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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 126

मरुत्त-चरित (१): महायज्ञ

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127

श्लोक 1 (markandeya.126.1)

क्रौष्टुकिरुवाच भगवन्विस्तरात्सर्वं ममैतत्कथितं त्वया । करन्धमस्य चरितमविक्षिच्चरितं च यत् ॥ 126.1 ॥

krauṣṭukiruvāca bhagavanvistarātsarvaṁ mamaitatkathitaṁ tvayā karandhamasya caritamavikṣiccaritaṁ ca yat

हे भगवन्, आपने मुझे करन्धम का चरित्र और अविक्षित् का चरित्र — यह सब कुछ विस्तार से कहा है।

श्लोक 2 (markandeya.126.2)

अविक्षितस्य नृपतेर्मरुत्तस्य महात्मनः । श्रोतुमिच्छामि चरितं श्रूयते सोऽतिचेष्टितः ॥ 126.2 ॥

avikṣitasya nṛpatermaruttasya mahātmanaḥ śrotumicchāmi caritaṁ śrūyate so’ticeṣṭitaḥ

अब मैं राजा अविक्षित् के महात्मा पुत्र मरुत्त का चरित्र सुनना चाहता हूँ; सुना जाता है कि वे अत्यंत उत्कृष्ट कर्मों वाले थे।

श्लोक 3 (markandeya.126.3)

चक्रवर्त्ती महाभागः शूरः कान्तो महामतिः । धर्मविद्धर्मकृच्चैव सम्यक्पालयिता भुवः ॥ 126.3 ॥

cakravarttī mahābhāgaḥ śūraḥ kānto mahāmatiḥ dharmaviddharmakṛccaiva samyakpālayitā bhuvaḥ

वे चक्रवर्ती सम्राट्, परम भाग्यशाली, शूरवीर, सुन्दर, महाबुद्धिमान्, धर्मज्ञ और धर्माचरण करने वाले तथा पृथ्वी का भलीभाँति पालन करने वाले थे।

श्लोक 4 (markandeya.126.4)

मार्कण्डेय उवाच स पित्रा समनुज्ञातं राज्यं प्राप्य पितामहात् । धर्मतः पालयामास पिता पुत्रानिवौरसान् ॥ 126.4 ॥

mārkaṇḍeya uvāca sa pitrā samanujñātaṁ rājyaṁ prāpya pitāmahāt dharmataḥ pālayāmāsa pitā putrānivaurasān

मार्कण्डेय ने कहा: पिता द्वारा अनुज्ञात तथा पितामह से प्राप्त राज्य को पाकर उसने धर्मपूर्वक उसका पालन किया, जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का पालन करता है।

श्लोक 5 (markandeya.126.5)

इयाज सुबहून्यज्ञान्यथावत्स्वाप्तदक्षिणान् । ऋत्विक्पुरोहितादेशादनिर्विण्णो महीपतिः ॥ 126.5 ॥

iyāja subahūnyajñānyathāvatsvāptadakṣiṇān ṛtvikpurohitādeśādanirviṇṇo mahīpatiḥ

उस अथक राजा ने ऋत्विक् और पुरोहित के निर्देशानुसार यथाविधि प्रचुर दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ किए।

श्लोक 6 (markandeya.126.6)

तस्याप्रतिहतं चक्रमासीद्द्वीपेषु सप्तसु । गतिश्चाप्यनवच्छिन्ना स्वःपातालजलादिषु ॥ 126.6 ॥

tasyāpratihataṁ cakramāsīddvīpeṣu saptasu gatiścāpyanavacchinnā svaḥpātālajalādiṣu

उसका शासन-चक्र सातों द्वीपों में अबाधित था, तथा स्वर्ग, पाताल, जल आदि में भी उसकी गति निर्बाध थी।

श्लोक 7 (markandeya.126.7)

ततः प्राप्य धनं विप्र यथावत्स्वक्रियापरः । अयजत्स महायज्ञैर्देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ 126.7 ॥

tataḥ prāpya dhanaṁ vipra yathāvatsvakriyāparaḥ ayajatsa mahāyajñairdevānindrapurogamān

हे विप्र, इस प्रकार धन प्राप्त कर, अपने कर्तव्य में तत्पर उस राजा ने महायज्ञों द्वारा इन्द्र-प्रमुख देवताओं का यजन किया।

