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उत्तरखण्ड · अध्याय 27

राजा बभ्रुवाहन और प्रेत की कथा

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (garuda.2.27.1)

तार्क्ष्य उवाच । कथं प्रेता वसन्त्यत्र कीदृग्रूपा भवन्ति ते । महाप्रेताः पिशाचाश्च कैःकैः कर्मफलैर्विभो । सर्वेषामनुकम्पार्थं ब्रूहि मे मधुसूदन

tārkṣya uvāca kathaṁ pretā vasantyatra kīdṛgrūpā bhavanti te mahāpretāḥ piśācāśca kaiḥkaiḥ karmaphalairvibho sarveṣāmanukampārthaṁ brūhi me madhusūdana

तार्क्ष्य ने कहा — हे प्रभो! प्रेत यहाँ कैसे रहते हैं, उनका कैसा रूप होता है? महाप्रेत और पिशाच किन-किन कर्मफलों से बनते हैं, हे मधुसूदन? सबके अनुकम्पार्थ मुझे बताइए।

श्लोक 2 (garuda.2.27.2)

प्रेतत्वान्मुच्यते येन दानेन च शुभे न च । तन्मे कथय देवेश मम चेदिच्छसि प्रियम्

pretatvānmucyate yena dānena ca śubhe na ca tanme kathaya deveśa mama cedicchasi priyam

जिस दान और शुभ कर्म से प्रेतत्व से मुक्ति मिलती है, और जिससे नहीं मिलती, वह मुझे बताइए, हे देवेश, यदि आप मेरा हित चाहते हैं।

श्लोक 3 (garuda.2.27.3)

श्रीकृष्ण उवाच । साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य मानुषाणां हिताय वै । शृणुचावहितो भूत्वा यद्वच्मि प्रेतलक्षणम्

śrīkṛṣṇa uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā tārkṣya mānuṣāṇāṁ hitāya vai śṛṇucāvahito bhūtvā yadvacmi pretalakṣaṇam

श्रीकृष्ण ने कहा — हे तार्क्ष्य! तुमने मनुष्यों के हित के लिए भली भाँति पूछा है। सावधान होकर सुनो, मैं प्रेत के लक्षण कहता हूँ।

श्लोक 4 (garuda.2.27.4)

गुह्यद्गुह्यतरं ह्येतन्नाख्येयं यस्य कस्यचित् । भक्तस्त्वं हि महाबाहो तेन ते कथयाम्यहम्

guhyadguhyataraṁ hyetannākhyeyaṁ yasya kasyacit bhaktastvaṁ hi mahābāho tena te kathayāmyaham

यह अत्यंत गोपनीय विषय है, जो किसी को भी नहीं बताना चाहिए; परन्तु हे महाबाहो! तुम मेरे भक्त हो, इसलिए मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 5 (garuda.2.27.5)

पुरा त्रेतायुगे तात राजासीद्बभ्रुवाहनः । महोदयपुरे रम्ये धर्मनिष्ठो महाबलः

purā tretāyuge tāta rājāsīdbabhruvāhanaḥ mahodayapure ramye dharmaniṣṭho mahābalaḥ

हे तात! प्राचीन काल में त्रेतायुग में महोदयपुर नामक सुन्दर नगर में बभ्रुवाहन नाम का राजा था, जो धर्मनिष्ठ और महाबली था।

श्लोक 6 (garuda.2.27.6)

यज्वा दानपतिः श्रीमान्ब्रह्मण्यः साधुसंमतः । शीलाचारगुणोपेतो दयादाक्षिण्यसंयुतः

yajvā dānapatiḥ śrīmānbrahmaṇyaḥ sādhusaṁmataḥ śīlācāraguṇopeto dayādākṣiṇyasaṁyutaḥ

वह यज्ञकर्ता, दानपति, श्रीमान, ब्राह्मणों का हितैषी, सज्जनों द्वारा सम्मानित, शील-आचार-गुणों से युक्त तथा दया और उदारता से संपन्न था।

श्लोक 7 (garuda.2.27.7)

प्रजाः पालयते नित्यं पुत्रानिव महाबलः । क्षत्त्रधर्मरतो नित्यं स दण्ड्यान्दण्डयन्नृपः

prajāḥ pālayate nityaṁ putrāniva mahābalaḥ kṣattradharmarato nityaṁ sa daṇḍyāndaṇḍayannṛpaḥ

वह महाबली राजा अपनी प्रजा को नित्य पुत्रों के समान पालता था; क्षत्रिय-धर्म में सदा तत्पर रहकर दण्डनीयों को दण्ड देता था।

श्लोक 8 (garuda.2.27.8)

स कदाचिन्महाबाहुः ससैन्योमृगयां गतः । वनं विवेश गहनं नानावृक्षसमन्वितम्

sa kadācinmahābāhuḥ sasainyomṛgayāṁ gataḥ vanaṁ viveśa gahanaṁ nānāvṛkṣasamanvitam

