सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 88
रक्तबीज-वध
श्लोक 1 (markandeya.88.1)
ऋषिरुवाच चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते । बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥ 88.1 ॥
ṛṣiruvāca caṇḍe ca nihate daitye muṇḍe ca vinipātite bahuleṣu ca sainyeṣu kṣayiteṣvasureśvaraḥ
ऋषि ने कहा — दैत्य चण्ड के मारे जाने, मुण्ड के गिरा दिए जाने, और अधिकांश सेना के नष्ट हो जाने पर असुरों का स्वामी...
श्लोक 2 (markandeya.88.2)
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् । उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥ 88.2 ॥
tataḥ kopaparādhīnacetāḥ śumbhaḥ pratāpavān udyogaṁ sarvasainyānāṁ daityānāmādideśa ha
...वह प्रतापी शुम्भ क्रोध के वशीभूत होकर अपनी सम्पूर्ण दैत्य-सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार होने की आज्ञा देने लगा।
श्लोक 3 (markandeya.88.3)
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः । कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥ 88.3 ॥
adya sarvabalairdaityāḥ ṣaḍaśītirudāyudhāḥ kambūnāṁ caturaśītirniryāntu svabalairvṛtāḥ
'आज छियासी दैत्य अपनी-अपनी सेनाओं सहित शस्त्र उठाकर निकलें; चौरासी कम्बु भी अपने-अपने बल के साथ प्रस्थान करें।'
श्लोक 4 (markandeya.88.4)
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै । शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥ 88.4 ॥
koṭivīryāṇi pañcāśadasurāṇāṁ kulāni vai śataṁ kulāni dhaumrāṇāṁ nirgacchantu mamājñayā
'करोड़ों के बल वाले असुरों के पचास कुल तथा धौम्रों के सौ कुल मेरी आज्ञा से निकलें।'
श्लोक 5 (markandeya.88.5)
कालका दौर्हृदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः । युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥ 88.5 ॥
kālakā daurhṛdā mauryāḥ kālakeyāstathāsurāḥ yuddhāya sajjā niryāntu ājñayā tvaritā mama
'कालक, दौर्हृद, मौर्य तथा कालकेय असुर युद्ध के लिए सुसज्जित होकर मेरी आज्ञा से शीघ्र प्रस्थान करें।'
श्लोक 6 (markandeya.88.6)
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः । निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥ 88.6 ॥
ityājñāpyāsurapatiḥ śumbho bhairavaśāsanaḥ nirjagāma mahāsainyasahasrairbahubhirvṛtaḥ
ऐसी आज्ञा देकर भयंकर शासनवाला असुरपति शुम्भ अनेक सहस्रों महासेनाओं से घिरा हुआ प्रस्थान कर गया।
श्लोक 7 (markandeya.88.7)
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम् । ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥ 88.7 ॥
āyāntaṁ caṇḍikā dṛṣṭvā tatsainyamatibhīṣaṇam jyāsvanaiḥ pūrayāmāsa dharaṇīgaganāntaram
उस अत्यन्त भयंकर आती हुई सेना को देखकर चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार से आकाश और पृथ्वी के बीच के स्थान को भर दिया।
श्लोक 8 (markandeya.88.8)
स च सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप । घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चाप्यबृंहयत् ॥ 88.8 ॥
sa ca siṁho mahānādamatīva kṛtavān nṛpa ghaṇṭāsvanena tannādamambikā cāpyabṛṁhayat
हे राजन्! उस सिंह ने भी अत्यन्त महान् गर्जना की, और अम्बिका ने अपनी घण्टी की ध्वनि से उस गर्जना को और बढ़ा दिया।
श्लोक 9 (markandeya.88.9)
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा । निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥ 88.9 ॥
dhanurjyāsiṁhaghaṇṭānāṁ nādāpūritadiṅmukhā ninādairbhīṣaṇaiḥ kālī jigye vistāritānanā
धनुष की टंकार, सिंह की गर्जना और घण्टी के नाद से समस्त दिशाएँ भर गईं; उन सबको काली की भीषण गर्जनाओं ने अपने विस्तृत मुख से पराजित कर दिया।
श्लोक 10 (markandeya.88.10)
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम् । देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥ 88.10 ॥
taṁ ninādamupaśrutya daityasainyaiścaturdiśam devī siṁhastathā kālī saroṣaiḥ parivāritāḥ
उस गर्जना को सुनकर दैत्यों की सेनाओं ने चारों दिशाओं से देवी, सिंह तथा काली को क्रोधपूर्वक घेर लिया।
श्लोक 11 (markandeya.88.11)
एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम् । भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥ 88.11 ॥
etasminnantare bhūpa vināśāya suradviṣām bhavāyāmarasiṁhānāmativīryabalānvitāḥ
हे राजन्! इसी बीच, देवताओं के शत्रुओं के विनाश और श्रेष्ठ देवताओं के कल्याण के लिए, अतुलनीय पराक्रम और बल से सम्पन्न...
