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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 134

पुराण-श्रवण-पठन-फल

अध्याय 133अध्याय-सूची

श्लोक 1 (markandeya.134.1)

पक्षिण ऊचुः एवमुक्त्वा जैमिनेयं मार्कण्डेयो महामुनिः । विसृज्य क्रौष्टुकिमुनिं चक्रे माध्याह्निकीं क्रियाम् ॥ 134.1 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ evamuktvā jaimineyaṁ mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ visṛjya krauṣṭukimuniṁ cakre mādhyāhnikīṁ kriyām

पक्षियों ने कहा — इस प्रकार जैमिनि से यह सब कहकर, महामुनि मार्कण्डेय ने क्रौष्टुकि मुनि को विदा किया और मध्याह्न की सन्ध्या-क्रिया सम्पन्न की।

श्लोक 2 (markandeya.134.2)

अस्माभिश्च श्रुतं तस्माद्यत्ते प्रोक्तं महामुने । अनादिसिद्धमेतद्धि पुरा प्रोक्तं स्वयंभुवा ॥ 134.2 ॥

asmābhiśca śrutaṁ tasmādyatte proktaṁ mahāmune anādisiddhametaddhi purā proktaṁ svayaṁbhuvā

'हे महामुने, हमने भी उस [कथा] से वही सुना है जो आपने कहा — यह तो अनादि-सिद्ध है, जो पूर्वकाल में स्वयंभू ब्रह्मा ने ही कहा था।'

श्लोक 3 (markandeya.134.3)

मार्कण्डेयाय मुनये यत्तेऽस्माभिरुदाहृतम् । पुण्यं पवित्रमायुष्यं धर्मकामार्थसिद्धिदम् ॥ 134.3 ॥

mārkaṇḍeyāya munaye yatte’smābhirudāhṛtam puṇyaṁ pavitramāyuṣyaṁ dharmakāmārthasiddhidam

'मुनि मार्कण्डेय के लिए हमने जो कुछ कहा, वह पुण्यमय, पवित्र, आयुष्यकर तथा धर्म-अर्थ-काम की सिद्धि देने वाला है।'

श्लोक 4 (markandeya.134.4)

पठतां शृण्वतां सद्यः सर्वपापप्रमोचनम् । आदावेव कृता ये च प्रश्नाश्चत्वार एव हि ॥ 134.4 ॥

paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ sadyaḥ sarvapāpapramocanam ādāveva kṛtā ye ca praśnāścatvāra eva hi

'पढ़ने और सुनने वालों को यह तत्काल ही सब पापों से मुक्त करने वाला है। आरम्भ में ही जो चार प्रश्न किए गए थे —'

श्लोक 5 (markandeya.134.5)

पितुः पुत्रस्य संवादस्तथा सृष्टिः स्वयंभुवः । तथा मनूनां स्थितयो राज्ञां च चरितं मुने ॥ 134.5 ॥

pituḥ putrasya saṁvādastathā sṛṣṭiḥ svayaṁbhuvaḥ tathā manūnāṁ sthitayo rājñāṁ ca caritaṁ mune

'पिता-पुत्र का संवाद, स्वयंभू की सृष्टि, तथा मनुओं की स्थिति और राजाओं का चरित्र, हे मुने —'

श्लोक 6 (markandeya.134.6)

अस्माभिरेतत्ते प्रोक्तं किमद्य श्रोतुमिच्छसि । एतान्सर्वान्नरः श्रुत्वा पठते वा सभासु च ॥ 134.6 ॥

asmābhiretatte proktaṁ kimadya śrotumicchasi etānsarvānnaraḥ śrutvā paṭhate vā sabhāsu ca

'यह सब हमने आपसे कह दिया है। अब आज आप और क्या सुनना चाहते हैं? इन सबको सुनकर अथवा सभाओं में पढ़कर मनुष्य —'

श्लोक 7 (markandeya.134.7)