श्लोक 8 (markandeya.126.8)

इतरे च यथावर्णाः स्वे स्वे कर्मण्यतन्द्रिताः । तदुपात्तधनाश्चक्रुरिष्टापूर्त्तादिकाः क्रियाः ॥ 126.8 ॥

itare ca yathāvarṇāḥ sve sve karmaṇyatandritāḥ tadupāttadhanāścakruriṣṭāpūrttādikāḥ kriyāḥ

तथा अन्य लोग भी अपने-अपने वर्ण के अनुसार अपने कर्म में सावधान रहते हुए, उससे प्राप्त धन से इष्ट और पूर्त आदि कार्य करने लगे।

श्लोक 9 (markandeya.126.9)

पाल्यमाना मही तेन मरुत्तेन महात्मना । योऽस्पर्द्धात्त्रिदशावासवासिभिर्द्विजसत्तम ॥ 126.9 ॥

pālyamānā mahī tena maruttena mahātmanā yo’sparddhāttridaśāvāsavāsibhirdvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, उस महात्मा मरुत्त द्वारा पालित पृथ्वी ऐसी थी कि वह स्वर्गवासी देवताओं की भी होड़ करता था।

श्लोक 10 (markandeya.126.10)

तेनातिशयिताः सर्वे केवलं न महीक्षितः । यज्विना देवराजोऽपि शतयज्ञाभिसन्धिना ॥ 126.10 ॥

tenātiśayitāḥ sarve kevalaṁ na mahīkṣitaḥ yajvinā devarājo’pi śatayajñābhisandhinā

उस यज्ञशील राजा ने केवल पृथ्वी के राजाओं को ही नहीं, अपितु सौ यज्ञों के संकल्पवाले देवराज इन्द्र को भी पीछे छोड़ दिया।

श्लोक 11 (markandeya.126.11)

ऋत्विक्तस्य तु संवर्त्तो बभूवाङ्गिरसः सुतः । भ्राता बृहस्पतेर्विप्र महात्मा तपसां निधिः ॥ 126.11 ॥

ṛtviktasya tu saṁvartto babhūvāṅgirasaḥ sutaḥ bhrātā bṛhaspatervipra mahātmā tapasāṁ nidhiḥ

हे विप्र, उसका ऋत्विक् संवर्त था, जो अंगिरा का पुत्र, बृहस्पति का भाई, महात्मा और तपस्याओं का भण्डार था।

श्लोक 12 (markandeya.126.12)

सौवर्णो मुञ्जवान्नाम पर्वतः सुरसेवितः । पातितं तेन तच्छृङ्गं कृते तस्य महीपतेः ॥ 126.12 ॥

sauvarṇo muñjavānnāma parvataḥ surasevitaḥ pātitaṁ tena tacchṛṅgaṁ kṛte tasya mahīpateḥ

मुञ्जवान् नामक एक स्वर्णमय पर्वत है, जो देवताओं द्वारा सेवित है; उस राजा के लिए संवर्त ने उसका शिखर गिरा दिया।

श्लोक 13 (markandeya.126.13)

तेन यस्याखिलं यज्ञे भूमिभागादिकं द्विज । प्रासादाश्च कृताः शुभ्रास्तपसा सर्वकाञ्चनाः ॥ 126.13 ॥

tena yasyākhilaṁ yajñe bhūmibhāgādikaṁ dvija prāsādāśca kṛtāḥ śubhrāstapasā sarvakāñcanāḥ

हे द्विज, उसने अपनी तपस्या से यज्ञ की सम्पूर्ण भूमि आदि तथा उज्ज्वल प्रासादों को सर्वथा स्वर्णमय बना दिया।

श्लोक 14 (markandeya.126.14)

गाथाश्चाप्यत्र गायन्ति मरुत्तचरिताश्रयाः । सातत्येनर्षयः सर्वे कुर्वन्तोऽध्ययनं यथा ॥ 126.14 ॥

gāthāścāpyatra gāyanti maruttacaritāśrayāḥ sātatyenarṣayaḥ sarve kurvanto’dhyayanaṁ yathā

यहाँ मरुत्त के चरित्र पर आधारित गाथाएँ भी गाई जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे सभी ऋषि निरन्तर स्वाध्याय करते हैं।