श्लोक 12 (markandeya.88.12)
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः । शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥ 88.12 ॥
brahmeśaguhaviṣṇūnāṁ tathendrasya ca śaktayaḥ śarīrebhyo viniṣkramya tadrūpaiścaṇḍikāṁ yayuḥ
...ब्रह्मा, ईशान, गुह (कार्तिकेय) तथा विष्णु और इन्द्र की शक्तियाँ उनके अपने शरीरों से निकलकर उन्हीं के रूप में चण्डिका के पास गईं।
श्लोक 13 (markandeya.88.13)
यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम् । तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥ 88.13 ॥
yasya devasya yadrūpaṁ yathābhūṣaṇavāhanam tadvadeva hi tacchaktirasurān yoddhumāyayau
जिस देवता का जैसा रूप, आभूषण और वाहन था, उसकी शक्ति भी ठीक उसी रूप में असुरों से युद्ध करने आई।
श्लोक 14 (markandeya.88.14)
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः । आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥ 88.14 ॥
haṁsayuktavimānāgre sākṣasūtrakamaṇḍaluḥ āyātā brahmaṇaḥ śaktirbrahmāṇī sābhidhīyate
हंसों से युक्त विमान के आगे बैठी, अक्षमाला और कमण्डलु धारण किए हुए, ब्रह्मा की शक्ति आईं, जो 'ब्रह्माणी' कहलाती हैं।
श्लोक 15 (markandeya.88.15)
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी । महाहिवलया प्राप्ता चन्द्रलेखाविभूषणा ॥ 88.15 ॥
māheśvarī vṛṣārūḍhā triśūlavaradhāriṇī mahāhivalayā prāptā candralekhāvibhūṣaṇā
वृषभ पर आरूढ़, श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करने वाली, महासर्प का कंकण पहने तथा चन्द्ररेखा से विभूषित माहेश्वरी प्राप्त हुईं।
श्लोक 16 (markandeya.88.16)
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना । योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥ 88.16 ॥
kaumārī śaktihastā ca mayūravaravāhanā yoddhumabhyāyayau daityānambikā guharūpiṇī
हाथ में शक्ति लिए, श्रेष्ठ मयूर पर सवार, गुह के ही रूप में अम्बिका कौमारी दैत्यों से युद्ध करने आईं।
श्लोक 17 (markandeya.88.17)
तथैव वैष्णावी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता । शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥ 88.17 ॥
tathaiva vaiṣṇāvī śaktirgaruḍopari saṁsthitā śaṅkhacakragadāśārṅgakhaḍgahastābhyupāyayau
उसी प्रकार गरुड़ पर विराजमान वैष्णवी शक्ति भी शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष तथा खड्ग हाथों में लिए हुए वहाँ आ पहुँचीं।
श्लोक 18 (markandeya.88.18)
जज्ञे वाराहमतुलं रूपं या बिभ्रती हरेः । शक्तिः साप्यायौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥ 88.18 ॥
jajñe vārāhamatulaṁ rūpaṁ yā bibhratī hareḥ śaktiḥ sāpyāyau tatra vārāhīṁ bibhratī tanum
श्री हरि का जो अनुपम यज्ञवाराह-रूप प्रकट हुआ था, उसी की शक्ति भी वाराही का शरीर धारण करके वहाँ पहुँचीं।
श्लोक 19 (markandeya.88.19)
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः । प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥ 88.19 ॥
nārasiṁhī nṛsiṁhasya bibhratī sadṛśaṁ vapuḥ prāptā tatra saṭākṣepakṣiptanakṣatrasaṁhatiḥ
नृसिंह के समान रूप धारण किए हुए नारसिंही भी वहाँ पहुँचीं, जिनके अयाल हिलाने मात्र से तारागण बिखर जाते थे।
श्लोक 20 (markandeya.88.20)
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता । प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥ 88.20 ॥
