सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 90
शुम्भ-वध
श्लोक 1 (markandeya.90.1)
ऋषिरुवाच निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसंमितम् । हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥ 90.1 ॥
ṛṣiruvāca niśumbhaṁ nihataṁ dṛṣṭvā bhrātaraṁ prāṇasaṁmitam hanyamānaṁ balaṁ caiva śumbhaḥ kruddho 'bravīdvacaḥ
ऋषि ने कहा—अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मारा गया और अपनी सेना का संहार होते देखकर, शुम्भ ने क्रोधित होकर यह वचन कहा।
श्लोक 2 (markandeya.90.2)
बलावलेपाद् दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह । अन्यासां बलमाश्रित्य युध्यसे यातिमानिनी ॥ 90.2 ॥
balāvalepād duṣṭe tvaṁ mā durge garvamāvaha anyāsāṁ balamāśritya yudhyase yātimāninī
"बल के घमंड के कारण, हे दुष्टे! तू दुर्गे होने का अभिमान मत कर। तू दूसरों के बल का सहारा लेकर ही युद्ध करती है, फिर भी अपने को महान मानती है।"
श्लोक 3 (markandeya.90.3)
श्रीदेव्युवाच एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥ 90.3 ॥
śrīdevyuvāca ekaivāhaṁ jagatyatra dvitīyā kā mamāparā paśyaitā duṣṭa mayyeva viśantyo madvibhūtayaḥ
श्री देवी ने कहा—इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है? हे दुष्ट, देख, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं जो मुझमें ही समा रही हैं।
श्लोक 4 (markandeya.90.4)
ऋषिरुवाच ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् । तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकावासीत्तदाम्बिका ॥ 90.4 ॥
ṛṣiruvāca tataḥ samastāstā devyo brahmāṇīpramukhā layam tasyā devyāstanau jagmurekāvāsīttadāmbikā
ऋषि ने कहा—तब ब्राह्मणी आदि वे समस्त देवियाँ उस देवी के शरीर में लीन हो गईं; अकेली अम्बिका ही शेष रह गई।
श्लोक 5 (markandeya.90.5)
श्रीदेव्युवाच अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता । सत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ 90.5 ॥
śrīdevyuvāca ahaṁ vibhūtyā bahubhiriha rūpairyadāsthitā satsaṁhṛtaṁ mayaikaiva tiṣṭhāmyājau sthiro bhava
श्री देवी ने कहा—मैं जो अपनी शक्ति से यहाँ अनेक रूपों में स्थित थी, उन सबको समेटकर अब अकेली ही युद्धभूमि में खड़ी हूँ; तू स्थिर हो जा।
श्लोक 6 (markandeya.90.6)
ऋषिरुवाच ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः । पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ 90.6 ॥
ṛṣiruvāca tataḥ pravavṛte yuddhaṁ devyāḥ śumbhasya cobhayoḥ paśyatāṁ sarvadevānāmasurāṇāṁ ca dāruṇam
ऋषि ने कहा—तब देवी और शुम्भ, दोनों के मध्य भीषण युद्ध छिड़ गया, जिसे समस्त देवगण और असुरगण देख रहे थे।
श्लोक 7 (markandeya.90.7)
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः । तयोर्युद्धमभूद् भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥ 90.7 ॥
śaravarṣaiḥ śitaiḥ śastraistathā cāstraiḥ sudāruṇaiḥ tayoryuddhamabhūd bhūyaḥ sarvalokabhayaṅkaram
तीखे बाणों की वर्षा से, शस्त्रों से तथा अत्यन्त भयंकर अस्त्रों से उन दोनों का वह युद्ध और भी बढ़ गया, जो समस्त लोकों को भयभीत करने वाला था।
श्लोक 8 (markandeya.90.8)
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका । बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥ 90.8 ॥
divyānyastrāṇi śataśo mumuce yānyathāmbikā babhañja tāni daityendrastatpratīghātakartṛbhiḥ
अम्बिका ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, दैत्यराज ने उन्हें प्रति-अस्त्रों से नष्ट कर दिया।
श्लोक 9 (markandeya.90.9)
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी । बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥ 90.9 ॥
muktāni tena cāstrāṇi divyāni parameśvarī babhañja līlayaivograhuṅkāroccāraṇādibhiḥ
और उसके द्वारा छोड़े गए उन दिव्य अस्त्रों को परमेश्वरी देवी ने भयंकर हुंकार-ध्वनि करते हुए, मानो खेल ही खेल में नष्ट कर दिया।