श्लोक 15 (markandeya.126.15)

मरुत्तेन समो नाभूद्यजमानो महीतले । सदः समस्तं यद्यज्ञे प्रासादाश्चैव काञ्चनाः ॥ 126.15 ॥

maruttena samo nābhūdyajamāno mahītale sadaḥ samastaṁ yadyajñe prāsādāścaiva kāñcanāḥ

पृथ्वी पर मरुत्त के समान कोई यजमान नहीं हुआ, क्योंकि उसके यज्ञ में सम्पूर्ण सदन और प्रासाद स्वर्णमय थे।

श्लोक 16 (markandeya.126.16)

अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । विप्राणां परिवेष्टारः शक्राद्यास्त्रिदशोत्तमाः ॥ 126.16 ॥

amādyadindraḥ somena dakṣiṇābhirdvijātayaḥ viprāṇāṁ pariveṣṭāraḥ śakrādyāstridaśottamāḥ

इन्द्र सोमरस से तथा द्विजगण दक्षिणा से उन्मत्त हो गए; शक्र आदि श्रेष्ठ देवगण स्वयं ब्राह्मणों को परोसने वाले बने।

श्लोक 17 (markandeya.126.17)

यथा यज्ञे मरुत्तस्य तृप्ताः सर्वे महीपतेः । सुवर्णमखिलं त्यक्तं रत्नपूर्णगृहे द्विजैः ॥ 126.17 ॥

yathā yajñe maruttasya tṛptāḥ sarve mahīpateḥ suvarṇamakhilaṁ tyaktaṁ ratnapūrṇagṛhe dvijaiḥ

इस प्रकार राजा मरुत्त के यज्ञ में सभी तृप्त हो गए; ब्राह्मणों ने रत्नों से भरे घरों में भी सारा स्वर्ण छोड़ दिया।

श्लोक 18 (markandeya.126.18)

प्रासादादिसमस्तं च सौवर्णं तस्य यत्क्रतौ । त्रयो वर्णाह्यलभ्यन्त तस्मात्केचित्तथा ददुः । ( तेन त्यक्तेन शिष्टा ये जनाः पूर्णमनोरथाः । तेऽपि यज्ञान्यजन्ते स्म देशे देशे पृथक्पृथक् ।) ॥ 126.18 ॥

prāsādādisamastaṁ ca sauvarṇaṁ tasya yatkratau trayo varṇāhyalabhyanta tasmātkecittathā daduḥ (tena tyaktena śiṣṭā ye janāḥ pūrṇamanorathāḥ te’pi yajñānyajante sma deśe deśe pṛthakpṛthak)

उसके यज्ञ में जो कुछ भी स्वर्णमय था — प्रासाद आदि सब — शेष तीनों वर्णों को उसमें से प्राप्त हुआ; उनमें से कुछ ने भी उसी प्रकार आगे दान कर दिया। (उनके द्वारा छोड़े गए उस धन से शेष लोग भी, अपनी कामनाएँ पूर्ण कर, विभिन्न देशों में पृथक्-पृथक् यज्ञ करने लगे।)

श्लोक 19 (markandeya.126.19)

तस्यैवं कुर्वतो राज्यं सम्यक्पालयतः प्रजाः । तपस्वी कश्चिदभ्येत्य तमाह मुनिसत्तम ॥ 126.19 ॥

tasyaivaṁ kurvato rājyaṁ samyakpālayataḥ prajāḥ tapasvī kaścidabhyetya tamāha munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ, इस प्रकार जब वह राज्य करते हुए प्रजा का भलीभाँति पालन कर रहा था, तब एक तपस्विनी उसके पास आकर उससे बोली:

श्लोक 20 (markandeya.126.20)

पितुर्माता तवाहेदं दृष्ट्वा तापसमण्डलम् । विषाभिभूतमुरगैर्मदोन्मत्तैर्नरेश्वर ॥ 126.20 ॥

piturmātā tavāhedaṁ dṛṣṭvā tāpasamaṇḍalam viṣābhibhūtamuragairmadonmattairnareśvara

'हे नरेश्वर, मैं तुम्हारे पिता की माता हूँ; मदोन्मत्त सर्पों के विष से पीड़ित इस तापस-मण्डल को देखकर...'