vajrahastā tathaivaindrī gajarājopari sthitā prāptā sahasranayanā yathā śakrastathaiva sā
उसी प्रकार वज्रधारिणी ऐन्द्री गजराज पर बैठी हुई प्राप्त हुईं, जो सहस्र नेत्रों वाली साक्षात् इन्द्र के समान ही थीं।
श्लोक 21 (markandeya.88.21)
ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः । हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽह चण्डिकाम् ॥ 88.21 ॥
tataḥ parivṛtastābhirīśāno devaśaktibhiḥ hanyantāmasurāḥ śīghraṁ mama prītyā 'ha caṇḍikām
तब उन देवशक्तियों से घिरे हुए ईशान ने चण्डिका से कहा — 'मेरी प्रसन्नता के लिए असुरों का शीघ्र वध किया जाए।'
श्लोक 22 (markandeya.88.22)
ततो देव्याः शरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा । चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥ 88.22 ॥
tato devyāḥ śarīrāttu viniṣkrāntātibhīṣaṇā caṇḍikāśaktiratyugrā śivāśataninādinī
तत्पश्चात् देवी के अपने शरीर से एक अत्यन्त भीषण, उग्र चण्डिका-शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों सियारों-सी गर्जना करती थी।
श्लोक 23 (markandeya.88.23)
सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता । दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ 88.23 ॥
sā cāha dhūmrajaṭilamīśānamaparājitā dūta tvaṁ gaccha bhagavan pārśvaṁ śumbhaniśumbhayoḥ
उस अपराजिता ने धूम्रजटाधारी ईशान से कहा — 'हे भगवन्! आप दूत बनकर शुम्भ और निशुम्भ के पास जाइए।'
श्लोक 24 (markandeya.88.24)
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ । ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥ 88.24 ॥
brūhi śumbhaṁ niśumbhaṁ ca dānavāvatigarvitau ye cānye dānavāstatra yuddhāya samupasthitāḥ
'अत्यन्त घमण्डी दानवों शुम्भ और निशुम्भ से, तथा वहाँ युद्ध के लिए उपस्थित अन्य सभी दानवों से कहिए —'
श्लोक 25 (markandeya.88.25)
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः । यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥ 88.25 ॥
trailokyamindro labhatāṁ devāḥ santu havirbhujaḥ yūyaṁ prayāta pātālaṁ yadi jīvitumicchatha
'त्रिलोक इन्द्र को प्राप्त हो, देवता फिर से हविष्य भोगें; और यदि तुम जीना चाहते हो तो पाताल चले जाओ।'
श्लोक 26 (markandeya.88.26)
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः । तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥ 88.26 ॥
balāvalepādatha cedbhavanto yuddhakāṅkṣiṇaḥ tadāgacchata tṛpyantu macchivāḥ piśitena vaḥ
'किन्तु यदि बल के अभिमान में तुम अब भी युद्ध की कामना रखते हो, तो आओ — मेरी सियारिनें तुम्हारे मांस से तृप्त हों।'
श्लोक 27 (markandeya.88.27)
यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम् । शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥ 88.27 ॥
yato niyukto dautyena tayā devyā śivaḥ svayam śivadūtīti loke 'smiṁstataḥ sā khyātimāgatā
चूँकि उस देवी ने स्वयं शिव को दूत के रूप में नियुक्त किया, इसलिए वे संसार में 'शिवदूती' के नाम से विख्यात हुईं।
श्लोक 28 (markandeya.88.28)
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः । अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता ॥ 88.28 ॥
te 'pi śrutvā vaco devyāḥ śarvākhyātaṁ mahāsurāḥ amarṣāpūritā jagmuryatra kātyāyanī sthitā
