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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 133

वपुष्मद्वध

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

श्लोक 1 (markandeya.133.1)

मार्कण्डेय उवाच इति प्रतिज्ञाय तदा नरिष्यन्तसुतो दमः । कोपामर्षविवृत्ताक्षः श्भश्रुमावृत्य पाणिना ॥ 133.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti pratijñāya tadā nariṣyantasuto damaḥ kopāmarṣavivṛttākṣaḥ śbhaśrumāvṛtya pāṇinā

मार्कण्डेय ने कहा — इस प्रकार प्रतिज्ञा करके, नरिष्यन्त-पुत्र दम ने, क्रोध और आमर्ष से फैली हुई आँखों से, हाथ से अपनी दाढ़ी को सहलाते हुए —

श्लोक 2 (markandeya.133.2)

हा हतोऽस्मीति पितरं ध्यात्वा देवं विनिंद्य च । प्रोवाच मंत्रिणः सर्वानानिनाय पुरोहितम् ॥ 133.2 ॥

hā hato’smīti pitaraṁ dhyātvā devaṁ viniṁdya ca provāca maṁtriṇaḥ sarvānānināya purohitam

'हाय, मैं मारा गया' — यह सोचकर पिता का स्मरण करते हुए और दैव की निन्दा करते हुए, उसने अपने सभी मन्त्रियों को बुलाकर पुरोहित को भी बुला भेजा।

श्लोक 3 (markandeya.133.3)

दम उवाच यदत्र कृत्यं तद्ब्रूत ताते प्राप्ते सुरालयम् । श्रुतं भवद्भिर्यत्प्रोक्तं तेन शूद्रतपस्विना ॥ 133.3 ॥

dama uvāca yadatra kṛtyaṁ tadbrūta tāte prāpte surālayam śrutaṁ bhavadbhiryatproktaṁ tena śūdratapasvinā

दम ने कहा — 'यहाँ जो करणीय है, वह कहो — पिता के देवलोक को प्राप्त होने पर उस शूद्र तपस्वी ने जो कुछ कहा है, वह आपने सुन ही लिया है।'

श्लोक 4 (markandeya.133.4)

वृद्धस्तपस्वी स नृपो वानप्रस्थव्रते स्थितः । मौनव्रतधरोऽशस्त्रो मन्मात्रा चेन्द्रसेनया ॥ 133.4 ॥

vṛddhastapasvī sa nṛpo vānaprasthavrate sthitaḥ maunavratadharo’śastro manmātrā cendrasenayā

'वह वृद्ध तपस्वी राजा वानप्रस्थ-व्रत में स्थित, मौनव्रतधारी और निःशस्त्र था — उसके साथ केवल मेरी माता इन्द्रसेना थीं।'

श्लोक 5 (markandeya.133.5)

प्रोक्तं संसृष्टया स्वात्म्याद्याथातथ्यं वपुष्मते । तेनापि खड्गमाकृष्य जटां सव्येन पाणिना ॥ 133.5 ॥

proktaṁ saṁsṛṣṭayā svātmyādyāthātathyaṁ vapuṣmate tenāpi khaḍgamākṛṣya jaṭāṁ savyena pāṇinā

'मेरी माता ने, अपनी ओर से, यथार्थ बात वपुष्मान् को बता दी थी। फिर भी, दुष्टात्मा वपुष्मान् ने बाएँ हाथ से जटा पकड़कर और दाहिने हाथ से खड्ग खींचकर —

श्लोक 6 (markandeya.133.6)

धृत्वा जघान दुष्टात्मा लोकनाथमनाथवत् । माता च संदिश्य हि मां धिक्छब्दं ब्रुवती सती ॥ 133.6 ॥

dhṛtvā jaghāna duṣṭātmā lokanāthamanāthavat mātā ca saṁdiśya hi māṁ dhikchabdaṁ bruvatī satī

'उस लोकनाथ को अनाथ की भाँति मार डाला। मेरी सती माता, मुझे यह सन्देश और धिक्कार का वचन भेजकर,'