श्लोक 21 (markandeya.126.21)

पितामहस्ते स्वर्यातः सम्यक्संपाल्य मेदिनीम् । पिता तव तथा शक्तो हित्वा ग्रामं वनं गतः । ( तपश्चरणशक्ताऽहमिह चौर्वाश्रमे स्थिता) ॥ 126.21 ॥

pitāmahaste svaryātaḥ samyaksaṁpālya medinīm pitā tava tathā śakto hitvā grāmaṁ vanaṁ gataḥ (tapaścaraṇaśaktā’hamiha caurvāśrame sthitā)

'तुम्हारे पितामह पृथ्वी का भलीभाँति पालन कर स्वर्ग सिधार गए; तुम्हारे पिता भी समर्थ होते हुए ग्राम को त्यागकर वन चले गए — (और मैं तपश्चरण में समर्थ होकर यहाँ और्व के आश्रम में निवास कर रही हूँ।)'

श्लोक 22 (markandeya.126.22)

साऽहं पश्यामि वैकल्यं तव राज्यं प्रशासतः । पितामहस्य तेनाभूद्यत्पूर्वेषां च ते नृप ॥ 126.22 ॥

sā’haṁ paśyāmi vaikalyaṁ tava rājyaṁ praśāsataḥ pitāmahasya tenābhūdyatpūrveṣāṁ ca te nṛpa

'हे राजन्, मैं ऐसी होकर भी तुम्हारे राज्य-शासन में वह त्रुटि देख रही हूँ, जो तुम्हारे पितामह और पूर्वजों के समय नहीं थी।'

श्लोक 23 (markandeya.126.23)

नूनं प्रमत्तो भोगेषु सक्तो वाऽविजितेन्द्रियः । चारान्धता यतोऽस्तीयं दुष्टादुष्टं न वेत्सि यत् ॥ 126.23 ॥

nūnaṁ pramatto bhogeṣu sakto vā’vijitendriyaḥ cārāndhatā yato’stīyaṁ duṣṭāduṣṭaṁ na vetsi yat

'निश्चय ही तुम प्रमादी हो, या भोगों में आसक्त हो, या इन्द्रियों को न जीत सके हो, क्योंकि तुम्हारे गुप्तचरों के प्रति यह अन्धता है कि तुम दुष्ट और अदुष्ट को नहीं पहचानते।'

श्लोक 24 (markandeya.126.24)

पातालादभ्युपेतैस्तु भुजगैर्दशशालिभिः । दष्टा मुनिसुताः सप्त दूषिताश्च जलाशयः ॥ 126.24 ॥

pātālādabhyupetaistu bhujagairdaśaśālibhiḥ daṣṭā munisutāḥ sapta dūṣitāśca jalāśayaḥ

'पाताल से आए हुए विषधर सर्पों ने ऋषियों के सात पुत्रों को डस लिया है और जलाशयों को भी दूषित कर दिया है।'

श्लोक 25 (markandeya.126.25)

स्वेदमूत्रपुरीषेण दूषितं सुशृतं हविः । अपराधं समुद्दिश्य दत्तो नागबलिश्चिरात् ॥ 126.25 ॥

svedamūtrapurīṣeṇa dūṣitaṁ suśṛtaṁ haviḥ aparādhaṁ samuddiśya datto nāgabaliścirāt

'पसीने, मूत्र और मल से हवि को दूषित किया गया है; और इस अपराध के कारण, चिरकाल से दिया जाने वाला नाग-बलि अब रोक दिया गया है।'

श्लोक 26 (markandeya.126.26)

एते समर्था मुनयो भस्मीकर्तुं भुजङ्गमान् । किन्त्वेषां नाधिकारोऽत्र त्वमेवाधिकारवान् ॥ 126.26 ॥

ete samarthā munayo bhasmīkartuṁ bhujaṅgamān kintveṣāṁ nādhikāro’tra tvamevādhikāravān

'ये मुनि सर्पों को भस्म कर देने में समर्थ हैं, किन्तु इस विषय में उनका अधिकार नहीं है — इसमें अधिकार तो केवल तुम्हारा है।'

श्लोक 27 (markandeya.126.27)

