सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 89
निशुम्भ-वध
श्लोक 1 (markandeya.89.1)
राजोवाच विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम । देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम् ॥ 89.1 ॥
rājovāca vicitramidamākhyātaṁ bhagavan bhavatā mama devyāścaritamāhātmyaṁ raktabījavadhāśritam
राजा ने कहा — हे भगवन्! आपने मुझे यह विचित्र वृत्तान्त सुनाया, रक्तबीज के वध से सम्बद्ध देवी का यह महिमामय चरित्र।
श्लोक 2 (markandeya.89.2)
भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते । चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः ॥ 89.2 ॥
bhūyaścecchāmyahaṁ śrotuṁ raktabīje nipātite cakāra śumbho yatkarma niśumbhaścātikopanaḥ
मैं और भी सुनना चाहता हूँ कि रक्तबीज के गिर जाने पर शुम्भ और अत्यन्त क्रोधी निशुम्भ ने आगे क्या किया।
श्लोक 3 (markandeya.89.3)
ऋषिरुवाच चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते । शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे ॥ 89.3 ॥
ṛṣiruvāca cakāra kopamatulaṁ raktabīje nipātite śumbhāsuro niśumbhaśca hateṣvanyeṣu cāhave
ऋषि ने कहा — रक्तबीज के गिर जाने पर और युद्ध में अन्य असुरों के भी मारे जाने पर, असुर शुम्भ और निशुम्भ को अपार क्रोध हुआ।
श्लोक 4 (markandeya.89.4)
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन् । अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया ॥ 89.4 ॥
hanyamānaṁ mahāsainyaṁ vilokyāmarṣamudvahan abhyadhāvanniśumbho 'tha mukhyayāsurasenayā
अपनी विशाल सेना को इस प्रकार नष्ट होते देखकर क्रोध से भरा हुआ निशुम्भ अपनी प्रमुख असुर-सेना के साथ आगे बढ़ा।
श्लोक 5 (markandeya.89.5)
तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः । संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ॥ 89.5 ॥
tasyāgratastathā pṛṣṭhe pārśvayośca mahāsurāḥ saṁdaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kruddhā hantuṁ devīmupāyayuḥ
उसके आगे, पीछे तथा दोनों ओर महाअसुर, क्रोध से होंठ चबाते हुए, देवी का वध करने के लिए बढ़ चले।
श्लोक 6 (markandeya.89.6)
आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः । निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥ 89.6 ॥
ājagāma mahāvīryaḥ śumbho 'pi svabalairvṛtaḥ nihantuṁ caṇḍikāṁ kopātkṛtvā yuddhaṁ tu mātṛbhiḥ
अत्यन्त पराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना से घिरा हुआ, पहले मातृगणों से युद्ध करके, क्रोधपूर्वक चण्डिका का वध करने आया।
श्लोक 7 (markandeya.89.7)
ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः । शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥ 89.7 ॥
tato yuddhamatīvāsīddevyā śumbhaniśumbhayoḥ śaravarṣamatīvograṁ meghayoriva varṣatoḥ
तब देवी तथा शुम्भ-निशुम्भ के बीच अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया, मानो दो मेघ एक साथ अत्यन्त उग्र बाण-वर्षा कर रहे हों।
श्लोक 8 (markandeya.89.8)
चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः । ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥ 89.8 ॥
cicchedāstāñcharāṁstābhyāṁ caṇḍikā svaśarotkaraiḥ tāḍayāmāsa cāṅgeṣu śastraughairasureśvarau
चण्डिका ने अपने बाणों के समूह से उन दोनों के छोड़े हुए बाणों को काट डाला, और उन दोनों असुरेश्वरों के अंगों पर शस्त्रों की झड़ी लगा दी।
श्लोक 9 (markandeya.89.9)
निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम् । अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥ 89.9 ॥
niśumbho niśitaṁ khaḍgaṁ carma cādāya suprabham atāḍayanmūrdhni siṁhaṁ devyā vāhanamuttamam
निशुम्भ ने तीक्ष्ण तलवार और चमकीली ढाल लेकर देवी के श्रेष्ठ वाहन सिंह के सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 10 (markandeya.89.10)
ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम् । निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥ 89.10 ॥
