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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 2

चटकोत्पत्ति

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (markandeya.2.1)

मार्कण्डेय उवाच अरिष्टनेमिपुत्रोऽभूद् गरुडो नाम पक्षिराट् । गरुडस्याभवत् पुत्रः सम्पातिरिति विश्रुतः ॥ 2.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca ariṣṭanemiputro ’bhūd garuḍo nāma pakṣirāṭ garuḍasyābhavat putraḥ sampātiriti viśrutaḥ

अरिष्टनेमि का पुत्र गरुड नामक पक्षिराज हुआ। गरुड का पुत्र संपाति नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 2 (markandeya.2.2)

तस्याप्यासीत् सुतः शूरः सुपार्श्वो वायुविक्रमः । सुपार्श्वतनयः कुन्तिः कुन्तिपुत्रः प्रलोलुपः ॥ 2.2 ॥

tasyāpyāsīt sutaḥ śūraḥ supārśvo vāyuvikramaḥ supārśvatanayaḥ kuntiḥ kuntiputraḥ pralolupaḥ

उसका भी पुत्र वीर, वायु के समान वेगवान् सुपार्श्व हुआ; सुपार्श्व का पुत्र कुन्ति, और कुन्ति का पुत्र प्रलोलुप हुआ।

श्लोक 3 (markandeya.2.3)

तस्यापि तनयावास्तां कङ्कः कन्धर एव च ॥ 2.3 ॥

tasyāpi tanayāvāstāṁ kaṅkaḥ kandhara eva ca

उसके भी दो पुत्र हुए, कङ्क और कन्धर।

श्लोक 4 (markandeya.2.4)

कङ्कः कैलासशिखरे विद्युद्रूपेति विश्रुतम् । ददर्शाम्बुजपत्राक्षं राक्षसं धनदानुगम् ॥ 2.4 ॥

kaṅkaḥ kailāsaśikhare vidyudrūpeti viśrutam dadarśāmbujapatrākṣaṁ rākṣasaṁ dhanadānugam

कैलास पर्वत के शिखर पर कङ्क ने विद्युद्रूप नामक, कमल-पत्र के समान नेत्रों वाले, कुबेर के एक अनुचर राक्षस को देखा,

श्लोक 5 (markandeya.2.5)

आपानासक्तममलस्त्रग्दामाम्बरधारिणम् । भार्यासहायमासीनं शिलापट्टेऽमले शुभे ॥ 2.5 ॥

āpānāsaktamamalastragdāmāmbaradhāriṇam bhāryāsahāyamāsīnaṁ śilāpaṭṭe ’male śubhe

जो निर्मल माला और वस्त्र धारण किए, मदिरापान में लीन, अपनी पत्नी के साथ एक निर्मल और शुभ शिलाखण्ड पर बैठा था।

श्लोक 6 (markandeya.2.6)

तद्दृष्टमात्रं कङ्केन रक्षः क्रोधसमन्वितम् । प्रोवाच कस्मादायातस्त्वमितो ह्यण्डजाधम ॥ 2.6 ॥

taddṛṣṭamātraṁ kaṅkena rakṣaḥ krodhasamanvitam provāca kasmādāyātastvamito hyaṇḍajādhama

उसे देखते ही कङ्क ने क्रोधपूर्वक कहा—हे नीच अण्डज, तू यहाँ किसलिए आया है?

श्लोक 7 (markandeya.2.7)

स्त्रीसन्निकर्षे तिष्ठन्तं कस्मान्मामुपसर्पसि । नैष धर्मः सुबुद्धीनां मिथोनिष्पाद्यवस्तुषु ॥ 2.7 ॥

strīsannikarṣe tiṣṭhantaṁ kasmānmāmupasarpasi naiṣa dharmaḥ subuddhīnāṁ mithoniṣpādyavastuṣu

स्त्री के साथ बैठे हुए मेरे निकट तू क्यों आता है? परस्पर की निजी बातों में हस्तक्षेप करना बुद्धिमानों का धर्म नहीं है।

श्लोक 8 (markandeya.2.8)

कङ्क उवाच साधारणोऽयं शैलेन्द्रो यथा तव तथा मम । अन्येषां चैव जन्तूनां ममता भवतोऽत्र का ॥ 2.8 ॥

kaṅka uvāca sādhāraṇo ’yaṁ śailendro yathā tava tathā mama anyeṣāṁ caiva jantūnāṁ mamatā bhavato ’tra kā

कङ्क ने कहा—यह पर्वतराज जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है, और अन्य सभी प्राणियों का भी। यहाँ तुम्हारा कैसा स्वामित्व?