एक बार वह महाबाहु राजा सेना सहित मृगया के लिए गया और नाना वृक्षों से युक्त घने वन में प्रवेश किया।

श्लोक 9 (garuda.2.27.9)

शार्दूलशतसंजुष्टं नानापक्षिनिनादितम् । वनमध्ये तदा राजा मृगं दूरादपश्यत

śārdūlaśatasaṁjuṣṭaṁ nānāpakṣinināditam vanamadhye tadā rājā mṛgaṁ dūrādapaśyata

सैकड़ों व्याघ्रों से भरे तथा विविध पक्षियों की ध्वनि से गूँजते उस वन के मध्य राजा ने दूर से एक मृग देखा।

श्लोक 10 (garuda.2.27.10)

तेन विद्धो मृगोऽतीव बाणेन सुदृढेन च । बाणमादाय तं तस्य स वनेऽदर्शनं ययौ

tena viddho mṛgo'tīva bāṇena sudṛḍhena ca bāṇamādāya taṁ tasya sa vane'darśanaṁ yayau

राजा ने उसे एक अत्यंत दृढ़ बाण से बींध दिया; वह मृग उस बाण को लिए हुए वन में ओझल हो गया।

श्लोक 11 (garuda.2.27.11)

कक्षे तच्छोणितस्त्रावात्स राजानुजगाम तम् । ततो मृगप्रसङ्गेन वनमन्यद्विवेश सः

kakṣe tacchoṇitastrāvātsa rājānujagāma tam tato mṛgaprasaṅgena vanamanyadviveśa saḥ

उसके रक्त की धार को देखकर राजा उसके पीछे-पीछे चला; मृग का पीछा करते हुए वह दूसरे वन में प्रवेश कर गया।

श्लोक 12 (garuda.2.27.12)

क्षुत्क्षामकण्ठो नृपतिः श्रमसन्तापमूर्छितः । जलस्थानं समासाद्य साश्व एवावगाहत

kṣutkṣāmakaṇṭho nṛpatiḥ śramasantāpamūrchitaḥ jalasthānaṁ samāsādya sāśva evāvagāhata

भूख से जिसका कण्ठ सूख गया था तथा श्रम और ताप से मूर्च्छित होते उस राजा ने एक जलाशय देखकर अपने अश्व सहित उसमें प्रवेश किया।

श्लोक 13 (garuda.2.27.13)

पीत्वा तदु दकं शीतं पद्मगन्धाधिवासितम् । तत उत्तीर्य सलिलाद्विमलाद्बभ्रुवाहनः

pītvā tadu dakaṁ śītaṁ padmagandhādhivāsitam tata uttīrya salilādvimalādbabhruvāhanaḥ

कमल की सुगन्ध से सुवासित उस शीतल जल को पीकर बभ्रुवाहन उस निर्मल जल से बाहर निकला।

श्लोक 14 (garuda.2.27.14)

न्यग्रोधवृक्षमासाद्य शीतच्छायं मनोहरम् । महाविटपिनं हृद्यं पक्षिसङ्घातनादितम्

nyagrodhavṛkṣamāsādya śītacchāyaṁ manoharam mahāviṭapinaṁ hṛdyaṁ pakṣisaṅghātanāditam

वह मनोहर, शीतल छाया वाले, विशाल शाखाओं वाले, हृदयग्राही तथा पक्षियों के समूहों की ध्वनि से युक्त एक वटवृक्ष के पास पहुँचा।

श्लोक 15 (garuda.2.27.15)

वनस्य तस्य सर्वस्य केतुभूतमिवोच्छ्रितम् । तं महातरुमासाद्य निषसाद महीपतिः

vanasya tasya sarvasya ketubhūtamivocchritam taṁ mahātarumāsādya niṣasāda mahīpatiḥ

वह उस सम्पूर्ण वन के मानो ध्वजा के समान ऊँचा उठा हुआ था; उस विशाल वृक्ष के पास पहुँचकर राजा बैठ गया।

श्लोक 16 (garuda.2.27.16)

अथ प्रेतं ददर्शासौ क्षुत्तृष्णाव्याकुलेन्द्रियम् । उत्कचं मलिनं कुब्जं (रूक्षं) निर्मांसं भीमदर्शनम्

atha pretaṁ dadarśāsau kṣuttṛṣṇāvyākulendriyam utkacaṁ malinaṁ kubjaṁ (rūkṣaṁ) nirmāṁsaṁ bhīmadarśanam

तभी उसने भूख-प्यास से व्याकुल इन्द्रियों वाले, बिखरे बालों, मलिन, कुबड़े, रूखे, मांसरहित तथा भयानक दिखने वाले एक प्रेत को देखा,

श्लोक 17 (garuda.2.27.17)

स्नायुबद्धास्थिचरणं धावमानमितस्ततः । अन्यैश्च बहुभिः प्रेतैः समन्तात्परिवारितम्

snāyubaddhāsthicaraṇaṁ dhāvamānamitastataḥ anyaiśca bahubhiḥ pretaiḥ samantātparivāritam

