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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 9

विष्णु-दीक्षा

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (garuda.1.9.1)

।।हरिरुवाच । समये (या) दीक्षितः शिष्यो बद्धनेत्रस्तु वाससा । अष्टाहुतिशतं तस्य मूलमन्त्रेण होमयेत्

hariruvāca samaye (yā) dīkṣitaḥ śiṣyo baddhanetrastu vāsasā aṣṭāhutiśataṁ tasya mūlamantreṇa homayet

हरि ने कहा — समय पर दीक्षित होने वाले शिष्य की आँखों को वस्त्र से बाँध देना चाहिए। उसके लिए मूल मंत्र से आठ सौ आहुतियाँ देनी चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.1.9.2)

द्विगुणं पुत्रके होमं त्रिगुणं साधके मतम् । निर्वाणदेशिके रुद्र ! चतुर्गुणमुदाहृतम्

dviguṇaṁ putrake homaṁ triguṇaṁ sādhake matam nirvāṇadeśike rudra ! caturguṇamudāhṛtam

'पुत्रक' (उच्चतर शिष्य) के लिए दुगुना होम, और 'साधक' के लिए तिगुना होम माना गया है। हे रुद्र! निर्वाण-दीक्षा देने वाले आचार्य के लिए चौगुना कहा गया है।

श्लोक 3 (garuda.1.9.3)

गुरुविष्णुद्विजस्त्रीणां हन्ता बध्यस्त्व(श्च)दीक्षितैः । अथ दीक्षां प्रवक्ष्यामि धर्माधर्मक्षयङ्करीम्

guruviṣṇudvijastrīṇāṁ hantā badhyastva(śca)dīkṣitaiḥ atha dīkṣāṁ pravakṣyāmi dharmādharmakṣayaṅkarīm

गुरु, विष्णु-भक्त, ब्राह्मण या स्त्री का हत्यारा भी दीक्षितों के द्वारा (उस पाप-बंधन से) मुक्त हो जाता है। अब मैं वह दीक्षा बताता हूँ, जो धर्म और अधर्म दोनों का क्षय करने वाली है।

श्लोक 4 (garuda.1.9.4)

उपवेश्य बहिः शिष्यान्धारणं तेषु कारयेत् । वायव्या कलया रुद्र शोष्यमाणान्विचिंतयेत्

upaveśya bahiḥ śiṣyāndhāraṇaṁ teṣu kārayet vāyavyā kalayā rudra śoṣyamāṇānviciṁtayet

शिष्यों को बाहर बिठाकर उनमें धारणा (एकाग्रता) कराई जाए। हे रुद्र! वायु-तत्त्व की कला से उन्हें सूखते हुए कल्पना करनी चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.1.9.5)

आग्नेय्या दह्यमानांश्च प्लावितानम्भसा पुनः । तेजस्तेजसि तं जीवमेकीकृत्य समाक्षिपेत्

āgneyyā dahyamānāṁśca plāvitānambhasā punaḥ tejastejasi taṁ jīvamekīkṛtya samākṣipet

फिर अग्नि-तत्त्व से उन्हें जलते हुए, और पुनः जल-तत्त्व से उन्हें बहते हुए कल्पना करनी चाहिए। तेज को तेज में मिलाकर, उस जीव को एकीभूत कर परमात्मा में निक्षिप्त करना चाहिए।

श्लोक 6 (garuda.1.9.6)

प्रणवं चिन्तयेव्द्योम्नि शरीरेऽन्यत्तु कारणम् । एकैकं यो जयेत्तत्र क्षेत्रज्ञं देहकारणात्

praṇavaṁ cintayevdyomni śarīre'nyattu kāraṇam ekaikaṁ yo jayettatra kṣetrajñaṁ dehakāraṇāt

आकाश-तत्त्व में प्रणव (ॐ) का चिंतन करे, शरीर में अन्य कारण-तत्त्व का। जो इस प्रकार एक-एक तत्त्व को जीत लेता है, वह देह के कारण से क्षेत्रज्ञ (आत्मा) को जान लेता है।

श्लोक 7 (garuda.1.9.7)

उत्पाद्य योजयेत्पश्चादेकैकं वृषभध्वज । मण्डलादिष्वशक्तस्तु कल्पयित्वाऽर्चयेद्धरिम्

utpādya yojayetpaścādekaikaṁ vṛṣabhadhvaja maṇḍalādiṣvaśaktastu kalpayitvā'rcayeddharim

