सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 87
चण्ड-मुण्ड-वध
श्लोक 1 (markandeya.87.1)
ऋषिरुवाच आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः । चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः ॥ 87.1 ॥
ṛṣiruvāca ājñaptāste tato daityāścaṇḍamuṇḍapurogamāḥ caturaṅgabalopetā yayurabhyudyatāyudhāḥ
ऋषि ने कहा — आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड के नेतृत्व में वे दैत्य चतुरंगिणी सेना सहित शस्त्र उठाए वहाँ से चल पड़े।
श्लोक 2 (markandeya.87.2)
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम् । सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने ॥ 87.2 ॥
dadṛśuste tato devīmīṣaddhāsāṁ vyavasthitām siṁhasyopari śailendraśṛṅge mahati kāñcane
वहाँ उन्होंने देवी को सुवर्णमय पर्वत-शिखर पर सिंह के ऊपर, मन्द मुस्कान लिए हुए विराजमान देखा।
श्लोक 3 (markandeya.87.3)
ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः । आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये सत्समीपगाः ॥ 87.3 ॥
te dṛṣṭvā tāṁ samādātumudyamaṁ cakrurudyatāḥ ākṛṣṭacāpāsidharāstathānye satsamīpagāḥ
उसे देखकर वे उसे पकड़ लेने के लिए उद्यत हो गए — कुछ धनुष-बाण और तलवार ताने हुए, तो कुछ उसके निकट पहुँचे हुए।
श्लोक 4 (markandeya.87.4)
ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति । कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा ॥ 87.4 ॥
tataḥ kopaṁ cakāroccairambikā tānarīn prati kopena cāsyā vadanaṁ maṣīvarṇamabhūttadā
तब अम्बिका उन शत्रुओं पर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठीं, और क्रोध के कारण उनका मुख स्याही के समान काला पड़ गया।
श्लोक 5 (markandeya.87.5)
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद् द्रुतम् । काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी ॥ 87.5 ॥
bhrukuṭīkuṭilāttasyā lalāṭaphalakād drutam kālī karālavadanā viniṣkrāntāsipāśinī
उनके भृकुटि-कुटिल ललाट से अचानक भयंकर मुखवाली काली प्रकट हुईं, जो खड्ग और पाश धारण किए हुए थीं।
श्लोक 6 (markandeya.87.6)
विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा । द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा ॥ 87.6 ॥
vicitrakhaṭvāṅgadharā naramālāvibhūṣaṇā dvīpicarmaparīdhānā śuṣkamāṁsātibhairavā
वे विचित्र खट्वांग धारण किए, नरमुण्डों की माला से विभूषित, व्याघ्रचर्म पहने, सूखे मांसवाली अत्यन्त भयानक थीं।
श्लोक 7 (markandeya.87.7)
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा । निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥ 87.7 ॥
ativistāravadanā jihvālalanabhīṣaṇā nimagnāraktanayanā nādāpūritadiṅmukhā
उनका मुख अत्यन्त विस्तृत था, लपलपाती जीभ से भयानक, आँखें धँसी हुई और लाल थीं, तथा गर्जना से समस्त दिशाएँ भर जाती थीं।
श्लोक 8 (markandeya.87.8)
सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान् । सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्वलम् ॥ 87.8 ॥
sā vegenābhipatitā ghātayantī mahāsurān sainye tatra surārīṇāmabhakṣayata tadvalam
वे वेगपूर्वक टूट पड़ीं और महाअसुरों का वध करती हुई देवताओं के उन शत्रुओं की सेना को वहीं भक्षण करने लगीं।
श्लोक 9 (markandeya.87.9)
पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहि योधघण्टासमन्वितान् । समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥ 87.9 ॥
pārṣṇigrāhāṅkuśagrāhi yodhaghaṇṭāsamanvitān samādāyaikahastena mukhe cikṣepa vāraṇān