जिसके पैर स्नायुओं से बँधी हड्डियों मात्र थे, जो इधर-उधर दौड़ रहा था तथा जो अन्य अनेक प्रेतों से चारों ओर घिरा हुआ था।

श्लोक 18 (garuda.2.27.18)

तं दृष्ट्वा विकृतं घोरं विस्मितो बभ्रुवाहनः । प्रेतोऽपि दृष्ट्वा तां घोरामटवीमागतं नृपम्

taṁ dṛṣṭvā vikṛtaṁ ghoraṁ vismito babhruvāhanaḥ preto'pi dṛṣṭvā tāṁ ghorāmaṭavīmāgataṁ nṛpam

उस विकृत, भयानक प्रेत को देखकर बभ्रुवाहन आश्चर्यचकित हुआ; प्रेत ने भी उस भयानक वन में आए राजा को देखा,

श्लोक 19 (garuda.2.27.19)

तदा हृष्टमना भूत्वा तस्यान्तिकमुपागतः । अब्रवीत्स तदा तार्क्ष्य प्रेतराजो नृपं वचः

tadā hṛṣṭamanā bhūtvā tasyāntikamupāgataḥ abravītsa tadā tārkṣya pretarājo nṛpaṁ vacaḥ

और तब प्रसन्नचित्त होकर उसके निकट आया। हे तार्क्ष्य! उस प्रेतराज ने राजा से यह वचन कहा —

श्लोक 20 (garuda.2.27.20)

प्रेतभावो मया त्यक्तः प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् । त्वत्संयोगान्महाबाहो नास्तिधन्यतरो मम

pretabhāvo mayā tyaktaḥ prāpto'smi paramāṁ gatim tvatsaṁyogānmahābāho nāstidhanyataro mama

"मैंने प्रेत-भाव त्याग दिया है, मैं परम गति को प्राप्त हुआ हूँ; हे महाबाहो! तुम्हारे साथ इस संयोग से मुझसे बढ़कर धन्य कोई और नहीं।"

श्लोक 21 (garuda.2.27.21)

नृपतिरुवाच । कृष्णवर्णः करालास्यस्त्वं प्रेत इव लक्ष्यसे । कथयस्व मम प्रीत्या यथैवं चासि तत्त्वतः

nṛpatiruvāca kṛṣṇavarṇaḥ karālāsyastvaṁ preta iva lakṣyase kathayasva mama prītyā yathaivaṁ cāsi tattvataḥ

राजा ने कहा — "तुम काले वर्ण, विकराल मुख वाले, प्रेत के समान दिखते हो; मुझ पर प्रीति करके सच-सच बताओ कि तुम वास्तव में ऐसे कैसे हो।"

श्लोक 22 (garuda.2.27.22)

तथा पृष्टः स वै राज्ञा प्रोवाच सकलं स्वकम्

tathā pṛṣṭaḥ sa vai rājñā provāca sakalaṁ svakam

राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उसने अपनी सम्पूर्ण कथा कह सुनाई।

श्लोक 23 (garuda.2.27.23)

प्रेत उवाच । कथयामि नृपश्रेष्ठ सर्वमेवादितस्तव । प्रेतत्वे कारणं श्रुत्वा दयां कर्तुं ममार्हसि

preta uvāca kathayāmi nṛpaśreṣṭha sarvamevāditastava pretatve kāraṇaṁ śrutvā dayāṁ kartuṁ mamārhasi

प्रेत ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हें आदि से सब कुछ बताता हूँ; मेरे प्रेतत्व का कारण सुनकर तुम्हें मुझ पर दया करनी चाहिए।

श्लोक 24 (garuda.2.27.24)

वैदिशं नाम नगरं सर्वसम्पत्समन्वितम् । नानाजनपदाकीर्णं नानारत्नसमाकुलम् । नानापुण्यसमायुक्तं नानावृक्षसमाकुलम्

vaidiśaṁ nāma nagaraṁ sarvasampatsamanvitam nānājanapadākīrṇaṁ nānāratnasamākulam nānāpuṇyasamāyuktaṁ nānāvṛkṣasamākulam

वैदिश नामक एक नगर था, जो सब प्रकार की सम्पदा से युक्त, नाना जनपदों से भरा, नाना रत्नों से परिपूर्ण, नाना पुण्य-कार्यों से युक्त तथा नाना वृक्षों से आकीर्ण था।

श्लोक 25 (garuda.2.27.25)

तत्राहं न्यवसं भूयो देवार्चनरतः सदा । वैश्यो जात्या सुदेवोऽहं नाम्ना विदितमस्तु ते

tatrāhaṁ nyavasaṁ bhūyo devārcanarataḥ sadā vaiśyo jātyā sudevo'haṁ nāmnā viditamastu te

वहाँ मैं देव-अर्चना में सदा रत रहकर निवास करता था; मैं जाति से वैश्य था, मेरा नाम सुदेव था, यह तुम्हें ज्ञात हो।