विधूय सर्वपापानि ब्रह्मणोऽन्ते लयं व्रजेत् । अष्टादशपुराणानि यानि प्राह पितामहः ॥ 134.7 ॥

vidhūya sarvapāpāni brahmaṇo’nte layaṁ vrajet aṣṭādaśapurāṇāni yāni prāha pitāmahaḥ

'समस्त पापों को झाड़कर अन्ततः ब्रह्म में लय को प्राप्त होता है। पितामह [ब्रह्मा] ने जो अठारह पुराण कहे हैं —'

श्लोक 8 (markandeya.134.8)

तेषां तु सप्तमं ज्ञेयं मार्कर्ण्डेयं सुविश्रुतम् । ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा ॥ 134.8 ॥

teṣāṁ tu saptamaṁ jñeyaṁ mārkarṇḍeyaṁ suviśrutam brāhmaṁ pādmaṁ vaiṣṇavaṁ ca śaivaṁ bhāgavataṁ tathā

'उनमें से सातवाँ यह अत्यन्त सुविख्यात मार्कण्डेय पुराण जानना चाहिए। ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, तथा भागवत —'

श्लोक 9 (markandeya.134.9)

तथान्यन्नारदीयं च मार्कण्डेयं च सप्तमम् । आग्नेयमष्टमं प्रोक्तं भविष्यं नवमं तथा ॥ 134.9 ॥

tathānyannāradīyaṁ ca mārkaṇḍeyaṁ ca saptamam āgneyamaṣṭamaṁ proktaṁ bhaviṣyaṁ navamaṁ tathā

'तथा अन्य एक और, नारदीय, और सातवाँ मार्कण्डेय; आठवाँ आग्नेय कहा गया है, तथा नौवाँ भविष्य पुराण।'

श्लोक 10 (markandeya.134.10)

दशमं ब्रह्मवैवर्त्तं लैङ्गमेकादशं स्मृतम् । वाराहं द्वादशं प्रोक्तं स्कन्दमत्र त्रयोदशम् ॥ 134.10 ॥

daśamaṁ brahmavaivarttaṁ laiṅgamekādaśaṁ smṛtam vārāhaṁ dvādaśaṁ proktaṁ skandamatra trayodaśam

'दसवाँ ब्रह्मवैवर्त, ग्यारहवाँ लैंग स्मृत है; बारहवाँ वाराह कहा गया है, और यहाँ तेरहवाँ स्कान्द है।'

श्लोक 11 (markandeya.134.11)

चतुर्दशं वामनं च कौर्मं पञ्चदशं तथा । मात्स्यं च गारुडं चैव ब्रह्माण्डं च ततः परम् ॥ 134.11 ॥

caturdaśaṁ vāmanaṁ ca kaurmaṁ pañcadaśaṁ tathā mātsyaṁ ca gāruḍaṁ caiva brahmāṇḍaṁ ca tataḥ param

'चौदहवाँ वामन, तथा पन्द्रहवाँ कौर्म; तथा मात्स्य और गारुड़, और उसके बाद ब्रह्माण्ड — [ये अठारहवाँ है]।'

श्लोक 12 (markandeya.134.12)

अष्टादशपुराणानां नामधेयानि यः पठेत् । त्रिसन्ध्यं जपते नित्यं सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ 134.12 ॥

aṣṭādaśapurāṇānāṁ nāmadheyāni yaḥ paṭhet trisandhyaṁ japate nityaṁ so’śvamedhaphalaṁ labhet

'जो इन अठारह पुराणों के नामों को नित्य तीनों संध्याओं में जपता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।'

श्लोक 13 (markandeya.134.13)

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ 134.13 ॥

sargaśca pratisargaśca vaṁśo manvantarāṇi ca vaṁśānucaritaṁ caiva purāṇaṁ pañcalakṣaṇam

'सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, तथा वंशानुचरित — इन पाँच लक्षणों से युक्त होना ही पुराण का स्वरूप है।'