शर्व (शिव) द्वारा कहे गए देवी के वे वचन सुनकर वे महाअसुर भी क्रोध से भरकर वहाँ गए, जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं।
श्लोक 29 (markandeya.88.29)
ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः । ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥ 88.29 ॥
tataḥ prathamamevāgre śaraśaktyṛṣṭivṛṣṭibhiḥ vavarṣuruddhatāmarṣāstāṁ devīmamarārayaḥ
तब सबसे पहले देवताओं के उन शत्रुओं ने उद्धत क्रोध से भरकर देवी पर बाणों, शक्तियों और भालों की वर्षा की।
श्लोक 30 (markandeya.88.30)
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् । चिच्छेद लीलयाऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥ 88.30 ॥
sā ca tān prahitān bāṇāñchūlaśaktiparaśvadhān ciccheda līlayā 'dhmātadhanurmuktairmaheṣubhiḥ
और उन्होंने अपने खींचे हुए धनुष से छोड़े गए महान् बाणों द्वारा लीलामात्र में उन फेंके गए बाणों, त्रिशूलों, शक्तियों तथा फरसों को काट डाला।
श्लोक 31 (markandeya.88.31)
तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान् । खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा ॥ 88.31 ॥
tasyāgratastathā kālī śūlapātavidāritān khaṭvāṅgapothitāṁścārīn kurvatī vyacarattadā
उनके आगे-आगे काली भी त्रिशूल के प्रहार से शत्रुओं को चीरती और खट्वांग से कुचलती हुई विचरण करने लगीं।
श्लोक 32 (markandeya.88.32)
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः । ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ॥ 88.32 ॥
kamaṇḍalujalākṣepahatavīryān hataujasaḥ brahmāṇī cākarocchatrūn yena yena sma dhāvati
ब्रह्माणी जिस-जिस ओर दौड़तीं, वहीं अपने कमण्डलु के जल के छिड़काव मात्र से शत्रुओं का बल और तेज हर लेतीं।
श्लोक 33 (markandeya.88.33)
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी । दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना ॥ 88.33 ॥
māheśvarī triśūlena tathā cakreṇa vaiṣṇavī daityāñjaghāna kaumārī tathā śaktyātikopanā
माहेश्वरी ने त्रिशूल से, वैष्णवी ने चक्र से, तथा अत्यन्त क्रोधित कौमारी ने शक्ति से दैत्यों का वध किया।
श्लोक 34 (markandeya.88.34)
ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः । पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥ 88.34 ॥
aindrīkuliśapātena śataśo daityadānavāḥ peturvidāritāḥ pṛthvyāṁ rudhiraughapravarṣiṇaḥ
ऐन्द्री के वज्र-प्रहार से सैकड़ों दैत्य-दानव विदीर्ण होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, रक्त की धाराएँ बहाते हुए।
श्लोक 35 (markandeya.88.35)
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः । वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥ 88.35 ॥
tuṇḍaprahāravidhvastā daṁṣṭrāgrakṣatavakṣasaḥ vārāhamūrtyā nyapataṁścakreṇa ca vidāritāḥ
थूथन के प्रहार से चूर-चूर, दाढ़ों की नोक से छाती फटी हुई, कुछ वाराही की मूर्ति से गिरा दिए गए, तो कुछ चक्र से विदीर्ण हुए।
श्लोक 36 (markandeya.88.36)
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् । नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगन्तरा ॥ 88.36 ॥
nakhairvidāritāṁścānyān bhakṣayantī mahāsurān nārasiṁhī cacārājau nādāpūrṇadigantarā
नखों से विदीर्ण अन्य महाअसुरों को भक्षण करती हुई नारसिंही अपनी गर्जना से दिशाओं को भरते हुए रणभूमि में विचरण करने लगीं।
श्लोक 37 (markandeya.88.37)