श्लोक 26 (garuda.2.27.26)

हव्येन तर्पिता देवाः कव्येन पितरस्तथा । विविधैर्दानयोगैश्च विप्राः सन्तर्पिता मया

havyena tarpitā devāḥ kavyena pitarastathā vividhairdānayogaiśca viprāḥ santarpitā mayā

मैंने हव्य से देवताओं को और कव्य से पितरों को तृप्त किया; अनेक प्रकार के दान-योगों से ब्राह्मणों को भी तृप्त किया।

श्लोक 27 (garuda.2.27.27)

आवाहाश्च विवाहाश्च मया वै सुनिवेशिताः । दीनानाथविशिष्टेभ्यो मया दत्तमनेकधा

āvāhāśca vivāhāśca mayā vai suniveśitāḥ dīnānāthaviśiṣṭebhyo mayā dattamanekadhā

मेरे द्वारा आवाहन और विवाह भली प्रकार सम्पन्न किए गए; दीन-अनाथ और योग्य जनों को मैंने अनेक प्रकार से दान दिया।

श्लोक 28 (garuda.2.27.28)

तत्सर्वं विफलं तात मम दैवादुपागतम् । यथा मे निष्फलं जातं सुकृतं तद्वदामि ते

tatsarvaṁ viphalaṁ tāta mama daivādupāgatam yathā me niṣphalaṁ jātaṁ sukṛtaṁ tadvadāmi te

हे तात! वह सब मेरे भाग्य के कारण निष्फल हो गया; मेरे पुण्य किस प्रकार निष्फल हुए, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 29 (garuda.2.27.29)

न मेऽस्ति सन्ततिस्तात न सुहृन्न च बान्धवः । न च मित्रं हि मे तादृग्यः कुर्यादौर्ध्वदैहिकम्

na me'sti santatistāta na suhṛnna ca bāndhavaḥ na ca mitraṁ hi me tādṛgyaḥ kuryādaurdhvadaihikam

हे तात! मेरी कोई संतान नहीं, न कोई मित्र, न बन्धु; और न ऐसा कोई मित्र है जो मेरा औध्वदैहिक (मृत्युोत्तर) कर्म करे।

श्लोक 30 (garuda.2.27.30)

प्रेतत्वं सुस्थिरं तेन मम जातं नृपोत्तम । एकादशं त्रिपक्षं च षाण्मासिकमथाब्दिकम् । प्रतिमास्यानि चान्यानि एवं श्राद्धानि षोडश

pretatvaṁ susthiraṁ tena mama jātaṁ nṛpottama ekādaśaṁ tripakṣaṁ ca ṣāṇmāsikamathābdikam pratimāsyāni cānyāni evaṁ śrāddhāni ṣoḍaśa

हे नृपोत्तम! इसी कारण मेरा प्रेतत्व स्थिर हो गया है। एकादशी, त्रिपक्ष, षाण्मासिक, आब्दिक, तथा अन्य मासिक श्राद्ध — इस प्रकार सोलह श्राद्ध होते हैं।

श्लोक 31 (garuda.2.27.31)

यस्यैतानि न दीयन्ते प्रेतश्राद्धानि भूपते । प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि

yasyaitāni na dīyante pretaśrāddhāni bhūpate pretatvaṁ susthiraṁ tasya dattaiḥ śrāddhaśatairapi

हे भूपते! जिसे ये प्रेत-श्राद्ध नहीं दिए जाते, उसका प्रेतत्व सैकड़ों अन्य श्राद्ध देने पर भी स्थिर ही बना रहता है।

श्लोक 32 (garuda.2.27.32)

एवं ज्ञात्वा महाराज प्रेतत्वादुद्धरस्व माम् । वर्णानां चापि सर्वेषां राजा बन्धुरिहोच्यते

evaṁ jñātvā mahārāja pretatvāduddharasva mām varṇānāṁ cāpi sarveṣāṁ rājā bandhurihocyate

महाराज! यह जानकर मुझे प्रेतत्व से उबारो; सभी वर्णों का बन्धु यहाँ राजा ही कहा जाता है।

श्लोक 33 (garuda.2.27.33)

तन्मां तारय राजेन्द्र मणिरत्नं ददामि ते । यथा मम शुभावाप्तिर्भवेन्नृपवरोत्तम

tanmāṁ tāraya rājendra maṇiratnaṁ dadāmi te yathā mama śubhāvāptirbhavennṛpavarottama

हे राजेन्द्र! इसलिए मुझे तारो, मैं तुम्हें मणि-रत्न दूँगा, जिससे मुझे शुभ प्राप्ति हो, हे नृपवरोत्तम।

श्लोक 34 (garuda.2.27.34)

तथा कार्यं महाबाहो कृपा यदि मयीष्यते । आत्मनश्च कुरु क्षिप्रं सर्वमेवौर्ध्वेदैहिकम्

tathā kāryaṁ mahābāho kṛpā yadi mayīṣyate ātmanaśca kuru kṣipraṁ sarvamevaurdhvedaihikam