तावत्सुखं भूपतिजैर्भोगजं प्राप्यते नृप । अभिषेकजलं यावन्न मूर्ध्नि विनिपात्यते ॥ 126.27 ॥

tāvatsukhaṁ bhūpatijairbhogajaṁ prāpyate nṛpa abhiṣekajalaṁ yāvanna mūrdhni vinipātyate

'हे राजन्, राजपुत्र को भोगजनित सुख तभी तक प्राप्त होता है, जब तक उसके मस्तक पर अभिषेक का जल नहीं डाला जाता।'

श्लोक 28 (markandeya.126.28)

कानि मित्राणि कः शत्रुर्मम शत्रोर्बलं कियत् । कोऽहं के मन्त्रिणः पक्षे के वा भूपतयो मम ॥ 126.28 ॥

kāni mitrāṇi kaḥ śatrurmama śatrorbalaṁ kiyat ko’haṁ ke mantriṇaḥ pakṣe ke vā bhūpatayo mama

'मेरे मित्र कौन हैं, शत्रु कौन है, शत्रु का बल कितना है; मैं कौन हूँ, मेरे पक्ष में कौन-से मन्त्री हैं, अथवा कौन-से राजा मेरे हैं?'

श्लोक 29 (markandeya.126.29)

( कियान्कोशो बलं किंवा कोऽनुरक्तो जनो मम) । विरक्तो वा परैर्भिन्नः परेषामपि कीदृशः । कः सम्यगत्र नगरे विषये वा जनो मम ॥ 126.29 ॥

(kiyānkośo balaṁ kiṁvā ko’nurakto jano mama) virakto vā parairbhinnaḥ pareṣāmapi kīdṛśaḥ kaḥ samyagatra nagare viṣaye vā jano mama

'(मेरा कोष कितना है, बल कितना है, तथा कौन-सी प्रजा मुझसे अनुरक्त है?) कौन विरक्त है या शत्रुओं द्वारा भेदा गया है, और शत्रुओं की प्रजा की स्थिति कैसी है? इस नगर या राज्य में मेरा वास्तव में हितैषी जन कौन है?'

श्लोक 30 (markandeya.126.30)

धर्मकर्माश्रयो मूढः कः सम्यगपि वर्त्तते । को दण्ड्यः परिपाल्यः कः के चोपेक्ष्या नरा मया ॥ 126.30 ॥

dharmakarmāśrayo mūḍhaḥ kaḥ samyagapi varttate ko daṇḍyaḥ paripālyaḥ kaḥ ke copekṣyā narā mayā

'कौन मूढ़ होते हुए भी धर्म-कर्म का आश्रय लेकर सम्यक् आचरण करता है? किसे दण्ड देना चाहिए, किसका पालन करना चाहिए, और किन मनुष्यों की मेरे द्वारा उपेक्षा करनी चाहिए?'

श्लोक 31 (markandeya.126.31)

सामभेदतया दम्या देशकालमवेक्षता । चारांश्च चारयेदन्यैरज्ञातान्भूपतिश्चरैः ॥ 126.31 ॥

sāmabhedatayā damyā deśakālamavekṣatā cārāṁśca cārayedanyairajñātānbhūpatiścaraiḥ

'देश-काल को देखते हुए राजा को साम और भेद से शत्रुओं को वश में करना चाहिए, तथा ऐसे गुप्तचरों द्वारा गुप्तचरों को नियुक्त करना चाहिए जो एक-दूसरे से अपरिचित हों।'

श्लोक 32 (markandeya.126.32)

सचिवादिषु सर्वेषु चरान्दद्यान्महीपतिः । इत्यादौ भूपतिर्नित्यं कर्मण्यासक्तमानसः ॥ 126.32 ॥

sacivādiṣu sarveṣu carāndadyānmahīpatiḥ ityādau bhūpatirnityaṁ karmaṇyāsaktamānasaḥ

'राजा को अपने सभी मन्त्रियों आदि पर भी गुप्तचर नियुक्त करने चाहिए। इस प्रकार राजा को सदैव अपने कर्तव्य में मन लगाए रखना चाहिए...'

