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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 132

दम की प्रतिज्ञा

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

श्लोक 1 (markandeya.132.1)

मार्कण्डेय उवाच इन्द्रसेनासमाज्ञप्तः स गत्वा शूद्रतापसः । समाचष्ट यथापूर्वं दमाय निधनं पितुः ॥ 132.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca indrasenāsamājñaptaḥ sa gatvā śūdratāpasaḥ samācaṣṭa yathāpūrvaṁ damāya nidhanaṁ pituḥ

मार्कण्डेय ने कहा — इन्द्रसेना द्वारा आज्ञप्त वह शूद्र तपस्वी जाकर दम को अपने पिता की मृत्यु का सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना आया।

श्लोक 2 (markandeya.132.2)

तापसेन समाख्याते दमस्तेन पितुर्वधे । क्रोधेनातीव जज्वाल हविषेवाग्निरुद्धतः ॥ 132.2 ॥

tāpasena samākhyāte damastena piturvadhe krodhenātīva jajvāla haviṣevāgniruddhataḥ

पिता के वध का यह समाचार उस तपस्वी से सुनकर, दम अत्यन्त क्रोध से इस प्रकार जल उठा जैसे घी से बढ़ी हुई प्रज्वलित अग्नि।

श्लोक 3 (markandeya.132.3)

स तु क्रोधाग्निना धीरे दह्यमानो महामुने । करं करेण निष्पिष्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ 132.3 ॥

sa tu krodhāgninā dhīre dahyamāno mahāmune karaṁ kareṇa niṣpiṣya vākyametaduvāca ha

हे धीर महामुने, क्रोधाग्नि से जलते हुए उसने अपने एक हाथ को दूसरे हाथ से मसलते हुए यह वचन कहा —

श्लोक 4 (markandeya.132.4)

अनाथ इव मे तातो मयि पुत्रे तु जीवति । घातितः सुनृशंसेन परिभूय कुलं मम ॥ 132.4 ॥

anātha iva me tāto mayi putre tu jīvati ghātitaḥ sunṛśaṁsena paribhūya kulaṁ mama

'मेरे पुत्र के जीवित रहते हुए भी मेरे पिता मानो अनाथ की भाँति मारे गए — उस अत्यन्त क्रूर व्यक्ति द्वारा, जिसने मेरे कुल का ही अपमान किया।'

श्लोक 5 (markandeya.132.5)

तापं करोम्यहं किंवाप्येष क्लैब्यात्क्षमाम्यहम् । दुर्वृत्तशान्तौ शिष्टानां पालनेऽधिकृता वयम् ॥ 132.5 ॥

tāpaṁ karomyahaṁ kiṁvāpyeṣa klaibyātkṣamāmyaham durvṛttaśāntau śiṣṭānāṁ pālane’dhikṛtā vayam

'क्या मैं केवल संताप करूँ, या भीरुता के कारण क्षमा कर दूँ? हम तो दुष्टों के दमन और सज्जनों के पालन के लिए ही नियुक्त हैं।'

श्लोक 6 (markandeya.132.6)

पितरं चापि निहतं दृष्ट्वा जीवन्ति शत्रवः । तत्किमेतेन बहुना हा तातेति च किं पुनः ॥ 132.6 ॥

pitaraṁ cāpi nihataṁ dṛṣṭvā jīvanti śatravaḥ tatkimetena bahunā hā tāteti ca kiṁ punaḥ

'मेरे पिता को मारा हुआ देखकर भी शत्रु जीवित हैं — तो फिर इस बहुत विलाप से क्या लाभ, बार-बार हा-तात कहने से भी क्या?'

श्लोक 7 (markandeya.132.7)

विलापेनात्र यत्कृत्यं तदेषोऽत्र करोम्यहम् । यद्यहं तस्य रक्तेन देहोत्थेन वपुष्मतः । न करोमि गुरोस्तृप्तिं तत्प्रवेक्ष्ये हुताशनम् ॥ 132.7 ॥

vilāpenātra yatkṛtyaṁ tadeṣo’tra karomyaham yadyahaṁ tasya raktena dehotthena vapuṣmataḥ na karomi gurostṛptiṁ tatpravekṣye hutāśanam

'विलाप के अतिरिक्त जो यहाँ करणीय है, वही मैं अब करूँगा — यदि मैं उस वपुष्मान् के शरीर से बहे रक्त द्वारा पितृ-गुरु को तृप्त नहीं करता, तो मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश करूँगा।'

श्लोक 8 (markandeya.132.8)

तच्छोणितेनोदककर्म तस्य मांसेन सम्यग्द्विजभोजनं च । कुर्यां पितुस्तस्य च पिण्डदानं न चेत्प्रवेक्ष्यामि हुताशनं तत् ॥ 132.8 ॥

tacchoṇitenodakakarma tasya māṁsena samyagdvijabhojanaṁ ca kuryāṁ pitustasya ca piṇḍadānaṁ na cetpravekṣyāmi hutāśanaṁ tat

'उसी के रक्त से जलतर्पण-क्रिया करूँगा, उसी के मांस से ब्राह्मणों को विधिवत् भोजन कराऊँगा, और अपने पिता के लिए पिण्डदान करूँगा — यदि ऐसा न करूँ, तो मैं उसी अग्नि में प्रवेश करूँगा।'

श्लोक 9 (markandeya.132.9)

साहाय्यमस्यासुरदेवयक्षगन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः । कुर्वन्ति चेत्तानपि चास्त्रपूगैर्भस्मीकरोम्येष रुषा समेतः ॥ 132.9 ॥

sāhāyyamasyāsuradevayakṣagandharvavidyādharasiddhasaṁghāḥ kurvanti cettānapi cāstrapūgairbhasmīkaromyeṣa ruṣā sametaḥ