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः । पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥ 88.37 ॥
caṇḍāṭṭahāsairasurāḥ śivadūtyabhidūṣitāḥ petuḥ pṛthivyāṁ patitāṁstāṁścakhādātha sā tadā
शिवदूती के भयंकर अट्टहास से पीड़ित असुर पृथ्वी पर गिर पड़ते; और वे उन गिरे हुओं को उसी समय भक्षण कर लेतीं।
श्लोक 38 (markandeya.88.38)
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान् । दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥ 88.38 ॥
iti mātṛgaṇaṁ kruddhaṁ mardayantaṁ mahāsurān dṛṣṭvābhyupāyairvividhairneśurdevārisainikāḥ
इस प्रकार मातृगणों को क्रोधपूर्वक महाअसुरों को कुचलते देखकर देवताओं के शत्रुओं की सेनाएँ विविध उपायों से भाग खड़ी हुईं।
श्लोक 39 (markandeya.88.39)
पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान् । योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥ 88.39 ॥
palāyanaparān dṛṣṭvā daityān mātṛgaṇārditān yoddhumabhyāyayau kruddho raktabījo mahāsuraḥ
मातृगणों से पीड़ित होकर भागते हुए दैत्यों को देखकर महाअसुर रक्तबीज क्रोधपूर्वक युद्ध करने आगे बढ़ा।
श्लोक 40 (markandeya.88.40)
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः । समुत्पतति मेदिन्यां तत्प्रमाणो महासुरः ॥ 88.40 ॥
raktabinduryadā bhūmau patatyasya śarīrataḥ samutpatati medinyāṁ tatpramāṇo mahāsuraḥ
उसके शरीर से जब भी रक्त की एक बूँद पृथ्वी पर गिरती, उसी क्षण उतने ही आकार का एक महाअसुर पृथ्वी से उत्पन्न हो जाता।
श्लोक 41 (markandeya.88.41)
युयुधे स गदापाणिपरिन्द्रशक्त्या महासुरः । ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥ 88.41 ॥
yuyudhe sa gadāpāṇiparindraśaktyā mahāsuraḥ tataścaindrī svavajreṇa raktabījamatāḍayat
गदा हाथ में लिए वह महाअसुर इन्द्र की शक्ति (ऐन्द्री) से युद्ध करने लगा; तब ऐन्द्री ने अपने वज्र से रक्तबीज पर प्रहार किया।
श्लोक 42 (markandeya.88.42)
कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम् । समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥ 88.42 ॥
kuliśenāhatasyāśu bahu susrāva śoṇitam samuttasthustato yodhāstadrūpāstatparākramāḥ
वज्र से आहत होते ही उसका रक्त तेजी से बहने लगा, और उसी से उसके समान रूप और पराक्रमवाले अनेक योद्धा उठ खड़े हुए।
श्लोक 43 (markandeya.88.43)
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः । तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥ 88.43 ॥
yāvantaḥ patitāstasya śarīrādraktabindavaḥ tāvantaḥ puruṣā jātāstadvīryabalavikramāḥ
उसके शरीर से जितनी रक्त-बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उसके समान वीर्य, बल और पराक्रम से युक्त होकर उत्पन्न हो गए।
श्लोक 44 (markandeya.88.44)
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः । समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥ 88.44 ॥
te cāpi yuyudhustatra puruṣā raktasambhavāḥ samaṁ mātṛbhiratyugraśastrapātātibhīṣaṇam
रक्त से उत्पन्न वे पुरुष भी वहाँ मातृगणों के साथ अत्यन्त उग्र शस्त्र-प्रहारों से भयंकर बना हुआ युद्ध करने लगे।
श्लोक 45 (markandeya.88.45)
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा । ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥ 88.45 ॥
punaśca vajrapātena kṣatamasya śiro yadā vavāha raktaṁ puruṣāstato jātāḥ sahasraśaḥ