श्लोक 9 (markandeya.2.9)

मार्कण्डेय उवाच ब्रुवाणमित्थं खड्गेन कङ्कं चिन्छेद राक्षसः । क्षरत्क्षतजबीभत्सं विस्फुरन्तमचेतनम् ॥ 2.9 ॥

mārkaṇḍeya uvāca bruvāṇamitthaṁ khaḍgena kaṅkaṁ cincheda rākṣasaḥ kṣaratkṣatajabībhatsaṁ visphurantamacetanam

इस प्रकार कहते हुए कङ्क को उस राक्षस ने खड्ग से काट डाला, जिससे वह रक्त बहाता हुआ, भयंकर, कांपता, बेसुध हो गया।

श्लोक 10 (markandeya.2.10)

कङ्कं विनिहतं श्रुत्वा कन्धरः क्रोधमूर्च्छितः । विद्युद्रूपवधायाशु मनश्चक्रेऽण्डजेश्वरः ॥ 2.10 ॥

kaṅkaṁ vinihataṁ śrutvā kandharaḥ krodhamūrcchitaḥ vidyudrūpavadhāyāśu manaścakre ’ṇḍajeśvaraḥ

कङ्क के वध का समाचार सुनकर क्रोध से मूर्च्छित अण्डजेश्वर कन्धर ने तुरंत विद्युद्रूप के वध का निश्चय किया।

श्लोक 11 (markandeya.2.11)

स गत्वा शैलशिखरं कङ्को यत्र हतः स्थितः । तस्य संकलनं चक्रे भ्रातुर्ज्येष्ठस्य खेचरः । कोपामर्षविवृताक्षो नागेन्द्र इव निः श्वसन् ॥ 2.11 ॥

sa gatvā śailaśikharaṁ kaṅko yatra hataḥ sthitaḥ tasya saṁkalanaṁ cakre bhrāturjyeṣṭhasya khecaraḥ kopāmarṣavivṛtākṣo nāgendra iva niḥ śvasan

वह उस पर्वत शिखर पर गया जहाँ कङ्क मरा पड़ा था, और क्रोध व असहनशीलता से फैली आँखों के साथ, नागराज के समान श्वास लेते हुए, उस खेचर ने अपने ज्येष्ठ भ्राता का अन्त्येष्टि संस्कार किया।

श्लोक 12 (markandeya.2.12)

जगामाथ स यत्रास्ते भ्रातृहा तस्य राक्षसः । पक्षवातेन महता चालयन् भूधरान् वरान् ॥ 2.12 ॥

jagāmātha sa yatrāste bhrātṛhā tasya rākṣasaḥ pakṣavātena mahatā cālayan bhūdharān varān

फिर वह वहाँ गया जहाँ उसका भ्रातृघाती वह राक्षस था, अपने पंखों के महान वेग से श्रेष्ठ पर्वतों को हिलाता हुआ।

श्लोक 13 (markandeya.2.13)

वेगात् पयोदजालानि विक्षिपन् क्षतजेक्षणः । क्षणात् क्षयितशत्रुः स पक्षाभ्यां क्रान्तभूधरः ॥ 2.13 ॥

vegāt payodajālāni vikṣipan kṣatajekṣaṇaḥ kṣaṇāt kṣayitaśatruḥ sa pakṣābhyāṁ krāntabhūdharaḥ

रक्त-लोचन वह वेगपूर्वक मेघों के समूहों को बिखेरता हुआ, अपने पंखों से पर्वतों को आच्छादित करता हुआ, क्षणभर में शत्रु का नाश करने के लिए उड़ा।

श्लोक 14 (markandeya.2.14)

पानासक्तमतिं तत्र तं ददर्श निशाचरम् । आताम्रवक्त्रनयनं हेमपर्यङ्कमाश्रितम् ॥ 2.14 ॥

pānāsaktamatiṁ tatra taṁ dadarśa niśācaram ātāmravaktranayanaṁ hemaparyaṅkamāśritam

वहाँ उसने उस निशाचर को देखा, जो पान में मग्न था, जिसका मुख और नेत्र लाल हो रहे थे, स्वर्ण पर्यंक पर विराजमान।

श्लोक 15 (markandeya.2.15)

स्त्रग्दामापूरितशिखं हरिचन्दनभूषितम् । केतकीगर्भपत्राभैर्दन्तैर्घोरतराननम् ॥ 2.15 ॥

stragdāmāpūritaśikhaṁ haricandanabhūṣitam ketakīgarbhapatrābhairdantairghoratarānanam

जिसका मुकुट मालाओं से भरा था, जो हरिचन्दन से विभूषित था, जिसका मुख केतकी के भीतरी पत्तों के समान दाँतों से अत्यंत भयंकर लग रहा था।

श्लोक 16 (markandeya.2.16)

वामोरुमाश्रितां चास्य ददर्शायतलोचनाम् । पत्नीं मदनिकां नाम पुंस्कोकिलकलस्वनाम् ॥ 2.16 ॥

vāmorumāśritāṁ cāsya dadarśāyatalocanām patnīṁ madanikāṁ nāma puṁskokilakalasvanām

और उसने उसकी बायीं जांघ पर बैठी, विशाल नेत्रों वाली, पुरुष कोकिल के समान मधुर स्वर वाली उसकी पत्नी मदनिका को भी देखा।

श्लोक 17 (markandeya.2.17)