श्लोक 14 (markandeya.134.14)

चतुःप्रश्नसमोपेतं पुराणं ह्येतदुत्तमम् । श्रुत्वा पुनश्च ते पापं कल्पकोटिशतैः कृतम् ॥ 134.14 ॥

catuḥpraśnasamopetaṁ purāṇaṁ hyetaduttamam śrutvā punaśca te pāpaṁ kalpakoṭiśataiḥ kṛtam

'चार प्रश्नों से समन्वित यह पुराण अत्यन्त उत्तम है। इसे सुनकर, करोड़ों-करोड़ों कल्पों में किए गए पाप भी —'

श्लोक 15 (markandeya.134.15)

ब्रह्महत्यादिपापानि यान्यन्यान्यशुभानि च । तानि सर्वाणि नश्यन्ति तृणं वातहतं यथा ॥ 134.15 ॥

brahmahatyādipāpāni yānyanyānyaśubhāni ca tāni sarvāṇi naśyanti tṛṇaṁ vātahataṁ yathā

'ब्रह्महत्या आदि पाप और अन्य जो भी अशुभ कर्म हों, वे सब उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे तिनका आँधी से उड़ जाता है।'

श्लोक 16 (markandeya.134.16)

पुष्करे दानजं पुण्यं श्रवणादस्य जायते । सर्ववेदाधिकफलं समाप्त्या चाधिगच्छति ॥ 134.16 ॥

puṣkare dānajaṁ puṇyaṁ śravaṇādasya jāyate sarvavedādhikaphalaṁ samāptyā cādhigacchati

'इसके श्रवण से पुष्कर तीर्थ में दान करने से उत्पन्न पुण्य प्राप्त होता है, और इसके पूर्ण होने पर समस्त वेदों से भी अधिक फल प्राप्त होता है।'

श्लोक 17 (markandeya.134.17)

यः श्रावयेत्पूजयेत्तं यथा देवं पितामहम् । गन्धपुष्पैस्तथा वस्त्रैर्ब्राह्मणानां च तर्पणैः ॥ 134.17 ॥

yaḥ śrāvayetpūjayettaṁ yathā devaṁ pitāmaham gandhapuṣpaistathā vastrairbrāhmaṇānāṁ ca tarpaṇaiḥ

'जो इसे सुनाता है, उसे पितामह ब्रह्मा के समान देवता मानकर पूजना चाहिए — गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा ब्राह्मणों के तर्पण से।'

श्लोक 18 (markandeya.134.18)

यथाशक्त्या च दातव्यं नृपैर्ग्रामादिवाहनम् । एतत्पुराणमखिलं वेदार्थैरुपबृंहितम् । धर्मशास्त्रैकनिलयं श्रुत्वा सर्वार्थमाप्नुयात् ॥ 134.18 ॥

yathāśaktyā ca dātavyaṁ nṛpairgrāmādivāhanam etatpurāṇamakhilaṁ vedārthairupabṛṁhitam dharmaśāstraikanilayaṁ śrutvā sarvārthamāpnuyāt

'राजाओं को अपनी शक्ति के अनुसार ग्राम आदि वाहन तक भी दान देना चाहिए। यह सम्पूर्ण पुराण वेदार्थों से परिपूर्ण और समस्त धर्मशास्त्रों का एकमात्र आश्रय है — इसे सुनकर मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है।'

श्लोक 19 (markandeya.134.19)

श्रुत्वा पुराणमखिलं व्यासं सम्पूजयेद्बुधः । धर्मार्थकाममोक्षाणां यथोक्तफलहेतवे ॥ 134.19 ॥

śrutvā purāṇamakhilaṁ vyāsaṁ sampūjayedbudhaḥ dharmārthakāmamokṣāṇāṁ yathoktaphalahetave

'सम्पूर्ण पुराण सुनकर बुद्धिमान् व्यक्ति को व्यास की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वे ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के फल के यथोक्त कारण हैं।'