हाथियों को उनके अंकुशधारी सवारों, योद्धाओं और घण्टियों सहित एक ही हाथ से पकड़कर उन्होंने अपने मुख में डाल लिया।
श्लोक 10 (markandeya.87.10)
तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह । निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम् ॥ 87.10 ॥
tathaiva yodhaṁ turagai rathaṁ sārathinā saha nikṣipya vaktre daśanaiścarvayantyatibhairavam
उसी प्रकार घोड़ों सहित योद्धा को और सारथि सहित रथ को मुख में डालकर वे अत्यन्त भयंकर ढंग से दाँतों से चबाने लगीं।
श्लोक 11 (markandeya.87.11)
एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम् । पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत् ॥ 87.11 ॥
ekaṁ jagrāha keśeṣu grīvāyāmatha cāparam pādenākramya caivānyamurasānyamapothayat
उन्होंने एक को केशों से, दूसरे को गर्दन से पकड़ लिया; तीसरे को पैर से रौंदा और चौथे को छाती से कुचल डाला।
श्लोक 12 (markandeya.87.12)
तैर्मुक्तानि च शस्त्रणि महास्त्राणि तथासुरैः । मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि ॥ 87.12 ॥
tairmuktāni ca śastraṇi mahāstrāṇi tathāsuraiḥ mukhena jagrāha ruṣā daśanairmathitānyapi
उन असुरों द्वारा छोड़े गए शस्त्रों और महान अस्त्रों को उन्होंने क्रोधपूर्वक मुख में पकड़ लिया और दाँतों से ही चूर-चूर कर डाला।
श्लोक 13 (markandeya.87.13)
बलिनां तद्बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् । ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा ॥ 87.13 ॥
balināṁ tadbalaṁ sarvamasurāṇāṁ durātmanām mamardābhakṣayaccānyānanyāṁścātāḍayattathā
उन दुरात्मा और बलशाली असुरों की सम्पूर्ण सेना को उन्होंने कुचल डाला — किन्हीं को भक्षण किया, किन्हीं को मार गिराया।
श्लोक 14 (markandeya.87.14)
असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः । जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहता रणे ॥ 87.14 ॥
asinā nihatāḥ kecitkecitkhaṭvāṅgatāḍitāḥ jagmurvināśamasurā dantāgrābhihatā raṇe
कुछ असुर तलवार से मारे गए, कुछ खट्वांग के प्रहार से, और कुछ रणभूमि में उनके दाँतों की नोक से आहत होकर विनष्ट हो गए।
श्लोक 15 (markandeya.87.15)
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां निपातितम् । दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ॥ 87.15 ॥
kṣaṇena tanmahāsainyamasurāṇāṁ nipātitam dṛṣṭvā caṇḍo 'bhidudrāva tāṁ kālīmatibhīṣaṇām
एक ही क्षण में असुरों की उस विशाल सेना को धराशायी देखकर चण्ड उस अत्यन्त भयंकर काली की ओर दौड़ा।
श्लोक 16 (markandeya.87.16)
शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः । छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः ॥ 87.16 ॥
śaravarṣairmahābhīmairbhīmākṣīṁ tāṁ mahāsuraḥ chādayāmāsa cakraiśca muṇḍaḥ kṣiptaiḥ sahasraśaḥ
उस महाअसुर मुण्ड ने अत्यन्त भीषण बाणों की वर्षा से और सहस्रों फेंके गए चक्रों से उस भयंकर-नेत्रा काली को ढँक दिया।
श्लोक 17 (markandeya.87.17)
तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम् । बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम् ॥ 87.17 ॥
tāni cakrāṇyanekāni viśamānāni tanmukham babhuryathārkabimbāni subahūni ghanodaram
उसके मुख में समाते हुए वे अनेक चक्र ऐसे प्रतीत होते थे मानो सूर्य के अनेक बिम्ब किसी घने बादल के भीतर समा रहे हों।
श्लोक 18 (markandeya.87.18)
ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी । काली करालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥ 87.18 ॥