ततो रोषपरीतात्मा कन्धरः कन्दरस्थितम् । तमुवाच सुदुष्टात्मन्नेहि युध्यस्व वै मया ॥ 2.17 ॥

tato roṣaparītātmā kandharaḥ kandarasthitam tamuvāca suduṣṭātmannehi yudhyasva vai mayā

तब क्रोध से आविष्ट कन्धर ने उस कन्दरा में बैठे उससे कहा—हे दुरात्मन्, आ, मेरे साथ युद्ध कर।

श्लोक 18 (markandeya.2.18)

यस्माज्जेष्ठो मम भ्राता विश्रब्धो घाततस्त्वया । तस्मात्त्वां मदसंसक्तं नयिष्ये यमसादनम् ॥ 2.18 ॥

yasmājjeṣṭho mama bhrātā viśrabdho ghātatastvayā tasmāttvāṁ madasaṁsaktaṁ nayiṣye yamasādanam

चूँकि मेरा ज्येष्ठ भ्राता निर्भय बैठा हुआ तेरे द्वारा मारा गया, इसलिए मद में डूबे हुए तुझे मैं यमलोक भेजूँगा।

श्लोक 19 (markandeya.2.19)

विश्वस्तघातिनां लोका ये च स्त्रीबालघातिनाम् । यास्यसे निरयान् सर्वांस्तांस्त्वमद्य मया हतः ॥ 2.19 ॥

viśvastaghātināṁ lokā ye ca strībālaghātinām yāsyase nirayān sarvāṁstāṁstvamadya mayā hataḥ

आज मेरे द्वारा मारा जाकर तू उन सब नरकों में जाएगा जो विश्वासघाती और स्त्री-बालक के हन्ताओं के लिए हैं।

श्लोक 20 (markandeya.2.20)

मार्कण्डेय उवाच इत्येवं पतगेन्द्रेण प्रोक्तं स्त्रीसन्निधौ तदा । रक्षः क्रोधसमाविष्टं प्रत्यभाषत पक्षिणम् ॥ 2.20 ॥

mārkaṇḍeya uvāca ityevaṁ patagendreṇa proktaṁ strīsannidhau tadā rakṣaḥ krodhasamāviṣṭaṁ pratyabhāṣata pakṣiṇam

अपनी पत्नी के समक्ष उस पक्षिराज द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर क्रोध से भरा वह राक्षस उस पक्षी को यह उत्तर देने लगा।

श्लोक 21 (markandeya.2.21)

यदि ते निहतो भ्राता पौरुषं तद्धि दर्शितम् । त्वामप्यद्य हनिष्येऽहं खड्गेनानेन खेचर ॥ 2.21 ॥

yadi te nihato bhrātā pauruṣaṁ taddhi darśitam tvāmapyadya haniṣye ’haṁ khaḍgenānena khecara

यदि तेरा भाई मारा गया तो उसमें मेरा पौरुष ही दिखा है। हे खेचर, आज इसी खड्ग से मैं तुझे भी मार डालूँगा।

श्लोक 22 (markandeya.2.22)

तिष्ठ क्षणं नात्र जीवन् पतगाधम यास्यसि । इत्युक्त्वाञ्जनपुञ्जाभं विमलं खड्गमाददे ॥ 2.22 ॥

tiṣṭha kṣaṇaṁ nātra jīvan patagādhama yāsyasi ityuktvāñjanapuñjābhaṁ vimalaṁ khaḍgamādade

एक क्षण ठहर, हे नीच पक्षी, अब तू यहाँ से जीवित नहीं जाएगा—यह कहकर उसने अंजन-राशि के समान श्याम, निर्मल खड्ग उठा लिया।

श्लोक 23 (markandeya.2.23)

ततः पतगराजस्य यक्षाधिपभटस्य च । बभूव युद्धमतुलं यथा गरुड-शक्रयोः ॥ 2.23 ॥

tataḥ patagarājasya yakṣādhipabhaṭasya ca babhūva yuddhamatulaṁ yathā garuḍa-śakrayoḥ

तब पक्षिराज और उस यक्षाधिपति के योद्धा में गरुड और शक्र के युद्ध के समान अनुपम युद्ध हुआ।

श्लोक 24 (markandeya.2.24)

ततः स राक्षसः क्रोधात् खड्गमाविध्य वेगवत् । चिक्षेप पतगेन्द्राय निर्वाणाङ्गारवर्चसम् ॥ 2.24 ॥

tataḥ sa rākṣasaḥ krodhāt khaḍgamāvidhya vegavat cikṣepa patagendrāya nirvāṇāṅgāravarcasam

तब उस राक्षस ने क्रोध से अपने खड्ग को वेगपूर्वक घुमाकर, बुझते हुए अंगारे के समान तेजयुक्त, उसे पक्षिराज पर फेंक दिया।

श्लोक 25 (markandeya.2.25)