फिर जब वज्र के प्रहार से उसका सिर घायल हुआ, तब बहते रक्त से सहस्रों पुरुष और उत्पन्न हो गए।
श्लोक 46 (markandeya.88.46)
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह । गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥ 88.46 ॥
vaiṣṇavī samare cainaṁ cakreṇābhijaghāna ha gadayā tāḍayāmāsa aindrī tamasureśvaram
वैष्णवी ने युद्ध में उसे चक्र से मारा, और ऐन्द्री ने उस असुरेश्वर को गदा से आहत किया।
श्लोक 47 (markandeya.88.47)
वैष्णावीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः । सहस्रशौ जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥ 88.47 ॥
vaiṣṇāvīcakrabhinnasya rudhirasrāvasambhavaiḥ sahasraśau jagadvyāptaṁ tatpramāṇairmahāsuraiḥ
वैष्णवी के चक्र से बिंधे हुए उसके रक्त-प्रवाह से उत्पन्न, उसी आकार के सहस्रों महाअसुरों से समस्त जगत् व्याप्त हो गया।
श्लोक 48 (markandeya.88.48)
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना । माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥ 88.48 ॥
śaktyā jaghāna kaumārī vārāhī ca tathāsinā māheśvarī triśūlena raktabījaṁ mahāsuram
कौमारी ने शक्ति से, वाराही ने तलवार से, तथा माहेश्वरी ने त्रिशूल से महाअसुर रक्तबीज पर प्रहार किया।
श्लोक 49 (markandeya.88.49)
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक् । मातः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥ 88.49 ॥
sa cāpi gadayā daityaḥ sarvā evāhanat pṛthak mātaḥ kopasamāviṣṭo raktabījo mahāsuraḥ
और वह दैत्य रक्तबीज भी क्रोध से भरकर गदा से उन सभी माताओं में से प्रत्येक पर पृथक्-पृथक् प्रहार करने लगा।
श्लोक 50 (markandeya.88.50)
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि । पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥ 88.50 ॥
tasyāhatasya bahudhā śaktiśūlādibhirbhuvi papāta yo vai raktaughastenāsañchataśo 'surāḥ
उनकी शक्तियों, त्रिशूलों आदि से बार-बार आहत होकर उसके शरीर से जो रक्त की धारा पृथ्वी पर गिरी, उससे सैकड़ों असुर उत्पन्न हो गए।
श्लोक 51 (markandeya.88.51)
तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत् । व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥ 88.51 ॥
taiścāsurāsṛksambhūtairasuraiḥ sakalaṁ jagat vyāptamāsīttato devā bhayamājagmuruttamam
उस असुर के रक्त से उत्पन्न उन असुरों से सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया, जिसे देखकर देवता अत्यन्त भय को प्राप्त हुए।
श्लोक 52 (markandeya.88.52)
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा । उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ॥ 88.52 ॥
tān viṣaṇṇān surān dṛṣṭvā caṇḍikā prāha satvarā uvāca kālīṁ cāmuṇḍe vistīrṇaṁ vadanaṁ kuru
उन खिन्न देवताओं को देखकर चण्डिका ने तुरन्त काली से कहा — 'हे चामुण्डे! अपना मुख विस्तृत करो।'
श्लोक 53 (markandeya.88.53)
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून् महासुरान् । रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥ 88.53 ॥
macchastrapātasambhūtān raktabindūn mahāsurān raktabindoḥ pratīccha tvaṁ vaktreṇānena veginā
'मेरे शस्त्रों के प्रहार से रक्तबीज के रक्त-बिन्दुओं से उत्पन्न इन महाअसुरों को तुम इसी वेगवान मुख से ग्रहण करो।'
श्लोक 54 (markandeya.88.54)