श्लोक 7 (markandeya.133.7)

मन्दभाग्यं च निःश्रीकं प्रविष्टा हव्यवाहनम् । तमालिंग्य नरिष्यन्तं प्रयाता त्रिदशालयम् ॥ 133.7 ॥

mandabhāgyaṁ ca niḥśrīkaṁ praviṣṭā havyavāhanam tamāliṁgya nariṣyantaṁ prayātā tridaśālayam

'शोक-सन्तप्त और श्रीहीन होकर अग्नि में प्रविष्ट हुई — नरिष्यन्त का आलिंगन करके ही वे देवलोक को चली गईं।'

श्लोक 8 (markandeya.133.8)

सोऽहमद्य करिष्यामि यन्मे मातुरुदीरितम् । हस्त्यश्वरथपादातं सैन्यं च परिकल्प्यताम् ॥ 133.8 ॥

so’hamadya kariṣyāmi yanme māturudīritam hastyaśvarathapādātaṁ sainyaṁ ca parikalpyatām

'तो अब मैं वही करूँगा जो मेरी माता ने कहा है। हाथी, अश्व, रथ और पैदल सेना तैयार की जाए।'

श्लोक 9 (markandeya.133.9)

अनिर्याप्य पितुर्वैरमहत्वा पितृघातकम् । अकृत्वा च वचो मातुर्जीवितुं किमिहोत्सहे ॥ 133.9 ॥

aniryāpya piturvairamahatvā pitṛghātakam akṛtvā ca vaco māturjīvituṁ kimihotsahe

'पिता के वैर का प्रतिशोध लिए बिना, पितृ-घातक को मारे बिना, और माता के वचन को पूरा किए बिना, मैं यहाँ जीवित रहने की इच्छा भी कैसे करूँ?'

श्लोक 10 (markandeya.133.10)

मार्कण्डेय उवाच मन्त्रिणस्तद्वचः श्रुत्वा हाहेत्युक्त्वा तथा च तत् । कृतवन्तो विमनसः सभृत्यबलवाहनाः ॥ 133.10 ॥

mārkaṇḍeya uvāca mantriṇastadvacaḥ śrutvā hāhetyuktvā tathā ca tat kṛtavanto vimanasaḥ sabhṛtyabalavāhanāḥ

मार्कण्डेय ने कहा — मन्त्रियों ने यह वचन सुनकर 'हाय-हाय' कहकर विषण्ण मन से ही, अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित, वैसा ही आयोजन किया।

श्लोक 11 (markandeya.133.11)

निर्ययुः सपरीवाराः पुरस्कृत्य दमं नृपम् । गृहीत्वा चाशिषो विप्रात्त्रिकालज्ञात्पुरोधसः ॥ 133.11 ॥

niryayuḥ saparīvārāḥ puraskṛtya damaṁ nṛpam gṛhītvā cāśiṣo viprāttrikālajñātpurodhasaḥ

वे सब परिवार सहित राजा दम को आगे करके निकल पड़े, और त्रिकालज्ञ पुरोहित ब्राह्मण से आशीर्वाद ग्रहण करके —

श्लोक 12 (markandeya.133.12)

अहिराडिव निःश्वस्य दमः प्रायाद्वपुष्मतम् । सीमापालादिसामन्तान्निघ्नन्याम्यां दिश त्वरा ॥ 133.12 ॥

ahirāḍiva niḥśvasya damaḥ prāyādvapuṣmatam sīmāpālādisāmantānnighnanyāmyāṁ diśa tvarā

दम ने सर्प-राज की भाँति दीर्घ श्वास लेते हुए वपुष्मान् की ओर प्रस्थान किया, और मार्ग में सीमापाल आदि सामन्तों का त्वरा से संहार करते हुए चला।

श्लोक 13 (markandeya.133.13)