श्लोक 10 (markandeya.90.10)
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः । सा च तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥ 90.10 ॥
tataḥ śaraśatairdevīmācchādayata so 'suraḥ sā ca tatkupitā devī dhanuściccheda ceṣubhiḥ
तब उस असुर ने देवी को सैकड़ों बाणों से ढक दिया; इससे कुपित होकर देवी ने अपने बाणों से उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 11 (markandeya.90.11)
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे । चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥ 90.11 ॥
chinne dhanuṣi daityendrastathā śaktimathādade ciccheda devī cakreṇa tāmapyasya kare sthitām
धनुष कट जाने पर दैत्यराज ने शक्ति (भाला) उठा ली; देवी ने अपने चक्र से उसके हाथ में स्थित उस शक्ति को भी काट डाला।
श्लोक 12 (markandeya.90.12)
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् । अभ्यधावत्तदा देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥ 90.12 ॥
tataḥ khaḍgamupādāya śatacandraṁ ca bhānumat abhyadhāvattadā devīṁ daityānāmadhipeśvaraḥ
तब खड्ग तथा सूर्य-किरणों के समान चमकने वाली सौ-चन्द्र-चिह्नित ढाल लेकर वह दैत्याधिपति देवी की ओर दौड़ा।
श्लोक 13 (markandeya.90.13)
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका । धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् ॥ 90.13 ॥
tasyāpatata evāśu khaḍgaṁ ciccheda caṇḍikā dhanurmuktaiḥ śitairbāṇaiścarma cārkakarāmalam
उसके निकट पहुँचते ही चण्डिका ने उसका खड्ग काट डाला, तथा धनुष से छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों से सूर्य-किरणों-सी उज्ज्वल उसकी ढाल को भी काट डाला।
श्लोक 14 (markandeya.90.14)
अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह । हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधान्वा विसारथिः । जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥ 90.14 ॥
aśvāṁśca pātayāmāsa rathaṁ sārathinā saha hatāśvaḥ sa tadā daityaśchinnadhānvā visārathiḥ jagrāha mudgaraṁ ghoramambikānidhanodyataḥ
उसने उसके घोड़ों को तथा सारथि-सहित रथ को भी गिरा दिया। घोड़े मारे जाने पर, धनुष कट जाने पर, सारथिविहीन हो जाने पर, उस दैत्य ने अम्बिका के वध के लिए एक भयंकर मुद्गर उठा लिया।
श्लोक 15 (markandeya.90.15)
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः । तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥ 90.15 ॥
cicchedāpatatastasya mudgaraṁ niśitaiḥ śaraiḥ tathāpi so 'bhyadhāvattāṁ muṣṭimudyamya vegavān
दौड़ते हुए उसके उस मुद्गर को भी देवी ने तीक्ष्ण बाणों से काट डाला; फिर भी वह वेगपूर्वक मुट्ठी उठाकर उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 16 (markandeya.90.16)
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः । देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥ 90.16 ॥
sa muṣṭiṁ pātayāmāsa hṛdaye daityapuṅgavaḥ devyāstaṁ cāpi sā devī talenorasyatāḍayat
उस दैत्यश्रेष्ठ ने देवी के हृदय पर मुक्का मारा; देवी ने भी अपनी हथेली से उसके वक्षस्थल पर प्रहार किया।
श्लोक 17 (markandeya.90.17)
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले । स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥ 90.17 ॥
talaprahārābhihato nipapāta mahītale sa daityarājaḥ sahasā punareva tathotthitaḥ
हथेली के प्रहार से आहत होकर वह भूमि पर गिर पड़ा; परन्तु वह दैत्यराज तत्काल ही पूर्ववत् पुनः उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 18 (markandeya.90.18)
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः । तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥ 90.18 ॥
utpatya ca pragṛhyoccairdevīṁ gaganamāsthitaḥ tatrāpi sā nirādhārā yuyudhe tena caṇḍikā
फिर उछलकर देवी को ऊँचा पकड़कर वह आकाश में जा पहुँचा; वहाँ भी बिना किसी आधार के चण्डिका उससे युद्ध करती रहीं।