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान् महासुरान् । एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति । भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे ॥ 88.54 ॥
bhakṣayantī cara raṇe tadutpannān mahāsurān evameṣa kṣayaṁ daityaḥ kṣīṇarakto gamiṣyati bhakṣyamāṇāstvayā cogrā na cotpatsyanti cāpare
'उससे उत्पन्न उन महाअसुरों को भक्षण करती हुई रणभूमि में विचरण करो; इस प्रकार यह दैत्य रक्तहीन होकर क्षय को प्राप्त होगा। तुम्हारे द्वारा भक्षण किए जाने पर ये उग्र असुर फिर उत्पन्न नहीं होंगे।'
श्लोक 55 (markandeya.88.55)
ऋषिरुवाच इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् । मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम् ॥ 88.55 ॥
ṛṣiruvāca ityuktvā tāṁ tato devī śūlenābhijaghāna tam mukhena kālī jagṛhe raktabījasya śoṇitam
ऋषि ने कहा — यह कहकर देवी ने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया, और काली ने अपने मुख से रक्तबीज का रक्त ग्रहण कर लिया।
श्लोक 56 (markandeya.88.56)
ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् । न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि ॥ 88.56 ॥
tato 'sāvājaghānātha gadayā tatra caṇḍikām na cāsyā vedanāṁ cakre gadāpāto 'lpikāmapi
तब उसने भी गदा से चण्डिका पर प्रहार किया, किन्तु उस गदा के आघात से उन्हें तनिक भी पीड़ा नहीं हुई।
श्लोक 57 (markandeya.88.57)
तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् । यतस्ततः स्ववक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति ॥ 88.57 ॥
tasyāhatasya dehāttu bahu susrāva śoṇitam yatastataḥ svavaktreṇa cāmuṇḍā sampratīcchati
उस आहत रक्तबीज के शरीर से जहाँ-जहाँ से रक्त बहुत अधिक बहता, वहीं-वहीं से चामुण्डा अपने मुख से उसे ग्रहण कर लेतीं।
श्लोक 58 (markandeya.88.58)
मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः । तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ॥ 88.58 ॥
mukhe samudgatā ye 'syā raktapātānmahāsurāḥ tāṁścakhādātha cāmuṇḍā papau tasya ca śoṇitam
उसके गिरते रक्त से उनके मुख में जो-जो महाअसुर उत्पन्न होते, चामुण्डा उन्हें भी भक्षण कर लेतीं और उसका रक्त भी पी जातीं।
श्लोक 59 (markandeya.88.59)
देवी शूलेन चक्रेण बाणैरसिभिरृष्टिभिः । जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ॥ 88.59 ॥
devī śūlena cakreṇa bāṇairasibhirṛṣṭibhiḥ jaghāna raktabījaṁ taṁ cāmuṇḍāpītaśoṇitam
जिसका रक्त चामुण्डा द्वारा पी लिया गया था, उस रक्तबीज पर देवी ने त्रिशूल, चक्र, बाणों, तलवार और भाले से प्रहार किया।
श्लोक 60 (markandeya.88.60)
स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसंहतितो हतः । नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ॥ 88.60 ॥
sa papāta mahīpṛṣṭhe śastrasaṁhatito hataḥ nīraktaśca mahīpāla raktabījo mahāsuraḥ
हे भूपाल! शस्त्रों के समूह से आहत होकर वह महाअसुर रक्तबीज रक्तहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 61 (markandeya.88.61)
ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप । तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥ 88.61 ॥
tataste harṣamatulamavāpustridaśā nṛpa teṣāṁ mātṛgaṇo jāto nanartāsṛṅmadoddhataḥ
हे राजन्! तब देवताओं को अपार हर्ष प्राप्त हुआ, और मातृगण रक्त के मद से उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे।