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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 55

भुवनकोश-वर्णन

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

श्लोक 1 (garuda.1.55.1)

॥हरिरुवाच ॥ मध्ये त्विलावृतो वर्षो भद्राश्वः पूर्वतोऽद्भुतः ॥ पूर्वदक्षिणतो वर्षो हिरण्वान्वृषभध्वज

.hariruvāca . madhye tvilāvṛto varṣo bhadrāśvaḥ pūrvato'dbhutaḥ . pūrvadakṣiṇato varṣo hiraṇvānvṛṣabhadhvaja

हरि ने कहा — मध्य में इलावृत वर्ष है, पूर्व में अद्भुत भद्राश्व। हे वृषभध्वज, पूर्व-दक्षिण में हिरण्वान् वर्ष है,

श्लोक 2 (garuda.1.55.2)

ततः किम्पुरुषो वर्षो मेरोर्दक्षिणतः स्मृतः ॥ भारतो दक्षिणे प्रोक्तो हरिर्दक्षिणपश्चिमे

tataḥ kimpuruṣo varṣo merordakṣiṇataḥ smṛtaḥ . bhārato dakṣiṇe prokto harirdakṣiṇapaścime

फिर मेरु के दक्षिण में किंपुरुष वर्ष स्मरण किया गया है। दक्षिण में भारत कहा गया है, दक्षिण-पश्चिम में हरि-वर्ष,

श्लोक 3 (garuda.1.55.3)

पश्चिमे केतुमालश्च रम्यकः पश्चिमोत्तरे ॥ उत्तरे च कुरोर्वर्षः कल्पवृक्षसमावृतः

paścime ketumālaśca ramyakaḥ paścimottare . uttare ca kurorvarṣaḥ kalpavṛkṣasamāvṛtaḥ

पश्चिम में केतुमाल, और उत्तर-पश्चिम में रम्यक। उत्तर में कुरु का वर्ष है, जो कल्पवृक्षों से घिरा है,

श्लोक 4 (garuda.1.55.4)

सिद्धिः स्वाभाविकी रुद्र ! वर्जयित्वा तु भारतम् ॥ इन्द्रद्वीपः कशेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तितमान्

siddhiḥ svābhāvikī rudra ! varjayitvā tu bhāratam . indradvīpaḥ kaśerumāṁstāmravarṇo gabhastitamān

हे रुद्र, जहाँ भारत को छोड़कर सिद्धि स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है। इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्,

श्लोक 5 (garuda.1.55.5)

नागद्वीपः कटाहश्च सिंहलो वारुणस्तथा ॥ अयं तुनवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः

nāgadvīpaḥ kaṭāhaśca siṁhalo vāruṇastathā . ayaṁ tunavamasteṣāṁ dvīpaḥ sāgarasaṁvṛtaḥ

नागद्वीप, कटाह, सिंहल, और वारुण भी — यह इनमें नौवाँ द्वीप है, समुद्र से घिरा हुआ।

श्लोक 6 (garuda.1.55.6)

पूर्वे किरातास्तस्यास्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः ॥ अन्ध्रा दक्षिणतो रुद्र ! तुरष्कास्त्वपि चोत्तरे

pūrve kirātāstasyāste paścime yavanāḥ sthitāḥ . andhrā dakṣiṇato rudra ! turaṣkāstvapi cottare

इसके पूर्व में किरात रहते हैं, पश्चिम में यवन बसे हैं। हे रुद्र, दक्षिण में आन्ध्र, और उत्तर में तुरुष्क भी,

श्लोक 7 (garuda.1.55.7)

ब्राह्मणाः क्षत्त्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्तरवासिनः ॥ महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः

brāhmaṇāḥ kṣattriyā vaiśyāḥ śūdrāścāntaravāsinaḥ . mahendro malayaḥ sahyaḥ śuktimānṛkṣaparvataḥ

और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मध्य भाग में बसते हैं। महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष-पर्वत,

श्लोक 8 (garuda.1.55.8)

विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः ॥ वेदस्मृति र्नर्मदा च वरदा सुरसा शिवा

vindhyaśca pāriyātraśca saptātra kulaparvatāḥ . vedasmṛti rnarmadā ca varadā surasā śivā

विन्ध्य और पारियात्र — ये यहाँ के सात कुल-पर्वत हैं। वेदस्मृति, नर्मदा, वरदा, सुरसा, शिवा,

श्लोक 9 (garuda.1.55.9)

तापी पयोष्णी सरयूः कावेरी गोमती तथा ॥ गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणी महानदी

tāpī payoṣṇī sarayūḥ kāverī gomatī tathā . godāvarī bhīmarathī kṛṣṇaveṇī mahānadī

तापी, पयोष्णी, सरयू, कावेरी और गोमती,

श्लोक 10 (garuda.1.55.10)

केतुमाला ताम्रपर्णो चन्द्रभागा सरस्वती ॥ ऋषिकुल्या च कावेरी मृत्तगङ्गा पयस्विनी

ketumālā tāmraparṇo candrabhāgā sarasvatī . ṛṣikulyā ca kāverī mṛttagaṅgā payasvinī

गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, महानदी, केतुमाला, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, सरस्वती,

श्लोक 11 (garuda.1.55.11)

विदर्भा च शतद्रूश्च नद्यः पापहराः शुभाः ॥ आसां पिबन्ति सलिलं मध्यदेशादयो जनाः

vidarbhā ca śatadrūśca nadyaḥ pāpaharāḥ śubhāḥ . āsāṁ pibanti salilaṁ madhyadeśādayo janāḥ