हे महाबाहो! यदि मुझ पर तुम्हारी कृपा है तो वैसा ही करो, और स्वयं भी शीघ्र अपने सम्पूर्ण औध्वदैहिक कर्म करा लो।

श्लोक 35 (garuda.2.27.35)

नृपतिरुवाच । कथं प्रेता भवन्तीह कृतैरप्यौर्ध्वदैहिकैः । पिशाचाश्च भवन्तीह कर्मभिः कैश्च तद्वद

nṛpatiruvāca kathaṁ pretā bhavantīha kṛtairapyaurdhvadaihikaiḥ piśācāśca bhavantīha karmabhiḥ kaiśca tadvada

राजा ने कहा — जिनका औध्वदैहिक कर्म भी कर दिया गया हो, वे यहाँ प्रेत कैसे बन जाते हैं? और किन कर्मों से वे पिशाच बनते हैं, वह भी बताओ।

श्लोक 36 (garuda.2.27.36)

प्रेत उवाच । देवद्रव्यं च ब्रह्मस्वं स्त्रीबालधनसञ्चयम् । ये हरन्ति नृपश्रेष्ठ प्रेतयोनिं व्रजन्ति ते

preta uvāca devadravyaṁ ca brahmasvaṁ strībāladhanasañcayam ye haranti nṛpaśreṣṭha pretayoniṁ vrajanti te

प्रेत ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ! जो देव-द्रव्य, ब्रह्मस्व अथवा स्त्री-बालकों के संचित धन का हरण करते हैं, वे प्रेत-योनि को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 37 (garuda.2.27.37)

तापसीं च सगोत्रां च अगम्यां ये भजन्ति हि । भवन्ति ते महाप्रेता अम्बुजानि हरन्ति ये

tāpasīṁ ca sagotrāṁ ca agamyāṁ ye bhajanti hi bhavanti te mahāpretā ambujāni haranti ye

जो तापसी स्त्री अथवा स्वगोत्रा अगम्य स्त्री का सेवन करते हैं, वे महाप्रेत बनते हैं; तथा जो कमलों (कमल-अर्घ्य) का हरण करते हैं, वे भी।

श्लोक 38 (garuda.2.27.38)

प्रवालवज्रहर्तारो ये च वस्त्रापहारकाः । तथा हिरण्यहर्तारः संयुगेऽसन्मुखागताः

pravālavajrahartāro ye ca vastrāpahārakāḥ tathā hiraṇyahartāraḥ saṁyuge'sanmukhāgatāḥ

मूँगा-हीरे का हरण करने वाले, वस्त्र चुराने वाले, तथा स्वर्ण का हरण करने वाले, तथा युद्ध में तुच्छ शत्रु से पीठ दिखाने वाले,

श्लोक 39 (garuda.2.27.39)

कृतघ्ना नास्तिका रौद्रास्तथा साहसिका नराः । पञ्चयज्ञविनिर्मुक्ता महादानरताश्च ये

kṛtaghnā nāstikā raudrāstathā sāhasikā narāḥ pañcayajñavinirmuktā mahādānaratāśca ye

कृतघ्न, नास्तिक, क्रूर, तथा दुःसाहसी मनुष्य, जो पंचयज्ञों से रहित रहकर भी बड़े-बड़े दान करते फिरते हैं (दिखावटी दानी),

श्लोक 40 (garuda.2.27.40)

स्वामिद्रोहकरा मित्रब्राह्मद्रोहकराश्च ये । तीर्थपापकरा राजञ्जायन्ते प्रेतयोनयः । एवमाद्या महाराज जायन्ते प्रेतयोनयः

svāmidrohakarā mitrabrāhmadrohakarāśca ye tīrthapāpakarā rājañjāyante pretayonayaḥ evamādyā mahārāja jāyante pretayonayaḥ

स्वामी से द्रोह करने वाले, मित्र और ब्राह्मण से द्रोह करने वाले, तथा तीर्थों में पाप करने वाले, हे राजन्! प्रेत-योनि को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार, हे महाराज, ये सब प्रेत-योनि प्राप्त करते हैं।

श्लोक 41 (garuda.2.27.41)

राजोवाच । कथं मुक्ता भवन्तीह प्रेतत्वात्त्वं च तेऽपि च । कथं चापि मया कार्यमौर्ध्वदैहिकमात्मनः । विधिना केन तत्कार्यं सर्वमेतद्वदस्व मे

rājovāca kathaṁ muktā bhavantīha pretatvāttvaṁ ca te'pi ca kathaṁ cāpi mayā kāryamaurdhvadaihikamātmanaḥ vidhinā kena tatkāryaṁ sarvametadvadasva me

राजा ने कहा — तुम और तुम्हारे जैसे अन्य लोग प्रेतत्व से कैसे मुक्त होते हैं? और मुझे स्वयं अपना औध्वदैहिक कर्म कैसे करना चाहिए? किस विधि से यह करना चाहिए, यह सब मुझे बताओ।