पतगेन्द्रश्च तं खड्गङ्किञ्चिदुत्प्लुत्य भूतलात् । वक्त्रेण जग्राह तदा गरुडः पन्नगं यथा ॥ 2.25 ॥

patagendraśca taṁ khaḍgaṅkiñcidutplutya bhūtalāt vaktreṇa jagrāha tadā garuḍaḥ pannagaṁ yathā

पक्षिराज ने भूमि से थोड़ा उछलकर, जैसे गरुड सर्प को पकड़ते हैं वैसे ही अपने मुख से उस खड्ग को पकड़ लिया।

श्लोक 26 (markandeya.2.26)

वक्त्रपादतलैर्भङ्क्त्वा चक्रे क्षोभमथातुलम् । तस्मिन् भग्ने ततः खड्गे बाहुयुद्धमवर्तत ॥ 2.26 ॥

vaktrapādatalairbhaṅktvā cakre kṣobhamathātulam tasmin bhagne tataḥ khaḍge bāhuyuddhamavartata

उसने चोंच और पैरों के तलवों से उसे तोड़कर अद्भुत विक्षोभ उत्पन्न किया; खड्ग के टूट जाने पर फिर हाथों-हाथ युद्ध होने लगा।

श्लोक 27 (markandeya.2.27)

ततः पतगराजेन वक्षस्याक्रम्य राक्षसः । हस्त-पाद-करैराशु शिरसा च वियोजितः ॥ 2.27 ॥

tataḥ patagarājena vakṣasyākramya rākṣasaḥ hasta-pāda-karairāśu śirasā ca viyojitaḥ

तब पक्षिराज ने उसकी छाती पर चढ़कर हाथों, पैरों और पंजों से शीघ्र ही उस राक्षस को सिर से अलग कर दिया।

श्लोक 28 (markandeya.2.28)

तस्मिन् विनिहते सा स्त्री खगं शरणमभ्यगात् । किञ्चित् संजातसंत्रासा प्राह भार्या भवामि ते ॥ 2.28 ॥

tasmin vinihate sā strī khagaṁ śaraṇamabhyagāt kiñcit saṁjātasaṁtrāsā prāha bhāryā bhavāmi te

उसके मारे जाने पर वह स्त्री उस पक्षी की शरण में आई; कुछ भयभीत होकर उसने कहा—मैं तुम्हारी पत्नी बनूँगी।

श्लोक 29 (markandeya.2.29)

तामादाय खगश्रेष्ठः स्वकं गृहमगात् पुनः । गत्वा स निष्कृतिं भ्रातुर्विद्युद्रुपनिपातनात् ॥ 2.29 ॥

tāmādāya khagaśreṣṭhaḥ svakaṁ gṛhamagāt punaḥ gatvā sa niṣkṛtiṁ bhrāturvidyudrupanipātanāt

उसे लेकर वह श्रेष्ठ पक्षी अपने घर लौट गया, विद्युद्रूप के वध द्वारा भाई के प्रतिशोध से मुक्त होकर।

श्लोक 30 (markandeya.2.30)

कन्धरस्य च सा वेश्म प्राप्येच्छारूपधारिणी । मेनकातनया सुभ्रूः सौपर्णं रूपमाददे ॥ 2.30 ॥

kandharasya ca sā veśma prāpyecchārūpadhāriṇī menakātanayā subhrūḥ sauparṇaṁ rūpamādade

इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, सुन्दर भौंहों वाली वह मेनका की पुत्री कन्धर के घर पहुँचकर सुपर्ण का रूप धारण करने लगी।

श्लोक 31 (markandeya.2.31)

तस्यां स जनयामास तार्क्षों नाम सुतां तदा । मुनिशापाग्निविप्लुष्टां वपुमप्सरसां वराम् । तस्या नाम तदा चक्रे तार्क्षोमिति विहङ्गमः ॥ 2.31 ॥

tasyāṁ sa janayāmāsa tārkṣoṁ nāma sutāṁ tadā muniśāpāgnivipluṣṭāṁ vapumapsarasāṁ varām tasyā nāma tadā cakre tārkṣomiti vihaṅgamaḥ

उससे उसने तार्क्षी नामक पुत्री उत्पन्न की—वही अप्सराओं में श्रेष्ठ वपु, जो मुनि के शाप की अग्नि से दग्ध थी; उस पक्षी ने उसका नाम तार्क्षी रखा।

श्लोक 32 (markandeya.2.32)

मन्दपालसुताश्चासंश्चत्वारोऽमितबुद्धयः । जरितारिप्रभृतयो द्रोणान्ता द्विजसत्तमाः ॥ 2.32 ॥

mandapālasutāścāsaṁścatvāro ’mitabuddhayaḥ jaritāriprabhṛtayo droṇāntā dvijasattamāḥ

मन्दपाल के चार पुत्र हुए, असीम बुद्धि वाले, जरितारि से आरम्भ होकर द्रोण तक, द्विजों में श्रेष्ठ।

श्लोक 33 (markandeya.2.33)