श्लोक 20 (markandeya.134.20)

दद्याद्गां गुरवे स्वर्णवस्त्रालङ्कारसंयुताम् । श्रवणस्य फलावाप्त्यै दानैः संतोषयेद्गुरुम् ॥ 134.20 ॥

dadyādgāṁ gurave svarṇavastrālaṅkārasaṁyutām śravaṇasya phalāvāptyai dānaiḥ saṁtoṣayedgurum

'गुरु को स्वर्ण, वस्त्र और आभूषणों से युक्त एक गौ देनी चाहिए। श्रवण के फल की प्राप्ति के लिए दानों से गुरु को संतुष्ट करना चाहिए।'

श्लोक 21 (markandeya.134.21)

अपूज्य पाठकर्तारं श्लोकमेकं शृणोति यः । नासौ पुण्यमवाप्नोति शास्त्रचोरः स्मृतो हि सः ॥ 134.21 ॥

apūjya pāṭhakartāraṁ ślokamekaṁ śṛṇoti yaḥ nāsau puṇyamavāpnoti śāstracoraḥ smṛto hi saḥ

'जो पाठ करने वाले की पूजा किए बिना ही एक भी श्लोक सुन लेता है, वह पुण्य को प्राप्त नहीं करता — वह शास्त्र-चोर ही कहा जाता है।'

श्लोक 22 (markandeya.134.22)

न तस्य देवाः प्रीणन्ति पितरो नैव पुत्रकान् । दत्तं श्राद्धं तथेच्छन्ति तीर्थस्नानफलं न च ॥ 134.22 ॥

na tasya devāḥ prīṇanti pitaro naiva putrakān dattaṁ śrāddhaṁ tathecchanti tīrthasnānaphalaṁ na ca

'उससे न देवता प्रसन्न होते हैं, न पितर, न ही उसके पुत्र सन्तुष्ट होते हैं। उसके द्वारा किया गया श्राद्ध भी वे स्वीकार नहीं करते, न तीर्थ-स्नान का फल ही उसे मिलता है।'

श्लोक 23 (markandeya.134.23)

लभेत शास्त्रचोरश्च निन्दां सज्जनसंसदि । अवज्ञया न श्रोतव्यं शास्त्रमेतद्विचक्षणैः ॥ 134.23 ॥

labheta śāstracoraśca nindāṁ sajjanasaṁsadi avajñayā na śrotavyaṁ śāstrametadvicakṣaṇaiḥ

'वह शास्त्र-चोर सज्जनों की सभा में निन्दा को प्राप्त होता है। विवेकी पुरुषों को यह शास्त्र कभी अनादरपूर्वक नहीं सुनना चाहिए।'

श्लोक 24 (markandeya.134.24)

पठ्यमाने त्ववज्ञाते साधुभिः शास्त्र उत्तमे । मूको भवति जन्मानि सप्त मूर्खः प्रजायते ॥ 134.24 ॥

paṭhyamāne tvavajñāte sādhubhiḥ śāstra uttame mūko bhavati janmāni sapta mūrkhaḥ prajāyate

'यदि साधुजनों द्वारा इस उत्तम शास्त्र का पाठ किया जा रहा हो और कोई उसका अनादर करे, तो वह सात जन्मों तक गूँगा और मूर्ख होकर जन्म लेता है।'

श्लोक 25 (markandeya.134.25)

श्रुत्वा तत्पूजयेद्यस्तु पुराणं सप्तमं पुनः । सर्वपापविनिर्मुक्तः पुनात्येव निजं कुलम् ॥ 134.25 ॥

śrutvā tatpūjayedyastu purāṇaṁ saptamaṁ punaḥ sarvapāpavinirmuktaḥ punātyeva nijaṁ kulam

'जो इस सातवें पुराण को सुनकर पुनः इसकी पूजा भी करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अपने पूरे कुल को ही पवित्र कर देता है।'