श्लोक 42 (garuda.2.27.42)

प्रेत उवाच । शृणु राजेन्द्र संक्षेपाद्विधिं नारायणात्मकम् । सच्छास्त्रश्रवणं विष्णोः पूजा सज्जनसंगतिः

preta uvāca śṛṇu rājendra saṁkṣepādvidhiṁ nārāyaṇātmakam sacchāstraśravaṇaṁ viṣṇoḥ pūjā sajjanasaṁgatiḥ

प्रेत ने कहा — हे राजेन्द्र! संक्षेप में नारायण-केन्द्रित विधि सुनो — सत्शास्त्र-श्रवण, विष्णु की पूजा, तथा सज्जनों की संगति,

श्लोक 43 (garuda.2.27.43)

प्रेतयोनिविनाशाय भवन्तीति मया श्रुतम् । अतो वक्ष्यामि ते विष्णुपूजां प्रेतत्वनाशिनीम्

pretayonivināśāya bhavantīti mayā śrutam ato vakṣyāmi te viṣṇupūjāṁ pretatvanāśinīm

ये प्रेत-योनि के विनाश के कारण होते हैं, ऐसा मैंने सुना है; इसलिए मैं तुम्हें प्रेतत्व-नाशक विष्णु-पूजा बताता हूँ।

श्लोक 44 (garuda.2.27.44)

सुवर्णद्वयमाहृत्य मूर्तिं भूप प्रकल्पयेत् । नारायणस्य देवस्य सर्वाभरणभूषिताम्

suvarṇadvayamāhṛtya mūrtiṁ bhūpa prakalpayet nārāyaṇasya devasya sarvābharaṇabhūṣitām

हे भूप! दो स्वर्ण (मुद्राओं) से नारायण देव की समस्त आभूषणों से सज्जित मूर्ति बनवानी चाहिए,

श्लोक 45 (garuda.2.27.45)

पीतवस्त्रयुगाच्छन्नां चन्दनागुरुचर्चिताम् । स्नापयेद्विविधैस्तोयैरधिवास्य यजेत्ततः

pītavastrayugācchannāṁ candanāgurucarcitām snāpayedvividhaistoyairadhivāsya yajettataḥ

जो पीत वस्त्र-युगल से आच्छादित तथा चन्दन-अगर से चर्चित हो। उसे विविध जलों से स्नान कराकर, अधिवासित करके तत्पश्चात् पूजन करे।

श्लोक 46 (garuda.2.27.46)

पूर्वे तु श्रीधरं देवं दक्षिणे मधुसूदनम् । पश्चिमे वानमं देवमुत्तरे च गदाधरम्

pūrve tu śrīdharaṁ devaṁ dakṣiṇe madhusūdanam paścime vānamaṁ devamuttare ca gadādharam

पूर्व दिशा में श्रीधर देव, दक्षिण में मधुसूदन, पश्चिम में वामन देव, तथा उत्तर में गदाधर की स्थापना करे।

श्लोक 47 (garuda.2.27.47)

मध्ये पितामहं पूज्य तथा देवं महेश्वरम् । पूजयेच्च विधानेन गन्धपुष्पादिभिः पृथक्

madhye pitāmahaṁ pūjya tathā devaṁ maheśvaram pūjayecca vidhānena gandhapuṣpādibhiḥ pṛthak

मध्य में पितामह (ब्रह्मा) तथा महेश्वर देव की पूजा करे; और विधिपूर्वक गन्ध-पुष्प आदि से पृथक्-पृथक् पूजन करे।

श्लोक 48 (garuda.2.27.48)

ततः प्रदक्षिणीकृत्य अग्नौ सन्तर्प्य देवताः । घृतेन दध्ना क्षीरेण विश्वान्देवांस्तथा नृप

tataḥ pradakṣiṇīkṛtya agnau santarpya devatāḥ ghṛtena dadhnā kṣīreṇa viśvāndevāṁstathā nṛpa

तत्पश्चात् प्रदक्षिणा करके, घी, दही और दूध से अग्नि में देवताओं तथा विश्वदेवों को तृप्त करे, हे राजन्।

श्लोक 49 (garuda.2.27.49)

ततः स्नातो विनीतात्मा यजमानः समाहितः । नारायणाग्रे विधिवत्स्वक्रियामौर्ध्वदैहिकीम्

tataḥ snāto vinītātmā yajamānaḥ samāhitaḥ nārāyaṇāgre vidhivatsvakriyāmaurdhvadaihikīm

तत्पश्चात् स्नान करके, विनम्र और एकाग्रचित्त यजमान नारायण के समक्ष विधिपूर्वक अपना औध्वदैहिक कर्म

श्लोक 50 (garuda.2.27.50)

आरभेत विनीतात्मा क्रोधलोभविवर्जितः । श्राद्धानि कुर्यात्सर्वाणि वृषस्योत्सर्जनं तथा