तेषां जघन्यो धर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः । उपयेमे स तां तार्क्षों कन्धरानुमते शुभाम् ॥ 2.33 ॥

teṣāṁ jaghanyo dharmātmā vedavedāṅgapāragaḥ upayeme sa tāṁ tārkṣoṁ kandharānumate śubhām

उनमें सबसे छोटा, धर्मात्मा, वेद-वेदांगों में पारंगत पुत्र ने कन्धर की सहमति से उस शुभ तार्क्षी से विवाह किया।

श्लोक 34 (markandeya.2.34)

कस्यचित्त्वथ कालस्य तार्क्षो गर्भमवाप ह । सप्तपक्षाहिते गर्भे कुरुक्षेत्रं जगाम सा ॥ 2.34 ॥

kasyacittvatha kālasya tārkṣo garbhamavāpa ha saptapakṣāhite garbhe kurukṣetraṁ jagāma sā

कुछ काल बाद तार्क्षी गर्भवती हुई; गर्भ के सात पक्ष पूरे होने पर वह कुरुक्षेत्र गई।

श्लोक 35 (markandeya.2.35)

कुरु-पाण्डवयोर्युद्धे वर्तमाने सुदारुणे । भावित्वाच्चैव कार्यस्य रणमध्ये विवेश सा ॥ 2.35 ॥

kuru-pāṇḍavayoryuddhe vartamāne sudāruṇe bhāvitvāccaiva kāryasya raṇamadhye viveśa sā

कुरु और पाण्डवों के भीषण युद्ध के समय, नियति के कारण, वह उस रणभूमि के मध्य में जा पहुँची।

श्लोक 36 (markandeya.2.36)

तत्रापश्यत् तदा युद्धं भगदत्तकिरीटिनोः । निरन्तरं शरैरासीदाकाशं शलभैरिव ॥ 2.36 ॥

tatrāpaśyat tadā yuddhaṁ bhagadattakirīṭinoḥ nirantaraṁ śarairāsīdākāśaṁ śalabhairiva

वहाँ उसने भगदत्त और किरीटी (अर्जुन) का वह युद्ध देखा, जिसमें बाणों से भरा आकाश टिड्डियों के समूह के समान लग रहा था।

श्लोक 37 (markandeya.2.37)

पार्थकोदण्डनिर्मुक्तमासन्नमतिवेगवत् । तस्या भल्लमहिश्यामं त्वचं चिच्छेद जाठरीम् ॥ 2.37 ॥

pārthakodaṇḍanirmuktamāsannamativegavat tasyā bhallamahiśyāmaṁ tvacaṁ ciccheda jāṭharīm

पार्थ के धनुष से छूटा, हाथी के समान श्याम, अत्यंत वेगवान् और निकट आता हुआ एक भल्ल बाण उसके पेट की त्वचा को चीर गया।

श्लोक 38 (markandeya.2.38)

भिन्ने कोष्ठे शसाङ्काभं भूमावण्डचतुष्टयम् । आयुषः सावशेषत्वात् तूलराशाविवापतत् ॥ 2.38 ॥

bhinne koṣṭhe śasāṅkābhaṁ bhūmāvaṇḍacatuṣṭayam āyuṣaḥ sāvaśeṣatvāt tūlarāśāvivāpatat

उसका उदर विदीर्ण होने पर चन्द्रमा के समान श्वेत चार अण्डे भूमि पर गिरे; आयु शेष होने के कारण वे मानो रुई के ढेर पर गिरे।

श्लोक 39 (markandeya.2.39)

तत्पातसमकालं च सुप्रतीकाद्गजोत्तमात् । पपात महती घण्टा बाणसंछिन्नबन्धना ॥ 2.39 ॥

tatpātasamakālaṁ ca supratīkādgajottamāt papāta mahatī ghaṇṭā bāṇasaṁchinnabandhanā

उनके गिरने के साथ ही सुप्रतीक नामक श्रेष्ठ हाथी से, बाण द्वारा उसका बन्धन कटने पर, एक विशाल घण्टा भी गिरा।

श्लोक 40 (markandeya.2.40)

समं समन्तात् प्राप्ता तु निर्भिन्नधरणीतला । छादयन्ती खगाण्डानि स्थितानि पिशितोपरि ॥ 2.40 ॥

samaṁ samantāt prāptā tu nirbhinnadharaṇītalā chādayantī khagāṇḍāni sthitāni piśitopari

वह घण्टा पृथ्वी में धँसकर चारों ओर से समान रूप से उन पक्षी-अण्डों को, जो मांस के ऊपर पड़े थे, ढक कर स्थित हो गया।

श्लोक 41 (markandeya.2.41)

हते च तस्मिन् नृपतौ भगदत्ते नरेश्वरे । बहून्यहान्यभूद्युद्धं कुरुपाण्डवसैन्ययोः ॥ 2.41 ॥

hate ca tasmin nṛpatau bhagadatte nareśvare bahūnyahānyabhūdyuddhaṁ kurupāṇḍavasainyayoḥ