श्लोक 19 (markandeya.90.19)
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् । चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥ 90.19 ॥
niyuddhaṁ khe tadā daityaścaṇḍikā ca parasparam cakratuḥ prathamaṁ siddhamunivismayakārakam
तब आकाश में उस दैत्य और चण्डिका के मध्य परस्पर बाहुयुद्ध हुआ—सिद्धों और मुनियों को चकित कर देने वाला वह प्रथम ऐसा युद्ध था।
श्लोक 20 (markandeya.90.20)
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह । उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥ 90.20 ॥
tato niyuddhaṁ suciraṁ kṛtvā tenāmbikā saha utpātya bhrāmayāmāsa cikṣepa dharaṇītale
फिर बहुत देर तक उसके साथ बाहुयुद्ध करने के बाद अम्बिका ने उसे ऊपर उठाकर घुमाया और धरती पर पटक दिया।
श्लोक 21 (markandeya.90.21)
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः । अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥ 90.21 ॥
sa kṣipto dharaṇīṁ prāpya muṣṭimudyamya vegitaḥ abhyadhāvata duṣṭātmā caṇḍikānidhanecchayā
पटके जाने पर वह धरती को छूते ही वेगपूर्वक मुट्ठी उठाकर, चण्डिका के वध की इच्छा से, वह दुष्टात्मा पुनः उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 22 (markandeya.90.22)
तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् । जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥ 90.22 ॥
tamāyāntaṁ tato devī sarvadaityajaneśvaram jagatyāṁ pātayāmāsa bhittvā śūlena vakṣasi
तब आती हुई उस समस्त दैत्यजाति के स्वामी को देवी ने अपने त्रिशूल से उसका वक्षस्थल भेदकर पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 23 (markandeya.90.23)
स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः । चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥ 90.23 ॥
sa gatāsuḥ papātorvyāṁ devīśūlāgravikṣataḥ cālayan sakalāṁ pṛthvīṁ sābdhidvīpāṁ saparvatām
देवी के त्रिशूल की नोक से बिंधा हुआ वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, अपने गिरने से समुद्रों, द्वीपों और पर्वतों सहित समस्त पृथ्वी को कँपाते हुए।
श्लोक 24 (markandeya.90.24)
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि । जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥ 90.24 ॥
tataḥ prasannamakhilaṁ hate tasmin durātmani jagatsvāsthyamatīvāpa nirmalaṁ cābhavannabhaḥ
उस दुरात्मा के मारे जाने पर सब कुछ प्रसन्न हो उठा; जगत् को अत्यन्त स्वास्थ्य प्राप्त हुआ और आकाश निर्मल हो गया।
श्लोक 25 (markandeya.90.25)
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः । सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥ 90.25 ॥
utpātameghāḥ solkā ye prāgāsaṁste śamaṁ yayuḥ sarito mārgavāhinyastathāsaṁstatra pātite
पहले जो उल्कापात-सहित उत्पाती मेघ थे, वे शान्त हो गए; और उसके गिरने पर नदियाँ पुनः अपने सही मार्ग में बहने लगीं।
श्लोक 26 (markandeya.90.26)
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भमानसाः । बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥ 90.26 ॥
tato devagaṇāḥ sarve harṣanirbhamānasāḥ babhūvurnihate tasmin gandharvā lalitaṁ jaguḥ
तब उसके मारे जाने पर समस्त देवगण हर्ष से भरे हुए हृदय वाले हो गए, और गन्धर्वों ने मधुर गीत गाए।
श्लोक 27 (markandeya.90.27)
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः । ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥ 90.27 ॥ जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ।
avādayaṁstathaivānye nanṛtuścāpsarogaṇāḥ vavuḥ puṇyāstathā vātāḥ suprabho 'bhūddivākaraḥ jajvaluścāgnayaḥ śāntāḥ śāntā digjanitasvanāḥ
अन्य देवों ने वाद्य बजाए, अप्सराओं के समूहों ने नृत्य किया; पवित्र वायु बहने लगी, सूर्य अत्यन्त तेजस्वी हो उठा, अग्नियाँ शान्त भाव से प्रज्वलित हुईं, और दिशाओं से उठने वाला कोलाहल शान्त हो गया।