ārabheta vinītātmā krodhalobhavivarjitaḥ śrāddhāni kuryātsarvāṇi vṛṣasyotsarjanaṁ tathā

क्रोध और लोभ से रहित होकर आरम्भ करे; सभी श्राद्ध तथा वृषोत्सर्ग भी करे।

श्लोक 51 (garuda.2.27.51)

त्रयोदशानां विप्राणां वस्त्रच्छत्राण्युपानहौ । अङ्गुलीयकमुक्तानि भाजनासनभोजनैः

trayodaśānāṁ viprāṇāṁ vastracchatrāṇyupānahau aṅgulīyakamuktāni bhājanāsanabhojanaiḥ

तेरह ब्राह्मणों को वस्त्र, छत्र, जूते, अंगूठियाँ, मोती, तथा पात्र-आसन-भोजन दें।

श्लोक 52 (garuda.2.27.52)

सान्नाश्च सोदका देया घटाः प्रेतहिताय वै । शय्यादानमथो दत्त्वा घटं प्रेतस्य निर्वपेत्

sānnāśca sodakā deyā ghaṭāḥ pretahitāya vai śayyādānamatho dattvā ghaṭaṁ pretasya nirvapet

प्रेत के हित के लिए अन्न और जल सहित घट देने चाहिए; शय्या-दान देकर फिर प्रेत के निमित्त घट अर्पित करे।

श्लोक 53 (garuda.2.27.53)

नारायणेति सन्नाम संपुटस्थं समर्चयेत् । एवं कृत्वाथ विधिवच्छुभाशुभफलं लभेत्

nārāyaṇeti sannāma saṁpuṭasthaṁ samarcayet evaṁ kṛtvātha vidhivacchubhāśubhaphalaṁ labhet

उसे 'नारायण' नाम से संपुटित करके अर्चना करे; इस प्रकार विधिपूर्वक करने पर शुभ फल प्राप्त होता है।

श्लोक 54 (garuda.2.27.54)

राजोवाच । कथं प्रेतघटं कुर्याद्दद्यात्केन विधानतः । ब्रूहि सर्वानुकम्पार्थं घटं प्रेतविमुक्तिदम्

rājovāca kathaṁ pretaghaṭaṁ kuryāddadyātkena vidhānataḥ brūhi sarvānukampārthaṁ ghaṭaṁ pretavimuktidam

राजा ने कहा — प्रेत-घट कैसे बनाएँ, किस विधि से किसे दें? हे प्रेत! प्रेत को मुक्ति देने वाला वह घट सबके अनुकम्पार्थ बताओ।

श्लोक 55 (garuda.2.27.55)

प्रेत उवाच । साधु पृष्टं महाराज कथयामि निबोध ते । प्रेतत्वं न भवेद्येन दानेन सुदृढेन च

preta uvāca sādhu pṛṣṭaṁ mahārāja kathayāmi nibodha te pretatvaṁ na bhavedyena dānena sudṛḍhena ca

प्रेत ने कहा — हे महाराज! तुमने भली भाँति पूछा, सुनो, मैं बताता हूँ; जिस दृढ़ दान से प्रेतत्व नहीं होता,

श्लोक 56 (garuda.2.27.56)

दानं प्रेतघटं नाम सर्वाशुभविनाशनम् । दुर्लभं सर्वलोकानां दुर्गतिक्षयकारकम्

dānaṁ pretaghaṭaṁ nāma sarvāśubhavināśanam durlabhaṁ sarvalokānāṁ durgatikṣayakārakam

वह दान 'प्रेत-घट' कहलाता है, जो समस्त अशुभ का नाश करने वाला है; यह सब लोकों के लिए दुर्लभ तथा दुर्गति का नाशक है।

श्लोक 57 (garuda.2.27.57)

सन्तप्तहाटकमयं तु घटं विधाय ब्रह्मोशकेशवयुतं सह लोकपालैः । क्षीराज्यपूर्णविवरं प्रणिपत्य भक्त्या विप्राय देहि तव दानशतैः किमन्यैः

santaptahāṭakamayaṁ tu ghaṭaṁ vidhāya brahmośakeśavayutaṁ saha lokapālaiḥ kṣīrājyapūrṇavivaraṁ praṇipatya bhaktyā viprāya dehi tava dānaśataiḥ kimanyaiḥ

तपाए हुए सोने का घट बनवाकर, ब्रह्मा-ईश-केशव के साथ लोकपालों से युक्त, दूध-घी से भरे उसके भीतरी भाग को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके ब्राह्मण को दो — इससे बढ़कर सैकड़ों अन्य दानों की क्या आवश्यकता?

श्लोक 58 (garuda.2.27.58)

ब्रह्मा मध्ये तथा विष्णुः शङ्करः शङ्करोऽव्ययः । प्राच्यादिषु च तत्कण्ठे लोकपालान्क्रमेण तु

brahmā madhye tathā viṣṇuḥ śaṅkaraḥ śaṅkaro'vyayaḥ prācyādiṣu ca tatkaṇṭhe lokapālānkrameṇa tu

मध्य में ब्रह्मा, तथा विष्णु और अविनाशी शंकर की स्थापना करे; उसके कण्ठ पर पूर्व आदि दिशाओं में लोकपालों को क्रम से स्थापित करे।

श्लोक 59 (garuda.2.27.59)

सम्पूज्य विधिवद्राजन्धूपैः कुसुमचन्दनैः । ततो दुग्धाज्यसहितं घटं देयं हिरण्मयम्

sampūjya vidhivadrājandhūpaiḥ kusumacandanaiḥ tato dugdhājyasahitaṁ ghaṭaṁ deyaṁ hiraṇmayam

हे राजन्! धूप, पुष्प, चन्दन से विधिपूर्वक पूजा करके, तत्पश्चात् दूध-घी सहित वह स्वर्ण-घट दान करे।

श्लोक 60 (garuda.2.27.60)

सर्वदानाधिकञ्चैतन्महापातकनाशनम् । कर्तव्यं श्रद्धया राजन्प्रेतत्वविनिवृत्तये

sarvadānādhikañcaitanmahāpātakanāśanam kartavyaṁ śraddhayā rājanpretatvavinivṛttaye

यह सब दानों से बढ़कर महापातकों का नाशक है; हे राजन्! श्रद्धापूर्वक इसे करना चाहिए, जिससे प्रेतत्व की निवृत्ति हो।

श्लोक 61 (garuda.2.27.61)

श्रीभागवानुवाच । एवं संजल्षतस्तस्य प्रेतेन नियतात्मनः । सेनाजगामानुपदं हस्त्यश्वरथसंकुला

śrībhāgavānuvāca evaṁ saṁjalṣatastasya pretena niyatātmanaḥ senājagāmānupadaṁ hastyaśvarathasaṁkulā

श्रीभगवान ने कहा — इस प्रकार वह संयत-चित्त प्रेत जब यह कह रहा था, तभी हाथी-घोड़े-रथों से भरी सेना पीछे-पीछे आ पहुँची।

श्लोक 62 (garuda.2.27.62)

ततो बले समायाते दत्त्वा राज्ञे महामणिम् । नमस्कृत्य पुनः प्रार्थ्य प्रेतोऽदर्शनमीयिवान्

tato bale samāyāte dattvā rājñe mahāmaṇim namaskṛtya punaḥ prārthya preto'darśanamīyivān

तब सेना के आ जाने पर, राजा को महामणि देकर, प्रणाम करके तथा पुनः प्रार्थना करके, वह प्रेत अदृश्य हो गया।

श्लोक 63 (garuda.2.27.63)

तस्माद्वनाद्विनिष्क्रम्य राजापि स्वपुरं ययौ । स्वपुरं स समासाद्य सर्वं तत्प्रेतभाषितम्

tasmādvanādviniṣkramya rājāpi svapuraṁ yayau svapuraṁ sa samāsādya sarvaṁ tatpretabhāṣitam

उस वन से निकलकर राजा भी अपने नगर को गया; अपने नगर पहुँचकर प्रेत द्वारा कहे गए उस सम्पूर्ण वचन के अनुसार

श्लोक 64 (garuda.2.27.64)

चकार विधिवत्पक्षिन्नौर्ध्वदेहादिकं विधिम् । तस्य पुण्यप्रदानेन प्रेतो मुक्तो दिवं ययौ

cakāra vidhivatpakṣinnaurdhvadehādikaṁ vidhim tasya puṇyapradānena preto mukto divaṁ yayau

हे पक्षी! उसने विधिपूर्वक औध्वदेहिक आदि विधि सम्पन्न की। उस पुण्य-दान से वह प्रेत मुक्त होकर स्वर्ग को गया।

श्लोक 65 (garuda.2.27.65)

श्राद्धेन परदत्तेन गतः प्रेतोऽपि सद्गतिम् । किं पुनः पुत्रदत्तेन पिता यातीति चात्भुतम्

śrāddhena paradattena gataḥ preto'pi sadgatim kiṁ punaḥ putradattena pitā yātīti cātbhutam

पराए के द्वारा दिए गए श्राद्ध से भी प्रेत सद्गति को प्राप्त हुआ — फिर पुत्र द्वारा दिए गए श्राद्ध से पिता को गति मिलना तो और भी आश्चर्य की बात नहीं!

श्लोक 66 (garuda.2.27.66)

इतिहासमिमं पुण्यं शृणोति श्रावयेच्च यः । न तौ प्रेतत्वमायातः पापाचारयुतावपि

itihāsamimaṁ puṇyaṁ śṛṇoti śrāvayecca yaḥ na tau pretatvamāyātaḥ pāpācārayutāvapi

जो इस पुण्य इतिहास को सुनता या सुनाता है, वे दोनों (श्रोता और वक्ता), पापाचारी होते हुए भी, प्रेतत्व को प्राप्त नहीं होते।

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