tāḍite vāhane devī kṣurapreṇāsimuttamam niśumbhasyāśu ciccheda carma cāpyaṣṭacandrakam
वाहन के आहत होते ही देवी ने क्षुरप्र बाण से निशुम्भ की उस श्रेष्ठ तलवार को शीघ्र काट डाला, और आठ चन्द्राकृतियों वाली उसकी ढाल को भी काट डाला।
श्लोक 11 (markandeya.89.11)
छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः । तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥ 89.11 ॥
chinne carmaṇi khaḍge ca śaktiṁ cikṣepa so 'suraḥ tāmapyasya dvidhā cakre cakreṇābhimukhāgatām
ढाल और तलवार दोनों के कट जाने पर उस असुर ने एक शक्ति फेंकी; सामने आती हुई उस शक्ति को भी उन्होंने चक्र से दो टुकड़े कर दिया।
श्लोक 12 (markandeya.89.12)
कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः । आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥ 89.12 ॥
kopādhmāto niśumbho 'tha śūlaṁ jagrāha dānavaḥ āyātaṁ muṣṭipātena devī taccāpyacūrṇayat
तब क्रोध से उन्मत्त हुए दानव निशुम्भ ने त्रिशूल उठाया; आते ही देवी ने उसे भी मुष्टि के प्रहार से चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 13 (markandeya.89.13)
अथादाय गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति । सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥ 89.13 ॥
athādāya gadāṁ so 'pi cikṣepa caṇḍikāṁ prati sāpi devyā triśūlena bhinnā bhasmatvamāgatā
फिर गदा उठाकर उसने भी चण्डिका पर प्रहार किया; उसे भी देवी के त्रिशूल से बिंधकर भस्म हो जाना पड़ा।
श्लोक 14 (markandeya.89.14)
ततः परशुहस्तं तमायान्त दैत्यपुङ्गवम् । आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥ 89.14 ॥
tataḥ paraśuhastaṁ tamāyānta daityapuṅgavam āhatya devī bāṇaughairapātayata bhūtale
तत्पश्चात् परशु हाथ में लिए आते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ को देवी ने बाणों के समूह से आहत कर पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 15 (markandeya.89.15)
तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे । भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥ 89.15 ॥
tasminnipatite bhūmau niśumbhe bhīmavikrame bhrātaryatīva saṁkruddhaḥ prayayau hantumambikām
अत्यन्त भीषण पराक्रमी निशुम्भ को इस प्रकार भूमि पर गिरा हुआ देखकर उसका भाई अत्यन्त क्रोधित होकर अम्बिका का वध करने चल पड़ा।
श्लोक 16 (markandeya.89.16)
स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः । भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥ 89.16 ॥
sa rathasthastathātyuccairgṛhītaparamāyudhaiḥ bhujairaṣṭābhiratulairvyāpyāśeṣaṁ babhau nabhaḥ
रथ पर बैठे, अत्यन्त ऊँचे उठाए हुए श्रेष्ठ आयुधों को धारण किए उसने अपनी आठ अनुपम भुजाओं से समस्त आकाश को व्याप्त कर दिया।
श्लोक 17 (markandeya.89.17)
तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत् । ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥ 89.17 ॥
tamāyāntaṁ samālokya devī śaṅkhamavādayat jyāśabdaṁ cāpi dhanuṣaścakārātīva duḥsaham
उसे आता हुआ देखकर देवी ने शंख बजाया और अपने धनुष की प्रत्यंचा से अत्यन्त असह्य टंकार-ध्वनि उत्पन्न की।
श्लोक 18 (markandeya.89.18)
पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च । समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥ 89.18 ॥
pūrayāmāsa kakubho nijaghaṇṭāsvanena ca samastadaityasainyānāṁ tejovadhavidhāyinā
उन्होंने अपनी घण्टी की ध्वनि से भी दिशाओं को भर दिया, जो समस्त दैत्य-सेनाओं के तेज का नाश करने वाली थी।
श्लोक 19 (markandeya.89.19)
ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः । पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश ॥ 89.19 ॥
tataḥ siṁho mahānādaistyājitebhamahāmadaiḥ pūrayāmāsa gaganaṁ gāṁ tathaiva diśo daśa
तब सिंह ने भी अपने महान् गर्जनों से, जो हाथियों के मद को भी छुड़ा देते थे, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओं को भर दिया।
श्लोक 20 (markandeya.89.20)
ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत् । कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥ 89.20 ॥
tataḥ kālī samutpatya gaganaṁ kṣmāmatāḍayat karābhyāṁ tanninādena prāksvanāste tirohitāḥ
तब काली उछलकर आकाश में उठीं और अपने दोनों हाथों से पृथ्वी पर प्रहार किया, जिसकी ध्वनि से पहले के सब स्वर दब गए।
श्लोक 21 (markandeya.89.21)
अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह । तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥ 89.21 ॥
aṭṭāṭṭahāsamaśivaṁ śivadūtī cakāra ha taiḥ śabdairasurāstresuḥ śumbhaḥ kopaṁ paraṁ yayau
शिवदूती ने भी अमंगलकारी घोर अट्टहास किया; उन ध्वनियों से असुर भयभीत हो उठे और शुम्भ अत्यन्त क्रोध को प्राप्त हुआ।
श्लोक 22 (markandeya.89.22)
दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा । तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥ 89.22 ॥
durātmaṁstiṣṭha tiṣṭheti vyājahārāmbikā yadā tadā jayetyabhihitaṁ devairākāśasaṁsthitaiḥ
जब अम्बिका ने 'रुक, रुक, हे दुरात्मन्!' कहा, तब आकाश में स्थित देवताओं ने 'जय हो' कहकर उसे प्रतिध्वनित किया।
श्लोक 23 (markandeya.89.23)
शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा । आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥ 89.23 ॥
śumbhenāgatya yā śaktirmuktā jvālātibhīṣaṇā āyāntī vahnikūṭābhā sā nirastā maholkayā
शुम्भ ने आकर जो अत्यन्त भयंकर ज्वालाओं वाली, अग्निपुंज के समान आती हुई शक्ति फेंकी, उसे भी देवी ने एक विशाल उल्का से निरस्त कर दिया।
श्लोक 24 (markandeya.89.24)
सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम् । निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥ 89.24 ॥
siṁhanādena śumbhasya vyāptaṁ lokatrayāntaram nirghātaniḥsvano ghoro jitavānavanīpate
हे राजन्! शुम्भ की सिंहनाद-सी गर्जना से तीनों लोक व्याप्त हो गए, और उस घोर वज्रपात-सी ध्वनि ने विजय पा ली।
श्लोक 25 (markandeya.89.25)
शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान् । चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ 89.25 ॥
śumbhamuktāñcharāndevī śumbhastatprahitāñcharān ciccheda svaśarairugraiḥ śataśo 'tha sahasraśaḥ
शुम्भ के छोड़े बाणों को देवी ने और देवी के भेजे बाणों को शुम्भ ने, अपने-अपने उग्र बाणों से सैकड़ों-हजारों की संख्या में काट डाला।
श्लोक 26 (markandeya.89.26)
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम् । स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥ 89.26 ॥
tataḥ sā caṇḍikā kruddhā śūlenābhijaghāna tam sa tadābhihato bhūmau mūrcchito nipapāta ha
तब क्रुद्ध हुई चण्डिका ने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया; उस प्रहार से आहत होकर वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 27 (markandeya.89.27)
ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः । आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा ॥ 89.27 ॥
tato niśumbhaḥ samprāpya cetanāmāttakārmukaḥ ājaghāna śarairdevīṁ kālīṁ kesariṇaṁ tathā
तत्पश्चात् चेतना पाकर धनुष हाथ में लिए निशुम्भ ने देवी, काली तथा सिंह पर बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 28 (markandeya.89.28)
पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः । चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम् ॥ 89.28 ॥
punaśca kṛtvā bāhūnāmayutaṁ danujeśvaraḥ cakrāyudhena ditijaśchādayāmāsa caṇḍikām
उस दनुजेश्वर ने पुनः अपनी दस हजार भुजाएँ बनाकर चक्रों के अस्त्रों से चण्डिका को ढँक दिया।
श्लोक 29 (markandeya.89.29)
ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान् ॥ 89.29 ॥
tato bhagavatī kruddhā durgā durgārtināśinī ciccheda tāni cakrāṇi svaśaraiḥ sāyakāṁśca tān
तब दुःखों का नाश करने वाली भगवती दुर्गा क्रोधित होकर अपने बाणों से उन सभी चक्रों और उन तीक्ष्ण बाणों को काट डालने लगीं।
श्लोक 30 (markandeya.89.30)
ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् । अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥ 89.30 ॥
tato niśumbho vegena gadāmādāya caṇḍikām abhyadhāvata vai hantuṁ daityasenāsamāvṛtaḥ
तब निशुम्भ ने वेगपूर्वक गदा उठाकर, दैत्य-सेना से घिरा हुआ, चण्डिका का वध करने के लिए दौड़ लगाई।
श्लोक 31 (markandeya.89.31)
तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका । खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥ 89.31 ॥
tasyāpatata evāśu gadāṁ ciccheda caṇḍikā khaḍgena śitadhāreṇa sa ca śūlaṁ samādade
उसके निकट आते ही चण्डिका ने तीक्ष्ण धारवाली तलवार से उस गदा को तत्काल काट डाला; तब उसने त्रिशूल उठा लिया।
श्लोक 32 (markandeya.89.32)
शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम् । हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥ 89.32 ॥
śūlahastaṁ samāyāntaṁ niśumbhamamarārdanam hṛdi vivyādha śūlena vegāviddhena caṇḍikā
त्रिशूल हाथ में लिए, देवताओं को पीड़ा देने वाले उस आते हुए निशुम्भ के हृदय में चण्डिका ने अपने वेगयुक्त त्रिशूल से गहरा वार किया।
श्लोक 33 (markandeya.89.33)
भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः । महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥ 89.33 ॥
bhinnasya tasya śūlena hṛdayānniḥsṛto 'paraḥ mahābalo mahāvīryastiṣṭheti puruṣo vadan
उसके त्रिशूल से हृदय बिंधते ही, अत्यन्त बलशाली, महापराक्रमी एक अन्य पुरुष 'ठहरो, ठहरो' कहता हुआ उसके हृदय से निकल आया।
श्लोक 34 (markandeya.89.34)
तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः । शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद् भुवि ॥ 89.34 ॥
tasya niṣkrāmato devī prahasya svanavattataḥ śiraściccheda khaḍgena tato 'sāvapatad bhuvi
उसके इस प्रकार निकलते ही देवी ने हँसते हुए गर्जना करते हुए तलवार से उसका सिर काट डाला, और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 35 (markandeya.89.35)
ततः सिंहश्चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् । असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥ 89.35 ॥
tataḥ siṁhaścakhādograṁ daṁṣṭrākṣuṇṇaśirodharān asurāṁstāṁstathā kālī śivadūtī tathāparān
तत्पश्चात् सिंह ने दाढ़ों से गर्दनें चीरते हुए भयंकर ढंग से उन असुरों को, तथा काली और शिवदूती ने भी अन्य असुरों को भक्षण किया।
श्लोक 36 (markandeya.89.36)
कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः । ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥ 89.36 ॥
kaumārīśaktinirbhinnāḥ kecinneśurmahāsurāḥ brahmāṇīmantrapūtena toyenānye nirākṛtāḥ
कुछ महाअसुर कौमारी की शक्ति से बिंधकर नष्ट हो गए, तो कुछ ब्रह्माणी के मन्त्र-पवित्र जल से दूर हटा दिए गए।
श्लोक 37 (markandeya.89.37)
माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे । वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णोकृता भुवि ॥ 89.37 ॥
māheśvarītriśūlena bhinnāḥ petustathāpare vārāhītuṇḍaghātena keciccūrṇokṛtā bhuvi
कुछ माहेश्वरी के त्रिशूल से बिंधकर गिर पड़े, तो कुछ वाराही के थूथन के प्रहार से पृथ्वी पर चूर-चूर हो गए।
श्लोक 38 (markandeya.89.38)
खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः । वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे ॥ 89.38 ॥
khaṇḍaṁ khaṇḍaṁ ca cakreṇa vaiṣṇavyā dānavāḥ kṛtāḥ vajreṇa caindrīhastāgravimuktena tathāpare
वैष्णवी के चक्र से दानव खण्ड-खण्ड कर दिए गए, तो कुछ और ऐन्द्री के हाथ से छूटे वज्र से नष्ट किए गए।
श्लोक 39 (markandeya.89.39)
केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् । भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॥ 89.39 ॥
kecidvineśurasurāḥ kecinnaṣṭā mahāhavāt bhakṣitāścāpare kālīśivadūtīmṛgādhipaiḥ
कुछ असुर इस प्रकार नष्ट हो गए, कुछ इस महासंग्राम से भाग खड़े हुए, और कुछ को काली, शिवदूती तथा सिंहराज ने भक्षण कर लिया।