ऋषिकुल्या, कावेरी, मृत्तगंगा, पयस्विनी, विदर्भा, और शतद्रु — ये सब पाप हरने वाली शुभ नदियाँ हैं। इनका जल मध्यदेश आदि के लोग पीते हैं।

श्लोक 12 (garuda.1.55.12)

पाञ्चालाः कुरवो मत्स्या यौधेयाः सपटच्चराः ॥ कुन्तयः शूरसेनाश्च मध्यदेशजनाः स्मृताः

pāñcālāḥ kuravo matsyā yaudheyāḥ sapaṭaccarāḥ . kuntayaḥ śūrasenāśca madhyadeśajanāḥ smṛtāḥ

पांचाल, कुरु, मत्स्य, यौधेय, पटच्चरों सहित, कुन्ति और शूरसेन — ये मध्यदेश के निवासी माने गए हैं।

श्लोक 13 (garuda.1.55.13)

वृषध्वज ! जनाः पाद्माः सूतमागधचेदयः ॥ काशय (षाया) श्च विदेहाश्च पूर्वस्यां कोशलास्तथा

vṛṣadhvaja ! janāḥ pādmāḥ sūtamāgadhacedayaḥ . kāśaya (ṣāyā) śca videhāśca pūrvasyāṁ kośalāstathā

हे वृषभध्वज, पद्म के निवासी, सूत, मागध, चेदि, काशी और विदेह के लोग, और पूर्व में उसी प्रकार कोसल —

श्लोक 14 (garuda.1.55.14)

कलिंगवंगपुण्ड्रांगा वैदर्भा मूलकास्तथा ॥ विन्ध्यान्तर्निलया देशाः पूर्वदक्षिणतः स्मृताः

kaliṁgavaṁgapuṇḍrāṁgā vaidarbhā mūlakāstathā . vindhyāntarnilayā deśāḥ pūrvadakṣiṇataḥ smṛtāḥ

कलिंग, वंग, पुण्ड्र, अंग, विदर्भ और मूलक भी — विन्ध्य के भीतर बसने वाले ये देश पूर्व-दक्षिण में स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 15 (garuda.1.55.15)

पुलन्दाश्मकजीमूतनयराष्ट्रनिवासिनः ॥ कर्णा(र्ना)टकम्बोजघणा दक्षिणापथवासिनः

pulandāśmakajīmūtanayarāṣṭranivāsinaḥ . karṇā(rnā)ṭakambojaghaṇā dakṣiṇāpathavāsinaḥ

पुलिन्द, अश्मक और जीमूत — अपने-अपने देशों के निवासी; कर्णाटक, कम्बोज और घण — दक्षिणापथ के निवासी हैं।

श्लोक 16 (garuda.1.55.16)

अम्बष्ठद्रविडा लाटाः काम्बोजाः स्त्रीमुखाः शकाः ॥ आनर्त्तवासिनश्चैव ज्ञेया यक्षिणपश्चिमे

ambaṣṭhadraviḍā lāṭāḥ kāmbojāḥ strīmukhāḥ śakāḥ . ānarttavāsinaścaiva jñeyā yakṣiṇapaścime

अम्बष्ठ, द्रविड़, लाट, कम्बोज, स्त्रीमुख और शक, और आनर्त के निवासी — इन्हें दक्षिण-पश्चिम में जानना चाहिए।

श्लोक 17 (garuda.1.55.17)

स्त्रीराज्याः सैन्धवा म्लेच्छा नास्ति का यवनास्तथा ॥ पश्चिमेन च विज्ञेया माथुरा नैषधैः सह

strīrājyāḥ saindhavā mlecchā nāsti kā yavanāstathā . paścimena ca vijñeyā māthurā naiṣadhaiḥ saha

स्त्री-राज्य, सैन्धव, म्लेच्छ, और यवन भी — पश्चिम में इन्हें मथुरा और नैषध निवासियों के साथ जानना चाहिए।

श्लोक 18 (garuda.1.55.18)

माण्डव्याश्च तुषाराश्च मूलिकाश्वमुखाः खशाः ॥ महाकेशा महानादा देशास्तूत्तरपश्चिमे

māṇḍavyāśca tuṣārāśca mūlikāśvamukhāḥ khaśāḥ . mahākeśā mahānādā deśāstūttarapaścime

माण्डव्य, तुषार, मूलिक, अश्वमुख और खश, महाकेश और महानाद — ये देश उत्तर-पश्चिम में हैं।

श्लोक 19 (garuda.1.55.19)

लम्ब (म्पा) का स्तननागाश्च माद्रगान्धारबाह्लिकाः ॥ हिमाचलालया म्लेच्छा उदीचीं दिशमाश्रिताः

lamba (mpā) kā stananāgāśca mādragāndhārabāhlikāḥ . himācalālayā mlecchā udīcīṁ diśamāśritāḥ

लम्पक, स्तन, नाग, मद्र, गान्धार और बाह्लीक — हिमाचल के आश्रय में रहने वाले ये म्लेच्छ उत्तर दिशा में बसते हैं।

श्लोक 20 (garuda.1.55.20)

त्रिगर्त्तनीलकोलात (भ) ब्रह्मपुत्राः सटङ्कणाः ॥ अभीषाहाः सकाश्मीरा उदक्पर्वेण कीर्त्तिताः

trigarttanīlakolāta (bha) brahmaputrāḥ saṭaṅkaṇāḥ . abhīṣāhāḥ sakāśmīrā udakparveṇa kīrttitāḥ

त्रिगर्त, नील, कोलाभ, ब्रह्मपुत्र-वासी, तंकणों सहित, अभीषाह और काश्मीर — ये उत्तर दिशा के भाग में गिने गए हैं।

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