निरीक्ष्य तं समायान्तं वपुष्मान्मर्षपूरितः । संक्रन्दनसुतेनापि दमो ज्ञातो वपुष्मता । आयातः सपरीवारः सामात्यः सपरिच्छदः ॥ 133.13 ॥

nirīkṣya taṁ samāyāntaṁ vapuṣmānmarṣapūritaḥ saṁkrandanasutenāpi damo jñāto vapuṣmatā āyātaḥ saparīvāraḥ sāmātyaḥ saparicchadaḥ

उसे इस प्रकार आते देखकर, आमर्ष से भरा हुआ वपुष्मान् — जिसे संक्रन्दन-पुत्र [वपुष्मान् स्वयं] ने पहचान लिया — दम को परिवार, अमात्यों और समस्त साज-सामान सहित आया हुआ जान लिया।

श्लोक 14 (markandeya.133.14)

अकंपितेन मनसा ससैन्यानि दिदेश ह । दूतं च प्रेषयामास निर्गम्य नगराद्बहिः ॥ 133.14 ॥

akaṁpitena manasā sasainyāni dideśa ha dūtaṁ ca preṣayāmāsa nirgamya nagarādbahiḥ

वह अविचलित मन से अपनी सेनाओं को आदेश देने लगा, और नगर से बाहर निकलकर उसने एक दूत भेजा।

श्लोक 15 (markandeya.133.15)

त्वं शीघ्रतरमागच्छ नरिष्यन्तः प्रतीक्षते । सभार्यक्षत्रबन्धो त्वं समायाहि ममान्तिकम् ॥ 133.15 ॥

tvaṁ śīghrataramāgaccha nariṣyantaḥ pratīkṣate sabhāryakṣatrabandho tvaṁ samāyāhi mamāntikam

'तुम शीघ्रतर आओ, नरिष्यन्त प्रतीक्षा कर रहा है! हे क्षत्रबन्धु, अपनी पत्नी सहित तुम मेरे निकट आ जाओ!'

श्लोक 16 (markandeya.133.16)

इमे मद्बाहुनिर्मुक्ताः शिता बाणाः पिपासिताः । भित्त्वा शरीरं सङ्ग्रामे पास्यन्ति रुधिरं तव ॥ 133.16 ॥

ime madbāhunirmuktāḥ śitā bāṇāḥ pipāsitāḥ bhittvā śarīraṁ saṅgrāme pāsyanti rudhiraṁ tava

'मेरी भुजाओं से छूटे हुए ये तीक्ष्ण, प्यासे बाण युद्ध में तुम्हारे शरीर को भेदकर तुम्हारा रक्त पी लेंगे।'

श्लोक 17 (markandeya.133.17)

श्रुत्वा दमस्तु तत्सर्वं दूतप्रोक्तं ययौ त्वरन् । स्मृत्वा प्रतिज्ञां पूर्वोक्तां निःश्वसमुरगो यथा ॥ 133.17 ॥

śrutvā damastu tatsarvaṁ dūtaproktaṁ yayau tvaran smṛtvā pratijñāṁ pūrvoktāṁ niḥśvasamurago yathā

दूत द्वारा कहा गया यह सब सुनकर दम अपनी पूर्व-प्रतिज्ञा का स्मरण करते हुए, सर्प के समान लम्बी साँस लेता हुआ, त्वरा से चल पड़ा।

श्लोक 18 (markandeya.133.18)

आहूतसमरे चैव पुमान्सेनाविकत्थनः । ततो युद्धमतीवासीद्दमस्य च वपुष्मतः ॥ 133.18 ॥

āhūtasamare caiva pumānsenāvikatthanaḥ tato yuddhamatīvāsīddamasya ca vapuṣmataḥ

युद्ध के लिए ललकारा गया वह पुरुष अपनी सेना का बड़ा गर्वोक्ति करने वाला था; तब दम और वपुष्मान् के बीच अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 19 (markandeya.133.19)