tato jahāsātiruṣā bhīmaṁ bhairavanādinī kālī karālavaktrāntardurdarśadaśanojjvalā
तब भयंकर गर्जना करनेवाली काली, जिनका विकराल मुख दुर्दर्शनीय दाँतों से चमक रहा था, अत्यन्त क्रोधपूर्वक भीषण अट्टहास करने लगीं।
श्लोक 19 (markandeya.87.19)
उत्थाय च महासिंहं देवी चण्डमधावत । गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥ 87.19 ॥
utthāya ca mahāsiṁhaṁ devī caṇḍamadhāvata gṛhītvā cāsya keśeṣu śirastenāsinācchinat
अपने महासिंह पर सवार होकर देवी चण्ड की ओर दौड़ीं; उसके केश पकड़कर उन्होंने उसी तलवार से उसका सिर काट डाला।
श्लोक 20 (markandeya.87.20)
छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रश्चक्रे नादं सुभैरवम् । तेन नादेन महता त्रासितं भुवनत्रयम् ॥ 87.20 ॥
chinne śirasi daityendraścakre nādaṁ subhairavam tena nādena mahatā trāsitaṁ bhuvanatrayam
सिर कटते ही उस दैत्येन्द्र ने अत्यन्त भयंकर चीत्कार किया, जिस महान् चीत्कार से तीनों लोक भयभीत हो उठे।
श्लोक 21 (markandeya.87.21)
अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । तमप्यपातयद् भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा ॥ 87.21 ॥
atha muṇḍo 'bhyadhāvattāṁ dṛṣṭvā caṇḍaṁ nipātitam tamapyapātayad bhūmau sā khaḍgābhihataṁ ruṣā
चण्ड को गिरा हुआ देखकर मुण्ड उनकी ओर दौड़ा; उसे भी उन्होंने क्रोधपूर्वक तलवार से आहत कर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 22 (markandeya.87.22)
हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ॥ 87.22 ॥
hataśeṣaṁ tataḥ sainyaṁ dṛṣṭvā caṇḍaṁ nipātitam muṇḍaṁ ca sumahāvīryaṁ diśo bheje bhayāturam
चण्ड को गिरा हुआ और महापराक्रमी मुण्ड को भी मारा गया देखकर, शेष बची सेना भय से आतुर होकर दिशाओं में भाग गई।
श्लोक 23 (markandeya.87.23)
शिरञ्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च । प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ॥ 87.23 ॥
śirañcaṇḍasya kālī ca gṛhītvā muṇḍameva ca prāha pracaṇḍāṭṭahāsamiśramabhyetya caṇḍikām
तब काली चण्ड और मुण्ड दोनों के सिर लेकर, प्रचण्ड अट्टहास मिश्रित वाणी में चण्डिका के पास आकर बोलीं।
श्लोक 24 (markandeya.87.24)
मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू । युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥ 87.24 ॥
mayā tavātropahṛtau caṇḍamuṇḍau mahāpaśū yuddhayajñe svayaṁ śumbhaṁ niśumbhaṁ ca haniṣyasi
'मैंने यहाँ आपको चण्ड और मुण्ड नामक दो महापशु भेंट किए हैं; अब युद्धरूपी यज्ञ में आप स्वयं शुम्भ और निशुम्भ का वध करेंगी।'
श्लोक 25 (markandeya.87.25)
ऋषिरुवाच तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ । उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥ 87.25 ॥
ṛṣiruvāca tāvānītau tato dṛṣṭvā caṇḍamuṇḍau mahāsurau uvāca kālīṁ kalyāṇī lalitaṁ caṇḍikā vacaḥ
ऋषि ने कहा — चण्ड और मुण्ड नामक उन दोनों महाअसुरों को इस प्रकार लाया गया देखकर कल्याणस्वरूपा चण्डिका ने काली से मधुर वचन कहे।
श्लोक 26 (markandeya.87.26)
श्रीदेव्युवाच यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता । चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥ 87.26 ॥
śrīdevyuvāca yasmāccaṇḍaṁ ca muṇḍaṁ ca gṛhītvā tvamupāgatā cāmuṇḍeti tato loke khyātā devi bhaviṣyasi
श्री देवी ने कहा — 'तूने स्वयं चण्ड और मुण्ड को पकड़कर मेरे पास लाया है, इसलिए हे देवी, संसार में तू 'चामुण्डा' के नाम से विख्यात होगी।'