श्लोक 33 (markandeya.126.33)

नयेद्दिनं तथा रात्रिं न तु भोगपरायणः । राज्ञां शरीरग्रहणं न भोगाय महीपते ॥ 126.33 ॥

nayeddinaṁ tathā rātriṁ na tu bhogaparāyaṇaḥ rājñāṁ śarīragrahaṇaṁ na bhogāya mahīpate

'...और इसी प्रकार दिन-रात बिताने चाहिए, भोग-परायण होकर नहीं। हे राजन्, राजाओं का शरीर-धारण भोग के लिए नहीं होता।'

श्लोक 34 (markandeya.126.34)

क्लेशाय महते पृथ्वी स्वधर्मपरिपालने । सम्यक्पालयतः पृथ्वीं स्वधर्मं च महीपते ॥ 126.34 ॥

kleśāya mahate pṛthvī svadharmaparipālane samyakpālayataḥ pṛthvīṁ svadharmaṁ ca mahīpate

'पृथ्वी तो स्वधर्म के पालन में महान् क्लेश के लिए ही है। हे राजन्, जो पृथ्वी और अपने स्वधर्म का भलीभाँति पालन करता है...'

श्लोक 35 (markandeya.126.35)

इह क्लेशो महान्स्वर्गे परमं सुखमक्षयम् । तदेतदवबुध्यस्व हित्वा भोगान्नरेश्वर ॥ 126.35 ॥

iha kleśo mahānsvarge paramaṁ sukhamakṣayam tadetadavabudhyasva hitvā bhogānnareśvara

'...यहाँ महान् क्लेश है, किन्तु स्वर्ग में परम अक्षय सुख है। हे नरेश्वर, इस बात को समझो और भोगों को त्याग दो।'

श्लोक 36 (markandeya.126.36)

पालनाय क्षितेः क्लेशमङ्गीकर्तुमिहार्हसि । इति वृत्तमृषीणां यद्व्यसनं त्वयि शासति ॥ 126.36 ॥

pālanāya kṣiteḥ kleśamaṅgīkartumihārhasi iti vṛttamṛṣīṇāṁ yadvyasanaṁ tvayi śāsati

'तुम्हें पृथ्वी के पालन का क्लेश स्वीकार करना चाहिए। यह वृत्तान्त है — तुम्हारे शासन में ऋषियों पर यह विपत्ति आई है...'

श्लोक 37 (markandeya.126.37)

भुजङ्गहेतुकं भूप चारान्धो नापि वेत्सि तत् । बहुनात्र किमुक्तेन दुष्टे दण्डो निपात्यताम् ॥ 126.37 ॥

bhujaṅgahetukaṁ bhūpa cārāndho nāpi vetsi tat bahunātra kimuktena duṣṭe daṇḍo nipātyatām

'...जो सर्पों के कारण हुई है, हे राजन्, और गुप्तचरों के प्रति अन्धे होने के कारण तुम्हें इसका पता तक नहीं है। यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? दुष्टों पर दण्ड का प्रहार होना चाहिए।'

श्लोक 38 (markandeya.126.38)

शिष्टान्पालय राजंस्त्वं धर्मषड्भागमाप्स्यसि । अरक्षन्पापमखिलं दुष्टैरविनयात्कृतम् ॥ 126.38 ॥

śiṣṭānpālaya rājaṁstvaṁ dharmaṣaḍbhāgamāpsyasi arakṣanpāpamakhilaṁ duṣṭairavinayātkṛtam

'हे राजन्, सज्जनों की रक्षा करो — तुम्हें उनके धर्म का षष्ठांश प्राप्त होगा। और यदि रक्षा न करोगे, तो दुष्टों द्वारा अविनय से किए गए समस्त पाप का भागी बनोगे।'

श्लोक 39 (markandeya.126.39)

समवाप्स्यस्यसन्दिग्धं यदिच्छसि कुरुष्व तत् । एतन्मयोक्तं सकलं यत्तवाहं पितामहः । कुरुष्वैवं स्थिते यत्ते रोचते वसुधाधिप ॥ 126.39 ॥

samavāpsyasyasandigdhaṁ yadicchasi kuruṣva tat etanmayoktaṁ sakalaṁ yattavāhaṁ pitāmahaḥ kuruṣvaivaṁ sthite yatte rocate vasudhādhipa

'तुम निःसंदेह इसे प्राप्त करोगे। जो चाहो सो करो। यह सब मैंने इसलिए कहा क्योंकि मैं तुम्हारी पितामही हूँ। अब स्थिति ऐसी है, हे वसुधाधिप, जो तुम्हें उचित लगे वही करो।'

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127