हे वृषभध्वज! इस प्रकार उत्पन्न कर तत्पश्चात् एक-एक तत्त्व को अगले तत्त्व में मिला देना चाहिए। जो मंडल आदि की रचना में असमर्थ हो, वह कल्पना मात्र से हरि का पूजन करे।

श्लोक 8 (garuda.1.9.8)

चतुर्द्वारं भवेत्तच्च ब्रह्मतीर्थादनुक्रमात् । हस्तं पद्मं समाख्यातं पत्राण्यङ्गुलयः स्मृताः

caturdvāraṁ bhavettacca brahmatīrthādanukramāt hastaṁ padmaṁ samākhyātaṁ patrāṇyaṅgulayaḥ smṛtāḥ

वह मंडल चार द्वारों वाला हो, ब्रह्मतीर्थ (अंगूठे के मूल) से क्रमशः बनाया गया। हाथ को ही कमल कहा गया है, और अंगुलियों को उसकी पंखुड़ियाँ माना गया है।

श्लोक 9 (garuda.1.9.9)

कर्णिकातलहस्तन्तु नखान्यस्य तु केशराः । तत्रार्चयेद्धरिं ध्यात्वा सूर्य्येन्द्वग्नयन्तरेव च

karṇikātalahastantu nakhānyasya tu keśarāḥ tatrārcayeddhariṁ dhyātvā sūryyendvagnayantareva ca

हथेली का तल कर्णिका (लोटस-कोश) है, और नख उसके केसर हैं। सूर्य, चंद्र और अग्नि के मध्य के उस स्थान का ध्यान करके वहाँ हरि का पूजन करे।

श्लोक 10 (garuda.1.9.10)

तं हस्तं पातयेन्मूर्ध्नि शिष्यस्य तु समाहितः । हस्ते विष्णुः स्थितो यस्माद्विष्णुहस्तस्ततस्त्वयम् । नश्यन्ति स्पर्शनात्तस्य पातकान्यखिलानि च

taṁ hastaṁ pātayenmūrdhni śiṣyasya tu samāhitaḥ haste viṣṇuḥ sthito yasmādviṣṇuhastastatastvayam naśyanti sparśanāttasya pātakānyakhilāni ca

फिर एकाग्रचित्त होकर उस हाथ को शिष्य के सिर पर रखना चाहिए। चूँकि उस हाथ में विष्णु स्थित हैं, इसलिए वह 'विष्णु-हस्त' कहलाता है। उसके स्पर्श मात्र से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 11 (garuda.1.9.11)

गुरुः शिष्यं समभ्यर्च्य नेत्रे बद्धे तु वाससा । देवस्य प्रमुखं कृत्वा पुष्पमेवार्पयेत्ततः । पुष्पं निपतितं यत्र मूर्ध्नो देवस्य शार्ङ्गिणः

guruḥ śiṣyaṁ samabhyarcya netre baddhe tu vāsasā devasya pramukhaṁ kṛtvā puṣpamevārpayettataḥ puṣpaṁ nipatitaṁ yatra mūrdhno devasya śārṅgiṇaḥ

गुरु शिष्य की भलीभाँति पूजा करके, उसकी दोनों आँखों को वस्त्र से बाँधकर, उसे देवता के सम्मुख कर, तत्पश्चात् उसे अर्पित करने के लिए एक पुष्प दे। शार्ङ्गधारी देवता (विष्णु) की मूर्ति के जिस अंग पर वह पुष्प गिरे,

श्लोक 12 (garuda.1.9.12)

तन्नाम कारयेत्तस्य स्त्रीणां नामांकितं स्वयम् । शूद्राणां दाससंयुक्तं कारयेत्तु विचक्षणः

tannāma kārayettasya strīṇāṁ nāmāṁkitaṁ svayam śūdrāṇāṁ dāsasaṁyuktaṁ kārayettu vicakṣaṇaḥ

उसी के अनुसार उसका नया नाम रखा जाए। स्त्रियों के नाम में वह स्वयं उपयुक्त रूप में अंकित करे, और शूद्रों के लिए बुद्धिमान आचार्य 'दास' शब्द से युक्त नाम रखे।

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