श्लोक 26 (markandeya.134.26)

पूतो याति न सन्देहो विष्णुलोकं सनातनम् । च्युतस्ततः पुनर्नैव स भविष्यति मानवः ॥ 134.26 ॥

pūto yāti na sandeho viṣṇulokaṁ sanātanam cyutastataḥ punarnaiva sa bhaviṣyati mānavaḥ

'वह पवित्र होकर निःसन्देह सनातन विष्णुलोक को प्राप्त होता है, और वहाँ से च्युत होकर वह फिर कभी [साधारण] मनुष्य नहीं बनता।'

श्लोक 27 (markandeya.134.27)

पुराणश्रवणादेव परमयोगमवाप्नुयात् । नास्तिकाय न दातव्यं वृषले वेदनिन्दके ॥ 134.27 ॥

purāṇaśravaṇādeva paramayogamavāpnuyāt nāstikāya na dātavyaṁ vṛṣale vedanindake

'इस पुराण के श्रवण मात्र से परम योग की प्राप्ति होती है। इसे नास्तिक को, वृषल [अधम शूद्र] को, अथवा वेद-निन्दक को कभी नहीं देना चाहिए।'

श्लोक 28 (markandeya.134.28)

गुरुद्विजातिनिन्दाय तथा भग्नव्रताय च । मातापित्रोर्निन्दकाय वेदशास्त्रादिनिन्दिने ॥ 134.28 ॥

gurudvijātinindāya tathā bhagnavratāya ca mātāpitrornindakāya vedaśāstrādinindine

'गुरु और ब्राह्मणों की निन्दा करने वाले को, व्रत भंग करने वाले को, माता-पिता की निन्दा करने वाले को, वेद-शास्त्र आदि की निन्दा करने वाले को —'

श्लोक 29 (markandeya.134.29)

भिन्नमर्यादिने चैव तथा वै ज्ञातिकोपिने । एतेषां नैव दातव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ 134.29 ॥

bhinnamaryādine caiva tathā vai jñātikopine eteṣāṁ naiva dātavyaṁ prāṇaiḥ kaṇṭhagatairapi

'मर्यादा भंग करने वाले को, तथा अपने ही ज्ञातिजनों के प्रति क्रोध रखने वाले को — इन सबको यह [पुराण] प्राणान्त होने पर भी कभी नहीं देना चाहिए।'

श्लोक 30 (markandeya.134.30)

लोभाद्वा यदि वा मोहाद्भयाद्वापि विशेषतः । पठेद्वा पाठयेद्वापि स गच्छेन्नरकं ध्रुवम् ॥ 134.30 ॥

lobhādvā yadi vā mohādbhayādvāpi viśeṣataḥ paṭhedvā pāṭhayedvāpi sa gacchennarakaṁ dhruvam

'जो लोभवश, मोहवश, अथवा विशेषतः भयवश ऐसे व्यक्तियों को इसे पढ़े या पढ़ाए, वह निश्चय ही नरक को प्राप्त होता है।'

श्लोक 31 (markandeya.134.31)

मार्कण्डेय उवाच एतत्सर्वमुपाख्यानं धर्म्यं स्वर्गापवर्गदम् । यः शृणोति पठेद्वापि सिद्धं तस्य समीहितम् ॥ 134.31 ॥

mārkaṇḍeya uvāca etatsarvamupākhyānaṁ dharmyaṁ svargāpavargadam yaḥ śṛṇoti paṭhedvāpi siddhaṁ tasya samīhitam

मार्कण्डेय ने कहा — यह सम्पूर्ण आख्यान धर्मयुक्त तथा स्वर्ग और मोक्ष दोनों को देने वाला है। जो इसे सुनता है अथवा पढ़ता है, उसका अभीष्ट कार्य सिद्ध हो जाता है।

श्लोक 32 (markandeya.134.32)

आधिव्याधिजदुःखेन कदाचिन्नाभियुज्यते । ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ 134.32 ॥