'यदि असुर, देव, यक्ष, गन्धर्व, विद्याधर और सिद्धों के समूह भी उसकी सहायता को आएँ, तो क्रोध से भरा हुआ मैं उन्हें भी अस्त्रों के समूहों से भस्म कर डालूँगा।'

श्लोक 10 (markandeya.132.10)

निःशूरमाधार्मिकमप्रशस्तं तं दाक्षिणात्यं समरे निहत्य । भोक्ष्ये ततोऽहं पृथिवीं च कृत्स्नां वह्निं प्रवेक्ष्याम्यनिहत्य तं वा ॥ 132.10 ॥

niḥśūramādhārmikamapraśastaṁ taṁ dākṣiṇātyaṁ samare nihatya bhokṣye tato’haṁ pṛthivīṁ ca kṛtsnāṁ vahniṁ pravekṣyāmyanihatya taṁ vā

'उस निर्वीर्य, अधार्मिक, निन्दनीय दाक्षिणात्य को युद्ध में मारकर मैं सारी पृथ्वी का भोग करूँगा — अथवा उसे मारे बिना मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश करूँगा।'

श्लोक 11 (markandeya.132.11)

सुदुर्मतिं तापसवृद्धघातिनं वनस्थगं साधुविधिं विदग्धगम् । हन्ताहमद्याखिलबन्धुमित्रपदातिहस्त्यश्वबलैः समेतम् ॥ 132.11 ॥

sudurmatiṁ tāpasavṛddhaghātinaṁ vanasthagaṁ sādhuvidhiṁ vidagdhagam hantāhamadyākhilabandhumitrapadātihastyaśvabalaiḥ sametam

'उस दुर्बुद्धि, वृद्ध-तपस्वी-हन्ता, वन में छिपने वाले, साधुविधि को कपटपूर्वक भंग करने वाले को — आज ही मैं उसके समस्त बन्धु-मित्र, पदाति, हस्ती और अश्वबल सहित मार डालूँगा।'

श्लोक 12 (markandeya.132.12)

एषोऽहमादाय धनुःसखड्गो रथी तथैवारिबलं समेत्य । करोमि वै यत्कदनं समस्ताः पश्यन्तु मे देवगणा समेताः ॥ 132.12 ॥

eṣo’hamādāya dhanuḥsakhaḍgo rathī tathaivāribalaṁ sametya karomi vai yatkadanaṁ samastāḥ paśyantu me devagaṇā sametāḥ

'धनुष और खड्ग हाथ में लिए हुए मैं स्वयं रथारूढ़ होकर शत्रु-सेना से भिड़ूँगा और ऐसा संहार करूँगा जिसे समस्त देवगण मिलकर देखें।'

श्लोक 13 (markandeya.132.13)

यो यः सहायो भविताद्य तस्य मया समेतस्य रणाय भूयः । तस्यैव निःशेषकुलक्षयाय समुद्यतोऽहं निजबाहुसैन्यः ॥ 132.13 ॥

yo yaḥ sahāyo bhavitādya tasya mayā sametasya raṇāya bhūyaḥ tasyaiva niḥśeṣakulakṣayāya samudyato’haṁ nijabāhusainyaḥ

'आज जो भी उसकी सहायता के लिए फिर से मुझसे युद्ध करने आएगा, उसी के समस्त कुल के सम्पूर्ण नाश के लिए भी मैं अपनी भुजाओं की सेना लेकर उद्यत हूँ।'

श्लोक 14 (markandeya.132.14)

यदि कुलिशकरोऽस्मिन्सयुगे देवराजः पितृपतिरथ चोग्रं दण्डमुद्यस्य कोपात् । धनपतिवरुणार्का रक्षितुं तं यतन्ते निशितशरवरौघैर्घातियिष्ये तथापि ॥ 132.14 ॥

yadi kuliśakaro’sminsayuge devarājaḥ pitṛpatiratha cograṁ daṇḍamudyasya kopāt dhanapativaruṇārkā rakṣituṁ taṁ yatante niśitaśaravaraughairghātiyiṣye tathāpi

'यदि इस युग में वज्रधर देवराज इन्द्र स्वयं, अथवा पितृपति यम अपना भयंकर दण्ड उठाकर क्रोधवश, अथवा धनपति कुबेर, वरुण और सूर्य भी उसकी रक्षा का प्रयत्न करें, तो भी मैं उसे तीक्ष्ण बाणों के समूहों से मार ही डालूँगा।'

श्लोक 15 (markandeya.132.15)

नियतमतिरदोषः काननाखण्डलोका निपतितफलभक्षः सर्वभूतेषु मैत्रः । प्रभवति मयि पुत्रे हिंसितो येन तातः पिशितरुधिरतृप्तास्तस्य सन्त्वद्य गृध्राः ॥ 132.15 ॥

niyatamatiradoṣaḥ kānanākhaṇḍalokā nipatitaphalabhakṣaḥ sarvabhūteṣu maitraḥ prabhavati mayi putre hiṁsito yena tātaḥ piśitarudhiratṛptāstasya santvadya gṛdhrāḥ

'स्थिर बुद्धि वाले, निर्दोष, वन में रहने वाले, केवल गिरे हुए फल खाने वाले, सब प्राणियों के मित्र गीध — आज उसी के मांस और रक्त से तृप्त हों, जिसने मुझ पुत्र के जीवित रहते हुए भी मेरे पिता की हिंसा की।'

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