रथी च रथिना नागी नागिना हयिना हयी । अयुध्यन्त च विप्रर्षे तद्युद्धं तुमुलं ह्यभूत् ॥ 133.19 ॥

rathī ca rathinā nāgī nāginā hayinā hayī ayudhyanta ca viprarṣe tadyuddhaṁ tumulaṁ hyabhūt

रथी रथी से, हाथीवाला हाथीवाले से, घुड़सवार घुड़सवार से युद्ध करने लगा — हे विप्रर्षि, वह युद्ध अत्यन्त घमासान हो गया।

श्लोक 20 (markandeya.133.20)

पश्यतां सर्वदेवानां सिद्धगन्धर्वरक्षसाम् । चकम्पे वसुधा ब्रह्मन्युध्यमाने दमे युधि ॥ 133.20 ॥

paśyatāṁ sarvadevānāṁ siddhagandharvarakṣasām cakampe vasudhā brahmanyudhyamāne dame yudhi

समस्त देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और राक्षसों के देखते हुए, हे ब्रह्मन्, दम के युद्ध करते समय पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 21 (markandeya.133.21)

न गजो न रथी नाश्वस्तस्य बाणसहस्तु यः । ततो दमेन युयुधे सेनाध्यक्षो वपुष्मतः ॥ 133.21 ॥

na gajo na rathī nāśvastasya bāṇasahastu yaḥ tato damena yuyudhe senādhyakṣo vapuṣmataḥ

न कोई हाथी, न रथी, न कोई अश्वारोही उसके सामने टिक सका जिसके पास हजारों बाण थे। तब वपुष्मान् का सेनापति स्वयं दम से युद्ध करने लगा।

श्लोक 22 (markandeya.133.22)

हृदि विव्याध च दम इषुणागाद्यमान्तिकम् । तस्मिन्निपतिते सैन्यं पलायनपरं ह्यभूत् ॥ 133.22 ॥

hṛdi vivyādha ca dama iṣuṇāgādyamāntikam tasminnipatite sainyaṁ palāyanaparaṁ hyabhūt

दम ने उसे हृदय में एक ऐसे बाण से बींध दिया जो उसे सीधे यमलोक तक पहुँचा दे। उसके गिरते ही उसकी सेना भागने पर उतारू हो गई।

श्लोक 23 (markandeya.133.23)

स स्वामिनं ततः प्राह दमः शत्रुं दमस्तथा । क्व यासि दुष्ट पितरं घातयित्वा तपस्विनम् ॥ 133.23 ॥

sa svāminaṁ tataḥ prāha damaḥ śatruṁ damastathā kva yāsi duṣṭa pitaraṁ ghātayitvā tapasvinam

तब दम ने अपने स्वामी [अर्थात् उस सेनापति] के शत्रु दम से यह कहा — 'दुष्ट, तपस्वी पिता को मार डालकर अब तू कहाँ भागता है?'

श्लोक 24 (markandeya.133.24)

अशस्त्रं च तपस्यन्तं क्षत्रियोऽसि निवर्तताम् । ततो निवृत्य स दमं योधयामास सानुजः ॥ 133.24 ॥

aśastraṁ ca tapasyantaṁ kṣatriyo’si nivartatām tato nivṛtya sa damaṁ yodhayāmāsa sānujaḥ

'तूने एक निःशस्त्र तपस्या-रत व्यक्ति को मार डाला — क्या तू सचमुच क्षत्रिय है? लौट आ!' — यह सुनकर वह अपने छोटे भाई सहित लौटकर दम से युद्ध करने लगा।

श्लोक 25 (markandeya.133.25)

स पुत्रः सह सम्बन्धिबान्धवैर्युयुधे रथी । ततः शरासनान्मुक्तबाणैर्व्याप्तास्ततो दिशः ॥ 133.25 ॥

sa putraḥ saha sambandhibāndhavairyuyudhe rathī tataḥ śarāsanānmuktabāṇairvyāptāstato diśaḥ

वह पुत्र [वपुष्मान्] अपने सम्बन्धियों और बान्धवों सहित रथ पर युद्ध करने लगा; तब धनुषों से छूटे हुए बाणों से सारी दिशाएँ व्याप्त हो गईं।

श्लोक 26 (markandeya.133.26)

दमं च सरथं चाशु शरजालैरपूरयत् । ततः पितृवधोत्थेन कोपेन स दमस्तथा ॥ 133.26 ॥

damaṁ ca sarathaṁ cāśu śarajālairapūrayat tataḥ pitṛvadhotthena kopena sa damastathā

उसने दम को उसके रथ सहित तत्काल बाण-जालों से भर दिया। तब पितृ-वध से उत्पन्न क्रोध से युक्त हुआ वह दम —

श्लोक 27 (markandeya.133.27)

चिच्छेद ताञ्छरान्स्तेषां विव्याधान्यैश्च तानपि । एकेनैकेन बाणेन सप्त पुत्रान्स्तथा द्विज ॥ 133.27 ॥

ciccheda tāñcharānsteṣāṁ vivyādhānyaiśca tānapi ekenaikena bāṇena sapta putrānstathā dvija

उन [शत्रुओं] के उन बाणों को काटता और उन्हें ही अन्य बाणों से बींधता गया, तथा हे द्विज, उसने एक-एक बाण से ही सात पुत्रों को [मार डाला]।

श्लोक 28 (markandeya.133.28)

सम्बन्धिबान्धवान्मित्रान्निनाय यमसादनम् । वपुष्मान्स रथी क्रोधान्निहतात्मजबान्धवः ॥ 133.28 ॥

sambandhibāndhavānmitrānnināya yamasādanam vapuṣmānsa rathī krodhānnihatātmajabāndhavaḥ

उनके सम्बन्धियों, बान्धवों और मित्रों को भी उसने यमलोक भेज दिया। पुत्रों और बान्धवों के मारे जाने पर क्रोधित हुआ रथी वपुष्मान् —

श्लोक 29 (markandeya.133.29)

युयुधे च स तेनाजौ शरैराशीविषोपमैः । चिच्छेद तस्य तान्बाणान्स दमश्च महामुने ॥ 133.29 ॥

yuyudhe ca sa tenājau śarairāśīviṣopamaiḥ ciccheda tasya tānbāṇānsa damaśca mahāmune

हे महामुने, सर्प के समान विषैले बाणों से उससे [दम से] युद्ध करने लगा; किन्तु दम ने भी उसके उन सब बाणों को काट डाला।

श्लोक 30 (markandeya.133.30)

युयुधाते च संरब्धौ परस्परजयैषिणौ । परस्परशराघातविच्छिन्नधनुषौ त्वरा ॥ 133.30 ॥

yuyudhāte ca saṁrabdhau parasparajayaiṣiṇau parasparaśarāghātavicchinnadhanuṣau tvarā

दोनों महाबली, परस्पर विजय की कामना से युद्ध करते हुए, एक-दूसरे के बाण-प्रहारों से शीघ्र ही अपने-अपने धनुष कटवा बैठे।

श्लोक 31 (markandeya.133.31)

गृहीतखड्गावुत्तीर्य चिक्रीडाते महाबलौ । दमः क्षणं नृपं ध्यात्वा पितरं निहतं वने ॥ 133.31 ॥

gṛhītakhaḍgāvuttīrya cikrīḍāte mahābalau damaḥ kṣaṇaṁ nṛpaṁ dhyātvā pitaraṁ nihataṁ vane

तब वे दोनों महाबली खड्ग हाथ में लेकर रथों से उतरकर परस्पर लड़ने लगे। दम ने एक क्षण के लिए वन में मारे गए अपने पिता का स्मरण किया,

श्लोक 32 (markandeya.133.32)

केशेष्वाकृष्य चाक्रम्य निपात्य धरणीतले । शिरोधरायां पादेन भुजमुद्यम्य चाब्रवीत् ॥ 133.32 ॥

keśeṣvākṛṣya cākramya nipātya dharaṇītale śirodharāyāṁ pādena bhujamudyamya cābravīt

और उसे बालों से पकड़कर, आक्रमण करके, धरती पर गिराकर, उसकी गर्दन पर पैर रखकर, अपनी भुजा उठाकर, उसने यह कहा —

श्लोक 33 (markandeya.133.33)

पश्यन्तु देवताः सर्वा मानुषाः पन्नगाः खगाः । पाट्यमानं च हृदयं क्षत्रबन्धोर्वपुष्मतः ॥ 133.33 ॥

paśyantu devatāḥ sarvā mānuṣāḥ pannagāḥ khagāḥ pāṭyamānaṁ ca hṛdayaṁ kṣatrabandhorvapuṣmataḥ

'समस्त देवता, मनुष्य, नाग और पक्षी देखें — इस क्षत्रबन्धु वपुष्मान् का हृदय अभी विदीर्ण किया जा रहा है!'

श्लोक 34 (markandeya.133.34)

एवमुक्त्वा च स दमो हदयं च व्यदारयत् । पातुकामश्च स सुरैः क्षतजेन निवारितः ॥ 133.34 ॥

evamuktvā ca sa damo hadayaṁ ca vyadārayat pātukāmaśca sa suraiḥ kṣatajena nivāritaḥ

यह कहकर दम ने उसका हृदय चीर डाला, और उसका रक्त पीने की इच्छा करने पर भी देवताओं ने उसे रोक दिया।

श्लोक 35 (markandeya.133.35)

ततश्चकार तातस्य रक्तेनैवोदकक्रियाम् । आनृण्यं प्राप्य स पितुः पुनः प्रायात्स्वमन्दिरम् ॥ 133.35 ॥

tataścakāra tātasya raktenaivodakakriyām ānṛṇyaṁ prāpya sa pituḥ punaḥ prāyātsvamandiram

तत्पश्चात् उसने उसी रक्त से अपने पिता का जलतर्पण किया, और पिता के ऋण से मुक्त होकर वह पुनः अपने घर को लौट गया।

श्लोक 36 (markandeya.133.36)

वपुष्मतश्च मांसेन पिण्डदानं चकार ह । ब्राह्मणान्भोजयामास रक्षः कुलसमुद्भवान् ॥ 133.36 ॥

vapuṣmataśca māṁsena piṇḍadānaṁ cakāra ha brāhmaṇānbhojayāmāsa rakṣaḥ kulasamudbhavān

उसने वपुष्मान् के मांस से ही पिण्डदान भी किया, और राक्षस-कुल में उत्पन्न [अर्थात् राक्षसवत् आचरण वाले वपुष्मान् के] उस मांस से ब्राह्मणों को भोजन कराया।

श्लोक 37 (markandeya.133.37)

एवंविधा हि राजानो बभूवुः सूर्यवंशजाः । अन्येऽपि सुधियः शूरा यज्विनो धर्मकोविदाः ॥ 133.37 ॥

evaṁvidhā hi rājāno babhūvuḥ sūryavaṁśajāḥ anye’pi sudhiyaḥ śūrā yajvino dharmakovidāḥ

इस प्रकार सूर्यवंश में उत्पन्न ऐसे-ऐसे राजा हुए, तथा अन्य भी बुद्धिमान्, शूरवीर, यज्ञकर्ता और धर्मकुशल राजा हुए,

श्लोक 38 (markandeya.133.38)

वेदान्तपारगास्ताञ्च न संख्यातुमिहोत्सहे । एतेषां चरितं श्रुत्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥ 133.38 ॥

vedāntapāragāstāñca na saṁkhyātumihotsahe eteṣāṁ caritaṁ śrutvā naraḥ pāpaiḥ pramucyate

वेदान्त में पारंगत — इन सबको यहाँ गिनाने का मैं साहस नहीं करता। इनके चरित्र को सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

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