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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 4

सृष्टि-वर्णन

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (garuda.1.4.1)

।।रुद्र उवाच । सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव एतद् ब्रूहि जनार्दन

rudra uvāca sargaśca pratisargaśca vaṁśo manvantarāṇi ca vaṁśānucaritaṁ caiva etad brūhi janārdana

रुद्र ने कहा — सृष्टि, प्रतिसृष्टि, वंश, मन्वंतर और वंशों का चरित — हे जनार्दन! यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 2 (garuda.1.4.2)

।। हरिरुवाच । श्रृणु रुद्र प्रवक्ष्यामि सर्गादीन्पापनाशनान् । सर्गस्थितिप्रलयान्तां तां विष्णोः क्रीडां पुरातनीम्

hariruvāca śrṛṇu rudra pravakṣyāmi sargādīnpāpanāśanān sargasthitipralayāntāṁ tāṁ viṣṇoḥ krīḍāṁ purātanīm

हरि ने कहा — हे रुद्र! सुनो, मैं पापनाशक सृष्टि आदि का वर्णन करता हूँ — सृष्टि, स्थिति और प्रलय तक फैली विष्णु की उस पुरातन क्रीड़ा का।

श्लोक 3 (garuda.1.4.3)

नरनारायणो देवो वासुदेवो निरंजनः । परमात्मा परं ब्रह्म जगज्जनिलयादिकृत्

naranārāyaṇo devo vāsudevo niraṁjanaḥ paramātmā paraṁ brahma jagajjanilayādikṛt

नर-नारायण देव, वासुदेव, निरंजन, परमात्मा, परब्रह्म ही जगत की उत्पत्ति और लय आदि के कर्ता हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.4.4)

तदेतत्सर्वमेवैतव्द्यक्ताव्यक्तस्वरूपवत् । तथा पुरुषरूपेण कालरूपेण च स्थितम्

tadetatsarvamevaitavdyaktāvyaktasvarūpavat tathā puruṣarūpeṇa kālarūpeṇa ca sthitam

यह सब कुछ व्यक्त और अव्यक्त, दोनों स्वरूपों में उन्हीं में स्थित है, तथा वे पुरुष-रूप और काल-रूप में भी स्थित हैं।

श्लोक 5 (garuda.1.4.5)

व्यक्तं विष्णुस्तथाऽव्यक्तं पुरुषः काल एव च । क्रीडतो बालकस्येव चेष्टास्तस्य निशामय

vyaktaṁ viṣṇustathā'vyaktaṁ puruṣaḥ kāla eva ca krīḍato bālakasyeva ceṣṭāstasya niśāmaya

विष्णु ही व्यक्त हैं और वे ही अव्यक्त, वे ही पुरुष हैं और वे ही काल हैं। खेलते हुए बालक की चेष्टाओं के समान उनकी लीलाओं को समझो।

श्लोक 6 (garuda.1.4.6)

अनादिनिधनो धाता त्वनन्तः पुरुषोत्तमः । तस्माद्भवति चाव्यक्तं तस्मादात्मापि जायते

anādinidhano dhātā tvanantaḥ puruṣottamaḥ tasmādbhavati cāvyaktaṁ tasmādātmāpi jāyate

वे आदि-अंत रहित विधाता, अनंत, पुरुषोत्तम हैं। उन्हीं से अव्यक्त प्रकट होता है, और उन्हीं से आत्मतत्त्व (महत्तत्त्व) भी उत्पन्न होता है।

श्लोक 7 (garuda.1.4.7)

तस्माहुद्धिर्मनस्तस्मात्ततः खं पवनस्ततः । तस्मात्तेजस्ततस्त्वापस्ततो भूमिस्ततोऽभवत्

tasmāhuddhirmanastasmāttataḥ khaṁ pavanastataḥ tasmāttejastatastvāpastato bhūmistato'bhavat

उससे बुद्धि, उससे मन, उससे आकाश, उससे वायु, उससे तेज, उससे जल, और उससे पृथ्वी उत्पन्न हुई।

श्लोक 8 (garuda.1.4.8)

अण्डो हिरण्मयो रुद्र । तस्यान्तः स्वयमेव हि । शरीरग्रहणं पूर्वं सृष्ट्यर्थं कुरुते प्रभुः

aṇḍo hiraṇmayo rudra tasyāntaḥ svayameva hi śarīragrahaṇaṁ pūrvaṁ sṛṣṭyarthaṁ kurute prabhuḥ

हे रुद्र! वह अंड सुवर्णमय है। उस अंड के भीतर स्वयं प्रभु ही सृष्टि के लिए पहले शरीर धारण करते हैं।

श्लोक 9 (garuda.1.4.9)

ब्रह्मा चतुर्मुखो भूत्वा रजोमात्राधिकः सदा । शरीरग्रहणं कृत्वाऽसृजदेतच्चराचरम्

brahmā caturmukho bhūtvā rajomātrādhikaḥ sadā śarīragrahaṇaṁ kṛtvā'sṛjadetaccarācaram

चतुर्मुख ब्रह्मा बनकर, सदा रजोगुण की अधिकता से युक्त होकर, शरीर धारण कर उन्होंने इस चराचर जगत की सृष्टि की।

श्लोक 10 (garuda.1.4.10)

अण्डस्यान्तर्जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् । स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यं च पाति च

aṇḍasyāntarjagatsarvaṁ sadevāsuramānuṣam sraṣṭā sṛjati cātmānaṁ viṣṇuḥ pālyaṁ ca pāti ca

उस अंड के भीतर देवता, असुर और मनुष्यों सहित समस्त जगत है। सृष्टिकर्ता विष्णु स्वयं अपने ही रूप को सृजते हैं और पालनीय की रक्षा करते हैं।

श्लोक 11 (garuda.1.4.11)

अपसंह्रियते चान्ते संहर्त्ता च स्वयं हरि । ब्रह्मा भूत्वासृजद्विष्णुर्जगत्पाति हरिः स्वयम्

apasaṁhriyate cānte saṁharttā ca svayaṁ hari brahmā bhūtvāsṛjadviṣṇurjagatpāti hariḥ svayam

अंत में वे स्वयं ही उसका संहार करते हैं। ब्रह्मा बनकर वे सृजन करते हैं, विष्णु बनकर स्वयं जगत का पालन करते हैं, हरि स्वयं ही (यह करते हैं)।

श्लोक 12 (garuda.1.4.12)

रुद्ररूपी च कल्पान्ते जगत्संहरतेऽखिलम् । ब्रह्मा तु सृष्टिकालेऽस्मिञ्जमध्यगतां महीम्

rudrarūpī ca kalpānte jagatsaṁharate'khilam brahmā tu sṛṣṭikāle'smiñjamadhyagatāṁ mahīm

और रुद्र-रूप धारण कर कल्प के अंत में वे समस्त जगत का संहार करते हैं। इस सृष्टि-काल में ब्रह्मा जल में डूबी हुई इस पृथ्वी को,

श्लोक 13 (garuda.1.4.13)

दंष्टूयोद्धरति ज्ञात्वा वारहीमास्थितस्तनूम् । देवादिसर्गाद्वक्ष्येऽहं संक्षेपाच्छृणु शङ्कर !

daṁṣṭūyoddharati jñātvā vārahīmāsthitastanūm devādisargādvakṣye'haṁ saṁkṣepācchṛṇu śaṅkara !

जानकर, वराह-शरीर धारण कर अपने दाँतों से ऊपर उठाते हैं। हे शंकर! अब मैं देवता आदि की सृष्टि का संक्षेप में वर्णन करता हूँ, सुनो!

श्लोक 14 (garuda.1.4.14)

प्रथमो महतः सर्गो विरूपो ब्रह्मणस्तु सः । तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गो हि स स्मृतः

prathamo mahataḥ sargo virūpo brahmaṇastu saḥ tanmātrāṇāṁ dvitīyastu bhūtasargo hi sa smṛtaḥ

पहली सृष्टि महत्तत्त्व की है, जो ब्रह्मा का ही विरूप (अव्यक्त रूप) है। दूसरी सृष्टि तन्मात्राओं की है, जिसे भूत-सृष्टि कहा गया है।

श्लोक 15 (garuda.1.4.15)

वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्गस्त्वैन्द्रियकः स्मृतः । इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः

vaikārikastṛtīyastu sargastvaindriyakaḥ smṛtaḥ ityeṣa prākṛtaḥ sargaḥ sambhūto buddhipūrvakaḥ

तीसरी सृष्टि वैकारिक है, जिसे ऐन्द्रियक (इन्द्रियों की सृष्टि) कहा गया है। इस प्रकार यह प्राकृत सृष्टि है, जो बुद्धिपूर्वक हुई है।

श्लोक 16 (garuda.1.4.16)

मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः । तिर्य्यक्स्त्रोतास्तु यः प्रोक्तस्तिर्य्यग्योन्यः स उच्यते

mukhyasargaścaturthastu mukhyā vai sthāvarāḥ smṛtāḥ tiryyakstrotāstu yaḥ proktastiryyagyonyaḥ sa ucyate

चौथी सृष्टि मुख्य-सृष्टि है, जिसमें स्थावर (वृक्ष आदि) को मुख्य कहा गया है। जो तिर्यक्-स्रोता कही गई है, वह पशु-पक्षियों की योनि कहलाती है।

श्लोक 17 (garuda.1.4.17)

तदूर्द्धस्त्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः । ततोऽर्वाक्स्त्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः

tadūrddhastrotasāṁ ṣaṣṭho devasargastu sa smṛtaḥ tato'rvākstrotasāṁ sargaḥ saptamaḥ sa tu mānuṣaḥ

उसके ऊपर के स्रोत की छठी सृष्टि देव-सृष्टि कही गई है। उसके नीचे के स्रोत की सातवीं सृष्टि मानव-सृष्टि है।

श्लोक 18 (garuda.1.4.18)

अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसस्तु सः । पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः

aṣṭamo'nugrahaḥ sargaḥ sāttvikastāmasastu saḥ pañcaite vaikṛtāḥ sargāḥ prākṛtāstu trayaḥ smṛtāḥ

आठवीं सृष्टि अनुग्रह-सृष्टि है, जो सात्त्विक और तामसिक दोनों है। ये पाँच वैकृत सृष्टियाँ हैं, और तीन प्राकृत कही गई हैं।

श्लोक 19 (garuda.1.4.19)

प्राकृतो वैकृतश्चापि कौमारो नवमः स्मृतः । स्थावरान्ताः सुराद्यास्तु प्रजा रुद्र ! चतुर्विधाः

prākṛto vaikṛtaścāpi kaumāro navamaḥ smṛtaḥ sthāvarāntāḥ surādyāstu prajā rudra ! caturvidhāḥ

प्राकृत और वैकृत दोनों से मिलकर नौवीं सृष्टि कौमार कही गई है। हे रुद्र! स्थावर से लेकर देवता तक चार प्रकार की प्रजा है।

श्लोक 20 (garuda.1.4.20)

ब्रह्मणः कुर्वतः सृष्टिं जज्ञिरे मानसाः सुताः । ततो देवासुरपितॄन्मानुषांश्च चतुष्टयम्

brahmaṇaḥ kurvataḥ sṛṣṭiṁ jajñire mānasāḥ sutāḥ tato devāsurapitṝnmānuṣāṁśca catuṣṭayam

सृष्टि करते हुए ब्रह्मा के मानस पुत्र उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् देव, असुर, पितर और मनुष्य — ये चार (और उत्पन्न हुए)।

श्लोक 21 (garuda.1.4.21)

सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमपूजयत् । मुक्तात्मनस्तमोमात्रादुद्रिक्तास्तत्प्रजापतेः

sisṛkṣurambhāṁsyetāni svamātmānamapūjayat muktātmanastamomātrādudriktāstatprajāpateḥ

इन (चारों वर्गों की) सृष्टि की इच्छा करते हुए उन्होंने अपने ही स्वरूप की पूजा की। मुक्तात्मा उस प्रजापति से, तमोगुण की अधिकता से,

श्लोक 22 (garuda.1.4.22)

सिसृक्षेर्जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे ततः । उत्ससर्ज ततस्तां तु तमोमात्रात्मिकां तनूम्

sisṛkṣerjaghanātpūrvamasurā jajñire tataḥ utsasarja tatastāṁ tu tamomātrātmikāṁ tanūm

पहले जघन-भाग से असुर उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने तमोगुणमय उस शरीर को त्याग दिया।

श्लोक 23 (garuda.1.4.23)

तमोमात्रा तनुस्त्यक्ता शङ्कराभूद्विभावरी । यक्षोपक्षांसि तद्देहे प्रीतिमापुस्ततः सुराः

tamomātrā tanustyaktā śaṅkarābhūdvibhāvarī yakṣopakṣāṁsi taddehe prītimāpustataḥ surāḥ

त्यागा हुआ वह तमोगुणी शरीर अंधकारमय रात्रि बन गया। उस शरीर से यक्ष और राक्षस उत्पन्न होकर देवताओं को प्रिय हुए।

श्लोक 24 (garuda.1.4.24)

सत्त्वोद्रिक्तास्तु मुखतः संभूता ब्रह्मणो हर ! । सत्त्वप्राया तनुस्तेन सन्त्यक्ता साप्यभूद्दिनम्

sattvodriktāstu mukhataḥ saṁbhūtā brahmaṇo hara ! sattvaprāyā tanustena santyaktā sāpyabhūddinam

हे हर! सत्त्वगुण की अधिकता से मुख से देवता उत्पन्न हुए। सत्त्वप्रधान वह शरीर त्यागा जाकर दिन बन गया।

श्लोक 25 (garuda.1.4.25)

ततो हि बलिनो रात्रावसुरा देवता दिवा । सत्त्वमात्रां तनुं गृह्य पितरश्च ततोऽभवन्

tato hi balino rātrāvasurā devatā divā sattvamātrāṁ tanuṁ gṛhya pitaraśca tato'bhavan

तत्पश्चात् बलवान असुर रात्रि में और देवता दिन में (प्रबल होते) हैं। सत्त्वमय शरीर धारण करके तत्पश्चात् पितर उत्पन्न हुए।

श्लोक 26 (garuda.1.4.26)

सा चोत्सृष्टाभवत्सन्ध्या दिननक्तान्तरस्थितिः । रजोमात्रां तनुं गृह्य मनुष्यास्त्वभवंस्ततः

sā cotsṛṣṭābhavatsandhyā dinanaktāntarasthitiḥ rajomātrāṁ tanuṁ gṛhya manuṣyāstvabhavaṁstataḥ

वह त्यागा हुआ शरीर दिन और रात्रि के मध्य स्थित संध्या बन गया। रजोगुणमय शरीर धारण करके तत्पश्चात् मनुष्य उत्पन्न हुए।

श्लोक 27 (garuda.1.4.27)

सा त्यक्ता चाभवज्ज्योत्स्त्रा प्राक्सन्ध्या याभिधीयते । ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या शरीराणि तु तस्य वै

sā tyaktā cābhavajjyotstrā prāksandhyā yābhidhīyate jyotsnā rātryahanī sandhyā śarīrāṇi tu tasya vai

वह त्यागा हुआ शरीर ज्योत्स्ना (चाँदनी) बन गया, जिसे प्रातःसंध्या भी कहा जाता है। चाँदनी, रात, दिन और संध्या — ये सब उन्हीं (प्रजापति) के शरीर हैं।

श्लोक 28 (garuda.1.4.28)

रजोमात्रां तनु गृह्य क्षुदभूत्कोप एव च । क्षुत्तृट्क्षामा अमृग्भक्षा राक्षसा रक्षणाच्च ये

rajomātrāṁ tanu gṛhya kṣudabhūtkopa eva ca kṣuttṛṭkṣāmā amṛgbhakṣā rākṣasā rakṣaṇācca ye

रजोगुणमय शरीर धारण करने पर क्षुधा और क्रोध उत्पन्न हुए। भूख-प्यास से क्षीण, मांस-भक्षी राक्षस 'रक्षण' शब्द से (नामित हुए) —

श्लोक 29 (garuda.1.4.29)

यक्षाख्या यक्षणाज्ज्ञेयाः सर्पा वै केशसर्पणात् । जाताः कोपेन भूतास्ते गन्धर्वा जज्ञिरे ततः

yakṣākhyā yakṣaṇājjñeyāḥ sarpā vai keśasarpaṇāt jātāḥ kopena bhūtāste gandharvā jajñire tataḥ

यक्ष नाम 'यक्षण' (पूजा) से जानना चाहिए, और सर्प केशों के सरकने (रेंगने) से (नामित हुए)। क्रोध से उत्पन्न वे भूत, और तत्पश्चात् गंधर्व उत्पन्न हुए,

श्लोक 30 (garuda.1.4.30)

गायन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वाप्सरसश्च ये । स्वर्गं द्यौर्वक्षसश्चक्रे सुखतोऽजाः स सृष्टवान्

gāyanto jajñire vācaṁ gandharvāpsarasaśca ye svargaṁ dyaurvakṣasaścakre sukhato'jāḥ sa sṛṣṭavān

गाते हुए, वाणी के साथ उत्पन्न गंधर्व और अप्सराएँ। सुख से स्वर्ग और वक्षस्थल से द्युलोक की रचना की; उन्होंने बकरियों (अजाओं) की भी सृष्टि की।

श्लोक 31 (garuda.1.4.31)

सृष्टवानुदराद्राश्च पार्श्वाभ्यां च प्रजापतिः । पद्भ्यां चैवांत्यमातङ्गान्महिषोष्ट्राविकांस्तथा

sṛṣṭavānudarādrāśca pārśvābhyāṁ ca prajāpatiḥ padbhyāṁ caivāṁtyamātaṅgānmahiṣoṣṭrāvikāṁstathā

प्रजापति ने उदर से भेड़ों की और दोनों पार्श्वों से (अन्य पशुओं की) सृष्टि की, और अंत में चरणों से हाथी, भैंस, ऊँट और भेड़ों की रचना की।

श्लोक 32 (garuda.1.4.32)

ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे । गौरजः पुरुषो मेध्यो ह्यश्वाश्वतरगर्दभाः

oṣadhyaḥ phalamūlinyo romabhyastasya jajñire gaurajaḥ puruṣo medhyo hyaśvāśvataragardabhāḥ

उनके रोमों से फल-मूल वाली ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। गौ, बकरा, पवित्र पुरुष (यज्ञ-योग्य पशु), घोड़ा, खच्चर और गधा —

श्लोक 33 (garuda.1.4.33)

एतान् ग्राम्यान्पशून्प्राहुरारण्यांश्च निबोध मे । श्वापदं द्विखुरं हस्तिवानराः पक्षिपञ्चमाः

etān grāmyānpaśūnprāhurāraṇyāṁśca nibodha me śvāpadaṁ dvikhuraṁ hastivānarāḥ pakṣipañcamāḥ

इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है; अब वन्य पशुओं को भी मुझसे सुनो। नखयुक्त हिंसक पशु, दो खुरों वाले, हाथी, बंदर, और पाँचवें पक्षी —

श्लोक 34 (garuda.1.4.34)

औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमाश्च सरीसृपाः । पूर्वादिभ्यो मुखेभ्यस्तु ऋग्वेदाद्याः प्रजज्ञिरे

audakāḥ paśavaḥ ṣaṣṭhāḥ saptamāśca sarīsṛpāḥ pūrvādibhyo mukhebhyastu ṛgvedādyāḥ prajajñire

जल-चर पशु छठे हैं, और सातवें रेंगने वाले जीव (सरीसृप) हैं। पूर्व आदि (चारों) मुखों से ऋग्वेद आदि (चारों वेद) उत्पन्न हुए।

श्लोक 35 (garuda.1.4.35)

आस्याद्वै ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्त्रियाः स्मृताः । ऊरुभ्यां तु विशः सृष्टाः शूद्रः पद्भ्यां जायत

āsyādvai brāhmaṇā jātā bāhubhyāṁ kṣattriyāḥ smṛtāḥ ūrubhyāṁ tu viśaḥ sṛṣṭāḥ śūdraḥ padbhyāṁ jāyata

मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, भुजाओं से क्षत्रिय कहे गए हैं, दोनों जंघाओं से वैश्य उत्पन्न हुए और चरणों से शूद्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 36 (garuda.1.4.36)

ब्रह्मलोको ब्राह्मणानां शाक्रः क्षत्त्रियजन्मनाम् । मारुतं च विशां स्थानं गान्धर्वं शूद्रजन्मनाम्

brahmaloko brāhmaṇānāṁ śākraḥ kṣattriyajanmanām mārutaṁ ca viśāṁ sthānaṁ gāndharvaṁ śūdrajanmanām

ब्राह्मणों का स्थान ब्रह्मलोक है, क्षत्रिय-जन्म वालों का इंद्रलोक है, वैश्यों का स्थान मरुत्लोक है और शूद्र-जन्म वालों का गंधर्वलोक है।

श्लोक 37 (garuda.1.4.37)

ब्रह्मचारिव्रतस्थानां ब्रह्मलोकः प्रजायते । प्राजापत्यं गृहस्थानां यथाविहितकारिणाम्

brahmacārivratasthānāṁ brahmalokaḥ prajāyate prājāpatyaṁ gṛhasthānāṁ yathāvihitakāriṇām

ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित रहने वालों को ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। विधिपूर्वक कर्म करने वाले गृहस्थों को प्राजापत्य लोक प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (garuda.1.4.38)

स्थानं सप्तऋषीणां च तथैव वनवासिनाम् । यतीनामक्षयं स्थानं यदृच्छागामिनां सदा

sthānaṁ saptaṛṣīṇāṁ ca tathaiva vanavāsinām yatīnāmakṣayaṁ sthānaṁ yadṛcchāgāmināṁ sadā

तथा वन में रहने वालों को सप्तर्षियों का स्थान (प्राप्त होता है)। स्वेच्छा से विचरण करने वाले संन्यासियों का स्थान सदा अक्षय है।

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