उस राजा भगदत्त के मारे जाने पर, कुरु और पाण्डव सेनाओं के बीच युद्ध और भी अनेक दिनों तक चलता रहा।

श्लोक 42 (markandeya.2.42)

वृत्ते युद्धे धर्मपुत्रे गते शान्तनवान्तिकम् । भीष्मस्य गदतोऽशेषान् श्रोतुं धर्मान् महात्मनः ॥ 2.42 ॥

vṛtte yuddhe dharmaputre gate śāntanavāntikam bhīṣmasya gadato ’śeṣān śrotuṁ dharmān mahātmanaḥ

युद्ध समाप्त होने पर, धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) के शान्तनु-पुत्र (भीष्म) के समीप जाकर उन महात्मा के मुख से समस्त धर्मों को सुनने के समय,

श्लोक 43 (markandeya.2.43)

घण्टागतानि तिष्ठन्ति यत्राण्डानि द्विजोत्तम । आजगाम तमुद्देशं शमीको नाम संयमी ॥ 2.43 ॥

ghaṇṭāgatāni tiṣṭhanti yatrāṇḍāni dvijottama ājagāma tamuddeśaṁ śamīko nāma saṁyamī

हे द्विजोत्तम, जहाँ घण्टे के नीचे वे अण्डे पड़े थे, वहाँ शमीक नामक संयमी ऋषि आ पहुँचे।

श्लोक 44 (markandeya.2.44)

स तत्र शब्दमशृणोच्चिचीकुचीति वाशताम् । बाल्यादस्फुटवाक्यानां विज्ञानेऽपि परे सति ॥ 2.44 ॥

sa tatra śabdamaśṛṇoccicīkucīti vāśatām bālyādasphuṭavākyānāṁ vijñāne ’pi pare sati

वहाँ उन्होंने बाल्यकाल के अस्पष्ट किन्तु परम ज्ञान से युक्त 'चिची-कुची' शब्द सुना।

श्लोक 45 (markandeya.2.45)

अथर्षिः शिष्यसहितो घण्टामुत्पाट्य विस्मितः । अमातृपितृपक्षाणि शिशुकानि ददर्श ह ॥ 2.45 ॥

atharṣiḥ śiṣyasahito ghaṇṭāmutpāṭya vismitaḥ amātṛpitṛpakṣāṇi śiśukāni dadarśa ha

तब शिष्यों सहित ऋषि ने आश्चर्यचकित होकर घण्टे को हटाकर, माता-पिता से रहित उन शिशुओं को देखा।

श्लोक 46 (markandeya.2.46)

तानि तत्र तथा भूमौ शमीको भगवान् मुनिः । दृष्ट्वा स विस्मयाविष्टः प्रोवाचानुगतान् द्विजान् ॥ 2.46 ॥

tāni tatra tathā bhūmau śamīko bhagavān muniḥ dṛṣṭvā sa vismayāviṣṭaḥ provācānugatān dvijān

भूमि पर पड़े हुए उन्हें इस प्रकार देखकर, आश्चर्य से भरे भगवान् मुनि शमीक ने अपने साथ आए द्विजों से कहा।

श्लोक 47 (markandeya.2.47)

सम्यगुक्तं द्विजाग्य्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् । पलायनपरं दृष्ट्वा दैत्यसैन्यं सुरार्दितम् ॥ 2.47 ॥

samyaguktaṁ dvijāgyreṇa śukreṇośanasā svayam palāyanaparaṁ dṛṣṭvā daityasainyaṁ surārditam

द्विजश्रेष्ठ शुक्र उशना ने स्वयं भली-भाँति कहा था, जब उन्होंने देवताओं से पीड़ित होकर भागते हुए दैत्य-सेना को देखा—

श्लोक 48 (markandeya.2.48)

न गन्तव्यं निवर्तध्वं कस्माद् व्रजथ कातराः । उत्सृज्य शौर्ययशसी क्व गता न मरिष्यथ ॥ 2.48 ॥

na gantavyaṁ nivartadhvaṁ kasmād vrajatha kātarāḥ utsṛjya śauryayaśasī kva gatā na mariṣyatha

'भागना उचित नहीं, लौट आओ! हे कातर, तुम कहाँ जाते हो? शौर्य और यश त्यागकर कहाँ जाओगे कि मृत्यु से बच जाओगे?

श्लोक 49 (markandeya.2.49)

नश्यतो युध्यतो वापि तावद्भवति जीवितम् । यावद्धातासृजत् पूर्वं न यावन्मनसेप्सितम् ॥ 2.49 ॥

naśyato yudhyato vāpi tāvadbhavati jīvitam yāvaddhātāsṛjat pūrvaṁ na yāvanmanasepsitam

भागते हुए या युद्ध करते हुए, जीवन उतना ही रहता है जितना विधाता ने पहले से निश्चित कर दिया है, मन की इच्छा के अनुसार नहीं।

श्लोक 50 (markandeya.2.50)

एके म्रियन्ते स्वगृहे पलायन्तोऽपरे जनाः । भुञ्जन्तोऽन्नं तथैवापः पिबन्तो निधनं गताः ॥ 2.50 ॥

eke mriyante svagṛhe palāyanto ’pare janāḥ bhuñjanto ’nnaṁ tathaivāpaḥ pibanto nidhanaṁ gatāḥ

कोई अपने घर में मरता है, कोई भागते हुए; कोई अन्न खाते हुए, तो कोई जल पीते हुए ही मृत्यु को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (markandeya.2.51)

विलासिनस्तथैवान्ये कामयाना निरामयाः । अविक्षताङ्गाः शस्त्रैश्च प्रेतराजवशङ्गताः ॥ 2.51 ॥

vilāsinastathaivānye kāmayānā nirāmayāḥ avikṣatāṅgāḥ śastraiśca pretarājavaśaṅgatāḥ

अन्य लोग विलास में रत, कामनाओं में लीन, नीरोग और शस्त्रों से अक्षत अंगों वाले होते हुए भी यमराज के वश में चले जाते हैं।

श्लोक 52 (markandeya.2.52)

अन्ये तपस्यभिरता नीताः प्रेतनृपानुगैः । योगाभ्यासे रताश्चान्ये नैव प्रापुरमृत्युताम् ॥ 2.52 ॥

anye tapasyabhiratā nītāḥ pretanṛpānugaiḥ yogābhyāse ratāścānye naiva prāpuramṛtyutām

अन्य तप में लीन होकर यमदूतों द्वारा ले जाए जाते हैं, और अन्य योगाभ्यास में रत रहकर भी अमरत्व नहीं पाते।

श्लोक 53 (markandeya.2.53)

शम्बराय पुरा क्षिप्तं वज्रं कुलिशपाणिना । हृदयेऽभिहतस्तेन तथापि न मृतोऽसुरः ॥ 2.53 ॥

śambarāya purā kṣiptaṁ vajraṁ kuliśapāṇinā hṛdaye ’bhihatastena tathāpi na mṛto ’suraḥ

पूर्वकाल में शम्बर पर वज्रधारी इन्द्र ने वज्र फेंका था; हृदय पर आघात लगने पर भी वह असुर नहीं मरा।

श्लोक 54 (markandeya.2.54)

तेनैव खलु वज्रेण तेनैनेन्द्रेण दानवाः । प्राप्ते काले हता दैत्यास्तत्क्षणान्निधनं गताः ॥ 2.54 ॥

tenaiva khalu vajreṇa tenainendreṇa dānavāḥ prāpte kāle hatā daityāstatkṣaṇānnidhanaṁ gatāḥ

किन्तु उसी वज्र से, उसी इन्द्र द्वारा, समय आने पर दानव मारे गए और दैत्य उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 55 (markandeya.2.55)

विदित्वैवं न सन्त्रासः कर्तव्यो विनिवर्तते । ततो निवृत्तास्ते दैत्यास्त्यक्त्वा मरणजं भयम् ॥ 2.55 ॥

viditvaivaṁ na santrāsaḥ kartavyo vinivartate tato nivṛttāste daityāstyaktvā maraṇajaṁ bhayam

यह जानकर भय नहीं करना चाहिए, लौट जाना चाहिए'—इस प्रकार वे दैत्य मृत्यु का भय त्यागकर लौट गए।

श्लोक 56 (markandeya.2.56)

इति शुक्रवचः सत्यं कृतमेभिः खगोत्तमैः । ये युद्धेऽपि न सम्प्राप्ताः पञ्चत्वमतिमानुषे ॥ 2.56 ॥

iti śukravacaḥ satyaṁ kṛtamebhiḥ khagottamaiḥ ye yuddhe ’pi na samprāptāḥ pañcatvamatimānuṣe

इस प्रकार शुक्र का वचन इन श्रेष्ठ पक्षियों द्वारा सत्य सिद्ध हुआ, जो इस अतिमानुष युद्ध में भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए।

श्लोक 57 (markandeya.2.57)

क्वाणाडानां पतनं विप्राः क्व घण्टापतनं समम् । क्व च मांस-वसा-रक्तैर्भूमेरास्तरणक्रियाः ॥ 2.57 ॥

kvāṇāḍānāṁ patanaṁ viprāḥ kva ghaṇṭāpatanaṁ samam kva ca māṁsa-vasā-raktairbhūmerāstaraṇakriyāḥ

हे विप्रो, अण्डों का गिरना और उसी क्षण घण्टे का गिरना कहाँ, और यह मांस, वसा, रक्त से पृथ्वी का इस प्रकार बिछ जाना कहाँ!