ādhivyādhijaduḥkhena kadācinnābhiyujyate brahmahatyādipāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ

वह मानसिक और शारीरिक व्याधियों के दुःख से कभी आक्रान्त नहीं होता। वह ब्रह्महत्या आदि पापों से भी मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 33 (markandeya.134.33)

सन्तः स्वजनमित्राणि भवन्ति हितबुद्धयः । नारयः सम्भविष्यन्ति दस्यवो वा कदाचन ॥ 134.33 ॥

santaḥ svajanamitrāṇi bhavanti hitabuddhayaḥ nārayaḥ sambhaviṣyanti dasyavo vā kadācana

उसके अपने स्वजन और मित्र सदा हितकारी बुद्धि वाले होते हैं। उसके कभी न शत्रु उत्पन्न होते हैं, न ही डाकू।

श्लोक 34 (markandeya.134.34)

सदर्थो मिष्टभोगी च दुर्भिक्षैर्नावसीदति । परदारपरद्रव्यपरहिंसादिकिल्बिषैः ॥ 134.34 ॥

sadartho miṣṭabhogī ca durbhikṣairnāvasīdati paradāraparadravyaparahiṁsādikilbiṣaiḥ

वह सम्पन्न और मधुर भोगों से युक्त रहता है, दुर्भिक्ष से कभी पीड़ित नहीं होता, तथा परस्त्री-हरण, परद्रव्य-हरण और परहिंसा आदि पापों से —

श्लोक 35 (markandeya.134.35)

मुच्यतेऽनेकदुःखेभ्यो नित्यं चैव द्विजोत्तम । ऋद्धिर्वृद्धिः स्मृतिः शान्तिः श्रीः पुष्टिस्तुष्टिरेव च । नित्यं तस्य भवेद्विप्र यः शृणोति कथामिमाम् ॥ 134.35 ॥

mucyate’nekaduḥkhebhyo nityaṁ caiva dvijottama ṛddhirvṛddhiḥ smṛtiḥ śāntiḥ śrīḥ puṣṭistuṣṭireva ca nityaṁ tasya bhavedvipra yaḥ śṛṇoti kathāmimām

वह नित्य ही अनेक दुःखों से मुक्त रहता है, हे द्विजोत्तम। ऋद्धि, वृद्धि, स्मृति, शान्ति, श्री, पुष्टि और तुष्टि — ये सब उसे सदा प्राप्त रहते हैं, हे विप्र, जो इस कथा को सुनता है।

श्लोक 36 (markandeya.134.36)

मार्कण्डेयपुराणमेतदखिलं शृण्वन्नशोच्यः पुमान्यो वा सम्यगुदीयरयेद्रसमयं शोच्यो न सोऽपि द्विज । योगज्ञानविशुद्धसिद्धिसहितः स्वर्गादिलोकेऽप्यसौ शक्राद्यैश्च सुरादिभिः परिवृतः स्वर्गे सदा पूज्यते ॥ 134.36 ॥

mārkaṇḍeyapurāṇametadakhilaṁ śṛṇvannaśocyaḥ pumānyo vā samyagudīyarayedrasamayaṁ śocyo na so’pi dvija yogajñānaviśuddhasiddhisahitaḥ svargādiloke’pyasau śakrādyaiśca surādibhiḥ parivṛtaḥ svarge sadā pūjyate

इस सम्पूर्ण मार्कण्डेय पुराण को सुनने वाला पुरुष कभी शोक करने योग्य नहीं रहता, और जो इसका सम्यक् रसमय पाठ भी करता है, हे द्विज, वह भी शोक करने योग्य नहीं रहता। योग और ज्ञान की विशुद्ध सिद्धि से युक्त होकर, वह स्वर्गादि लोकों में भी इन्द्र आदि देवताओं से घिरा हुआ स्वर्ग में सदा पूजित रहता है।

