पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 8
विष्णु-पूजा हेतु वज्रनाभ-मंडल
श्लोक 1 (garuda.1.8.1)
।।हरिरुवाच । भूमिष्ठे मण्डपे स्नात्वा मण्डले विष्णुमर्चयेत् । पञ्चरंगिकचूर्णेन वज्रनाभं तु मण्डलम्
hariruvāca bhūmiṣṭhe maṇḍape snātvā maṇḍale viṣṇumarcayet pañcaraṁgikacūrṇena vajranābhaṁ tu maṇḍalam
हरि ने कहा — भूमि पर बने मंडप में स्नान करके मंडल में विष्णु का पूजन करना चाहिए। पाँच रंगों के चूर्ण से वज्रनाभ नामक मंडल (बनाना चाहिए)।
श्लोक 2 (garuda.1.8.2)
षोडशैः कोष्ठकैस्तत्र सम्मितं रुद्र ? कारयेत् । चतुर्थपंचकोणेषु सूत्रपातं तु कारयेत्
ṣoḍaśaiḥ koṣṭhakaistatra sammitaṁ rudra ? kārayet caturthapaṁcakoṇeṣu sūtrapātaṁ tu kārayet
हे रुद्र! वहाँ उसे सोलह कोष्ठकों से युक्त बनाना चाहिए। चौथे और पाँचवें कोणों में सूत्र (डोरी) डालनी चाहिए।
श्लोक 3 (garuda.1.8.3)
कोणसूत्रादुभयतः कोणा ये तत्र संस्थिताः । तेषु चैव प्रकुर्वीत सूत्रपातं विचक्षणः
koṇasūtrādubhayataḥ koṇā ye tatra saṁsthitāḥ teṣu caiva prakurvīta sūtrapātaṁ vicakṣaṇaḥ
कोण-सूत्र से दोनों ओर जो कोण वहाँ स्थित हों, उन पर भी बुद्धिमान व्यक्ति को सूत्रपात करना चाहिए।
श्लोक 4 (garuda.1.8.4)
तदनन्तरकोणेषु एवमेव हि कारयेत् । प्रथमा नाभिरुद्दिष्टा मध्ये रेखाप्रसंगमे
tadanantarakoṇeṣu evameva hi kārayet prathamā nābhiruddiṣṭā madhye rekhāprasaṁgame
उसके बाद के कोणों में भी इसी प्रकार करना चाहिए। मध्य में जहाँ रेखाएँ मिलती हैं, वहाँ प्रथम नाभि (केंद्र-बिंदु) मानी गई है।
श्लोक 5 (garuda.1.8.5)
अन्तरेषु च सर्वेषु अष्टौ चैव तुनाभयः । पूर्वमध्यमनाभिभ्यामथं सूत्रं तु भ्रामयेत्
antareṣu ca sarveṣu aṣṭau caiva tunābhayaḥ pūrvamadhyamanābhibhyāmathaṁ sūtraṁ tu bhrāmayet
सभी अंतरालों में भी आठ नाभियाँ होती हैं। पूर्व और मध्य नाभि से सूत्र को घुमाना चाहिए।
श्लोक 6 (garuda.1.8.6)
अन्तरा स द्विजश्रेष्ठः पादोनं भ्रामयेद्धर ! । अनेन नाभिसूत्रस्य कर्णिकां भ्रामयेच्छिव !
antarā sa dvijaśreṣṭhaḥ pādonaṁ bhrāmayeddhara ! anena nābhisūtrasya karṇikāṁ bhrāmayecchiva !
हे हर! उस अंतराल में द्विजश्रेष्ठ को पाव भाग कम घुमाना चाहिए। हे शिव! इस नाभि-सूत्र से कर्णिका (लोटस-कोश) को घुमाना चाहिए।
श्लोक 7 (garuda.1.8.7)
कर्णिकाया द्विभागेन केसराणि विचक्षणः । तदग्रेण सदा विद्वान्दलान्येव समालिखेत्
karṇikāyā dvibhāgena kesarāṇi vicakṣaṇaḥ tadagreṇa sadā vidvāndalānyeva samālikhet
कर्णिका के दो भागों से बुद्धिमान व्यक्ति केसर (पुंकेसर) बनाए। उसके अग्र भाग से विद्वान सदा दलों (पंखुड़ियों) को अंकित करे।
श्लोक 8 (garuda.1.8.8)
सर्वेषु नाभिक्षेत्रषु मानेनानेन सुव्रत ! । पद्मानि तानि कुर्वीत देशिकः पर मार्थवित्
sarveṣu nābhikṣetraṣu mānenānena suvrata ! padmāni tāni kurvīta deśikaḥ para mārthavit
हे सुव्रत! सभी नाभि-क्षेत्रों में इसी माप से, परमार्थ जानने वाला आचार्य उन कमलों को बनाए।
श्लोक 9 (garuda.1.8.9)
आदिसूत्रविभागेन द्वाराणि परिकल्पयेत् । द्वारशोभां तथा तत्र तदर्द्धेन तु कल्पयेत्
ādisūtravibhāgena dvārāṇi parikalpayet dvāraśobhāṁ tathā tatra tadarddhena tu kalpayet
आदि-सूत्र के विभाजन से द्वारों की रचना करनी चाहिए, तथा उसके आधे भाग से वहाँ द्वार-शोभा (द्वार की अलंकृति) की रचना करनी चाहिए।
श्लोक 10 (garuda.1.8.10)
कर्णिकां पीतवर्णेन सितरक्तादिकेसरैः । अन्तरं नीलवर्णेन दलानि असितेन च
karṇikāṁ pītavarṇena sitaraktādikesaraiḥ antaraṁ nīlavarṇena dalāni asitena ca
कर्णिका को पीत वर्ण से, केसरों को श्वेत-रक्त आदि वर्णों से, अंतराल को नील वर्ण से, और दलों को काले वर्ण से (रंगना चाहिए)।
श्लोक 11 (garuda.1.8.11)
कृष्णवर्णेन रजसा चतुरश्रं प्रपूरयेत् । द्वाराणि शुक्लवर्णेन रेखाः पंच च मण्डले
kṛṣṇavarṇena rajasā caturaśraṁ prapūrayet dvārāṇi śuklavarṇena rekhāḥ paṁca ca maṇḍale
काले रंग की धूलि से चतुष्कोण को भरना चाहिए। द्वारों को श्वेत वर्ण से (रंगना चाहिए), और मंडल में पाँच रेखाएँ (खींचनी चाहिए)।
श्लोक 12 (garuda.1.8.12)
सिता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैव यथाक्रमम् । कृत्वैव मण्डलञ्चादौ न्यासं कृत्वार्चयेद्धरिम्
sitā raktā tathā pītā kṛṣṇā caiva yathākramam kṛtvaiva maṇḍalañcādau nyāsaṁ kṛtvārcayeddharim
श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण — क्रमशः इसी प्रकार। मंडल को इस प्रकार पहले बनाकर, न्यास करके हरि का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 13 (garuda.1.8.13)
हृन्मध्ये तु न्यसेद्विष्णुं कण्ठे सङ्कर्षणं तथा । प्रद्युम्नं शिरसिन्यस्य शिखायामनिरुद्धकम्
hṛnmadhye tu nyasedviṣṇuṁ kaṇṭhe saṅkarṣaṇaṁ tathā pradyumnaṁ śirasinyasya śikhāyāmaniruddhakam
हृदय के मध्य में विष्णु का न्यास करे, कंठ में संकर्षण का, शिर में प्रद्युम्न का न्यास करके, शिखा में अनिरुद्ध का न्यास करे।
श्लोक 14 (garuda.1.8.14)
ब्रह्माणं सर्वगात्रेषु करयोः श्रीधरं तथा । अहं विष्णुरिति ध्यात्वा कर्णिकायां न्यसेद्धरिम्
brahmāṇaṁ sarvagātreṣu karayoḥ śrīdharaṁ tathā ahaṁ viṣṇuriti dhyātvā karṇikāyāṁ nyaseddharim
सभी अंगों में ब्रह्मा का, दोनों हाथों में श्रीधर का न्यास करे। 'मैं ही विष्णु हूँ' — ऐसा ध्यान करके कर्णिका में हरि का न्यास करे।
श्लोक 15 (garuda.1.8.15)
न्यसेत्सङ्कर्षणं पूर्वे प्रद्युम्नं चैव दक्षिणे । अनिरुद्धं पश्चिमे च ब्रह्माणं चोत्तरे न्यसेत्
nyasetsaṅkarṣaṇaṁ pūrve pradyumnaṁ caiva dakṣiṇe aniruddhaṁ paścime ca brahmāṇaṁ cottare nyaset
पूर्व दिशा में संकर्षण का, दक्षिण में प्रद्युम्न का न्यास करे। पश्चिम में अनिरुद्ध का, और उत्तर में ब्रह्मा का न्यास करे।
श्लोक 16 (garuda.1.8.16)
श्रीधरं रुद्रकोणेषु इन्द्रादीन्दिक्षु विन्यसेत् । ततोऽभ्यर्च्य च गन्धाद्यैः प्राप्नुयात्परमं पदम्
śrīdharaṁ rudrakoṇeṣu indrādīndikṣu vinyaset tato'bhyarcya ca gandhādyaiḥ prāpnuyātparamaṁ padam
श्रीधर को रुद्र-कोणों (विदिशाओं) में, इंद्र आदि (दिक्पालों) को (उनकी) दिशाओं में स्थापित करे। तत्पश्चात् गंध आदि से पूजन करके परम पद को प्राप्त करता है।