वेत-वर्ण शुक्र का पूजन करे।

श्लोक 12 (garuda.1.39.12)

रक्तमङ्गारकं चैव आग्नेये पूजयेद्धर । शनैश्चरं कृष्णवर्णं नैर्ऋत्यां दिशि पूजयेत्

raktamaṅgārakaṁ caiva āgneye pūjayeddhara śanaiścaraṁ kṛṣṇavarṇaṁ nairṛtyāṁ diśi pūjayet

हे हर! आग्नेय दिशा में रक्त-वर्ण मंगल की पूजा करे। नैऋत्य दिशा में कृष्ण-वर्ण शनैश्चर की पूजा करे।

श्लोक 13 (garuda.1.39.13)

राहुं वायव्यदेशे तु नन्द्यावर्त्तनिभिं हर । ऐशान्यां धूम्रवर्णं तु केतुं सं परिपूजयेत्

rāhuṁ vāyavyadeśe tu nandyāvarttanibhiṁ hara aiśānyāṁ dhūmravarṇaṁ tu ketuṁ saṁ paripūjayet

हे हर! वायव्य दिशा में नंद्यावर्त पुष्प के समान वर्ण वाले राहु की पूजा करे। ईशान्य में धूम्र-वर्ण केतु की भलीभाँति पूजा करे।

श्लोक 14 (garuda.1.39.14)

एभिर्मन्त्रैर्महादेव तच्छृणुष्व च शङ्कर

ebhirmantrairmahādeva tacchṛṇuṣva ca śaṅkara

हे महादेव! हे शंकर! इन्हीं मंत्रों को सुनो —

श्लोक 15 (garuda.1.39.15)

ॐ सों सोमाय नमः । ॐ बुं बुधाय नमः । ॐ बृं बृहस्पतये नमः । ॐ भं भार्गवाय नमः । ॐ अं अंगारकाय नमः । ॐ शं शनैश्चराय नमः । ॐ रं राहवे नमः । ॐ कं केतवे नम इति

oṁ soṁ somāya namaḥ oṁ buṁ budhāya namaḥ oṁ bṛṁ bṛhaspataye namaḥ oṁ bhaṁ bhārgavāya namaḥ oṁ aṁ aṁgārakāya namaḥ oṁ śaṁ śanaiścarāya namaḥ oṁ raṁ rāhave namaḥ oṁ kaṁ ketave nama iti

'ॐ सों सोम को नमस्कार। ॐ बुं बुध को नमस्कार। ॐ बृं बृहस्पति को नमस्कार। ॐ भं शुक्र को नमस्कार। ॐ अं मंगल को नमस्कार। ॐ शं शनैश्चर को नमस्कार। ॐ रं राहु को नमस्कार। ॐ कं केतु को नमस्कार' — इस प्रकार।

श्लोक 16 (garuda.1.39.16)

पाद्यादीन्मूलमन्त्रेण दत्त्वा सूर्य्याय शङ्कर । नैवेद्यान्ते धेनुमुद्रां दर्शयेत्साधकोत्तमः

pādyādīnmūlamantreṇa dattvā sūryyāya śaṅkara naivedyānte dhenumudrāṁ darśayetsādhakottamaḥ

हे शंकर! मूल-मंत्र से पाद्य आदि सूर्य को अर्पित कर, नैवेद्य के अंत में उत्तम साधक धेनु-मुद्रा दिखाए।

श्लोक 17 (garuda.1.39.17)

जप्त्वा चाष्टसहस्त्रं तु तच्च तस्मै समर्पयेत् । ऐशान्यां दिशि भूतेश तेजश्चण्डं तु पूजयेत्

japtvā cāṣṭasahastraṁ tu tacca tasmai samarpayet aiśānyāṁ diśi bhūteśa tejaścaṇḍaṁ tu pūjayet

आठ हज़ार बार जप कर, उसे उसी को समर्पित करे। हे भूतेश! ईशान्य दिशा में तेजश्चंड की पूजा करे।

श्लोक 18 (garuda.1.39.18)

ॐ तेजश्चण्डाय हुं फट् स्वधा स्वाहा पौषट् । निर्माल्यं चार्पयेत्तस्मै ह्यर्घ्यं दद्यात्ततो हर

oṁ tejaścaṇḍāya huṁ phaṭ svadhā svāhā pauṣaṭ nirmālyaṁ cārpayettasmai hyarghyaṁ dadyāttato hara

'ॐ तेजश्चंड को हुं फट् स्वधा स्वाहा वौषट्।' उसे निर्माल्य अर्पित करे; हे हर! तत्पश्चात् अर्घ्य दे।

श्लोक 19 (garuda.1.39.19)

तिलतण्डुलसंयुक्तं रक्तचन्दनचर्चितम् । गन्धोदकेन संमिश्रं पुष्पधूपसमन्वितम्

tilataṇḍulasaṁyuktaṁ raktacandanacarcitam gandhodakena saṁmiśraṁ puṣpadhūpasamanvitam

तिल और चावल से युक्त, लाल चंदन से चर्चित, सुगंधित जल से मिश्रित, पुष्प और धूप से युक्त अर्घ्य-पात्र तैयार करे।

श्लोक 20 (garuda.1.39.20)

कृत्वा शिरसि तत्पात्रं जानुभ्यामवनिं गतः । दर्घ्यं तु सूर्य्याय ह्रृन्मन्त्रेण वृषध्वज

kṛtvā śirasi tatpātraṁ jānubhyāmavaniṁ gataḥ darghyaṁ tu sūryyāya hrṛnmantreṇa vṛṣadhvaja

उस पात्र को सिर पर रखकर, घुटनों से भूमि पर बैठकर, हे वृषध्वज! हृदय-मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दे।

श्लोक 21 (garuda.1.39.21)

गणं गुरून्प्रपूज्याथ सर्वान्देवानन्प्रपूजयेत् । ॐ गं गणपतये नमः । ॐ अं गुरुभ्यो नमः

gaṇaṁ gurūnprapūjyātha sarvāndevānanprapūjayet oṁ gaṁ gaṇapataye namaḥ oṁ aṁ gurubhyo namaḥ

गणपति और गुरुओं की भलीभाँति पूजा कर, तत्पश्चात् समस्त देवताओं की पूजा करे। 'ॐ गं, गणपति को नमस्कार।' 'ॐ अं, गुरुओं को नमस्कार।'

श्लोक 22 (garuda.1.39.22)

सूर्य्यस्य कथिता पूजा कृत्वैतां विष्णुलोकभाक्

sūryyasya kathitā pūjā kṛtvaitāṁ viṣṇulokabhāk

इस प्रकार सूर्य की पूजा बताई गई; इसे करने वाला विष्णुलोक का भागी होता है।

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