श्लोक 37 (markandeya.134.37)

पुराणमेतच्छ्रुत्वा च ज्ञानविज्ञानसंयुतम् । विमानवरमारुह्य स्वर्गलोके महीयते ॥ 134.37 ॥

purāṇametacchrutvā ca jñānavijñānasaṁyutam vimānavaramāruhya svargaloke mahīyate

इस पुराण को सुनकर, ज्ञान और विज्ञान से युक्त हुआ मनुष्य श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 38 (markandeya.134.38)

पुराणाक्षरसंख्या च प्रख्याता तत्त्वबुद्धिना । श्लोकानां षट्सहस्राणि तथा चाष्टशतानि च ॥ 134.38 ॥

purāṇākṣarasaṁkhyā ca prakhyātā tattvabuddhinā ślokānāṁ ṣaṭsahasrāṇi tathā cāṣṭaśatāni ca

तत्त्वज्ञ पुरुषों द्वारा प्रसिद्ध की गई इस पुराण के अक्षरों की संख्या — इसमें छह हजार आठ सौ श्लोक हैं,

श्लोक 39 (markandeya.134.39)

श्लोकास्तत्र नवाशीतिरेकादशसमाहिताः । कथिता मुनिना पूर्वं मार्कण्डेयेन धीमता ॥ 134.39 ॥

ślokāstatra navāśītirekādaśasamāhitāḥ kathitā muninā pūrvaṁ mārkaṇḍeyena dhīmatā

तथा उनमें नवासी और ग्यारह और मिलाकर [शेष अंश] हैं — यह सब बुद्धिमान् मुनि मार्कण्डेय द्वारा पूर्वकाल में कहा गया था।

श्लोक 40 (markandeya.134.40)

जैमिनिरुवाच भारतेनाभवद्यन्मे संशयस्फोटनं द्विजाः । तद्भवद्भिः कृतं यन्न कश्चिदद्य करिष्यति ॥ 134.40 ॥

jaiminiruvāca bhāratenābhavadyanme saṁśayasphoṭanaṁ dvijāḥ tadbhavadbhiḥ kṛtaṁ yanna kaścidadya kariṣyati

जैमिनि ने कहा — 'हे द्विजो, महाभारत से मुझे जो संशय उत्पन्न हुआ था, उसका जो निवारण आपने किया, वह आज कोई और नहीं कर सकता।'

श्लोक 41 (markandeya.134.41)

यूयं दीर्घायुषः स्यात प्रज्ञाबुद्धिविशारदाः । सांख्ययोगे तथा चास्तु बुद्धिरव्यभिचारिणी ॥ 134.41 ॥

yūyaṁ dīrghāyuṣaḥ syāta prajñābuddhiviśāradāḥ sāṁkhyayoge tathā cāstu buddhiravyabhicāriṇī

'आप सब दीर्घायु हों, प्रज्ञा और बुद्धि में निपुण हों; और सांख्य तथा योग में आपकी बुद्धि सदा अव्यभिचारिणी [अटल] बनी रहे।'

श्लोक 42 (markandeya.134.42)

पितृशापकृताद्दुःखाद्दौर्मनस्यं व्यपेतु वः । एतावदुक्त्वा वचनं जगाम स्वाश्रमं मुनिः । चितयन्परमोदारं पक्षिणां वाक्यमीरितम् ॥ 134.42 ॥

pitṛśāpakṛtādduḥkhāddaurmanasyaṁ vyapetu vaḥ etāvaduktvā vacanaṁ jagāma svāśramaṁ muniḥ citayanparamodāraṁ pakṣiṇāṁ vākyamīritam

'पितृ-शाप से उत्पन्न दुःख के कारण जो दौर्मनस्य आप पर छाया है, वह दूर हो जाए' — इतना कहकर वह मुनि पक्षियों द्वारा कहे गए इस अत्यन्त उदार वचन का चिन्तन करते हुए अपने आश्रम को चला गया।

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