श्लोक 58 (markandeya.2.58)

केऽप्येते सर्वथा विप्रा नैते सामान्यपक्षिणः । दैवानुकूलता लोके महाभाग्यप्रदर्शिनी ॥ 2.58 ॥

ke ’pyete sarvathā viprā naite sāmānyapakṣiṇaḥ daivānukūlatā loke mahābhāgyapradarśinī

ये किसी भी प्रकार साधारण पक्षी नहीं हैं; संसार में दैव की अनुकूलता ही महाभाग्य की परिचायक है।

श्लोक 59 (markandeya.2.59)

एवमुक्त्वा स तान् वीक्ष्य पुनर्वचनमब्रवीत् । निवर्तताश्रमं यात गृहीत्वा पक्षिबालकान् ॥ 2.59 ॥

evamuktvā sa tān vīkṣya punarvacanamabravīt nivartatāśramaṁ yāta gṛhītvā pakṣibālakān

यह कहकर और उन्हें देखकर उन्होंने पुनः कहा—लौट चलो, आश्रम जाओ, इन पक्षी-शिशुओं को लेकर।

श्लोक 60 (markandeya.2.60)

मार्जाराखुभयं यत्र नैषामण्डजजन्मनाम् । श्येनतो नकुलाद्वापि स्थाप्यन्तां तत्र पक्षिणः ॥ 2.60 ॥

mārjārākhubhayaṁ yatra naiṣāmaṇḍajajanmanām śyenato nakulādvāpi sthāpyantāṁ tatra pakṣiṇaḥ

जहाँ इन अण्डज-जात शिशुओं को बिल्ली और चूहे का भय न हो, वहीं इन पक्षियों को श्येन और नेवले से भी बचाकर रखा जाए।

श्लोक 61 (markandeya.2.61)

द्विजाः किं वातियत्नेन मार्यन्ते कर्मभिः स्वकैः । रक्ष्यन्ते चाखिला जीवा यथैते पक्षिबालकाः ॥ 2.61 ॥

dvijāḥ kiṁ vātiyatnena māryante karmabhiḥ svakaiḥ rakṣyante cākhilā jīvā yathaite pakṣibālakāḥ

हे द्विजो, अधिक प्रयत्न से क्या? प्राणी अपने ही कर्मों से मरते हैं, और समस्त जीव इसी प्रकार सुरक्षित भी रहते हैं जैसे ये पक्षी-शिशु।

श्लोक 62 (markandeya.2.62)

तथापि यत्नः कर्तव्यो नरैः सर्वेषु कर्मसु । कुर्वन् पुरुषकारन्तु वाच्यतां याति नो सताम् ॥ 2.62 ॥

tathāpi yatnaḥ kartavyo naraiḥ sarveṣu karmasu kurvan puruṣakārantu vācyatāṁ yāti no satām

फिर भी मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रयत्न करना चाहिए; पुरुषार्थ करने वाला सज्जनों में निन्दा को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 63 (markandeya.2.63)

इति मुनिवरचोदितास्ततस्ते मुनितनयाः परिगृह्य पक्षिणस्तान् । तरुविटपसमाश्रितालिसङ्घं ययुरथ तापसरम्यमाश्रमं स्वम् ॥ 2.63 ॥

iti munivaracoditāstataste munitanayāḥ parigṛhya pakṣiṇastān taruviṭapasamāśritālisaṅghaṁ yayuratha tāpasaramyamāśramaṁ svam

श्रेष्ठ मुनि के इस प्रकार प्रेरित करने पर उनके शिष्यों ने उन पक्षियों को लेकर, वृक्षों की शाखाओं पर भ्रमरों के झुण्ड से युक्त उस मनोरम तापस-आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 64 (markandeya.2.64)

स चापि वन्यं मनसाभिकामितं प्रगृह्य मूलं कुसुमं फलं कुशान् । चकार चक्रायुध-रुद्र-वेधसां सुरेन्द्र-वैवस्वतः जातवेदसाम् ॥ 2.64 ॥

sa cāpi vanyaṁ manasābhikāmitaṁ pragṛhya mūlaṁ kusumaṁ phalaṁ kuśān cakāra cakrāyudha-rudra-vedhasāṁ surendra-vaivasvataḥ jātavedasām

और वे मूल, पुष्प, फल तथा कुशा वन से मनोवांछित रूप में एकत्र कर, चक्रधारी विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, वैवस्वत यम और अग्नि को अर्पित करते थे।

श्लोक 65 (markandeya.2.65)

अपाम्पतेर्गोष्पतिवित्तरक्षिणोः समीरणस्यापि तथा द्विजोत्तमाः । धातुर्विधातुस्त्वथ वैश्वदेविकाः श्रुतिप्रयुक्ता विवधास्तु सत्क्रियाः ॥ 2.65 ॥

apāmpatergoṣpativittarakṣiṇoḥ samīraṇasyāpi tathā dvijottamāḥ dhāturvidhātustvatha vaiśvadevikāḥ śrutiprayuktā vivadhāstu satkriyāḥ

तथा हे द्विजोत्तमो, जल के स्वामी वरुण, गौओं और धन के रक्षक कुबेर, वायु, धाता, विधाता को भी, और श्रुति में विहित विश्वेदेव सम्बन्धी विविध सत्क्रियाएँ भी वे करते थे।

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